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रश्मिरथी / सप्तम सर्ग / भाग 3

12 मार्च 2022

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इतने में शर के कर्ण ने देखा जो अपना निषङग ,
तरकस में से फुङकार उठा, कोई प्रचण्ड विषधर भूजङग ,
कहता कि ''कर्ण! मैं अश्वसेन विश्रुत भुजंगो का स्वामी हूं,
जन्म से पार्थ का शत्रु परम, तेरा बहुविधि हितकामी हूं .

''बस, एक बार कर कृपा धनुष पर चढ शरव्य तक जाने दे ,
इस महाशत्रु को अभी तुरत स्यन्दन में मुझे सुलाने दे .
कर वमन गरल जीवन भर का सञ्चित प्रतिशोध उतारूंगा ,
तू मुझे सहारा दे, बढक़र मैं अभी पार्थ को मारूंगा .''

राधेय जरा हंसकर बोला, ''रे कुटिल! बात क्या कहता है ?
जय का समस्त साधन नर का अपनी बांहों में रहता है .
उस पर भी सांपों से मिल कर मैं मनुज, मनुज से युध्द करूं ?
जीवन भर जो निष्ठा पाली, उससे आचरण विरुध्द करूं ?''

''तेरी सहायता से जय तो मैं अनायास पा जाऊंगा ,
आनेवाली मानवता को, लेकिन, क्या मुख दिखलाऊंगा ?
संसार कहेगा, जीवन का सब सुकृत कर्ण ने क्षार किया ;
प्रतिभट के वध के लिए सर्प का पापी ने साहाय्य लिया .''

''हे अश्वसेन ! तेरे अनेक वंशज हैं छिपे नरों में भी ,
सीमित वन में ही नहीं, बहुत बसते पुर-ग्राम-घरों में भी .
ये नर-भुजङग मानवता का पथ कठिन बहुत कर देते हैं ,
प्रतिबल के वध के लिए नीच साहाय्य सर्प का लेते हैं .''

''ऐसा न हो कि इन सांपो में मेरा भी उज्ज्वल नाम चढे .
पाकर मेरा आदर्श और कुछ नरता का यह पाप बढे .
अर्जुन है मेरा शत्रु, किन्तु वह सर्प नहीं, नर ही तो है ,
संघर्ष सनातन नहीं, शत्रुता इस जीवन भर ही तो है .''

''अगला जीवन किसलिए भला, तब हो द्वेषान्ध बिगाडं मैं ?
सांपो की जाकर शरण, सर्प बन क्यों मनुष्य को मारूं मैं ?
जा भाग, मनुज का सहज शत्रु, मित्रता न मेरी पा सकता ,
मैं किसी हेतु भी यह कलङक अपने पर नहीं लगा सकता .''

काकोदार को कर विदा कर्ण, फिर बढा समर में गर्जमान,
अम्बर अनन्त झङकार उठा, हिल उठे निर्जरों के विमान .
तूफ़ान उठाये चला कर्ण बल से धकेल अरि के दल को,
जैसे प्लावन की धार बहाये चले सामने के जल को.

पाण्डव-सेना भयभीत भागती हुई जिधर भी जाती थी ;
अपने पीछे दौडते हुए वह आज कर्ण को पाती थी .
रह गयी किसी के भी मन में जय की किञ्चित भी नहीं आस ,
आखिर, बोले भगवान् सभी को देख व्याकुल हताश .

''अर्जुन ! देखो, किस तरह कर्ण सारी सेना पर टूट रहा ,
किस तरह पाण्डवों का पौरुष होकर अशङक वह लूट रहा .
देखो जिस तरफ़, उधर उसके ही बाण दिखायी पडते हैं ,
बस, जिधर सुनो, केवल उसके हुङकार सुनायी पडते हैं .''

''कैसी करालता ! क्या लाघव ! कितना पौरुष ! कैसा प्रहार !
किस गौरव से यह वीर द्विरद कर रहा समर-वन में विहार !
व्यूहों पर व्यूह फटे जाते, संग्राम उजडता जाता है ,
ऐसी तो नहीं कमल वन में भी कुञ्जर धूम मचाता है .''

''इस पुरुष-सिंह का समर देख मेरे तो हुए निहाल नयन ,
कुछ बुरा न मानो, कहता हूं , मैं आज एक चिर-गूढ वचन .
कर्ण के साथ तेरा बल भी मैं खूब जानता आया हूं ,
मन-ही-मन तुझसे बडा वीर, पर इसे मानता आया हूं .''

''औ' देख चरम वीरता आज तो यही सोचता हूं मन में ,
है भी कोई, जो जीत सके, इस अतुल धनुर्धर को रण में ?
मैं चक्र सुदर्शन धरूं और गाण्डीव अगर तू तानेगा ,
तब भी, शायद ही, आज कर्ण आतङक हमारा मानेगा .''

''यह नहीं देह का बल केवल, अन्तर्नभ के भी विवस्वान् ,
हैं किये हुए मिलकर इसको इतना प्रचण्ड जाज्वल्यमान .
सामान्य पुरुष यह नहीं, वीर यह तपोनिष्ठ व्रतधारी है ;
मृत्तिका-पुञ्ज यह मनुज ज्योतियों के जग का अधिकारी है .''

''कर रहा काल-सा घोर समर, जय का अनन्त विश्वास लिये ,
है घूम रहा निर्भय, जानें, भीतर क्या दिव्य प्रकाश लिये !
जब भी देखो, तब आंख गडी सामने किसी अरिजन पर है ,
भूल ही गया है, एक शीश इसके अपने भी तन पर है .''

''अर्जुन ! तुम भी अपने समस्त विक्रम-बल का आह्वान करो ,
अर्जित असंख्य विद्याओं का हो सजग हृदय में ध्यान करो .
जो भी हो तुममें तेज, चरम पर उसे खींच लाना होगा ,
तैयार रहो, कुछ चमत्कार तुमको भी दिखलाना होगा .'' 

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रचनाएँ
रश्मिरथी
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इसमें कुल ७ सर्ग हैं, जिसमे कर्ण के चरित्र के सभी पक्षों का सजीव चित्रण किया गया है। रश्मिरथी में दिनकर ने कर्ण की महाभारतीय कथानक से ऊपर उठाकर उसे नैतिकता और वफादारी की नयी भूमि पर खड़ा कर उसे गौरव से विभूषित कर दिया है। रश्मिरथी में दिनकर ने सारे सामाजिक और पारिवारिक संबंधों को नए सिरे से जाँचा है।
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रश्मिरथी / प्रथम सर्ग / भाग 1

11 मार्च 2022
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'जय हो' जग में जले जहाँ भी, नमन पुनीत अनल को, जिस नर में भी बसे, हमारा नमन तेज को, बल को। किसी वृन्त पर खिले विपिन में, पर, नमस्य है फूल, सुधी खोजते नहीं, गुणों का आदि, शक्ति का मूल। ऊँच-नीच का

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रश्मिरथी / प्रथम सर्ग / भाग 2

11 मार्च 2022
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अलग नगर के कोलाहल से, अलग पुरी-पुरजन से, कठिन साधना में उद्योगी लगा हुआ तन-मन से। निज समाधि में निरत, सदा निज कर्मठता में चूर, वन्यकुसुम-सा खिला कर्ण, जग की आँखों से दूर। नहीं फूलते कुसुम मात्र

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रश्मिरथी / प्रथम सर्ग / भाग 3

11 मार्च 2022
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फिरा कर्ण, त्यों 'साधु-साधु' कह उठे सकल नर-नारी, राजवंश के नेताओं पर पड़ी विपद् अति भारी। द्रोण, भीष्म, अर्जुन, सब फीके, सब हो रहे उदास, एक सुयोधन बढ़ा, बोलते हुए, 'वीर! शाबाश !' द्वन्द्व-युद्ध

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रश्मिरथी / प्रथम सर्ग / भाग 4

11 मार्च 2022
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'पूछो मेरी जाति , शक्ति हो तो, मेरे भुजबल से' रवि-समान दीपित ललाट से और कवच-कुण्डल से, पढ़ो उसे जो झलक रहा है मुझमें तेज-प़काश, मेरे रोम-रोम में अंकित है मेरा इतिहास। 'अर्जुन बङ़ा वीर क्षत्रिय ह

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रश्मिरथी / प्रथम सर्ग / भाग 5

11 मार्च 2022
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'करना क्या अपमान ठीक है इस अनमोल रतन का, मानवता की इस विभूति का, धरती के इस धन का। बिना राज्य यदि नहीं वीरता का इसको अधिकार, तो मेरी यह खुली घोषणा सुने सकल संसार। 'अंगदेश का मुकुट कर्ण के मस्तक

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रश्मिरथी / प्रथम सर्ग / भाग 6

11 मार्च 2022
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लगे लोग पूजने कर्ण को कुंकुम और कमल से, रंग-भूमि भर गयी चतुर्दिक् पुलकाकुल कलकल से। विनयपूर्ण प्रतिवन्दन में ज्यों झुका कर्ण सविशेष, जनता विकल पुकार उठी, 'जय महाराज अंगेश। 'महाराज अंगेश!' तीर-सा

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रश्मिरथी / प्रथम सर्ग / भाग 7

11 मार्च 2022
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'जनमे नहीं जगत् में अर्जुन! कोई प्रतिबल तेरा, टँगा रहा है एक इसी पर ध्यान आज तक मेरा। एकलव्य से लिया अँगूठा, कढ़ी न मुख से आह, रखा चाहता हूँ निष्कंटक बेटा! तेरी राह। 'मगर, आज जो कुछ देखा, उससे ध

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रश्मिरथी / द्वितीय सर्ग / भाग 1

11 मार्च 2022
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शीतल, विरल एक कानन शोभित अधित्यका के ऊपर, कहीं उत्स-प्रस्त्रवण चमकते, झरते कहीं शुभ निर्झर। जहाँ भूमि समतल, सुन्दर है, नहीं दीखते है पाहन, हरियाली के बीच खड़ा है, विस्तृत एक उटज पावन। आस-पास कुछ

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रश्मिरथी / द्वितीय सर्ग / भाग 2

12 मार्च 2022
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श्रद्धा बढ़ती अजिन-दर्भ पर, परशु देख मन डरता है, युद्ध-शिविर या तपोभूमि यह, समझ नहीं कुछ पड़ता है। हवन-कुण्ड जिसका यह उसके ही क्या हैं ये धनुष-कुठार? जिस मुनि की यह स्रुवा, उसी की कैसे हो सकती तलवा

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रश्मिरथी / द्वितीय सर्ग / भाग 3

12 मार्च 2022
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कर्ण मुग्ध हो भक्ति-भाव में मग्न हुआ-सा जाता है, कभी जटा पर हाथ फेरता, पीठ कभी सहलाता है, चढें नहीं चीटियाँ बदन पर, पड़े नहीं तृण-पात कहीं, कर्ण सजग है, उचट जाय गुरुवर की कच्ची नींद नहीं। 'वृद्ध

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रश्मिरथी / द्वितीय सर्ग / भाग 4

12 मार्च 2022
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खड्ग बड़ा उद्धत होता है, उद्धत होते हैं राजे, इसीलिए तो सदा बनाते रहते वे रण के बाजे। और करे ज्ञानी ब्राह्मण क्या? असि-विहीन मन डरता है, राजा देता मान, भूप का वह भी आदर करता है। 'सुनता कौन यहाँ

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रश्मिरथी / द्वितीय सर्ग / भाग 5

12 मार्च 2022
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'सिर था जो सारे समाज का, वही अनादर पाता है। जो भी खिलता फूल, भुजा के ऊपर चढ़ता जाता है। चारों ओर लोभ की ज्वाला, चारों ओर भोग की जय; पाप-भार से दबी-धँसी जा रही धरा पल-पल निश्चय। 'जब तक भोगी भूप प

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रश्मिरथी / द्वितीय सर्ग / भाग 6

12 मार्च 2022
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'वीर वही है जो कि शत्रु पर जब भी खड्ग उठाता है, मानवता के महागुणों की सत्ता भूल न जाता है। सीमित जो रख सके खड्ग को, पास उसी को आने दो, विप्रजाति के सिवा किसी को मत तलवार उठाने दो। 'जब-जब मैं शर-

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रश्मिरथी / द्वितीय सर्ग / भाग 6

12 मार्च 2022
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'वीर वही है जो कि शत्रु पर जब भी खड्ग उठाता है,मानवता के महागुणों की सत्ता भूल न जाता है।सीमित जो रख सके खड्ग को, पास उसी को आने दो,विप्रजाति के सिवा किसी को मत तलवार उठाने दो।'जब-जब मैं शर-चाप उठा कर

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रश्मिरथी / द्वितीय सर्ग / भाग 7

12 मार्च 2022
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'हाय, कर्ण, तू क्यों जन्मा था? जन्मा तो क्यों वीर हुआ? कवच और कुण्डल-भूषित भी तेरा अधम शरीर हुआ? धँस जाये वह देश अतल में, गुण की जहाँ नहीं पहचान? जाति-गोत्र के बल से ही आदर पाते हैं जहाँ सुजान?

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रश्मिरथी / द्वितीय सर्ग / भाग 8

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किन्तु, पाँव के हिलते ही गुरुवर की नींद उचट जाती, सहम गयी यह सोच कर्ण की भक्तिपूर्ण विह्वल छाती। सोचा, उसने, अतः, कीट यह पिये रक्त, पीने दूँगा, गुरु की कच्ची नींद तोड़ने का, पर पाप नहीं लूँगा। ब

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रश्मिरथी / द्वितीय सर्ग / भाग 9

12 मार्च 2022
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'सहनशीलता को अपनाकर ब्राह्मण कभी न जीता है, किसी लक्ष्य के लिए नहीं अपमान-हलाहल पीता है। सह सकता जो कठिन वेदना, पी सकता अपमान वही, बुद्धि चलाती जिसे, तेज का कर सकता बलिदान वही। 'तेज-पुञ्ज ब्राह्

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रश्मिरथी / द्वितीय सर्ग / भाग 10

12 मार्च 2022
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'छल से पाना मान जगत् में किल्विष है, मल ही तो है, ऊँचा बना आपके आगे, सचमुच यह छल ही तो है। पाता था सम्मान आज तक दानी, व्रती, बली होकर, अब जाऊँगा कहाँ स्वयं गुरु के सामने छली होकर? 'करें भस्म ही

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रश्मिरथी / द्वितीय सर्ग / भाग 11

12 मार्च 2022
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'तू ने जीत लिया था मुझको निज पवित्रता के बल से, क्या था पता, लूटने आया है कोई मुझको छल से? किसी और पर नहीं किया, वैसा सनेह मैं करता था, सोने पर भी धनुर्वेद का, ज्ञान कान में भरता था। 'नहीं किया

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रश्मिरथी / द्वितीय सर्ग / भाग 12

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कर्ण विकल हो खड़ा हुआ कह, 'हाय! किया यह क्या गुरुवर? दिया शाप अत्यन्त निदारुण, लिया नहीं जीवन क्यों हर? वर्षों की साधना, साथ ही प्राण नहीं क्यों लेते हैं? अब किस सुख के लिए मुझे धरती पर जीने देते ह

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रश्मिरथी / द्वितीय सर्ग / भाग 13

12 मार्च 2022
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'आह, बुद्धि कहती कि ठीक था, जो कुछ किया, परन्तु हृदय, मुझसे कर विद्रोह तुम्हारी मना रहा, जाने क्यों, जय? अनायास गुण-शील तुम्हारे, मन में उगते आते हैं, भीतर किसी अश्रु-गंगा में मुझे बोर नहलाते हैं।

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रश्मिरथी / तृतीय सर्ग / भाग 1

12 मार्च 2022
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हो गया पूर्ण अज्ञात वास, पाडंव लौटे वन से सहास, पावक में कनक-सदृश तप कर, वीरत्व लिए कुछ और प्रखर, नस-नस में तेज-प्रवाह लिये, कुछ और नया उत्साह लिये। सच है, विपत्ति जब आती है, कायर को ही

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रश्मिरथी / तृतीय सर्ग / भाग 2

12 मार्च 2022
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वसुधा का नेता कौन हुआ? भूखण्ड-विजेता कौन हुआ? अतुलित यश क्रेता कौन हुआ? नव-धर्म प्रणेता कौन हुआ? जिसने न कभी आराम किया, विघ्नों में रहकर नाम किया। जब विघ्न सामने आते हैं, सोते से हमें ज

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रश्मिरथी / तृतीय सर्ग / भाग 3

12 मार्च 2022
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मैत्री की राह बताने को, सबको सुमार्ग पर लाने को, दुर्योधन को समझाने को, भीषण विध्वंस बचाने को, भगवान् हस्तिनापुर आये, पांडव का संदेशा लाये। 'दो न्याय अगर तो आधा दो, पर, इसमें भी यदि बाध

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रश्मिरथी / तृतीय सर्ग / भाग 4

12 मार्च 2022
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'शत कोटि विष्णु, ब्रह्मा, महेश, शत कोटि विष्णु जलपति, धनेश, शत कोटि रुद्र, शत कोटि काल, शत कोटि दण्डधर लोकपाल। जञ्जीर बढ़ाकर साध इन्हें, हाँ-हाँ दुर्योधन! बाँध इन्हें। 'भूलोक, अतल, पाताल द

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रश्मिरथी / तृतीय सर्ग / भाग 5

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भगवान सभा को छोड़ चले, करके रण गर्जन घोर चले सामने कर्ण सकुचाया सा, आ मिला चकित भरमाया सा हरि बड़े प्रेम से कर धर कर, ले चढ़े उसे अपने रथ पर रथ चला परस्पर बात चली, शम-दम की टेढी घात चली

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रश्मिरथी / तृतीय सर्ग / भाग 6

12 मार्च 2022
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"विक्रमी पुरुष लेकिन सिर पर, चलता ना छत्र पुरखों का धर. अपना बल-तेज जगाता है, सम्मान जगत से पाता है. सब देख उसे ललचाते हैं, कर विविध यत्न अपनाते हैं "कुल-गोत्र नही साधन मेरा, पुरुषार्थ

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रश्मिरथी / तृतीय सर्ग / भाग 7

12 मार्च 2022
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"तुच्छ है राज्य क्या है केशव? पाता क्या नर कर प्राप्त विभव? चिंता प्रभूत, अत्यल्प हास, कुछ चाकचिक्य, कुछ पल विलास, पर वह भी यहीं गवाना है, कुछ साथ नही ले जाना है. "मुझसे मनुष्य जो होते हैं,

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रश्मिरथी / चतुर्थ सर्ग / भाग 1

12 मार्च 2022
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प्रेमयज्ञ अति कठिन, कुण्ड में कौन वीर बलि देगा? तन, मन, धन, सर्वस्व होम कर अतुलनीय यश लेगा? हरि के सम्मुख भी न हार जिसकी निष्ठा ने मानी, धन्य धन्य राधेय! बंधुता के अद्भुत अभिमानी। पर, जाने क्यों

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रश्मिरथी / चतुर्थ सर्ग / भाग 2

12 मार्च 2022
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वीर कर्ण, विक्रमी, दान का अति अमोघ व्रतधारी, पाल रहा था बहुत काल से एक पुण्य-प्रण भारी. रवि-पूजन के समय सामने जो याचक आता था, मुँह-माँगा वह दान कर्ण से अनायास पाता था पहर रही थी मुक्त चतुर्दिक य

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रश्मिरथी / चतुर्थ सर्ग / भाग 3

12 मार्च 2022
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गिरा गहन सुन चकित और मन-ही-मन-कुछ भरमाया, लता-ओट से एक विप्र सामने कर्ण के आया, कहा कि 'जय हो, हमने भी है सुनी सुकीर्ति कहानी, नहीं आज कोई त्रिलोक में कहीं आप-सा दानी. 'नहीं फिराते एक बार जो कुछ

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रश्मिरथी / चतुर्थ सर्ग / भाग 4

12 मार्च 2022
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सहम गया सुन शपथ कर्ण की, हृदय विप्र का डोला, नयन झुकाए हुए भिक्षु साहस समेट कर बोला, 'धन की लेकर भीख नहीं मैं घर भरने आया हूँ, और नहीं नृप को अपना सेवक करने आया हूँ. 'यह कुछ मुझको नहीं चाहिए, दे

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रश्मिरथी / चतुर्थ सर्ग / भाग 5

12 मार्च 2022
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'जनमा जाने कहाँ, पला, पद-दलित सूत के कुल में, परिभव सहता रहा विफल प्रोत्साहन हित व्याकुल मैं, द्रोणदेव से हो निराश वन में भृगुपति तक धाया बड़ी भक्ति कि पर, बदले में शाप भयानक पाया. 'और दान जिसके

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रश्मिरथी / चतुर्थ सर्ग / भाग 6

12 मार्च 2022
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'भुज को छोड़ न मुझे सहारा किसी और सम्बल का, बड़ा भरोसा था, लेकिन, इस कवच और कुण्डल का, पर, उनसे भी आज दूर सम्बन्ध किये लेता हूँ, देवराज! लीजिए खुशी से महादान देता हूँ. 'यह लीजिए कर्ण का जीवन और

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रश्मिरथी / चतुर्थ सर्ग / भाग 7

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'हाँ, पड़ पुत्र-प्रेम में आया था छल ही करने को, जान-बूझ कर कवच और कुण्डल तुझसे हरने को, वह छल हुआ प्रसिद्ध किसे, क्या मुख अब दिखलाऊंगा, आया था बन विप्र, चोर बनकर वापस जाऊँगा. 'वंदनीय तू कर्ण, दे

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रश्मिरथी / पंचम सर्ग / भाग 1

12 मार्च 2022
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आ गया काल विकराल शान्ति के क्षय का, निर्दिष्ट लग्न धरती पर खंड-प्रलय का. हो चुकी पूर्ण योजना नियती की सारी, कल ही होगा आरम्भ समर अति भारी. कल जैसे ही पहली मरीचि फूटेगी, रण में शर पर चढ़ महामृत्

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रश्मिरथी / पंचम सर्ग / भाग 2

12 मार्च 2022
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आहट पाकर जब ध्यान कर्ण ने खोला, कुन्ती को सम्मुख देख वितन हो बोला, ‘‘पद पर अन्तर का भक्ति-भाव धरता हूँ, राधा का सुत मैं, देवि ! नमन करता हूँ ‘‘हैं आप कौन ? किसलिए यहाँ आयी हैं ? मेरे निमित्त आद

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रश्मिरथी / पंचम सर्ग / भाग 3

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‘‘पर पुत्र ! सोच अन्यथा न तू कुछ मन में, यह भी होता है कभी-कभी जीवन में, अब दौड़ वत्स ! गोदी में वापस आ तू, आ गया निकट विध्वंस, न देर लगा तू। ‘‘जा भूल द्वेष के ज़हर, क्रोध के विष को, रे कर्ण !

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रश्मिरथी / पंचम सर्ग / भाग 4

12 मार्च 2022
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‘‘अपना खोया संसार न तुम पाओगी, राधा माँ का अधिकार न तुम पाओगी। छीनने स्वत्व उसका तो तुम आयी हो, पर, कभी बात यह भी मन में लायी हो ? ‘‘उसको सेवा, तुमको सुकीर्ति प्यारी है, तु ठकुरानी हो, वह केवल

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रश्मिरथी / पंचम सर्ग / भाग 5

12 मार्च 2022
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‘‘सोचो, जग होकर कुपित दण्ड क्या देता, कुत्सा, कलंक के सिवा और क्या लेता ? उड़ जाती रज-सी ग्लानि वायु में खुल कर, तुम हो जातीं परिपूत अनल में घुल कर। ‘‘शायद, समाज टूटता वज्र बन तुम पर, शायद, घिर

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रश्मिरथी / पंचम सर्ग / भाग 6

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इस सन्नाटे में दो जन सरित-किनारे, थे खड़े शिलावत् मूक, भाग्य के मारे। था सिसक रहा राधेय सोच यह मन में, क्यों उबल पड़ा असमय विष कुटिल वचन में ? क्या कहे और, यह सोच नहीं पाती थी, कुन्ती कुत्सा से

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रश्मिरथी / पंचम सर्ग / भाग 7

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"पाकर न एक को, और एक को खोकर, मैं चली चार पुत्रों की माता होकर।’’ कह उठा कर्ण, ‘‘छह और चार को भूलो, माता, यह निश्चय मान मोद में फूलो। ‘‘जीते जी भी यह समर झेल दुख भारी, लेकिन होगी माँ ! अन्तिम व

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रश्मिरथी / षष्ठ सर्ग / भाग 1

12 मार्च 2022
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नरता कहते हैं जिसे, सत्तव क्या वह केवल लड़ने में है ? पौरूष क्या केवल उठा खड्ग मारने और मरने में है ? तब उस गुण को क्या कहें मनुज जिससे न मृत्यु से डरता है ? लेकिन, तक भी मारता नहीं, वह स्वंय

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रश्मिरथी / षष्ठ सर्ग / भाग 2

12 मार्च 2022
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थोड़ी-सी भी यह सुधा मनुज का मन शीतल कर सकती है, बाहर की अगर नहीं, पीड़ा भीतर की तो हर सकती है। लेकिन धीरता किसे ? अपने सच्चे स्वरूप का ध्यान करे, जब ज़हर वायु में उड़ता हो पीयूष-विन्दू का पान

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रश्मिरथी / षष्ठ सर्ग / भाग 3

12 मार्च 2022
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पर, नहीं, विश्व का अहित नहीं होता क्या ऐसा कहने से ? प्रतिकार अनय का हो सकता। क्या उसे मौन हो सहने से ? क्या वही धर्म, लौ जिसकी दो-एक मनों में जलती है। या वह भी जो भावना सभी के भीतर छिपी मचलत

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रश्मिरथी / षष्ठ सर्ग / भाग 4

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औ’ जिस प्रकार हम आज बेल- बूटों के बीच खचित करके, देते हैं रण को रम्य रूप विप्लवी उमंगों में भरके; कहते, अनीतियों के विरूद्ध जो युद्ध जगत में होता है, वह नहीं ज़हर का कोष, अमृत का बड़ा सलोना सोत

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रश्मिरथी / षष्ठ सर्ग / भाग 5

12 मार्च 2022
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‘‘आज्ञा हो तो अब धनुष धरूँ, रण में चलकर कुछ काम करूँ, देखूँ, है कौन प्रलय उतरा, जिससे डगमग हो रही धरा। कुरूपति को विजय दिलाऊँ मैं, या स्वयं विरगति पाऊँ मैं। ‘‘अनुचर के दोष क्षमा करिये, मस्तक

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रश्मिरथी / षष्ठ सर्ग / भाग 6

12 मार्च 2022
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‘‘पर हाय, वीरता का सम्बल, रह जायेगा धनु ही केवल ? या शान्ति हेतु शीतल, शुचि श्रम, भी कभी करेंगे वीर परम ? ज्वाला भी कभी बुझायेंगे ? या लड़कर ही मर जायेंगे ? ‘‘चल सके सुयोधन पर यदि वश, बेटा !

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रश्मिरथी / षष्ठ सर्ग / भाग 7

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पाकर प्रसन्न आलोक नया, कौरव-सेना का शोक गया, आशा की नवल तरंग उठी, जन-जन में नयी उमंग उठी, मानों, बाणों का छोड़ शयन, आ गये स्वयं गंगानन्दन। सेना समग्र हुकांर उठी, ‘जय-जय राधेय !’ पुकार उठी, उ

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रश्मिरथी / षष्ठ सर्ग / भाग 8

12 मार्च 2022
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‘अर्जुन ! विलम्ब पातक होगा, शैथिल्य प्राण-घातक होगा, उठ जाग वीर ! मूढ़ता छोड़, धर धनुष-बाण अपना कठोर। तू नहीं जोश में आयेगा आज ही समर चुक जायेगा।’’ केशव का सिंह दहाड़ उठा, मानों चिग्घार पहाड़

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रश्मिरथी / षष्ठ सर्ग / भाग 9

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तब कहते हैं अर्जुन के हित, हो गया प्रकृति-क्रम विपर्यस्त, माया की सहसा शाम हुई, असमय दिनेश हो गये अस्त। ज्यों त्यों करके इस भाँति वीर अर्जुन का वह प्रण पूर्ण हुआ, सिर कटा जयद्रथ का, मस्तक निर

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रश्मिरथी / षष्ठ सर्ग / भाग 10

12 मार्च 2022
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साधना को भूल सिद्धि पर जब टकटकी हमारी लगती है, फिर विजय छोड़ भावना और कोई न हृदय में जगती है। तब जो भी आते विघ्न रूप, हो धर्म, शील या सदाचार, एक ही सदृश हम करते हैं सबके सिर पर पाद-प्रहार। उ

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रश्मिरथी / षष्ठ सर्ग / भाग 11

12 मार्च 2022
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संघटित या कि उनचास मरूत कर्ण के प्राण में छाये हों, या कुपित सूय आकाश छोड़ नीचे भूतल पर आये हों। अथवा रण में हो गरज रहा धनु लिये अचल प्रालेयवान, या महाकाल बन टूटा हो भू पर ऊपर से गरूत्मान। ब

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रश्मिरथी / षष्ठ सर्ग / भाग 12

12 मार्च 2022
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‘‘यदि इसी भाँति सब लोग मृत्यु के घाट उतरते जायेंगे, कल प्रात कौन सेना लेकर पाण्डव संगर में आयेंगे ? है विपद् की घड़ी, कर्ण का निर्भय, गाढ़, प्रहार रोक। बेटा ! जैसे भी बने, पाण्डवी सेना का संहार

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रश्मिरथी / षष्ठ सर्ग / भाग 13

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वह काल-सर्पिणी की जिह्वा, वह अटल मृत्यु की सगी स्वसा, घातकता की वाहिनी, शक्ति यम की प्रचण्ड, वह अनल-रसा, लपलपा आग-सी एकघ्नी तूणीर छोड़ बाहर आयी, चाँदनी मन्द पड़ गयी, समर में दाहक उज्जवलता छायी।

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रश्मिरथी / सप्तम सर्ग / भाग 1

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रथ सजा, भेरियां घमक उठीं, गहगहा उठा अम्बर विशाल, कूदा स्यन्दन पर गरज कर्ण ज्यों उठे गरज क्रोधान्ध काल। बज उठे रोर कर पटह-कम्बु, उल्लसित वीर कर उठे हूह, उच्छल सागर-सा चला कर्ण को लिये क्षुब्ध सैनिक

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रश्मिरथी / सप्तम सर्ग / भाग 2

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यह देह टूटने वाली है, इस मिट्टी का कब तक प्रमाण? मृत्तिका छोड ऊपर नभ में भी तो ले जाना है विमान। कुछ जुटा रहा सामान खमण्डल में सोपान बनाने को, ये चार फुल फेंके मैंने, ऊपर की राह सजाने को ये चार

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रश्मिरथी / सप्तम सर्ग / भाग 3

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इतने में शर के कर्ण ने देखा जो अपना निषङग ,तरकस में से फुङकार उठा, कोई प्रचण्ड विषधर भूजङग ,कहता कि ''कर्ण! मैं अश्वसेन विश्रुत भुजंगो का स्वामी हूं,जन्म से पार्थ का शत्रु परम, तेरा बहुविधि हितकामी हू

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रश्मिरथी / सप्तम सर्ग / भाग 4

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दिनमणि पश्चिम की ओर ढले देखते हुए संग्राम घोर , गरजा सहसा राधेय, न जाने, किस प्रचण्ड सुख में विभोर . ''सामने प्रकट हो प्रलय ! फाड़ तुझको मैं राह बनाऊंगा , जाना है तो तेरे भीतर संहार मचाता जाऊंगा .'

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रश्मिरथी / सप्तम सर्ग / भाग 5

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''शरासन तान, बस अवसर यही है , घड़ी फ़िर और मिलने की नहीं है . विशिख कोई गले के पार कर दे , अभी ही शत्रु का संहार कर दे .'' श्रवण कर विश्वगुरु की देशना यह , विजय के हेतु आतुर एषणा यह , सहम उट्ठ

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रश्मिरथी / सप्तम सर्ग / भाग 6

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''बडे पापी हुए जो ताज मांगा , किया अन्याय; अपना राज मांगा . नहीं धर्मार्थ वे क्यों हारते हैं , अधी हैं, शत्रु को क्यों मारते हैं ?'' ''हमीं धर्मार्थ क्या दहते रहेंगे ? सभी कुछ मौन हो सहते रहेंग

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रश्मिरथी / सप्तम सर्ग / भाग 7

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'जहर की कीच में ही आ गये जब , कलुष बन कर कलुष पर छा गये जब , दिखाना दोष फिर क्या अन्य जन में , अहं से फूलना क्या व्यर्थ मन में ?'' ''सुयोधन को मिले जो फल किये का , कुटिल परिणाम द्रोहानल पिये का

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रश्मिरथी / सप्तम सर्ग / भाग 8

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युधिष्ठिर प्राप्त कर निस्तार भय से , प्रफुल्लित हो, बहुत दुर्लभ विजय से , दृगों में मोद के मोती सजाये , बडे ही व्यग्र हरि के पास आये . कहा, ''केशव! बडा था त्रास मुझको , नहीं था यह कभी विश्वास म

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