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एक नायिका ऐसी भी.....

12 सितम्बर 2021

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           " एक नायिका ऐसी भी..."







"लड़के वाले आ रहे है कल! मीनू को देखने।" मां ने डायनिंग टेबल पर बैठते हुए कहा। सामने अपने पति को देखते हुए।
" जाकर अपनी लाडली को कह दो कि पार्लर हो आए, कही लड़के वाले इस बार भी...।" कहते हुए उनकी नजर मीनू पर गई तो वे चुप हो गए।

" क्या हुआ मां?" मीनू ने आधी बात सुन ली थी इसलिए उसने मां से पूछना चाहा।
" तू आज अपनी सहेली के साथ पार्लर हो आ, कल लड़के वाले आ रहे है। बड़ी मुश्किल से मेरी सहेली ने उन्हें मनाया है। अपने चेहरे को चमका वरना तू कुंवारी ही मर जायेगी।"  तीखे स्वर लहरियां खाती हुई मीनू के कानों में पड़ी।
मीनू वहां से चली आई अपने कमरे में। मोबाईल निकालकर देखा मितेश के मैसेजजेस आए हुए हैं। उसने कोई जवाब नहीं दिया और नंबर ब्लॉक कर दिया। मितेश दूसरे कास्ट का लड़का है और मीनू से प्रेम करता हैं। दोनो ही एक – दूसरे को चाहते है। लेकिन मीनू के माता– पिता अपनी एकलौती बेटी कि शादी ऊंचे खानदान वाले लड़के से करने के लिए ललायित हैं। मीनू सादगी प्रिय साधारण लड़की है। सांवला शरीर है उसका शायद इसीलिए कई लड़के वाले मीनू को देखने तो आए लेकिन एक पल में ही मुंह फेर कर चले भी गए।


शाम को शीतला आई। मीनू और शीतला पार्लर जाने के लिए तैयार हो गई। मां ने स्कूटी कि चाबी दी। शीतला के पीछे मीनू भारी मन लिए बैठ गई फिर स्कूटी चल पड़ी पार्लर कि ओर।


" प्लीज मीनू रुको ! थोड़ी देर बात करनी है मुझे तुमसे।" मितेश स्कूटी के सामने आ खड़ा हुआ। शीतला ने ब्रेक लगाया और स्कूटी उसके नजदीक जाकर रुकी।

" प्लीज कुछ मत कहो! मेरे घर कल लड़के वाले आ रहे है और मैं अब तुमसे कोई रिश्ता नहीं रखना चाहती। तुम्हे मुझसे भी कई गुना सुंदर लड़की मिल जायेगी। हमारे रास्ते अलग हो गए आज से।" आंसू कि बूंदे उभरने लगी। किसी तरह मीनू ने कहा और मुंह फेर ली।


" सच में तुम मुझे भुला दोगी? क्या यही प्यार है तुम्हारा? तुमने तो कहा था कि अपने मां– बाप को मैं मना लूंगी। सारे वादे एक पल में तुमने तोड़ दिए।" मितेश कि आंखे नम हो गईं।

" मेरे माता– पिता मेरी शादी बड़े खानदान वाले लड़के से करना चाहते है। तुम मिडिल क्लास फैमली से हो, मेरे घर वाले कभी भी इस रिश्ते के लिए नही मानेंगे और मैं अपने मर्यादा कि दहलीज पार नही कर सकती। मेरे लिए मेरा परिवार मायने रखता है। भूल जाओ मुझे और खुश रहो अपनी जिंदगी में।" आंसू बह निकले और पत्थर दिल इंसान बनने का नाटक करते हुए मीनू ने स्पष्टत: कह डाला। 
" मैं खुश रहूं या न रहूं ,तुम खुश रहना अपने परिवार के साथ । मैं भी देखता हूं कि कितनी खुश रहती हो यूं मेरा दिल तोड़ कर ।" रोते हुए मितेश वहां से चला गया।


" रात हो चुकी हैं। अंधेरा पसरा हुआ है। मीनू के आंखो से नींद कोसों दूर है।

" तुम्हारे बिना जीना, इंपोसिबल है मितेश! रात के अंधेरे में चांद कि कीमत जितनी होती हैं ठीक  उतनी ही कीमत तुम्हारी भी है मेरी जिंदगी में।तुम देखना हमारा भी एक घर होगा। हम भी दांपत्य जीवन एक– दूसरे के साथ राजी– खुशी से व्यतीत करेंगे।" कहते हुए मीनू ने मितेश के माथे पर चुंबन किया।
" जानती हो मीनू, रात को नींद नहीं आने पर मैं क्या करता हूं?" मीनू के गोद में सर रखकर उसे निहारते हुए मितेश ने कहा।
" क्या करते हो?" भोली सूरत पर सवालों– सी लकीर खींच गई।
" अंधेरे से भरे हुए आसमान में चांद को देखता हूं क्योंकि उसमें तुम नजर आती हो।" दो टूक जवाब देते हुए मितेश ने उसके हाथ को पकड़ कर अपने दिल के करीब रखा। मीनू को महसूस हुआ मितेश के दिल कि धड़कन।

भूतकाल से मीनू वर्तमान में आई। अपने सीने पर हाथ रखे वो कमरे के अंदर चहलकदमी करने लगी। फिर खिड़की कि ओर बढ़ गई। चांद बेहद खूबसूरत लग रहा है। अंधेरे में भी एक अजीब– सी चमक है आसमान में, क्योंकि चांद और सितारे अपनी रौशनी से आसमान को सजाए हुए हैं। प्रतीत हो रहा है कि चांद किसी महिला का चेहरा है और सितारे उसकी काली साड़ी पर लगे हुए अभ्रक। अनोखा अहसास होने पर फिर से मितेश कि याद हो आई।

वो धीमे कदमों से चलकर पलंग कि ओर गई। लेट ने के बाद सोचने लगी कि ," क्या सांवली लड़की होना पाप है? क्यों मां – बाप ऊंचा खानदान देखते हैं? लड़के का स्वभाव अच्छा होना चाहिए न कि धन दौलत। अमीर लड़के से शादी करने पर भी तो ताने सुनने पड़ते है। पति पर आश्रित रहने से लोग दो शब्द रोज कह डालते हैं भले ही वे भी गृहणी ही क्यों न हो। क्यों संस्कार नही देखे जाते? बेटियों के पैरों पर बेड़ी बांध दी जाती है जन्म से लेकर। भाग न जाए, मर्यादा भंग न करे, शादी हो गई है तो ससुराल वालों कि फरमाइशें और नही हुई है तो मां –बाप कि ।"
"ये लोग कैसे हैं ? समाज कैसा है आजकल का ?जिन्हे ये भी कहने में शर्म नहीं आती कि तू पराई है, मां– बाप के घर से लड़की कि डोली उठती है और ससुराल से अर्थी। तेरे पति का घर ही तेरा घर है। " क्यों बदल जाते है रिश्ते? 
सोचते हुए मीनू कि आंख लग गई और एक बूंद आंसू गाल पर लुढ़क आए।


अगली सुबह।

घर कि साज– सज्जा हो रही हैं। थोड़ी ही देर में लड़के वाले आ जायेंगे। पकवाने बनवाई गई है। नौकर– चाकर अपने काम में व्यस्त हैं। मीनू को अच्छे से सजाने कि जिम्मेदारी मां ने शीतला को सौंपी है। पिताजी खुश नजर आ रहे है और सारी चीजे सलीके से जमा रहे हैं। सोफा सेट आज मंगाया गया है पड़ोस के घर से क्योंकि लड़के वालों को दिखाना है कि हम भी अमीर है।


दरवाजे पर किसी कि दस्तक हुई। पिताजी चहकते हुए गए। दरवाजा खोला तो सामने लड़के वालों को देखकर जबरदस्त मुस्कुराहट आ गई चेहरे पर। मानों साक्षात श्री हरि विष्णु भगवान ही सांकेत धाम से यहां प्रकट हो गए हो।

औपचारिकताएं पूरी कि गई। उन्हे सोफे पर बिठाया गया। नाश्ते कि प्लेटे सामने टेबल पर रखी गई।
समोसे, भुजिया,रबड़ी, खीर– पूड़ी, बालूशाही, रसगुल्ले और भी नाना प्रकार के व्यंजन।

लड़का सांवला है मतलब मीनू से रंग में काला है। दांत उभरे हुए नजर आ रहे है। ऐसा लग रहा है देखने से कि मानों होठ नकली हो जिसे जबरदस्ती फिट किया गया हो दांतो को ढकने के लिए। उम्र भी काफी हो चुकी है यह तो उसके शरीर को देखकर ही पता चल रहा है ,फिर भी पैसे वाले खानदानी जो ठहरे। लड़का, लड़के कि मां और लड़के का पिता तीनो आए हैं।

" भाईसाहब, अपनी बेटी को बुला लीजिए ताकि दोनो बच्चे एक– दूसरे को एक नजर देख सके।" लड़के के पिता ने समोसा खाते हुए कहा।

" जी, क्यों नहीं। अभी बुला देता हूं आप  निश्चिंत रहे।" पिताजी ने मुस्कुराकर जवाब दिया।
पिताजी ने मां को आंखो से इशारा किया फिर वे सीढ़ियों पे चलकर मीनू के कमरे के दरवाजे के पास गई और कहा कि मीनू को लेकर हॉल में आ जाए।
शीतला, मीनू को लेकर आ गई। वो आगे बढ़ कर लड़के के माता–पिता  पैर छूने लगी।

" यहां बैठो! एक सुरीली आवाज आई। मीनू लड़के कि मां के बगल मे जाकर बैठ गई लेकिन उसे अजीब –सा महसूस हो रहा है।
लड़के ने मीनू को देखा अजीब ढंग से। साज– सज्जा और पार्लर से मेकअप कराने के कारण वो बेहद खूबसूरत और गोरी दिख रही हैं। लड़का अपलक उसे घूरने लगा। मीनू ने हिम्मत करी और नजरे उठाकर लड़के को देखा। अगले ही पल झेंपते हुए उसने नजरे नीचे कर ली लेकिन आत्मा रो पड़ी। सांवली लड़की को ताने मारे जाते है लेकिन लड़को को क्यों नही? मेरी शादी एक बड़े उम्र के काले – कलूटे लड़के से कराने के लिए, मेरे माता– पिता क्यों इतने आतुर हैं? सिर्फ खानदान को और पैसों को देखकर।

" लकड़ी तो बिलकुल सीता है सीता। बस आप दो लाख रुपए नगद तैयार रखिएगा। फिर देखना आपकी बेटी कैसे हमारे घर में राज करेगी।" लड़के कि मां ने मीनू के गाल को छूते हुए कहा।

" पर,,, इतने पैसे,,,।" मीनू के पिताजी कह ही रहे थे कि मीनू कि मां ने चुप रहने का इशारा किया।

" जी,हम पैसों का इंतजाम कर लेंगे । आप बिल्कुल निश्चिंत होकर बारात लेकर हमारे यहां आने कि तैयारियां शुरू कर दीजिए।" उन्होंने (मीनू कि मां )सहजता से कहा।

लड़के वाले चले गए।

शादी कि तैयारियां शुरू हो गई।
मीनू ने मां के मुंह से सुना था कि " एक बार बेटी कि शादी हो जाए फिर वे इस बोझ से मुक्त हो जायेंगे। धीरे– धीरे सारे कर्ज चुकाकर बाकी जीवन व्यतीत करेंगे। शादी न भई तो समाज के उलाहने उन्हे जीने नही देंगे। बस शादी हो जाए यहीं उनकी दिली ख्वाहिश है।"
मीनू दिल पर पत्थर रखकर कठपुतली बन कर रह गई। मितेश के साथ बिताए हुए लम्हे उसे काटने को दौड़ते थे लेकिन अब उसकी मर्जी का ख्याल किसी को नहीं है और न ही उसकी परवाह।


बारात आई। पहले दहेज में मांगे गए दो लाख पैसों के लिए दूल्हे के पिता ने, दुल्हन के पिता के आगे हाथ फैलाए। नगद पैसे पाने के बाद सहर्ष और विधिवत रूप से विवाह संपन्न हुआ। विवाह के दिन अपनी मीनू का एक बार दर्शन करने मितेश भी आया हुआ था जिसके आंखो के अश्रुजल मोतियों में गूथे जा रहे है। वो ज्यादा देर तक ठहर न सका।



मीनू ने शादी के पहले मितेश को कॉल करके कसम दी थी कि वो कभी भी उससे मिलने कि कोशिश न करें और ससुराल तो कतई न आए वरना उसका मरा हुआ मुंह देखेगा। फिर बिना नायक के बातों को सुने नायिका ने कॉल कट कर दिया और सिम कार्ड निकालकर उसके टुकड़े– टुकड़े कर के जला डाले । दो दिल खून के आंसू रोने के अलावा कुछ न कर सके।

दिन बीतते गए। मीनू के मां– बाप ने आत्महत्या कर ली जिसके बाद मीनू को गहरा आघात लगा। कर्ज तले वे सिर से लेकर पैर तक डूब गए थे। घर, गाड़ी, जेवरात और बाकी कीमती चीजें बिक गई थी। शादी का खर्च और दो लाख नगद पैसे जुटाने में सारी संपत्ति डूब गई।


अंतिम संस्कार पड़ोसियों ने किया और उस दिन भी मीनू न आ सकी। सास, ससुर और पति हरदम मीनू पर अत्याचार करते रहते कि ", दो लाख बस दिया तेरे बुड्ढे बाप ने। काली लड़की को क्रीम और पावडर से पोतकर 
हमारे सामने गोरी करके खड़ी कर दी। चार लाख देना चाहिए था।"

विभिन्न प्रकार के ताने सुनकर भी वो चुप रहती हैं। हर रोज़ घर कि चारदीवारी में बंद, नौकरानी कि तरह व्यतीत होता है इस नायिका का दिन। नायक को छोड़कर नायिका ने अपने मां– बाप को , समाज को और दहेज लोभियों को अंगीकार किया था जिसका ऐसा भयानक परिणाम दिखेगा इसकी कल्पना मात्र से रूह कांप उठती हैं।

नायिका मीनू गर्भवती है। नायिका के पति और सास ने मिलकर फैसला किया कि सोनोग्राफी के बहाने पता लगाना है कि लड़की है या लड़का?
इस बात से अनजान नायिका अपने बच्चे को महसूस करने लगी। सोचने लगी कि अब कोई होगा उसका भी इस दुनियां में फिक्र करने वाला या वाली। रो –रो कर "मां",  "अम्मा" कहने वाली या वाला। वो सपने संजोने लगी सारी अतीत कि दर्द भरी तस्वीरों को मिटाकर।नायिका को सोनोग्राफी के बहाने पति  हॉस्पिटल ले गया। घूसखोर डॉक्टर से पता चला कि बेटी पल रखी है। फिर क्या था नायिका को बेहोश कर दिया गया और उसके कोख में ही उसकी बच्ची को मार डाला गया..😭। होश आने पर बड़ी पीड़ा हुई। दर्द और वेदनाएं उसे कमजोर बनाती गई। नायिका को समझते देर न लगी कि अब उसकी गोद सूनी कर दी गई है और वो भी उसके पति के मर्जी से।
मन करता था मर जाए जलकर। जहर खा ले और मुक्त हो जाए ऐसे बंधनों से जो दर्द पे दर्द दिए जा रही हैं। हृदय को विदिर्ण कर देने वाले अपशब्द जो सास और ससुर देते हैं सुनकर कलेजा फटा जाता हैं नायिका का। कहा जाता है कि पति भगवान का स्वरूप होता है। लेकिन हर पति कहा भगवान का स्वरूप होता है? स्त्री रूपवती हो या कुरुपा उसे तो भोग – विलास कि सामग्री समझी जाती है। नायिका का पति बलात आबरू लुटकर पौरुषत्व का प्रमाण देते हुए, झूठी गर्वीली मुस्कुराहट के साथ अपने आप को महान समझ लेता है।वो  जानता है कि नायिका किसी से कुछ न कहेंगी , क्योंकि समाज तो उसी पर तंज कसेगी कहकर कि "नायिका में ही कोई खोट होगी,तभी तो बेटी कि शादी के तुरंत बाद उसके मां बाप भी चल बसे और अभी तक नायिका ने एक बेटा भी न जना है।"


नायिका किसे कहे कि एक बार क्या उसकी तो बार– बार कोख काटी जा रही है। बेटियों कि गर्भ में हत्या कराई जा रही है।नायिका का पति, पति न होकर हैवान है हैवान,,लेकिन कौन सुनता है नायिका कि बाते।

साल, महीने, दिन बीतते गए। किसी से भी नायिका को सहायता न मिल सकी। दो बेटे हुए हैं जिन्हे नायिका कि सास अपने पास रखती है क्योंकि उनका मानना है कि दोनो बच्चे नायिका के आसपास भी रहे तो बदसूरत हो जायेंगे,,, काले हो जायेंगे,,,।
"बेटी है " पता चलते ही नायिका को बेहोश करके जीते जी ही मार डाला जाता हैं। नायिका कि बेटी के शरीर के टुकड़े– टुकड़े कर दिए जाते है , कोख को शमशान घाट बना दिया जाता हैं क्योंकि वो बेटी है बेटा नही। बेटी है वो,, बोझ है,, जिसकी शादी के लिए पैसे जोड़ने पड़ते है,, मेहनत करनी पड़ती हैं बेटी है वो बेटी। बेटा होता तो घर में उत्सव मनाया जाता। मेहमान बुलाए जाते,, बफर सिस्टम होता।
हर कोई खाना ज्यादा खा लेते
व्यर्थ यूं ही वह फेकते
          व्यर्थ में भोजन कि बर्बादी होती
           खाने कि भी दिक्कत होती



थाली को हाथ में लिए फिरते
जानवरों कि तरह इधर उधर घूमते फिरते
न भोजन सही से खाते
ऐसे बेटे के होने पर बिफर सिस्टम से उत्सव मनाते,, उत्सव मनाते।


खैर नायिका के गर्भ में बेटी थी जिसे दुनियां में आने से पहले ही मार दिया गया। नायिका को अपने बेटों से दूर रखा जाता हैं, नायिका को हीन भावना से देखते हैं उसके ससुराल वाले।

पति रात को शराब पीकर आता फिर नायिका से खिलौने के भांति खेलकर चला जाता। यही नित्य कर्म उसने बना रखा है। नायिका के प्रति कोई दया उसे आज तक न आई। महीने बीतने लगे। नायिका 37 साल कि हो गई हैं। नायिका 11वे बार गर्भवती हुई। पता चला कि लड़का है कोख में। अच्छे से अच्छे पकवान नायिका को खिलाए जाते है। उन दोनों बेटों से मिल पाती है। नौकर – चाकर आजकल हमारी नायिका कि खिदमत में जुटे रहते है। क्योंकि बेटा है बेटी नही। बेटी होती तो अभी तक जीवंत न रहती। समय आया बच्चे के इस दुनियां में आने का। हॉस्पिटल ले जाया गया। प्रस्रव पीड़ा चरम सीमा में है।
डॉक्टर्स नायिका को घेरकर खड़े हुए हैं। ससुराल वाले इसी आश में है कि बच्चा सही सलामत पैदा हो जाए। सबके ईच्छा के विपरीत परिस्थिति नजर आई। बार –बार गर्भपात कराने से नायिका का शरीर कमजोर  हो चुका है। यह नौबत आ गई कि या तो बच्चे को बचाया जा सकता हैं या मां को। ससुरालियों ने कहा बच्चे को बचाया जाए क्योंकि बेटा है बेटी नही। डॉक्टर्स भी दंग रह गए ये फरमाईश सुनकर। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था जिसके चलते पहले नायिका ने प्राण त्याग दिए और बच्चा या बेटा मरा हुआ दुनियां में आया।
नायिका के प्राण एक दिव्य ज्योति– सी शरीर से निकली। मानों उसकी आत्मा ने कहा:– देख लो "एक नायिका ऐसी भी " थी जिसने नायक को ठुकरा कर समाज को चुना। मां – बाप को चुना लेकिन वो विद्रोह न कर सकी इस रिश्ते के खिलाफ। विद्रोह करती तो भी क्या नायिका के मां– बाप मान जाते? मां– बाप के नजर में खानदान और पैसे ही बढ़कर थे जिसके सामने उन्होंने संस्कारवान साधारण व्यक्ति को तुच्छ वस्तु मान रखा था। जिसकी गलती उन्हे मिली फिर उनकी बेटी यानि कि नायिका को ।
दहेज देकर सोचा था कि बेटी कि जिंदगी संवर जाएगी ये नही सोचा था कि दहेज मांगने वाले दहेज लोभियों कि हिम्मत बढ़ जाएगी,,, ये नही सोचा था कि जो लोग दहेज के लिए हाथ फैलाते हैं भीखमंगे बनकर भला क्या उन्हे अपनी बेटी देनी चाहिए?

सूत्र–:बिन सोचे -विचारे जो करे सो पाछे पछिताय।

जरूरत है सोच बदलने कि, धन दौलत से बढ़कर संस्कार मूल्यवान है। कृपया जो भी करे सोच विचार कर करे अन्यथा बाद में पछताने से दुःख के अलावा कुछ भी प्राप्त न होगा।

                       ।।समाप्त।।
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