shabd-logo

भूमिका

16 जनवरी 2023

10 बार देखा गया 10
              उपन्यास लिखना जितना प्रतिभा का विषय है, उससे अधिक धैर्य का। कविता, कहानी, निबंध में हाथ आजमाने के बाद करीब साल भर पूर्व मन में विचार कौंधा कि एक उपन्यास लिखा जाए! यह विचार अकेला प्रस्फुटित नहीं हुआ, इसके साथ कहीं अवचेतन में एक कहानी भी आकार लेने लगी थी। एक कहानी, जो कही जानी थी- बताई जानी थी। तब विचार मंथन और साहित्यिक मित्रों के साथ चलने वाली चर्चाओं और उन चर्चाओं के सकारात्मक प्रतिफलन ने इस बात पर मुहर लगा दी कि इस कहानी को अब उपन्यास का रूप दिया ही जायेगा। ‘उपन्यास’ के विस्तार और उस विस्तार में आने वाली गठन की समस्याओं से मन पहले तो घबराया भी, किन्तु ‘वह एक और मन रहा राम का, जो न थका’ को याद करते हुए इसे एक चुनौती की तरह स्वीकार किया गया।उससे मिलने वाला प्रसाद एक रचनाकार को  संतोष से तो भर ही देता है।
               प्रस्तुत उपन्यास एक ऐसे व्यक्ति की कहानी बयाँ करता है जो अपने जीवन को दूसरों के लिए होम कर देता है। स्नेहमल नाम का यह व्यक्ति अपने दृढ़ चरित्र से अन्य लोगों को प्रेरित-प्रभावित करता हुआ चलता है। अपने जीवन की समस्याओं को यह सीढ़ी बनाकर अपनी मंज़िल में उनका भी योग ले लेता है। वह बहते हुए पानी की तरह निर्मल स्वभाव का धनी होने के नाते लोगों के मन में व्याप्त बुराइयों को प्रच्छालित करता है। अपनी जीवन यात्रा पर चलने के दौरान मिलने वाले राहगीरों का भला करने के बाद भी उनसे मिले रोष और द्वेष का भागी बनते हुए भी प्रसन्नता व प्रमुदित मन से अनन्त यात्रा की ओर सफ़र कर जाता है।
                                 इस उपन्यास को लिखना एक पूरी मानसिक यात्रा को तय करने जैसा है। बिना परमपिता की ऊर्जा और परिवारीजनों के सहयोग इसका पुस्तकाकार रूप में आ पाना असंभव होता। इस उपन्यास को पूर्ण करने में मेरी जीवनसंगिनी रेनू शर्मा की प्रेरणा का महती योगदान रहा है। अपनी इच्छा-अनिच्छाओं को उन्होंने इस उपन्यास की तपस्या में होम कर दिया। धन्यवाद या आभार कहकर उनके इस त्याग को छोटा करने का मेरा कोई इरादा नहीं है। मेरे छोटे भाई-बहिन (मनीष शर्मा-मंजीता शर्मा) इस उपन्यास की यात्रा में जरूरी रसद बनते रहे। उनसे भी छोटे मगर काम के सुझाव इस दौरान मिलते रहे।
                  मेरे दादा-दादी (स्व.बौ. श्री हुकमचंद शर्मा- स्व.श्रीमती  रामदेई) का आशीर्वाद न होता तो यह उपन्यास अपनी पूर्णता को प्राप्त न कर पाता। मित्र सौम्य का योगदान इस अर्थ में कि समय बेसमय इस उपन्यास पर होने वाली चर्चाओं को वे अनथक और पूरी रूचि के साथ सुनते रहे और अपने अमूल्य सुझाव देते रहे, पुनः उनके लिए धन्यवाद एक औपचारिकता से अधिक कुछ नहीं।
                    इस उपन्यास के संपादन में साहित्य कुंज के संस्थापक, मेरे पितृतुल्य श्री सुमन कुमार घई  का विशेष योगदान रहा है। वे बराबर मुझे कुरेदते रहे ताकि सामाजिक – पारिवारिक जीवन की व्यस्तता के बावजूद यह उपन्यास अपना आकार ग्रहण कर पाया। बिना धैर्य की परीक्षा दिए सागर-मंथन जैसा यह काम अपनी पूर्णता को प्राप्त न कर पाता।
                  यह उपन्यास मेरी दूसरी पुस्तक है जो 'शब्द.in' पब्लिकेशन से प्रकाशित हो रही है।
जबकि मेरी पहली पुस्तक 'पत्थर नहीं है हृदय मेरा'एक काव्यसंग्रह है जिसमें मित्र सतीश सिंह राघव का काफी योगदान रहा।
                यह उपन्यास अपने संपादन के दौरान समय समय पर  मेरी परिवार रूपी बगिया में खिले नाना प्रकार के छोटे-छोटे पुष्प यथा: प्रियांशु,चारु,रितिका,रिया,वेद,लावण्या, मितांश, गार्गी,लोकित आदि का स्नेह रूपी सुगन्ध पाता रहा है।
    अंत में सभी पाठकों का भी धन्यवाद जिन्होंने तकनीक के समय में पुस्तक चुनकर 'सहृदय सामाजिक' के विरुद को अर्थवत्ता प्रदान की है। यह उपन्यास अपने प्रयास में कितना सफल हो सका है, इसका फैसला मैं सुधी पाठकों पर छोड़ता हूँ....
आपका
प्रवीण कुमार शर्मा
खिजूरी,भरतपुर,राजस्थान।
अध्याय 1
23
रचनाएँ
प्रेम का पुरोधा
5.0
यह एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है जो अपने जीवन को दूसरों के लिए होम कर देता है।स्नेहमल नाम का यह व्यक्ति अपने दृढ़ चरित्र से अन्य लोगों के चरित्र को गढ़ता हुआ चलता है।इसके जीवन में कई समस्याएं भी आती हैं लेकिन वह संत स्वभाव का होने के कारण समस्त समस्याओं को पार पाने में सफल होता है।वह बहते हुए पानी की तरह निर्मल स्वभाव का धनी होने के नाते लोगों के मनों में व्याप्त बुराइयों को प्रच्छालित करता हुआ अपनी जीवन यात्रा को मुस्कुराते हुए समाप्त कर अनन्त यात्रा की ओर सफर कर जाता है।
1

समर्पित

16 जनवरी 2023
3
0
0

कुलगौरव परदादा स्व. बौ. श्री यादराम शर्मा \ भूमिका

2

भूमिका

16 जनवरी 2023
2
0
0

उपन्यास लिखना जितना प्रतिभा का विषय है, उससे अधिक धैर्य का। कविता, कहानी, निबंध में हाथ आजमाने के बाद करीब साल भर पूर्व मन में विचार कौंधा कि एक उपन्यास लिखा जाए! यह विचार अकेला प्रस्फुटित नहीं हुआ, इ

3

अध्याय 1

16 जनवरी 2023
1
0
0

रेत का समंदर चारों ओर फैला हुआ है। रात में चाँदनी ऐसी लगती है मानो रेत पर दूध उड़ेल दिया हो। पूर्णिमा का चाँद ऐसा नज़र आता है मानो साक्षात्‌ राम के सिर के पीछे धवल ज्योति पुंज देदीप्यमान हो रहा हो। चार

4

अध्याय 2

16 जनवरी 2023
0
0
0

चलते चलते सुबह के चार बजने को आ गए हैं। अभी थोड़ी दूर कुछ पशु पालकों की बुदबुदाहट और पशुओं के रंभाने की आवाज़ सुनाई देने लगी है। अचानक पैर पड़ जाने से कुत्ते की चीख निकलने के साथ ही उस अधेड़ की विचार त

5

अध्याय 3

16 जनवरी 2023
0
0
0

अब वह शहर पहुँच चुका है लेकिन उसका मन बिल्कुल ही नहीं लग रहा। उसे तो अपने उस जीवन की ही याद आ रही थी जहाँ प्राकृतिक और आध्यात्मिक माहौल था। पक्षियों का कलरव, गाय के बछड़े का उछल कूद, उस घर के आँगन में

6

अध्याय 4

16 जनवरी 2023
0
0
0

शादी की रस्में शुरू होने को हैं। ये सोच स्नेहू की माँ बहुत ही ख़ुश है। बेटे की शादी होने पर माँ ही है जिसे सबसे ज़्यादा ख़ुशी होती है। उसकी माँ को थोड़ा सा दुःख है तो सिर्फ़ इसलिए कि संतानों की शादी की शुर

7

अध्याय 5

16 जनवरी 2023
0
0
0

स्नेहू और रीता के दिन ख़ुशी-ख़ुशी गुज़रने लगे। धीरे-धीरे ज़िम्मेदारी बढ़ने लगी। शादी को पाँच वर्ष होने को हैं। दो बच्चे हैं। लेकिन अभी कोई रोज़गार नहीं मिला है। माँ बाप भी शादी होने तक ही साथ देते हैं। शाद

8

अध्याय 6

16 जनवरी 2023
0
0
0

स्नेहमल अपनी जवानी के दिनों को याद करता था। यही गुरु थे यही कुटिया थी। वह अपने उन दिनों को याद करके भाव भिवोर हो जाता था, प्रेमल दास की कुटिया में स्नेहू अब रोज़ जाने लगा था। प्रेमल दास जितनी स्नेहू की

9

अध्याय 7

16 जनवरी 2023
0
0
0

गुरुजी के मार्गदर्शन में वह अपनी ज़िन्दगी जी रहा था। मानव सेवा ही अब उसका धर्म बन चुका था। स्नेहमल ने एक अनाथालय से सम्पर्क कर लिया, जहाँ वह हर महीने आर्थिक और शारीरिक मदद करने पहुँच जाता। अपनी दिनचर्य

10

अध्याय 8

16 जनवरी 2023
0
0
0

स्नेहमल ने महामारी से लड़ने के लिए जो साहस दिखाया उसके कारण लोग उसे देवता मानने लगे। स्नेहमल ने कई लोगों की जान बचाई। लोगों ने उसके इस परोपकार के लिए उसे संत का दर्जा दे दिया। इस तरह समाज ने उसे इस पु

11

अध्याय 9

16 जनवरी 2023
0
0
0

स्नेहमल रीता के जाने के बाद बिल्कुल अकेला रह गया था। बेटी और बेटा रीता की मौत की ख़बर सुनकर आए तो थे लेकिन उसकी तेरहवीं करके चले गए। बेटा ने उससे अपने साथ चलने की ज़िद भी की थी लेकिन उसने साथ चलने से इं

12

अध्याय 10

16 जनवरी 2023
0
0
0

गाँव में प्रवेश करते ही उसे लोग आते–जाते दिखने लगे। सभी लोग अपने दैनिक कार्यों में व्यस्त थे। कुछ अपनी मवेशियों को चारा डाल रहे थे, कुछ मवेशियों का दूध दुहने में व्यस्त थे, कुछ अपने नित्य कर्मों में व

13

अध्याय 11

16 जनवरी 2023
0
0
0

खाना खाने के बाद दिन में स्नेहमल को लेटे-लेटे नींद आ गयी। तभी दो नौजवान उस महिला से ठाकुर के बेटे से न मिलने की कहने आए। वह महिला बिचारी उन के सामने हाथ जोड़े गुहार लगा रही थी कि मुझे तो तुम धमका दोगे

14

अध्याय 12

16 जनवरी 2023
0
0
0

रात होते होते स्नेहमल को नींद आ गयी। घर के अंदर जाकर वह महिला अपने कामों को निपटाने में लग गयी। एक गहरी नींद लेने के बाद पास में उस घर से आ रही बुदबुदाहट से उसकी निद्रा में कुछ अड़चन आयी। लेकिन वह उस

15

अध्याय 13

16 जनवरी 2023
0
0
0

पिछली रात को जैसे ही ठाकुर का बेटा उस महिला से मिलकर अपने घर पहुँचा वैसे ही उसके कमरे के बाहर दारु पीकर धुत्त पड़ा पहरेदार को अचानक से चेत हो गया। चेत होते ही उसे कमरे में से कुछ आवाज़ें सुनाई दीं। आवा

16

अध्याय 14

16 जनवरी 2023
0
0
0

तीनों ही पेड़ से बँधे बेहोशी की हालत में बारिश में भीग रहे थे। कोई भी इस जहान में ऐसा नहीं था जो उन्हें होश में ला सके, सँभाल सके। लेकिन प्रकृति की नज़र में तो सब बराबर हैं। वह सभी पर बराबर नेह बरसाती

17

अध्याय 15

16 जनवरी 2023
0
0
0

सुबह होते ही स्नेहमल अपने नित्य कर्मों से फ़ारिग़ हो गया। थोड़ी देर बाद वह घर से ठाकुर से मिलने निकल गया। साथ में उस ठाकुर के बेटे के वफ़ादार नौकर वेश बदलकर उसके पीछे-पीछे चलने लगे। उन सब ने साधुओं का व

18

अध्याय 16

16 जनवरी 2023
0
0
0

स्नेहमल ठाकुर के गाँव को छोड़कर दूसरे गाँव की ओर चला जा रहा था। उसका मन विचारों में डूबा हुआ था। वह सोचता हुआ जा रहा था कि जिन बच्चों को पाल-पोस कर इतना बड़ा कर दिया वही उसके सगे बच्चे आज उसे पहचान नहीं

19

अध्याय 17

16 जनवरी 2023
0
0
0

स्नेहमल अपनी लंबी यात्रा के बाद एक गाँव में ठहरा। गाँव में एक तालाब के किनारे पेड़ की छाँव में बैठ गया। पास ही में एक कुएँ से पानी खींचकर उसने अपनी प्यास बुझाई और अपनी बोतल को भर लिया। वहीं पर वह अपने

20

अध्याय 18

16 जनवरी 2023
0
0
0

स्नेहमल सोचने लगा कि पागलपन दुनिया का वह कड़वा सच है जो पूरी दुनिया को आईना दिखाता है। दुनिया जिन लोगों के पागलपन पर हँसती है वह वास्तविक रूप में ख़ुद पर हँस रही होती है। पागल और शराबी एक जैसे होते हैं

21

अध्याय 19

16 जनवरी 2023
0
0
0

सर्दियों के दिन थे, अँधेरा गहराया हुआ था। स्नेहमल एक वीरान जगह में होकर गुज़र रहा था कि अचानक उसे किसी से ठोकर लगी और गिर पड़ा। उसने जब नीचे की ओर निगाह डाली तो देखा कि जर्जर, फ़टे पुराने कपड़े पहना हुआ,

22

अध्याय 20

16 जनवरी 2023
0
0
0

पौ फटते ही स्नेहमल उस व्यक्ति को लेकर उस गाँव में पहुँचा। हालाँकि वह व्यक्ति इतना डरा और सहमा हुआ था कि वह सुबह बमुश्किल ही गाँव चलने को राज़ी हो पाया था। लेकिन स्नेहमल उसे साहस देते हुए यहाँ लाया था।

23

अध्याय 21

16 जनवरी 2023
0
0
0

सुबह होते ही उस धनराम नाम के ज़मींदार ने गाँव के लोगों को इकट्ठा किया। रात को आये ख़्वाब के बारे में सभी को बताया। पहले तो किसी ने भी उसकी बात पर कोई ध्यान नहीं दिया लेकिन जब उसने लोगों से बहुत ही ज़िद क

---

किताब पढ़िए

लेख पढ़िए