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दिल्ली दंगा की सच्चाई !

15 सितम्बर 2020

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दिल्ली दंगा और आतंकवाद निरोधी कानून का गलत इस्तेमाल !


आज एक बार फिर से दिल्ली दंगा चर्चा मे आ चूका है !असल मे यह दंगा का मुख्य कारण नफरत भरा भाषण को बताया जाता है !

सरकार ने मुसलमानो और अल्पसंख्यक के खिलाफ मे एक बिल लाया था और इसका लोकतान्त्रिक विरोध बहुत सारे लोग कर रहे थे तो कपिल मिश्रा और अनुराग ठाकुर ने कहा था की गद्दारो को गोली मारो उसके बाद से ये आंदोलन दंगा का रूप ले लिया !


इसके बाद ज़ब दिल्ली हाई कोर्ट मे इन दोनो के खिलाफ केस दर्ज हुआ तो जस्टिस मुरलीधरन ने इस बयान को गलत करार दिया और लेकिन रातो रात उनका ट्रांसफर पंजाब हाई कोर्ट मे हो गया !


यहीं तक यह मामला नहीं है जब दंगा अपना चरम सीमा पर था तो रागिनी यादव नाम की औरत इस दंगे मे आती है और कहती है हिन्दुओं अपने धर्म के लिए तलवार उठाओ और काट दो इन देशद्रोहियों का सर ! पुलिस भी वहाँ मौजूद रहता है लेकिन वो उनके साथ सपोर्ट मे था !


इस घटना को इसलिए लोग प्रायोजित मानते हैं की जामिया मिलिया इसलामिया यूनिवर्सिटी के बाहर छात्र नागरिकता कानून का विरोध करते हैँ ! और उधर से गोपाल शर्मा नाम का शख्स आता है! और बन्दूक निकालकर ताबड़तोड़ फायरिंग करता है जिसमे एक छात्र के पैर मे गोली लगती है !सैकड़ो के संख्या मे पुलिस मौजूद था लेकिन सब बलि का बकरा बना हुआ था !


अब बात करते हैं इस दंगा को वामपंथियों से सरकार जोड़ क्यों रही है तो इस दंगा के बाद एक नया शब्द आया था uapa, आतंकवाद निरोधी कानून इस कानून का प्रयोग किसी आतंकवादी संगठन या उससे जुड़े व्यक्ति के लिए बना था जो बिल 2019 मे लोकसभा से पारित हुआ था लेकिन सरकार इस बिल का गलत प्रयोग करके एक्टिविस्ट, पत्रकार, और, छात्र के अभिव्यक्ति की आजादी जैसे मौलिक अधिकारो को हनन करना चाहता है !


सरकार की यह सोच है की इस बिल का प्रयोग करके सही लोगो को फसाया जाये यह बिल उमर खालिद, सफूरा जरगर, कफील खान, शरजील इमाम जैसे सोशल एक्टिविस्ट पर लगा है !


इस दंगे की जाँच मे सारे वामपंथी विचारधारा वाले लोग का नाम आया है जिसमे योगेंद्र यादव, अपूर्वानंद, सीताराम येचुरी जिनका इस दंगा से दूर दूर तक तालुक नहीं था !


कफील खान पर भड़काऊ भाषण देने का आरोप था लेकिन अलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा की यह भाषण राष्ट्रीयता और अखंडता को जोड़ता है !

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