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गिलिगडु

चित्रा मुद्गल

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2 जुलाई 2022 को पूर्ण की गई
ISBN : 9788171380411

स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी कथा जगत में अपनी धारदार कहानियों के जरिये विशिष्ट पहचान बनाने वाली कथाकार चित्रा मुद्गल ने एक जमीन अपनी सरीखे उपन्यास से जो जमीन बनाई उसे आवां जैसे वृहद उपन्यास से और पुख्ता ही किया । सामाजिक चेतना से लैस उनके पात्र समकालीन जटिल यथार्थ में अपनी खास जगह खुद बनाते हैं । गिलिगडु चित्रा जी का आकार में छोटा किन्तु संवेदनशीलता में कहीं गहरा उपन्यास है । इस उपन्यास में सेवानिवृत्त बुजुर्ग की एक रेखीय कहानी नहीं जीवन के रंग बहुआयामी प्रयोगों में उभरकर आए हैं । यह उपन्यास तेरह दिन की कहानी में चलते दो बुजुर्गों के जीवन का पूरा खाका ही नहीं बताता अपितु आज के बदलते जीवन मूल्यों को भी परिभाषित करता है कि कैसे नौजवान पीढ़ी अपने बुजुर्गों को घर में सम्मान न देते हुए अकेला छोड़ देती है । यह कृति इस विश्वास को और भी गहरा करती है कि साहित्यिक मूल्यों में सामाजिक सार्थकता का महत्त्व हमेशा बना रहेगा । जीवन में छोटे छोटे महायुद्धों में सहज विजय पाने के लिए रचनात्मक रास्ते की अनूठी तलाश है चित्रा मुद्गल का यह उपन्यास । पठनीयता ऐसी कि शुरू करते ही बंधे चले जाएं । जीवन ऐसा कि पूरी धड़कन के साथ सामने आए और कला ऐसी कि अनायास खिलखिल जाए । उपन्यास में रचनात्मक विश्वास ऐसा कि रचनाकार के अन्य उपन्यास भी पाठक पढ़ने को प्रेरित हो जाएं । 

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