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गिरीश पंकज

3 अध्याय
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कुछ लालच में पड़ करके यह रीत चलाना ठीक नहीं अभी उगे हैं जो पौधे बरगद बतलाना ठीक नहींजिनका जो हक है वो उनको मिल जाएगा खुद इक दिन पर जो लायक नहीं उन्हीं के गुण को गाना ठीक नहींइंसानो को इंसा ही रहने देना ओ नादानोनेक बड़े होंगे उनको भगवान बताना ठीक नहींचेहरा सब कुछ कह देता है इतना तो हम भी समझें जो खुश हो कर नहीं मिले उसके घर जाना ठीक नहींजो बात पुरानी पड़ गयी है तुम उसे वहीं पे रहने दो माहौल दुबारा बिगड़े क्यों वह बात उठाना ठीक नहींमाना होंगे ब्रह्मज्ञान में पारंगत कुछ लोग यहॉं लेकिन चेला बन पंडों के दण्ड उठाना ठीक नहीचलने वाला ही गिरता है लेकिन पाता है मंजिल ऐसे लोगों पर हँसना या के मुस्काना ठीक नहींजो अच्छे इंसां हैं उनकी तारीफ भले मत करना तुम पर बात-बात में उनको केवल मारो ताना ठीक नहींजो समझदार हैं उन्हें इशारा ही काफी हो जाता हैमूरख बन्दों को पंकज जी कुछ समझाना ठीक नहीं<p style="margin-top: 6px; marg 

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पुस्तक के भाग

1

ग़ज़ल

4 जून 2016
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और क्या देंगे सभी को हौसला देते रहेंप्यार का, सद्भावना का सिलसिला देते रहेंदे नहीं सकते हैं दौलत हैसियत भी है नहीं मुफ्त की इक चीज़ है दिल से दुआ देते रहेंज़िंदगी छोटी है इसको प्रेम से जी लें सभी इस तरह इन्सानियत का हम पता देते रहें खामखाँ इतरा रहे जैसे खुदा ही बन गए आदमी हैं आदमी को रास्ता देते रहें

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गीत / मैं क्या गाऊँ

6 जून 2016
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प्रिय, तुम भूले,  मैं क्या गाऊँ बस तुमको ही, मैं दोहराऊं .सदियाँ बीती, तुम न आए. क्या कोई पत्थर बन जाए. मना -मना कर हार गई मैं, कैसे आखिर तुम्हे मनाऊं ?प्रिय तुम भूले, मैं क्या गाऊँ तप्त धरा औ नीलगगन है.मन में भी तो नित्य अगन है .तुम आओ तो पड़े फुहारें प्रेम-नीर में डूब नहाऊँ.प्रिय तुम भूले, मैं क्या

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दोहे

16 अगस्त 2016
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पढ़-लिख कर वे हो गए,  देशप्रेम से दूर।ऐसी शिक्षा व्यर्थ है, जो कर देती क्रूर।आज़ादी का अर्थ है, निर्भययुक्त उड़ान।जीने का हक भी मिले, सबको एक समान।।शब्द नहीं है स्वतंत्रता, है यह एक विचार।लोकतंत्र की आत्मा, जीवन का आधार।आज़ादी हमको मिली, हो गए सत्तर साल इसको बेहतर नित करें, देश बने खुशहाल।आज़ादी मतलब यही

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