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देहमान

29 अप्रैल 2022

17 बार देखा गया 17

उत्तर दिशा को

अकेले न जाना

लाड़िली,

वहाँ

गंधर्व किन्नर रहते हैं ।

चाँदनी की मोहित खोहों में

ओसों के

दर्पण-से सरोवर हैं,

द्वार पर

झीने कुहासों के परदे पडे हैं ।

उत्तर दिशा में

अपनी वीणा न ले जाना

बावरी,

वहाँ अप्सर रहते हैं ।

वे मन के तारों में

ऐसे बोल छेड़ते हैं,

देह लाज छूट जाती है ।

प्राणों की गुहाएं

आनंद निर्झरों से

गूँज उठती हैं ।

उत्तर दिशा में

ग्यारह तारों की

भाव वीणा न बजाना

मानिनी,

वहाँ इंद्र रहते हैं ।

रक्त पदम-से

ह्रदय पात्र में

शची

स्वर्णिम मधु ढालती है,

स्वप्नों के मद से

इंद्रियों की नींद

उचट जाती है ।

वहाँ आलोक की भूलभुलैया में

अंधकार

खो जाता है ।

उत्तर दिशा को

ज्ञान शिखर की

अनंत चकाचौध में

देह मान लेकर

अकेले न जाना,

भामिनी,

वहाँ कोई नहीं,

कोई नहीं है ।

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रचनाएँ
कला और बूढ़ा चाँद
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कला और बूढ़ा चाँद छायावादी युग के प्रसिद्ध कवि सुमित्रानंदन पंत का प्रसिद्ध कविता संग्रह है। पंत जी की कविताओं में प्रकृति और कला के सौंदर्य को प्रमुखता से जगह मिली है। इस कृति के लिए पंत जी को वर्ष 1960 में 'साहित्य अकादमी पुरस्कार' द्वारा सम्मानित किया गया था। इस कविता संग्रह का प्रकाशन 'राजकमल प्रकाशन' द्वारा किया गया था। पंत जी की समस्त रचनाएँ भारतीय जीवन की समृद्ध सांस्कृतिक चेतना से गहन साक्षात्कार कराती हैं। उन्होंने खड़ी बोली की प्रकृति और उसके पुरुषार्थ, शक्ति और सामर्थ्य की पहचान का अभिमान ही नहीं चलाया, उसे अभिनंदित भी किया। उनके प्रकृति वर्णन में हृदयस्पर्शी तन्मयता, उर्मिल लयात्मकता और प्रकति प्रसन्नता का विपुल भाव है।
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बूढ़ा चाँद

29 अप्रैल 2022
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बूढ़ा चांद कला की गोरी बाहों में क्षण भर सोया है । यह अमृत कला है शोभा असि, वह बूढ़ा प्रहरी प्रेम की ढाल । हाथी दांत की स्‍वप्‍नों की मीनार सुलभ नहीं,- न सही । ओ बाहरी खोखली समते, न

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. कला

29 अप्रैल 2022
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कला ओ पारगामी गर्जन मौन शुभ्र ज्ञान घन, अगम नील की चिन्ता में मत घुल । यह रूप कला ही प्रेम कला अमरों का गवाक्ष है ।- उस पार की उयोति से तेरा अंतर दीपित कर देगी । तेरी आत्म रिक्तता अक

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वाचाल

29 अप्रैल 2022
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' मोर को मार्जार-रव क्यों कहते हैं मां  ' वह बिल्लीव की तरह बोलता है, इसलिए ! ' ' कुत्ते् की तरह बोलता तो बात भी थी ! कैसे भूंकता है कुत्ताे, मुहल्लां गूंज उठता है, भौं-भौं !' ' चुप रह !'

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इंद्रिय प्रमाण

29 अप्रैल 2022
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शरद के रजत नील अंचल में पीले गुलाबों का सूर्यास्‍त कुम्‍हला न जाय, वायु स्‍तब्‍ध विहग मौन ... ! सूक्ष्‍म कनक परागों से आदिम स्‍मृति सी गूढ गंध अंत में समा गई ! जिस सूर्य मंडल में प्रका

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कब से विलोकती तुमको

29 अप्रैल 2022
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कब से विलोकती तुमको ऊषा आ वातायन से? सन्ध्या उदास फिर जाती सूने-गृह के आँगन से! लहरें अधीर सरसी में तुमको तकतीं उठ-उठ कर, सौरभ-समीर रह जाता प्रेयसि! ठण्ढी साँसे भर! हैं मुकुल मुँदे डालों पर,

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तेरा कैसा गान

29 अप्रैल 2022
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(क) तेरा कैसा गान, विहंगम! तेरा कैसा गान? न गुरु से सीखे वेद-पुराण, न षड्दर्शन, न नीति-विज्ञान; तुझे कुछ भाषा का भी ज्ञान, काव्य, रस, छन्दों की पहचान? न पिक-प्रतिभा का कर अभिमान, मनन कर, मनन,

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अयुगल

29 अप्रैल 2022
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ओ शाश्‍वत दंपति, तुम्‍हारा असीम, अक्षय परस्‍पर का प्‍यार ही मेरा आनंद मंगल और चेतना का आलोक है !

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अनुभूति

29 अप्रैल 2022
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तुम आती हो, नव अंगों का शाश्वत मधु-विभव लुटाती हो। बजते नि:स्वर नूपुर छम-छम, सांसों में थमता स्पंदन-क्रम, तुम आती हो, अंतस्थल में शोभा ज्वाला लिपटाती हो। अपलक रह जाते मनोनयन कह पाते मर्म-

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अज्ञात स्‍पर्श

29 अप्रैल 2022
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शरद के एकांत शुभ्र प्रभात में हरसिंगार के सहस्रों झरते फूल उस आनंद सौन्‍दर्य का आभास न दे सके जो तुम्‍हारे अज्ञात स्‍पर्श से असंख्‍य स्‍वर्गिक अनुभूतियों में मेरे भीतर बरस पड़ता है !

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धेनुएं

29 अप्रैल 2022
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ओ रंभाती नदियो, बेसुध कहाँ भागी जाती हो? वंशी-रव तुम्हारे ही भीतर है। ओ, फेन-गुच्छ लहरों की पूँछ उठाए दौड़ती नदियो, इस पार उस पार भी देखो, जहाँ फूलों के कूल सुनहरे धान से खेत हैं। कल-

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देहमान

29 अप्रैल 2022
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उत्तर दिशा को अकेले न जाना लाड़िली, वहाँ गंधर्व किन्नर रहते हैं । चाँदनी की मोहित खोहों में ओसों के दर्पण-से सरोवर हैं, द्वार पर झीने कुहासों के परदे पडे हैं । उत्तर दिशा में अपनी वीणा न ले

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मधुछत्र

29 अप्रैल 2022
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ओ ममाखियो, यह सोने का मधु कहाँ से लाईं ? वे किस पार के वन थे सद्य: खिले फूल ? जिनकी पंखुड़ियां अंजलियों की तरह अनंत दान के लिए खुली रहती हैं । कितने स्रष्टा स्वप्न द्रष्टा चितवन तूली से

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खोज

29 अप्रैल 2022
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सांझ के धुंधलके में धीमी धीमी टिनटिनाती घंटियों की ध्वनि किन अनजान चरागाहों से आ रहीं है । भेड़ों के झुंड-सी अवचेतन की घाटियों में छिपी परंपराओं को संस्कार अपने अभ्यास की पैतृक लाठी से हा

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अमृत क्षण

29 अप्रैल 2022
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यह वन की आग है । डाल डाल पात पात जल रहे हैं । कोपलें चिनगियों-सी चटक रही हैं । शुभ्र हरी लपटें लाल पीली लपटें ऋतु शोभा को चूमती चाटती बढ़ती जाती हैं... आनंद सिन्धु सुलग उठा है । ओ वन

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शरद शील

29 अप्रैल 2022
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शरद आ गई है श्वेत कृष्ण बलाकों की मदिर चितवन लिए, शरद छा गई । स्वच्छ जल नील नभ उसी का कक्ष है । कांसों की दूध फेन सेज पर चंदिरा सोई है । गौर पद्म सरोवर उठता गिरता उसी का वक्ष है । यह प

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रिक्त मौन

29 अप्रैल 2022
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मैंने हिमालय के शुभ्र श्वेत मौन को फूँका, मानस शंख से छोटा था वह । सूरज ने प्रकाश चाँद ने चाँदनी लुटाई, हिमालय की सतरंग देह मेरी छाया निकली । स्वर्ग शोभा कनक गौर उभरे उरोजों को पीन ज

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रिक्त मौन

29 अप्रैल 2022
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मैंने हिमालय के शुभ्र श्वेत मौन को फूँका, मानस शंख से छोटा था वह । सूरज ने प्रकाश चाँद ने चाँदनी लुटाई, हिमालय की सतरंग देह मेरी छाया निकली । स्वर्ग शोभा कनक गौर उभरे उरोजों को पीन ज

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सहज गति

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तुम्हारी वेणी के प्रकाश नीड़ में मैरे स्वप्न चहकते हैं, ओ शुभ्र नीलिमे । जब तक अंधकार है प्रकाश भी है । तुम्हारे पथ की बाधा है ज्ञान, सबसे बडा अज्ञान । वैसे तुम चीन्ही हो, चिर परिचित हो ।

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दृष्टि

29 अप्रैल 2022
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अमृत सरोवर में रति सागर में डूब मैं पूर्ण हो गया । किसी वृहत् शतदल का पराग है यह स्वर्ण धूलि, इसके कण कण में मधु है । यह नील अंत: स्पर्शी एकाग्र दृष्टि है, जिसमें अनंत सृजन स्वप्न मचल रह

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मुख

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सिन्धु मेरी हथेली में समा जाते हैं, उन्हें पी जाता हूँ मैं, जब प्यासा होता हूँ । प्राणों की आग में गल कर, मैं ही उन्हें भरता हूँ । जब सूख जाते हैं वे । सोने के दर्पण सी दमकती प्राणों की आग

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अनुभूति

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तुम आती हो, नव अंगों का शाश्वत मधु-विभव लुटाती हो। बजते नि:स्वर नूपुर छम-छम, सांसों में थमता स्पंदन-क्रम, तुम आती हो, अंतस्थल में शोभा ज्वाला लिपटाती हो। अपलक रह जाते मनोनयन कह पाते मर्म-

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अज्ञात स्‍पर्श

29 अप्रैल 2022
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शरद के एकांत शुभ्र प्रभात में हरसिंगार के सहस्रों झरते फूल उस आनंद सौन्‍दर्य का आभास न दे सके जो तुम्‍हारे अज्ञात स्‍पर्श से असंख्‍य स्‍वर्गिक अनुभूतियों में मेरे भीतर बरस पड़ता है ।

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प्रज्ञा

29 अप्रैल 2022
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वन फूलों में मैंने नए स्वप्न रंग दिए, कल देखोगे । कोकिल कंठ में नयी झंकार भर दी कल सुनोगे । ये तितलियों के पंख वन परियों को दे दो ; चेतने, तुम्हारी शोभा विदेह चाँदनी है, अपना ही परिधान ।

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प्रेम

29 अप्रैल 2022
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मैंने गुलाब की मौन शोभा को देखा । उससे विनती की तुम अपनी अनिमेष सुषमा की शुभ्र गहराइयों का रहस्य मेरे मन की आँखों में खोलो । मैं अवाकू रह गया । वह सजीव प्रेम था । मैंने सूँघा, वह उन्

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यज्ञ

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यह ज्योति दुग्ध है, शुभ्र, तैल धारवत्, जो शील है, अमृत । ओ मुग्धाओ, ओ शोभाओ, अपना तारुण्य अर्पित करो रचना मंगल को । यह मानवता का यज्ञ है, मानव प्रेम का यज्ञ । तुम्हारे कोमल अंग समिधा हो

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अंतर्मानस

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आ:, यह माणिक सरोवर, रजत हरित, अमृत जल अरुण सरोवर । नव सूर्योदय हुआ, अंत: तृष्णाओं के रेशमी कुहासे छंट गए, देह लाज मान मिट गए । आ:, यह उज्जवल लावण्य, रस शुभ्र जल । ज्ञान ध्यान डूब गए, श

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प्रतीक्षा

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नया चाँद निकल आया है अतल गहराइयों से, समुद्र से भी अतल गहराइयों से । स्वप्न तरी पर बैठा स्फटिक ज्वाल, लहरों की रुपहली लपटों से घिरा । रात की गहराइयाँ सूरज को निगल जाती हैं; तभी, चाँद बन आई

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गीत खग

29 अप्रैल 2022
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ओ अवाक् शिखरो, भू के वक्ष-से उभरे, प्रकाश में कसे, दृष्टि तीरों-से तने, हृदय मत बेधो, मर्म मत छेदो । कौन रहश्चंद्र था क्षितिज पर, कैसा तमिस्र सागर ? कव का उद्दाम ज्वार । धरती के उपचेतन

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अयुगल

29 अप्रैल 2022
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ओ शाश्‍वत दंपति, तुम्‍हारा असीम, अक्षय परस्‍पर का प्‍यार ही मेरा आनंद मंगल और चेतना का आलोक है ।

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पट परिवर्तन

29 अप्रैल 2022
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किरणों की सुनहली आभा में लिपटा नील तुम्हारा उत्तरांग और तरंगित सागर मुक्ताफेन जड़ी हरी रेशमी साड़ी पहने तुम्हारी कटि तक डूबी आधी देह है । किसे ज्ञात था, पलक मारते ही ओस के धुएँ के बादल-स

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पारदर्शी

29 अप्रैल 2022
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ओ दुग्ध श्वेत माखन पर्वत के सूर्य, ओ श्वेत कमलों के वन, प्राणों के सुनहले जल,  तुम्हारे सूक्ष्म कोमल उरोज मांसल प्रकाश ने मुझे घेर लिया ! तुम्हारी आभा गुह्य सौरभ है जिसने मेरी इंद्रियों को

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अमृत

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मैं सूर्य की किरणें दुहूँ तुम चाँद की । मैं तुम्हें प्रकाश हूँ तुम प्यार । मैं उच्च पर्वत शिखरों से बोलूं जहाँ पौ फटने के पहिले फालसई नीलिमाओं के कुंज में उषा की सलज लालिमा में लिपटी श्वेत

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कोपलें

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अनाज कोई काम नहीं,  सोने के तार सा खिंचा प्यारा दिन है ! कल  गुलाबों में काट छाँट की थी, तब से  आँखों के सामने नयी नयी कोंपलें फूट रही हैं ! ललछौहीं कोंपलें स्वप्न भरी रतनार चितवन सी,

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पादपीठ

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तुम  किरणों के मुक्ताभ प्यालों में सुनहली हाला लाई हो ! मेरा हृदय  शुभ्र पद्म सा खिल उठा है ! उसमें चंद्रकला ने अंत: प्रेम का  रुपहला नीड़ बना लिया है ! पिघली आग सी हाला नहीं पीएगी वह, अमृत प

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भाव रूप

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अप्सराएँ । हिम कलशों पर साँस प्रात मूँगी लाली, सात लपटों वाली इंद्रधनुष छाया, हेम गौर स्वप्न चरण चाँदनी की रूप हीन शोभा, तितली, जुगनूँ हिलोर, ओस, अप्सराएँ । लीला, लावण्य, तनिमा,- अजान च

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विकास

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नीली नीहारिकाएँ शिखरों की हैं, हरीतिमाएँ, घाटियों की । जिनके आर पार रश्मि छाया सेतु बाँध तुम आती जाती हो । अंत: सौरभ से खिंच भौंरों की भीड़ तुम्हें घेरे गूँजती रहती है । और ये सदियों

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वर्जनाएँ

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तुम स्वर्ण हरित अंधकार में लपेट कर कई रेंगने वाली इच्छाएँ ले आते हो, जिन की रीढ़ उठ नहीं सकती । इनका क्या होगा मैं नहीं जानता । पिटारी खोलते ही टेढ़े मेढ़े सांपों सी ये  धरती भर में फैल जाती

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घर

29 अप्रैल 2022
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समुद्र की सीत्कार भरतीं आसुरी आँधियों के बीच वज्र की चट्टान पर सीना ताने यह किसका घर है ? सुदूर दीप स्तंभ से ज्योति प्रपात बरसाता हुआ !... या जलपोत है ? नाथुनों से फेन उगलतीं अजगर तरंगें

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दंतकथा

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पुरानी ही दुनिया अच्छी पुरानी ही दुनिया । नदी में कमल बह रहे कहाँ से आ रहे ? किनारे किनारे स्रोत की ओर जाते-जाते-देखा, नदी के बीच रंगीन भंवर पड़ा है; उसी से फुहार की तरह कमल बरस रहे हैं

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बिम्ब

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तुम रति की भौं हो कि काम का धनु खंड ? ओ चाँद, यह रेशमी आशा बंध तुम्हीं ने बुना । जिसमें किरणों के असंख्य रंग उभर आए हैं । ओ प्यार के टूटे दर्पण, तुम्हारा खंड खंड पूर्ण है । जिसमें अपूर्ण भ

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इंद्रिय प्रमाण

29 अप्रैल 2022
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शरद के रजत नील अंचल में पीले गुलाबों का सूर्यास्‍त कुम्‍हला न जाय, वायु स्‍तब्‍ध. विहग मौन ... । सूक्ष्‍म कनक परागों से आदिम स्‍मृति सी गूढ गंध अंत में समा गई । जिस सूर्य मंडल में प्रक

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नयी नींव

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ओ आत्म व्यथा के गायक, विश्व वेदना के पहाड़ को तिल की ओट कर, अपने क्षुद्र तिल-से दुख का पहाड़ बनाकर विश्व ह्रदय पर रखना चाहते हो ? अहंता में पथराई निजत्व की दीवार तोड़ी, यह वज्र कपाट तुम्हें

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मूर्धन्य

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ओ इस्पात के सत्य, मनुष्य की नाड़ियों में बह, उसके पैरों तले बिछ, लोहे की टोपी बन उसके सिर पर मत चढ़ । सिर पर फूलों का ही मुकुट शोभा देता है । स्वप्नों से घर की नींव पड़ सकती है, इस्पात  ग

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धर्मदान

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यह प्रकाश है, तुम इसमें क्या खोजोगे, क्या पाओगे ?- यह दीप तुम्हें सौंपता हूँ ! यह अग्नि है, तुम किन आनंदों के यज्ञ करोगे, किन कामनाओं की हवि दोगे ? यह वेदी तुम्हें सौंपता हूँ ! यह प्रक

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सान्निध्य

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तुम्हारी शोभा देख फूलों की आंखें अपलक रह गईं । तुम फूलों की फूल हो, माखन सी कोमल । तुम्हारे शुभ्र वक्ष में मुंह छिपाकर मैं ध्यान की तन्मय अतलताओं में डूब जाता हूँ । ओ कभी न खो जाने वाली

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चाँद

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चाँद ? मैं उसे अवश्य पकड़ूँगा । प्रेम के पिंजड़े में पालूंगा, ह्रदय की डाल पर सुलाऊँगा, प्यार की पंखुड़ी चाह की अँखड़ी चाँद उससे स्वप्नों का नीड़ सजाऊँगा । तुम्हारा ही तो मुकुर है । फूल के मुख

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भाव पथ

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शपथ !  अशुभ न करूँगा, असुंदर न वरूँगा, तुम मुरझा जाती हो ! ओ भावना सखी, तुमने मुझ पर सर्वस्व वार दिया ! मैं दूसरों पर निछावर हो सकूँ ! प्रीति चेतने, जीवन सौन्दर्य तुम्हारी छाया है ! बिना

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प्रकाश

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सुनहली धान की बाली सी दीप शिखाएँ अंधियाली के वृन्त पर कांपतीं, क्या जानें ? हीरक सकोरों में आलोक छटाएँ स्वप्न शीश इंद्रधनुष सी सुलगीं उनकी गूढ़ कथा है । जिसने सूर्य ही का मुख ताका इन्हें

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कालातीत

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वे नीरव नीलिमा घाटियाँ स्वप्नों की हैं । जहाँ शोभा चलती है अशरीरी । आनंद निर्झरी सी हीरक रव । यहाँ शाँति की स्वच्छ सरसी में प्रीति नहाती है, सुनहला परिधान खिसका मुक्ति में डूबी। असीम का

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कीर्ति

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किसी एक की नहीं यह कीर्ति, समस्त मानवता की है ! पूर्व पश्चिम से मुक्त जन भू की प्रतिभू मानवता की । शस्य बालियों भरी, आम्र मंजरियों सजी मुकुट नहीं कीर्ति, मन की  व्यक्तित्व की विभा है !

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भाव

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चंद्रमा मेरा यज्ञ कुंड है, शोभा के हाथ हवि अर्पित करते हैं ! भावना कल्पना स्वप्न प्रेरणा सभी चरु हैं, समिधा हैं, आहुति हैं ! ओ आनंद की लपटो, उठो ! ओ प्रीति, ओ प्रकाश, जगो ! यह सौन्द

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अवरोहण

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मेरी दुर्बल इंद्रियाँ तुम्हारे आनंद का उत्पात नहीं सहेंगी, उन्हें वज्र का बनाओ ! तुम्हारा आनंद समुद्री अतिवात है, मेरे रोम रोम दिशाओं में शुभ्र अट्टहास भर जग की सीमा से टकराकर मंथित हो उठते

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रक्षित

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तुम संयुक्त हो ? फूल के कटोरों का मधु मधुपायी पी गये तो, पीने दो उन्हें ! नया वसंत कल नये कटोरों में नया आसव ढालेगा ! तुम्हारी देह का लावण्य यदि इंद्रिय तृष्णा पी गई हो तो, छक कर पी लेने

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नया देश

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ओ अन्धकार के सुनहले पर्वत, जिसने अभी पंख मारना नहीं सीखा, जो मानस अतलताओं में मैनाक की तरह पैठा है, जिसमें स्वर्ग की' सैकडों गहराइयाँ डूब गई हैं । मैं आज तुम्हारे ही शिखर से बोल रहा हूँ

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रहस्य

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इन रजत नील ऊंचाइयों पर सब मूल्य, सब विचार खो गए । यहाँ के शुभ्र रक्ताभ प्रसारों में मन बुद्धि लीन हो गए । तुम आती भी हो तो अनाम अरूप गंध बन कर, स्वर्णिम परागों में लिपटी आनन्द सौन्दर्य का

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सूर्य मन

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लज्जा नम्र भाव लीन तुम अरुणोदय की अर्ध नत शुभ्र पद्म कली सी लगती हो । औ मानस सुषमे, प्रभात से पूर्व का यह घन कोमल अंधकार तुम्हारा कुंतल जाल सा मुझे घेरे है । सामने प्रकाश के पर्वत पर प

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एक

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नील हरित प्रसारों में रंगों के धब्बों का चटकीला प्रभाव है, शुभ्र प्रकाश अंतर्हित हो गया । सूरज, चाँद और मन प्रकाश के टुकड़े हैं, बहु रूप । दर्पण के टुकड़ों में एक ही छबि है, अपनी छवि ।

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शरद

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श्यामल मेघ रूपहले सूपों की तरह सिन्धु जल की निर्मलता बटोरकर तुम पर उलीचते रहे । ओ सुनहली आग, अविराम वृष्टि से धुलने पर तुम्हारी दीप्ति बढ़ती गई । ओ स्वच्छ अंगों की शरद । तुम्हारे लावण्य

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शंख ध्वनि

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शंखध्वनि गूँजती रहती, सुनाई नहीं पड़ती । त्याग का शुभ्र प्रसार, ध्यान की मौन गहराई, समर्पण की आत्म विस्मृत तन्मयता, आवेग की अवचनीय व्यथा और, प्रेम की गूढ़ तृप्ति शंखध्वनि ,… सुनाई नहीं पड़त

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पद

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केवल शोभा की सृष्टि करो, चाँदनी की अलकों में स्वप्नों का नीड़ बसा कर । केवल प्यार की वृद्धि करो, सांस लेती हिलोरों पर हेम गौर हंस मिथुन सटा कर । केवल आनंद अमृत पिलाओ, वासंती आग के दोने

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वरदान

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सीमा और क्षण को खोज कर हार गया, कहीं नहीं मिले । ओ नि:सीम शाश्वत, मैं रिक्त और पूर्ण से शून्य और सर्व से मुक्त हो गया । जहाँ कुछ न था, कुछ-नहीं भी न था, उसके गवाक्ष से स्वत: ही सुनहली

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अव्यक्त

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देह मूल्यों के नहीं मेरे मनुष्य । रस वृन्त पर खिले, मानस कमल हैं वे, पंक मूल, आत्मा के विकास । मुक्त-दृष्टि भावों के दल आनंद संतुलित । कलुष नहीं छूता उन्हें, रंग गंध वे मधु मरंद, गीत पं

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करुणा

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शब्दों के कंधों पर छंदों के बंधों पर नहीं आना चाहता । वे बहुत बोलते हैं । तब ? ध्यान के यान में सूक्ष्म उड़ान में, रुपहीन भावों में तत्व मात्र गात्र धर खो जाऊँ? अर्थ हीन प्रकाश में लीन हो

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सदानीरा

29 अप्रैल 2022
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तुम्हें नहीं दीखी? बिना तीरों की नदी, बिना स्रोत की सदानीरा। वेगहीन, गतिहीन, चारों ओर बहती, नहीं दीखी तुम्हें जलहीन, तलहीन सदानीरा? आकाश नदी है, समुद्र नदी, धरती पर्वत भी नदी हैं। आक

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फूल

29 अप्रैल 2022
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वह तटस्थ था, अनासक्त, तन्मय । कब पलकें खुलीं, शोभा पंखुरियाँ डुलीं, रंग निखरे, कुम्हलाए, वह अजान था, आत्मस्थ, वृन्तस्थ । गंध की लपटें असीम में समा गईं, स्वर्ण पंख मरदों से धरा योनि भर

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फूल

29 अप्रैल 2022
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वह तटस्थ था, अनासक्त, तन्मय । कब पलकें खुलीं, शोभा पंखुरियाँ डुलीं, रंग निखरे, कुम्हलाए, वह अजान था, आत्मस्थ, वृन्तस्थ । गंध की लपटें असीम में समा गईं, स्वर्ण पंख मरदों से धरा योनि भर

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देन

29 अप्रैल 2022
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काल नाल पर खिला   नया मानव, देश धूलि में सना नहीं । समतल द्वन्द्वों से ऊपर, दिक् प्रसारों के रूप रंग  गंध रज मधु सौम्य पंखड़ियों में संवारे, हीरक पद्म । एक है वह  अंत: स्थित बाह्य संतुलित,  भव

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शील

29 अप्रैल 2022
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ओ आत्म नम्र,  तुम्हें ज्वालाएँ नहीं जलातीं । तुम्हारी छंदों की पायलें उतारे दे रहा हूँ, तुम स्वप्नों के पग धर चुपचाप  भाव कोमल मर्म भूमि पर चल सको । तुम्हारी चापें  न सुनाई दें, पदचिह्न  

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आत्मानुभूति

29 अप्रैल 2022
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कैसे कहूँ  अपने अछूते आँचल में रंगों के धब्बे, मधुपों के षट्पद चिह्न  न पड़ने दे ।  यह कल की बात है । आज  अपनी भीनी शोभा लुटाना चाहे लुटा । मीठी कोमल पंखुरियाँ आँधियाँ दलें-मलें । गौर वर्ण

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रूपांध

29 अप्रैल 2022
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सत्य कथा  सत्य से प्रेम व्यथा  प्रेम से अधिक बढ़ गई । रूपहले बौर  झर न जायें, बने रहें ।  आम्र रस सृष्टि भले न हो । सूनी डालों पर कुहासे घिरे ओस भरे आशा बंध (मानस व्यथा के प्रतीक) पतझर

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वाचाल

29 अप्रैल 2022
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'मोर को  मार्जार-रव क्यों कहते हैं मां' 'वह बिल्ली की तरह बोलता है, इसलिए ।' 'कुत्ते् की तरह बोलता तो बात भी थी । कैसे भूंकता है कुत्ता, मुहल्ला गूंज उठता है, भौं-भौं ।'  'चुप रह !' 'क्यो

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