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गुलाबी चूड़ियाँ / नागार्जुन

17 अप्रैल 2023

18 बार देखा गया 18

प्राइवेट बस का ड्राइवर है तो क्या हुआ,
सात साल की बच्ची का पिता तो है!
सामने गियर से उपर
हुक से लटका रक्खी हैं
काँच की चार चूड़ियाँ गुलाबी
बस की रफ़्तार के मुताबिक
हिलती रहती हैं…
झुककर मैंने पूछ लिया
खा गया मानो झटका
अधेड़ उम्र का मुच्छड़ रोबीला चेहरा
आहिस्ते से बोला: हाँ सा’ब
लाख कहता हूँ नहीं मानती मुनिया
टाँगे हुए है कई दिनों से
अपनी अमानत
यहाँ अब्बा की नज़रों के सामने
मैं भी सोचता हूँ
क्या बिगाड़ती हैं चूड़ियाँ
किस ज़ुर्म पे हटा दूँ इनको यहाँ से?
और ड्राइवर ने एक नज़र मुझे देखा
और मैंने एक नज़र उसे देखा
छलक रहा था दूधिया वात्सल्य बड़ी-बड़ी आँखों में
तरलता हावी थी सीधे-साधे प्रश्न पर
और अब वे निगाहें फिर से हो गईं सड़क की ओर
और मैंने झुककर कहा -
हाँ भाई, मैं भी पिता हूँ
वो तो बस यूँ ही पूछ लिया आपसे
वरना किसे नहीं भाँएगी?
नन्हीं कलाइयों की गुलाबी चूड़ियाँ! 

72
रचनाएँ
वैद्यनाथ मिश्र नागार्जुन की प्रतिनिधि कविताएँ
4.0
वैद्यनाथ मिश्र नागार्जुन की प्रतिनिधि कविताएँ का संकलन।
1

सच न बोलना / नागार्जुन

17 अप्रैल 2023
12
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मलाबार के खेतिहरों को अन्न चाहिए खाने को, डण्डपाणि को लठ्ठ चाहिए बिगड़ी बात बनाने को ! जंगल में जाकर देखा, नहीं एक भी बाँस दिखा ! सभी कट गए सुना, देश को पुलिस रही सबक सिखा ! जन-गण-मन अधिनायक जय

2

सबके लेखे सदा सुलभ / नागार्जुन

17 अप्रैल 2023
6
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गाल-गाल पर दस-दस चुम्बन देह-देह को दो आलिंगन आदि सृष्टि का चंचल शिशु मैं त्रिभुवन का मैं परम पितामह व्यक्ति-व्यक्ति का निर्माता मैं ऋचा-ऋचा का उद्गाता मैं कहाँ नहीं हूँ, कौन नहीं हूँ अजी य

3

शैलेन्द्र के प्रति / नागार्जुन

21 अप्रैल 2023
1
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'गीतों के जादूगर का मैं छंदों से तर्पण करता हूँ ।' सच बतलाऊँ तुम प्रतिभा के ज्योतिपुत्र थे,छाया क्या थी, भली-भाँति देखा था मैंने, दिल ही दिल थे, काया क्या थी । जहाँ कहीं भी अंतर्मन से, ॠतुओं की

4

बार-बार हारा है / नागार्जुन

17 अप्रैल 2023
6
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गोआ तट का मैं मछुआरा सागर की सद्दाम तरंगे मुझ से कानाफूसी करतीं नारिकेल के कुंज वनों का मैं भोला-भाला अधिवासी केरल का वह कृषक पुत्र हूँ ‘ओणम’ अपना निजी पर्व है नौका-चालन का प्रतियोगी मैं धरत

5

यह दंतुरित मुसकान / नागार्जुन

21 अप्रैल 2023
1
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तुम्हारी यह दंतुरित मुस्कान मृतक में भी डाल देगी जान धूली-धूसर तुम्हारे ये गात... छोड़कर तालाब मेरी झोंपड़ी में खिल रहे जलजात परस पाकर तुम्हारी ही प्राण, पिघलकर जल बन गया होगा कठिन पाषाण छू गया

6

संग तुम्हारे, साथ तुम्हारे / नागार्जुन

17 अप्रैल 2023
5
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एक-एक को गोली मारो जी हाँ, जी हाँ, जी हाँ, जी हाँ ... हाँ-हाँ, भाई, मुझको भी तुम गोली मारो बारूदी छर्रे से मेरी सद्गति हो ... मैं भी यहाँ शहीद बनूँगा अस्पताल की खटिया पर क्यों प्राण तजूँगा हाँ

7

फसल / नागार्जुन

21 अप्रैल 2023
2
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एक की नहीं, दो की नहीं, ढेर सारी नदियों के पानी का जादू: एक के नहीं, दो के नहीं, लाख-लाख कोटि-कोटि हाथों के स्पर्श की गरिमा: एक की नहीं, दो की नहीं, हज़ार-हज़ार खेतों की मिट्टी का गुण धर्म:

8

सुन रहा हूँ / नागार्जुन

17 अप्रैल 2023
3
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सुन रहा हूँ पहर-भर से अनुरणन — मालवाही खच्चरों की घण्टियों के निरन्तर यह टिलिङ्-टिङ् टिङ् टिङ्-टिङा-टङ्-टाङ् ! सुन रहा हूँ अनुरणन ! और सब सोए हुए हैं उमा, सोमू, बसन्ती, शेखर, कमल... सभी तो

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अपने खेत में / नागार्जुन

21 अप्रैल 2023
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अपने खेत में.... जनवरी का प्रथम सप्ताह खुशग़वार दुपहरी धूप में... इत्मीनान से बैठा हूँ..... अपने खेत में हल चला रहा हूँ इन दिनों बुआई चल रही है इर्द-गिर्द की घटनाएँ ही मेरे लिए बीज जुटाती ह

10

जंगल में / नागार्जुन

17 अप्रैल 2023
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जंगल में लगी रही आग लगातार तीन दिन, दो रात निकटवर्ती गुफ़ावाला बाघ का खानदान विस्थापित हो गया उस झरने के निकट उसकी गुफ़ा भी दावानल के चपेट में आ गई थी... वो अब किधर भटक रहा होगा ? रात को

11

बाघ आया उस रात / नागार्जुन

21 अप्रैल 2023
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"वो इधर से निकला उधर चला गया" वो आँखें फैलाकर बतला रहा था- "हाँ बाबा, बाघ आया उस रात, आप रात को बाहर न निकलो! जाने कब बाघ फिर से बाहर निकल जाए!" "हाँ वो ही, वो ही जो उस झरने के पास रहता है वह

12

जन मन के सजग चितेरे / नागार्जुन

17 अप्रैल 2023
1
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 कवि केदारनाथ अग्रवाल के लिए हंसते-हंसते, बातें करते कैसे हम चढ़ गए धड़ाधड़ बम्बेश्वर के सुभग शिखर पर मुन्ना रह-रह लगा ठोकने तो टुनटुनिया पत्थर बोला — हम तो हैं फ़ौलाद, समझना हमें न तुम मामूली

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विज्ञापन सुंदरी / नागार्जुन

21 अप्रैल 2023
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रमा लो मांग में सिन्दूरी छलना... फिर बेटी विज्ञापन लेने निकलना... तुम्हारी चाची को यह गुर कहाँ था मालूम! हाथ न हुए पीले विधि विहित पत्नी किसी की हो न सकीं चौरंगी के पीछे वो जो होटल है और उस हो

14

ध्यानमग्न वक-शिरोमणि / नागार्जुन

17 अप्रैल 2023
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ध्यामग्न वक-शिरोमणि पतली टाँगों के सहारे जमे हैं झील के किनारे जाने कौन हैं ‘इष्टदेव’ आपके ! ‘इष्टदेव’ है आपके चपल-चटुल लघु-लघु मछलियाँ... चाँदी-सी चमकती मछलियाँ... फिसलनशील, सुपाच्य... सवे

15

मनुपुत्र दिगंबर / नागार्जुन

21 अप्रैल 2023
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समुद्र के तट पर सीपी की पीठ पर तरंगित रेखाओं की बहुरंगी अल्पना, हलकी! ऊपर औंधा आकाश निविड़ नील! नीचे श्याम सलिल वारुणी सृष्टि! सबकुछ भूल तिरोहित कर सभी कुछ – अवचेतन मध्य खड़े रहेंगे मनुपुत्र

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कोहरे में शायद न भी दीखे / नागार्जुन

17 अप्रैल 2023
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वो गया वो गया बिल्कुल ही चला गया पहाड़ की ओट में लाल-लाल गोला सूरज का शायद सुबह-सुबह दीख जाए पूरब में शायद कोहरे में न भी दीखे ! फ़िलहाल वो डूबता-डूबता दीख गया ! दिनान्त का आरक्त भास्कर

17

नया तरीका / नागार्जुन

21 अप्रैल 2023
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दो हज़ार मन गेहूँ आया दस गाँवों के नाम राधे चक्कर लगा काटने, सुबह हो गई शाम सौदा पटा बड़ी मुश्किल से, पिघले नेताराम पूजा पाकर साध गये चुप्पी हाकिम-हुक्काम भारत-सेवक जी को था अपनी सेवा से काम

18

रातोंरात भिगो गए बादल / नागार्जुन

17 अप्रैल 2023
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मानसून उतरा है जहरी खाल की पहाड़ियों पर बादल भिगो गए रातोंरात सलेटी छतों के कच्चे-पक्के घरों को प्रमुदित हैं गिरिजन सोंधी भाप छोड़ रहे हैं सीढ़ियों की ज्यामितिक आकॄतियों में फैले हुए खेत

19

चमत्कार / नागार्जुन

21 अप्रैल 2023
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पेट-पेट में आग लगी है, घर-घर में है फाका यह भी भारी चमत्कार है, काँग्रेसी महिमा का सूखी आँतों की ऐंठन का, हमने सुना धमाका यह भी भारी चमत्कार है, काँग्रेसी महिमा का महज विधानसभा तक सीमित है, जन

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निराला / नागार्जुन

17 अप्रैल 2023
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बाल झबरे, दृष्टि पैनी, फटी लुंगी नग्न तन किन्तु अन्तर्दीप्‍त था आकाश-सा उन्मुक्त मन उसे मरने दिया हमने, रह गया घुटकर पवन अब भले ही याद में करते रहें सौ-सौ हवन । क्षीणबल गजराज अवहेलि‍त रहा जग-भा

21

नाहक ही डर गई, हुज़ूर / नागार्जुन

21 अप्रैल 2023
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भुक्खड़ के हाथों में यह बन्दूक कहाँ से आई एस० डी० ओ० की गुड़िया बीबी सपने में घिघियाई बच्चे जागे, नौकर जागा, आया आई पास साहेब थे बाहर, घर में बीमार पड़ी थी सास नौकर ने समझाया, नाहक ही दर गई हु

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मोर न होगा ...उल्लू होंगे / नागार्जुन

17 अप्रैल 2023
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नागार्जुन ने यह कविता आपातकाल के प्रतिवाद में लिखी थी। ख़ूब तनी हो, ख़ूब अड़ी हो, ख़ूब लड़ी हो प्रजातंत्र को कौन पूछता, तुम्हीं बड़ी हो डर के मारे न्यायपालिका काँप गई है वो बेचारी अगली गति-विध

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पुलिस अफ़सर / नागार्जुन

21 अप्रैल 2023
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जिनके बूटों से कीलित है, भारत माँ की छाती जिनके दीपों में जलती है, तरुण आँत की बाती ताज़ा मुंडों से करते हैं, जो पिशाच का पूजन है अस जिनके कानों को, बच्चों का कल-कूजन जिन्हें अँगूठा दिखा-दिखाक

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मायावती / नागार्जुन

17 अप्रैल 2023
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मायावती मायावती दलितेन्द्र की छायावती छायावती जय जय हे दलितेन्द्र प्रभु, आपकी चाल-ढाल से दहशत में है केन्द्र जय जय हे दलितेन्द्र आपसे दहशत खाए केन्द्र अगल बगल हैं पण्डित सुखराम जिनके मुख म

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उषा की लाली / नागार्जुन

21 अप्रैल 2023
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उषा की लाली में अभी से गए निखर हिमगिरि के कनक शिखर ! आगे बढ़ा शिशु रवि बदली छवि, बदली छवि देखता रह गया अपलक कवि डर था, प्रतिपल अपरूप यह जादुई आभा जाए ना बिखर, जाए ना बिखर... उषा की लाली म

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प्रतिबद्ध हूँ, संबद्ध हूँ, आबद्ध हूँ / नागार्जुन

17 अप्रैल 2023
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प्रतिबद्ध हूँ संबद्ध हूँ आबद्ध हूँ प्रतिबद्ध हूँ, जी हाँ, प्रतिबद्ध हूँ – बहुजन समाज की अनुपल प्रगति के निमित्त – संकुचित ‘स्व’ की आपाधापी के निषेधार्थ... अविवेकी भीड़ की ‘भेड़या-धसान’ के खिला

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बर्बरता की ढाल ठाकरे / नागार्जुन

17 अप्रैल 2023
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बाल ठाकरे ! बाल ठाकरे !           कैसे फ़ासिस्टी प्रभुओं की --           गला रहा है दाल ठाकरे !       अबे सँभल जा, वो पहुँचा बाल ठाकरे !           सबने हाँ की, कौन ना करे !          छिप जा, मत तू

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प्रेत का बयान / नागार्जुन

17 अप्रैल 2023
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"ओ रे प्रेत -" कडककर बोले नरक के मालिक यमराज -"सच - सच बतला ! कैसे मरा तू ? भूख से , अकाल से ? बुखार कालाजार से ? पेचिस बदहजमी , प्लेग महामारी से ? कैसे मरा तू , सच -सच बतला !" खड़ खड़ खड़ खड़

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जो नहीं हो सके पूर्ण-काम / नागार्जुन

17 अप्रैल 2023
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जो नहीं हो सके पूर्ण-काम मैं उनको करता हूँ प्रणाम । कुछ कुण्ठित औ' कुछ लक्ष्य-भ्रष्ट जिनके अभिमन्त्रित तीर हुए; रण की समाप्ति के पहले ही जो वीर रिक्त तूणीर हुए ! उनको प्रणाम ! जो छोटी-सी नै

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गुलाबी चूड़ियाँ / नागार्जुन

17 अप्रैल 2023
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प्राइवेट बस का ड्राइवर है तो क्या हुआ, सात साल की बच्ची का पिता तो है! सामने गियर से उपर हुक से लटका रक्खी हैं काँच की चार चूड़ियाँ गुलाबी बस की रफ़्तार के मुताबिक हिलती रहती हैं… झुककर मैंने प

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चौथी पीढ़ी का प्रतिनिधि / नागार्जुन

17 अप्रैल 2023
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यहाँ, गढ़वाल में कोटद्वार-पौड़ी वाली सड़क पर ऊपर चक्करदार मोड़ के निकट मकई के मोटे टिक्कड़ को सतृष्ण नज़रों से देखता रहेगा अभी इस चालू मार्ग पर गिट्टियाँ बिछाने वाली मज़दूरिन माँ अभी एक बजे आ

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मैंने देखा / नागार्जुन

17 अप्रैल 2023
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मैंने देखा : दो शिखरों के अन्तराल वाले जँगल में आग लगी है ... बस अब ऊपर की मोड़ों से आगे बढ़ने लगी सड़क पर मैंने देखा : धुआँ उठ रहा घाटी वाले खण्डित-मण्डित अन्तरिक्ष में मैंने देखा : आग लगी

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काले-काले / नागार्जुन

17 अप्रैल 2023
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काले-काले ऋतु-रंग काली-काली घन-घटा काले-काले गिरि श्रृंग काली-काली छवि-छटा काले-काले परिवेश काली-काली करतूत काली-काली करतूत काले-काले परिवेश काली-काली मँहगाई काले-काले अध्यादेश रचनाकाल :

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उनको प्रणाम / नागार्जुन

17 अप्रैल 2023
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जो नहीं हो सके पूर्ण–काम मैं उनको करता हूँ प्रणाम । कुछ कंठित औ' कुछ लक्ष्य–भ्रष्ट जिनके अभिमंत्रित तीर हुए; रण की समाप्ति के पहले ही जो वीर रिक्त तूणीर हुए ! उनको प्रणाम ! जो छोटी–सी नैया

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अकाल और उसके बाद / नागार्जुन

17 अप्रैल 2023
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कई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास कई दिनों तक कानी कुतिया सोई उनके पास कई दिनों तक लगी भीत पर छिपकलियों की गश्त कई दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त। दाने आए घर के अंदर कई दिनों के बाद

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मेरी भी आभा है इसमें / नागार्जुन

17 अप्रैल 2023
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नए गगन में नया सूर्य जो चमक रहा है यह विशाल भूखंड आज जो दमक रहा है मेरी भी आभा है इसमें भीनी-भीनी खुशबूवाले रंग-बिरंगे यह जो इतने फूल खिले हैं कल इनको मेरे प्राणों ने नहलाया था कल इनको मेरे स

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शासन की बंदूक / नागार्जुन

17 अप्रैल 2023
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खड़ी हो गई चाँपकर कंकालों की हूक नभ में विपुल विराट-सी शासन की बंदूक उस हिटलरी गुमान पर सभी रहें है थूक जिसमें कानी हो गई शासन की बंदूक बढ़ी बधिरता दस गुनी, बने विनोबा मूक धन्य-धन्य वह, धन्य

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चंदू, मैंने सपना देखा / नागार्जुन

17 अप्रैल 2023
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चंदू, मैंने सपना देखा, उछल रहे तुम ज्यों हिरनौटा चंदू, मैंने सपना देखा, अमुआ से हूँ पटना लौटा चंदू, मैंने सपना देखा, तुम्हें खोजते बद्री बाबू चंदू,मैंने सपना देखा, खेल-कूद में हो बेकाबू मैंने सप

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बरफ पड़ी है / नागार्जुन

17 अप्रैल 2023
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बरफ़ पड़ी है सर्वश्वेत पार्वती प्रकृति निस्तब्ध खड़ी है सजे-सजाए बंगले होंगे सौ दो सौ चाहे दो-एक हज़ार बस मुठ्ठी-भर लोगों द्वारा यह नगण्य श्रंगार देवदारूमय सहस्रबाहु चिर-तरूण हिमाचल कर सकता है क्

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अग्निबीज / नागार्जुन

17 अप्रैल 2023
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अग्निबीज तुमने बोए थे रमे जूझते, युग के बहु आयामी सपनों में, प्रिय खोए थे ! अग्निबीज तुमने बोए थे तब के वे साथी क्या से क्या हो गए कर दिया क्या से क्या तो, देख–देख प्रतिरूपी छवियाँ पहले

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मोटे सलाखों वाली काली दीवार के उस पार / नागार्जुन

17 अप्रैल 2023
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क्रान्ति सुगबुगाई है करवट बदली है क्रान्ति ने मगर वह अभी भी उसी तरह लेटी है एक बार इस ओर देखकर उसने फिर से फेर लिया है अपना मुँह उसी ओर ’सम्पूर्ण क्रान्ति’ और ’समग्र विप्लव’ के मंजु घोष उसके का

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बातें / नागार्जुन

17 अप्रैल 2023
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बातें– हँसी में धुली हुईं सौजन्य चंदन में बसी हुई बातें– चितवन में घुली हुईं व्यंग्य-बंधन में कसी हुईं बातें– उसाँस में झुलसीं रोष की आँच में तली हुईं बातें– चुहल में हुलसीं नेह–साँचे में ढ

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भोजपुर / नागार्जुन

18 अप्रैल 2023
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1 यहीं धुआँ मैं ढूँढ़ रहा था यही आग मैं खोज रहा था यही गंध थी मुझे चाहिए बारूदी छर्रें की खुशबू! ठहरो–ठहरो इन नथनों में इसको भर लूँ... बारूदी छर्रें की खुशबू! भोजपुरी माटी सोंधी हैं, इसका यह

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जान भर रहे हैं जंगल में / नागार्जुन

18 अप्रैल 2023
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गीली भादों रैन अमावस कैसे ये नीलम उजास के अच्छत छींट रहे जंगल में कितना अद्भुत योगदान है इनका भी वर्षा–मंगल में लगता है ये ही जीतेंगे शक्ति प्रदर्शन के दंगल में लाख–लाख हैं, सौ हजार हैं कौन

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सत्य / नागार्जुन

18 अप्रैल 2023
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सत्य को लकवा मार गया है वह लंबे काठ की तरह पड़ा रहता है सारा दिन, सारी रात वह फटी–फटी आँखों से टुकुर–टुकुर ताकता रहता है सारा दिन, सारी रात कोई भी सामने से आए–जाए सत्य की सूनी निगाहों में जरा भी

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बादल को घिरते देखा है / नागार्जुन

18 अप्रैल 2023
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अमल धवल गिरि के शिखरों पर, बादल को घिरते देखा है। छोटे-छोटे मोती जैसे उसके शीतल तुहिन कणों को, मानसरोवर के उन स्वर्णिम कमलों पर गिरते देखा है, बादल को घिरते देखा है। तुंग हिमालय के कंधों पर

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बाकी बच गया अण्डा / नागार्जुन

18 अप्रैल 2023
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पाँच पूत भारतमाता के, दुश्मन था खूँखार गोली खाकर एक मर गया, बाक़ी रह गए चार चार पूत भारतमाता के, चारों चतुर-प्रवीन देश-निकाला मिला एक को, बाक़ी रह गए तीन तीन पूत भारतमाता के, लड़ने लग गए वो अ

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मेघ बजे / नागार्जुन

18 अप्रैल 2023
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धिन-धिन-धा धमक-धमक मेघ बजे दामिनि यह गयी दमक मेघ बजे दादुर का कण्ठ खुला मेघ बजे धरती का ह्र्दय धुला मेघ बजे पंक बना हरिचंदन मेघ बजे हल्का है अभिनन्दन मेघ बजे धिन-धिन-धा... १९६४ में लि

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घन-कुरंग / नागार्जुन

18 अप्रैल 2023
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नभ में चौकडियाँ भरें भले शिशु घन-कुरंग खिलवाड़ देर तक करें भले शिशु घन-कुरंग लो, आपस में गुथ गए खूब शिशु घन-कुरंग लो, घटा जल में गए डूब शिशु घन-कुरंग लो, बूंदें पडने लगीं, वाह शिशु घन-कुरंग

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फूले कदंब / नागार्जुन

18 अप्रैल 2023
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फूले कदंब टहनी-टहनी में कन्दुक सम झूले कदंब फूले कदंब सावन बीता बादल का कोप नहीं रीता जाने कब से वो बरस रहा ललचाई आंखों से नाहक जाने कब से तू तरस रहा मन कहता है छू ले कदंब फूले कदंब झूले कदं

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खुरदरे पैर / नागार्जुन

18 अप्रैल 2023
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खुब गए दूधिया निगाहों में फटी बिवाइयोंवाले खुरदरे पैर धँस गए कुसुम-कोमल मन में गुट्ठल घट्ठोंवाले कुलिश-कठोर पैर दे रहे थे गति रबड़-विहीन ठूँठ पैडलों को चला रहे थे एक नहीं, दो नहीं, तीन-ती

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अन्न पचीसी के दोहे / नागार्जुन

18 अप्रैल 2023
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सीधे-सादे शब्द हैं, भाव बडे ही गूढ़ अन्न-पचीसी घोख ले, अर्थ जान ले मूढ़ कबिरा खड़ा बाज़ार में, लिया लुकाठी हाथ बन्दा क्या घबरायेगा, जनता देगी साथ छीन सके तो छीन ले, लूट सके तो लूट मिल सकती कै

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तीनों बन्दर बापू के / नागार्जुन

18 अप्रैल 2023
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बापू के भी ताऊ निकले तीनों बन्दर बापू के! सरल सूत्र उलझाऊ निकले तीनों बन्दर बापू के! सचमुच जीवनदानी निकले तीनों बन्दर बापू के! ग्यानी निकले, ध्यानी निकले तीनों बन्दर बापू के! जल-थल-गगन-बिहारी निकल

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आये दिन बहार के / नागार्जुन

18 अप्रैल 2023
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'स्वेत-स्याम-रतनार' अँखिया निहार के सिण्डकेटी प्रभुओं की पग-धूर झार के लौटे हैं दिल्ली से कल टिकट मार के खिले हैं दाँत ज्यों दाने अनार के आए दिन बहार के ! बन गया निजी काम- दिलाएंगे और अन्न दान

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भूले स्वाद बेर के / नागार्जुन

18 अप्रैल 2023
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सीता हुई भूमिगत, सखी बनी सूपन खा बचन बिसर गए गए देर के सबेर के ! बन गया साहूकार लंकापति विभीषण पा गए अभयदान शावक कुबेर के ! जी उठा दसकंधर, स्तब्ध हुए मुनिगण हावी हुआ स्वर्थामरिग कंधों पर शेर के !

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आओ रानी / नागार्जुन

18 अप्रैल 2023
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आओ रानी, हम ढोयेंगे पालकी, यही हुई है राय जवाहरलाल की रफ़ू करेंगे फटे-पुराने जाल की यही हुई है राय जवाहरलाल की आओ रानी, हम ढोयेंगे पालकी! आओ शाही बैण्ड बजायें, आओ बन्दनवार सजायें, खुशियों में

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मंत्र कविता / नागार्जुन

18 अप्रैल 2023
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ॐ श‌ब्द ही ब्रह्म है.. ॐ श‌ब्द्, और श‌ब्द, और श‌ब्द, और श‌ब्द ॐ प्रण‌व‌, ॐ नाद, ॐ मुद्रायें ॐ व‌क्तव्य‌, ॐ उद‌गार्, ॐ घोष‌णाएं ॐ भाष‌ण‌... ॐ प्रव‌च‌न‌... ॐ हुंकार, ॐ फ‌टकार्, ॐ शीत्कार ॐ फुस‌फु

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इन घुच्ची आँखों में / नागार्जुन

19 अप्रैल 2023
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क्या नहीं है इन घुच्ची आँखों में इन शातिर निगाहों में मुझे तो बहुत कुछ प्रतिफलित लग रहा है! नफरत की धधकती भट्टियाँ... प्यार का अनूठा रसायन... अपूर्व विक्षोभ... जिज्ञासा की बाल-सुलभ ताजगी... ठ

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जी हाँ , लिख रहा हूँ / नागार्जुन

19 अप्रैल 2023
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जी हाँ, लिख रहा हूँ ... बहुत कुछ ! बहोत बहोत !! ढेर ढेर सा लिख रहा हूँ ! मगर , आप उसे पढ़ नहीं पाओगे ... देख नहीं सकोगे उसे आप ! दरअसल बात यह है कि इन दिनों अपनी लिखावट आप भी मैं कहॉ पढ़ पात

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घिन तो नहीं आती है / नागार्जुन

19 अप्रैल 2023
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पूरी स्पीड में है ट्राम खाती है दचके पै दचके सटता है बदन से बदन पसीने से लथपथ । छूती है निगाहों को कत्थई दांतों की मोटी मुस्कान बेतरतीब मूँछों की थिरकन सच सच बतलाओ घिन तो नहीं आती है? जी तो न

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कल और आज / नागार्जुन

19 अप्रैल 2023
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अभी कल तक गालियॉं देती तुम्‍हें हताश खेतिहर, अभी कल तक धूल में नहाते थे गोरैयों के झुंड, अभी कल तक पथराई हुई थी धनहर खेतों की माटी, अभी कल तक धरती की कोख में दुबके पेड़ थे मेंढक, अभी कल तक

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भारतीय जनकवि का प्रणाम / नागार्जुन

19 अप्रैल 2023
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गोर्की मखीम! श्रमशील जागरूक जग के पक्षधर असीम! घुल चुकी है तुम्हारी आशीष एशियाई माहौल में दहक उठा है तभी तो इस तरह वियतनाम । अग्रज, तुम्हारी सौवीं वर्षगांठ पर करता है भारतीय जनकवि तुमको प्रणाम ।

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कालिदास / नागार्जुन

19 अप्रैल 2023
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कालिदास! सच-सच बतलाना इन्दुमती के मृत्युशोक से अज रोया या तुम रोये थे? कालिदास! सच-सच बतलाना! शिवजी की तीसरी आँख से निकली हुई महाज्वाला में घृत-मिश्रित सूखी समिधा-सम कामदेव जब भस्म हो गया रत

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तन गई रीढ़ / नागार्जुन

19 अप्रैल 2023
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झुकी पीठ को मिला किसी हथेली का स्पर्श तन गई रीढ़ महसूस हुई कन्धों को पीछे से, किसी नाक की सहज उष्ण निराकुल साँसें तन गई रीढ़ कौंधी कहीं चितवन रंग गए कहीं किसी के होठ निगाहों के ज़रिये जाद

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यह तुम थीं / नागार्जुन

19 अप्रैल 2023
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कर गई चाक तिमिर का सीना जोत की फाँक यह तुम थीं सिकुड़ गई रग-रग झुलस गया अंग-अंग बनाकर ठूँठ छोड़ गया पतझार उलंग असगुन-सा खड़ा रहा कचनार अचानक उमगी डालों की सन्धि में छरहरी टहनी पोर-पोर में

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यह तुम थीं / नागार्जुन

19 अप्रैल 2023
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कर गई चाक तिमिर का सीना जोत की फाँक यह तुम थीं सिकुड़ गई रग-रग झुलस गया अंग-अंग बनाकर ठूँठ छोड़ गया पतझार उलंग असगुन-सा खड़ा रहा कचनार अचानक उमगी डालों की सन्धि में छरहरी टहनी पोर-पोर में

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सुबह-सुबह / नागार्जुन

19 अप्रैल 2023
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सुबह-सुबह तालाब के दो फेरे लगाए सुबह-सुबह रात्रि शेष की भीगी दूबों पर नंगे पाँव चहलकदमी की सुबह-सुबह हाथ-पैर ठिठुरे, सुन्न हुए माघ की कड़ी सर्दी के मारे सुबह-सुबह अधसूखी पतइयों का कौड़ा

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लालू साहू / नागार्जुन

19 अप्रैल 2023
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शोक विह्वल लालू साहू आपनी पत्नी की चिता में कूद गया लाख मना किया लोगों ने लाख-लाख मिन्नतें कीं अनुरोध किया लाख-लाख लालू ने एक न सुनी... 63 वर्षीय लालू 60 वर्षीया पत्नी की चिता में अपने को डालक

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सोनिया समन्दर / नागार्जुन

19 अप्रैल 2023
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सोनिया समन्दर सामने लहराता है जहाँ तक नज़र जाती है, सोनिया समन्दर ! बिछा है मैदान में सोन ही सोना सोना ही सोना सोना ही सोना गेहूँ की पकी फसलें तैयार हैं-- बुला रही हैं खेतिहरों को ..."

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शायद कोहरे में न भी दीखे / नागार्जुन

19 अप्रैल 2023
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वो गया वो गया बिल्कुल ही चला गया पहाड़ की ओट में लाल-लाल गोला सूरज का शायद सुबह-सुबह दीख जाए पूरब में शायद कोहरे में न भी दीखे ! फ़िलहाल वो डूबता-डूबता दीख गया ! दिनान्त का आरक्त भास्कर ज

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फुहारों वाली बारिश / नागार्जुन

19 अप्रैल 2023
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जाने, किधर से चुपचाप आकर हाथी सामने लेट गए हैं, जाने किधर से चुपचाप आकर हाथी सामने बैठ गए हैं ! पहाड़ों-जैसे अति विशाल आयतनोंवाले पाँच-सात हाथी सामने--बिल्कुल निकट जम गए हैं इनका परिमण्डल

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बादल भिगो गए रातोंरात / नागार्जुन

19 अप्रैल 2023
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मानसून उतरा है जहरी खाल की पहाड़ियों पर बादल भिगो गए रातोंरात सलेटी छतों के कच्चे-पक्के घरों को प्रमुदित हैं गिरिजन सोंधी भाप छोड़ रहे हैं सीढ़ियों की ज्यामितिक आकॄतियों में फैले हुए खेत

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