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अध्याय 7: पटाक्षेप

13 अगस्त 2023

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सी० आई० डी० विभाग में मेरा यथेष्ट मान था। अपने आश्चर्यजनक कार्यों से मैंने अपने डिपार्टमेंट में खलबली मचा दी थी। चारों ओर मेरी धूम थी। मैंने ऐसे-ऐसे गुप्त भेद खोले थे जिनके कारण मेरी कार्यपटुता और बुद्धिमत्ता का लोहा गवर्नमेंट मान गई थी । जो कार्य जासूसी - विभाग में कोई कर्मचारी न कर पाता, वह मेरे सुपुर्द किया जाता था । इस प्रकार जासूसी दुनिया में मेरी शोहरत थी ।

कीर्ति के साथ लक्ष्मी भी मुझपर प्रसन्न थी । दुःसाध्य कार्यों के बड़े-बड़े पारितोषिक प्राप्त होते थे। मेरी जैसी वेतन में वृद्धि किसी भाग्यशाली को ही मिली होगी । अतः मेरे जीवन में आराम और ऐश्वर्य के पर्याप्त साधन मौजूद थे । कीमती - कीमती पोशाकें पहिनता, राजे-महाराजों के मुकाबिले का भोजन करता ।

मेरे रहने का बंगला भी मेरे यश और वैभव के अनुकूल ही था। दीवारों पर लगे हुए कद्दे-आदम आईने और बहुमूल्य कलापूर्ण चित्र आंखों में चकाचौंध उत्पन्न करते थे । कमरों में फारस के गुलगुले गलीचों का फर्श बिछा था । चारों ओर के बरामदों में संगमरमर का सुन्दर चिकना फर्श था, जिसपर चलते समय फिसलने का भय बना रहता था । बिजली की बत्तियों के झल-मल करते हुए झाड़ छतों में लटकते थे । कमरे खुशनुमा गुलदस्तों और सुगन्धित लेवेन्डरों की सुगन्धि से भरे रहते थे । दरवाज़े पर रंग-बिरंगे बूटेदार विदेशी रेशम के परदे शोभा बढ़ा रहे थे । अद्भुत कारीगरी का फर्निचर सोने में सुगन्ध का काम करता था । 'डायनिंग हाल' की टेबिलों पर चमचमाते शीशों के गिलास और भांति-भांति की कीमती शराब की बोतलें करीने से चुनी रहती थीं ।

अपनी कार्यपटुता और बुद्धि के बल पर यथेष्ट धन कमाता और दोनों हाथों से रुपया लुटाता, संसार ही में स्वर्गीय सुख का मैं आनन्द उठाता था ।

चारों ओर विप्लवकारियों की धूम थी। आज इस षड्यन्त्र का भाण्डा फूटा, इतने नवयुवक गिरफ्तार हुए, कल अमुक केस में, किसी को बीस वर्ष की सज़ा किसी को काला पानी और फांसी । उन दिनों अख़बारों के कालम के कालम इसी विषय में रंगे रहते थे । और बड़े-बड़े गुप्त षड्यन्त्रों का भाण्डा-फोड़ करने का सेहरा मेरे ही सिर रहता था ।

किसी षडयन्त्र का किंचित् भी समाचार मिलने से, जबतक मैं पूर्णतः उस रहस्य को ढूंढ़ न निकालता मुझे चैन न मिलता था। इस छान-बीन में मुझे कष्ट भी कम नहीं उठाने पड़ते थे । ज़ायकेदार कबाब - कोरमे के स्थान पर महीनों सूखी दाल-रोटी पर ही निर्भर रहना पड़ता था। शराब के महीनों दर्शन न होते थे। मुलायम मखमली गद्दों के स्थान पर सूखी घास के बिछौने पर ही सन्तोष करना पड़ता था ।

‘उक्त गिरोह में सम्मिलित हुए बिना भीतरी भेद पाना असम्भव है ।' बस, तुरन्त ही बंगाली कुर्ता पहनकर मुझे बंगाली बनते देर न लगती थी । किस की सामर्थ्य थी, जो मेरे बहुरूपियेपन पर किंचित् भी सन्देह करने का साहस करता ? कौम के प्रति सहानुभूति के भाव प्रकट करने बैठता तो लोगों के हृदय में अपने पति श्रद्धा का स्त्रोत बहा देता ।

देश की दुर्दशा का रोना रोता तो नवयुवकों की रग-रग जोश से फड़क उठती । आज़ादी के वह ज़ोरदार तराने अलापता कि नीरस हृदय भी फड़क उठते- 'हाय हमारी मातृभूमि गुलामी की बेड़ियों में जकड़ी है और हम बेहोशी की नींद सो रहे हैं, हमारे देश के अधिकांश निवासी भूखों मर रहे हैं, उन्हें दिन में एक समय भी आधे पेट भोजन मयस्सर नहीं होता, और हम नवयुवक इस अन्याय को आंखों देखकर भी ख़ामोश बैठे हैं ! धिक्कार है हमारे इस जीवन को !

भाइयों ! हम बहुत सो चुके, अब हमें कार्य-क्षेत्र में अग्रसर होना चाहिए। रूस का इतिहास हमारे सामने है। भारत माता हमारी कायरता पर खून के आंसू रो रही है । बस, बहुत जुल्म सह लिया । अब उठो, वीरता का जामा पहिनो और साहस से काम लो । विजय हमारे साथ है। याद रखो, हम नवयुवक ही भारत को आज़ाद कर सकते हैं । ये बड़े-बड़े प्रसिद्ध लीडर कुछ नहीं । स्वयं गांधीजी भी कुछ नहीं कर सकते । इन लोगों में अभी वास्तविक शक्ति ही जाग्रत नहीं हुई है। अहिंसा के नारे बुलन्द करके जनता को कायरता का पाठ पढ़ा रहे हैं ।'

मेरे इन शब्दों में वह जादू था जो नवयुवकों के दिलों पर बिजलियां गिराता था । मुझपर सन्देह करना तो दूर रहा, भोले नवयुवक मुझे अपने दल का मुखिया बनाने को व्यग्र हो उठते थे। मैं भी देश-भक्त सैनिक के रूप में उक्त पार्टी का सरदार बन बैठता । मेरे कारण एक के स्थान पर दस और एकत्रित हो जाते थे । और अवसर आने पर नाटक का पर्दा उलटकर मैं पंख झाड़ अलग खड़ा हो जाता था । मेरे लिए मानो कुछ हुआ ही नहीं ।

गवर्नमेंट से पुरस्कार मिलते, प्रशंसा मिलती और जासूसी विभाग के आदमी बधाई के तार भेजते । मैं फूला न समाता । गवर्नमेन्ट प्रशंसा के तगमे बख्शीश करती। मैं गर्व की हँसी हँसता था। अदालत मेरे फंसाये शिकारों को मौत के घाट उतारती, मैं उन्हें देखकर मुस्कराता ।

अनेक माताओं के भोले-भाले लाल मेरे कौशल से ख़ाक में मिल जाते, कितने घर तबाह हो जाते, कितनी बहनें विधवा हो जातीं, कितनी माताएं पुत्रहीना बन जाती किन्तु मुझे इसका किंचित भी मलाल न था। देश को प्रज्वलित अग्नि की भट्टी में झोंक कर निर्दोष भाइयों के खून से हाथ रंग कर ही मैं सन्तुष्ट था ।

अपने सिवा मैं कानून को भी तो अन्याय करने को विवश करता था -- न्याय के सम्मुख ऐसे भीषण षड्यन्त्र रचे जाने का अभियोग है। वह षड्यन्त्र- कारियों को दंड देगा ही । पर कौन जाने इस षडयन्त्र के निर्माण में सबसे अधिक भाग तो मेरा ही है। मेरे काले कारनामे देखे जायं, तो संसार के देशद्रोहियों में, विश्वासघातकों में मेरा नाम सर्वोच्च रहेगा। अनेक षड्यन्त्रों की तो बुनियाद ही मेरे द्वारा पड़ती थी। मेरा ध्येय था अपनी कारगुज़ारी दिखाना और धन कमाना । अधिक क्या कहूं, मेरे कारनामों पर परदा पड़ा रहना ही उचित है, कदाचित गवर्नमेन्ट भी मेरे भेद जानती, तो फांसी से कम सज़ा न देती ।

सन् १९३० का ज़माना आया, और देश ने महान् क्रान्ति के में प्रवेश किया । महात्मा गान्धी के नमक कानून तोड़ते ही देश भर में आन्दोलन की आंधी आ गई । सारा देश परिवर्तन का बाना पहिन सत्याग्रह संग्राम में अग्रसर हुआ, जासूसी विभाग में हलचल मच गई। कांग्रेस सम्बन्धी गुप्त समाचार संग्रह करने को अनेक सी० आई० डी० विभाग अलग स्थापित किए गए। मेरा भी सम्बन्ध ऐसे ही एक विभाग से था ।

सत्याग्रह-आन्दोलन कांग्रेस का खुला युद्ध था । अहिंसात्मक युद्ध में गुप्त बातों की आवश्यकता ही नहीं थी, किन्तु गवर्नमेंट तो साधारण-से- साधारण बात की भी  जानकारी और प्रमाण रखने को व्यग्र थी । प्राणपण से आन्दोलन दबाने की चेष्टा की जा रही थी । कर्मचारी हैरान थे। राज्य की सत्ता हिली जा रही थी ।

मैं तन-मन से अपने कार्य में लग गया। इस बार भी देश-भक्ति का नाश करना था; परन्तु दूसरे सिद्धान्त पर जब मार-काट क्रान्ति, विद्रोह और बमबाजी का सबक नवयुवकों को पढ़ाया था —- इस बार अहिंसा का नाट्य करना था । मेरे लिए दुर्लभ कुछ भी नहीं था । खद्दर का कुर्ता और गान्धी टोपी पहिन कर स्वयंसेवकों में नाम लिखा लिया । अपनी बुद्धिमत्ता से लोगों पर प्रभाव जमाते देर नहीं लगी । जो कार्य मेरे सुपुर्द किया जाता, जान लगा कर उसे पूरा करता ।

नंगे-पांव गांव-गांव घूमकर आंधी-पानी की उपेक्षा करके कांग्रेस का प्रचार करता । इस परिश्रम के बल पर उस जिले में मेरा नाम हो गया । स्वयंसेवक से लेकर नेतागण तक मेरा सम्मान करने लगे ।

वह समय भी शीघ्र आया जब मैं सत्याग्रहियों का कमान्डर नियुक्त हुआ । अन्धा क्या चाहे दो आंखें । कमान्डर के रूप में हर स्थान पर मेरी पहुंच हो गई । कई बार कमेटी की मीटिंग में जाता और दूसरे ही दिन सारे कार्यक्रम पर पानी डाल आता । कार्यकर्ता हैरान होते कि किस प्रकार हमारे सारे गुप्त कार्यक्रम का पुलिस को पता लग गया । सबके सम्मुख अधिक आश्चर्य मैं ही प्रकट करता । कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी पर स्टेज पर खड़ा होकर जनता के बीच में गवर्नमेन्ट की नीति की निन्दा करता, और सी० आई० डी० के कर्मचारियों को खूब जली-कटी सुनाता । जनता मेरी जोशीली स्पीच सुनकर 'जय' के नारे लगाती। मैं अपनी कुटिलता पर मन-ही-मन मुस्कराता ।

दोनों ओर मेरी तूती बोल रही थी। जनता की आंखों में मैं कौम पर मिटनेवाला सैनिक, देश का सच्चा हितैषी और गवर्नमेन्ट की आंखों में चतुर जासूस, सांम्राज्य का खैरख्वाह ।

मेरे द्वारा देश का कितना अहित हुआ, उसका अनुमान मैं स्वयं ही कर सकता हूं। चारों ओर मेरे सिखाये चेले अपने कार्य को सफल बनाने में लगे थे। जब कांग्रेस का बड़ा समुदाय जेल के बन्धन में जकड़ दिया गया, तो मुझे खुलकर खेलने का अवसर मिला । अब तो मैं भोले ग्रामीण सत्याग्रहियों का नेता बन गया था । जनता में जोश उत्पन्न करके नित्य नये उत्पात खड़े करता । जनता पर लाठी चलवाना, गोलियां चलवाना मेरा उद्देश्य था । 

मैं इस आन्दोलन पर विचार करता, तो देश-भक्तों की मूर्खता पर खूब हंसता । लोगों को क्या हो गया है, कैसे मूर्ख हैं लोग! एक जोशीली स्पीच सुनी और पिघल गये । बड़े-बड़े पढ़े-लिखे विद्वानों की चेतना शक्ति नष्ट हो गई है । व्यर्थ ही अपना नाश कर रहे हैं। बड़ी-बड़ी तनख्वाहें पानेवाले भी नौकरी से इस्तीफा देकर कांग्रेस के चक्कर में फंस जाते हैं। यह समय साहसपूर्वक धन कमाने का है । हमारे अनेक पुलिस के कर्मचारी निरे डरपोक और कायर हैं। लाठी चार्ज के समय इनके हाथ नहीं उठते, आंसू बहाने लगते हैं, कोई इस्तीफा देता फिरता है, कोई अपने को धिक्कारता है । ये मूर्ख समझते ही नहीं कि जीवन में तरक्की का कितना महत्त्व है ।

विद्वानों का कहना है, यह सत्य की लड़ाई है, न्याय का युद्ध है, इस कारण मन स्वतः ही इस ओर आकृष्ट होता है। किन्तु सब गपोड़ है; कुछ नहीं सब मूर्खता है, केवल मूर्खता । मैं भी तो हाड़-मांस का पुतला हूं, मेरे ऊपर प्रभाव क्यों नही होता ? बड़े-बड़े लीडरों के प्रभावशाली व्याख्यान मैंने सुने हैं। लोगों को लाठी खाते मैंने अपनी आंखों देखा है । गोलियां चलीं, कितने हताहत हुए। घर उजड़ गये, बच्चे अनाथ हुए, स्त्रियां विधवा हुईं। उन लोगों का करुण चीत्कार मैंने अपने कानों से सुना है, उनकी दीन दशा अपनी आंखों से देखी है, किन्तु मेरे विचारों में लेशमात्र भी परिवर्तन नहीं हुआ । फिर कैसे मानूं कि सत्याग्रहियों में कुछ सामर्थ्य है, अहिंसा में बल है, महात्मा गान्धी में अद्भुत शक्ति है

सत्याग्रही नायक के नाते मुझे भी जेल का दण्ड मिला । किन्तु वहां मुझे कुछ कष्ट न था । सरकार की ओर से निजी तौर पर मुझे हर प्रकार की सुविधाएं प्राप्त मैं साधारण राजनैतिक बन्द्रियों से अलग रखा जाता था । सत्याग्रहियों का अनुमान था कि सरकार की आंखों में मैं भयंकर कार्यकर्ता हूं, इसलिए सबसे अलग रखा जाता हूं।

एकान्त में बैठे-बैठे भी मैं एक षड्यन्त्र का आयोजन कर रहा था। तीसरे चौथे दिन मुझे अन्य राजनैतिक बन्दियों की बैरक में जाने की सुविधा प्राप्त थी। गांववालों के मन में मेरे प्रति श्रद्धा थी। जेल जाने पर वह श्रद्धा और अधिक बढ़ गई । जन्मभूमि के उन भोले-भाले पुजारियों को मैंने ऐसा अनुमान करा दिया था कि मैंने भूख-हड़ताल आदि करके ही उन लोगों के समीप आने की सुविधा प्राप्त की है। जेल में भी मैं ग्रामीण सत्याग्रहियों का नेता बना हुआ था । सत्याग्रहियों को थोड़ी उत्तेजना  देकर मैंने एक महान् भयंकर काण्ड उपस्थित कर दिया । राजनैतिक बन्दियों को भोजन अत्यन्त खराब मिल रहा था। कई बार वे लोग जेल - कर्मचारियों से खाने की शिकायत कर चुके थे, रोटी कच्ची होती है, दाल में आधे कंकड़ होते हैं, किन्तु कुछ सुनवाई नहीं हुई । मैंने सबको अनशन करने का परामर्श दिया । बन्दियों ने नतमस्तक होकर अपने कमान्डर के आदेश का पालन किया ।

भूख हड़ताल के चार दिन शान्ति से व्यतीत हो गए । अवसर देख कर मैं पहुंचा और भूखे शेरों को छेड़ दिया – “भाइयों, चार दिन हो गए, जेल - कर्मचारियों ने अबतक तुम्हारी सुविधा का ध्यान नहीं किया, निराहार अवस्था में भी तुमसे पूरी मशक्कत ली जाती है । वीरो, इस अन्याय के प्रति हमें विद्रोह करना होगा । आज से मशक्कत करने से इन्कार कर दो, और जेलर साहब से कह दो -- 'हम पशुओं की भांति बैरक के अन्दर बन्द नहीं रहेंगे ।' यदि जेल कर्मचारी जबरन बन्द करें, तो बैरक के दरवाजे तोड़ फेंको। याद रखो, अपने निश्चय में अन्तर न आने पाये । सत्याग्रहियों का ध्येय है, जान चली जाय लेकिन आन न जाय ।”

दूसरे दिन प्रातःकाल सारी जेल में हाहाकार मच गया । ख़तरे का घण्टा बजा । जेल-कर्मचारियों के अतिरिक्त पुलिस भी बड़ी संख्या में एकत्रित हो गई । राजनैतिक बन्दियों में से अनेक होनहार नवयुवकों को हथकड़ी - बेड़ी पहिनाकर काल - कोठरी में बन्द कर दिया गया। केस चला । भिन्न-भिन्न प्रकार के दण्ड और कई व्यक्तियों को तीस-तीस बेतों के दण्ड की व्यवस्था की गई। बेतों के दण्ड का समय आया, नादिरशाही का दृश्य उपस्थित हुआ। जल्लादी कोड़े पीठों पर पैशाचिकता का पूर्ण गति से नृत्य करने लगे । कोड़े खानेवाले सत्याग्रहियों ने शरीरों से मांस की धज्जियां उड़ते समय भी — 'भारत माता की जय' के नारे लगा-लगा कर वीरता का प्रवाह बहाने में कुछ उठा नहीं रखा। किन्तु उस मानवता के प्रतिकूल भयानक काण्ड से सारे राजबन्दियों के हृदय दहल गये। सब पर आतंक छा गया ।

मुझे रिपोर्ट मिली, इस काण्ड से जनता में महान् आतंक छा गया है, आन्दोलन में शिथिलता आ गई है । सरकार ने अब अपना दमनचक्र घुमाकर स्थिति पर काबू पाने का निश्चय किया है ।

मैं जेल में एक वृक्ष के नीचे बैठा अपनी बुद्धि की सराहना कर रहा था - बुद्धि का यह चमत्कार कुछ करके रहेगा। इस आन्दोलन का नामोनिशान मिटा देगा। सारे देश के इन परवानों का रक्त ठण्डा पड़ जायगा । 

उसी समय टूटती आवाज़ में 'भारत माता की जय' के एक करुण चीत्कार ने मेरा ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया । हृदय में एकदम बिजली-सी टूट गई। जान पड़ा इस स्वर से मेरा कुछ सम्बन्ध है । उधर दृष्टि पड़ते ही मेरे मुख से चीख निकल गई— " उमेश !"

मैं बौखला कर उधर झपटा। मेरा उमेश खून से लथपथ 'जय' बोलते हुए पृथ्वी पर बेहोश होकर गिर पड़ा था। शरीर के बड़े-बड़े घावों से मांस के लोथड़े लटक रहे थे । सिर फट गया था, उसमें से रक्त की धारा बह रही थी। मेरे हृदय में आग के शोले उठने लगे, आंखों से चिनगारियां निकलने लगीं। वे पुलिस के कर्मचारी जो इस दशा में मेरे उमेश को गिरफ्तार करके लाये थे, मुझे जल्लाद सदृश दीख रहे थे । मैंने चाहा कि इन सब नर - पिशाचों का खून पी लूं । किन्तु हृदय के साथ ही मेरा शरीर कांपने लगा। आंखें स्वतः ही बन्द हो गई। जीवन में प्रथम बार मैंने अनुभव किया पीड़ा की ज्वलन्त ज्वाला को ।

उमेश को स्ट्रेचर पर डाल कर जेल - अस्पताल में पहुंचाया गया । उसके सिरहाने बैठे हुए अतीत के मेरे अपने कारनामे सजीव होकर आंखों के सामने घूमने लगे । मस्तिष्क अपने कृत्यों की विशद व्याख्या करके उनके परिणामों के चित्र बना-बनाकर आंखों को प्रदर्शन देने लगा। देश वासियों के साथ ही मैं अपने परिवार वालों के समक्ष देश भक्ति का नाट्य कर रहा था। मेरी गिरफ़्तारी का मेरे एकमात्र पुत्र उमेश पर भी प्रभाव हुआ । वह कॉलिज छोड़ कर आन्दोलन में सम्मिलित हो गया, और लाठी, गोली चलने के भीषण काण्ड में उपस्थित होने के कारण इस दशा को प्राप्त हुआ ।

उसका कोमल हृदय और शरीर उस पैशचिकता के प्रहार को सहन नहीं कर सका। रात्रि के मध्यान्ह में उसके हृदय की गति रुक गई। हृदय के हाहाकार ने मेरी धूर्तता और विश्वासघात का परदा उठा कर उनके नग्न सत्य का दर्शन करा दिया । वह सत्य हृदय में कोड़े मार-मार कर मुझे पश्चात्ताप के तीव्र निदाघ में जलाने लगा ।

अब तो आनन्द और सुख का संसार मेरे लिए रौरव नरक बन गया है । 

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रचनाएँ
सप्तदशी
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