कहते हैं अकेलापन बहुत टीसता है, बहुत परेशान करता है, अकेलेपन के कारण ही हम पागल भी हो सकते है! ऐसा सुना था मैने आज सुबह मै सोच रहा था तो मुझे लगा सच भी है, चलिए मै एक कहानी सुनाता हूँ, फिर ये सुनी बात पर यकीन पक्का भी हो जायेगा आपका!
बात सन 1665-66 की है इंग्लैंड भीषण प्लेग की बिमारी जूझ रहा था वहीं पर उस समय कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय का एक महाविद्यालय ट्रिनिटी महाविद्यालय।
जी हां ये वही कालेज है जिसमे काव्य शास्त्र के महान विचारक जाॅन राइडन, दर्शन शास्त्र के रसेल और अंग्रेजी दार्शनिक फ्रांसिस बेकन यहां के विद्यार्थी रहें है और हां सबसे जरूरी हमारे प्रथम प्रधानमंत्री श्री जवाहर लाल नेहरू भी उसी कॉलेज के विद्यार्थी रहे हैं।
उसी महाविद्यालय मे एक 22-23 साल के लड़के ने दाखिला लिया था जो कि एक आदर्श गणित का विद्यार्थी और बहुत होनहार भी था, अब क्योंकि प्लेग लंदन मे जोर पर था तो उसे लगा की अब लंदन मे रहना खतरे से खाली नही होगा ये सोचकर उसने अपने पैतृक निवास जाने का मन बनाया जो लंदन से करीब 100 किमी की दूरी पर था वहां चला भी गया, और उसका वो निर्णय ठीक भी था क्योंकि उस वर्ष इंग्लैंड की चौथाई आबादी प्लेग की भेंट चढ़ गई थी, पर घरवालों के गांव मे ना होने की वजह से वो वहां अकेला हो गया अकेला मतलब बिलकुल अकेला, एकदम अकेला।
और शुरू हुआ उसके अकेलेपन और पागलपन का सफर, पढ़ाई के पर्याप्त साधन की अनुपलब्धता मे ज्ञान बाहर से ज्यादा अंदर के विकसित होता है वही हुआ उस बच्चे के साथ भी जो बमुश्किलन 22-23 वर्ष का था
ये वही गांव था जहां पर बंद कमरे मे आती रोशनी से Optics विकास, calculus की शुरुआत, गिरते सेव से law of gravity की जानकारी दुनियाभर को समझ आयी।
जिसको समझने के लिए आज भी दुनिया पागल हुई पड़ी है, अब तक तो आप पहचान ही गये होंगे उस बच्चे का नाम जी हाँ वो सर आइजक न्युटन ही थे।