*#क्यों_हम_और_हमारे_लोग_हो_जाते_हैं_रोगी-*
ध्यान रखें कि हमारी सभी इन्द्रियाँ मन' के सहयोग के बिना कुछ नहीं करती, यदि ऐसा लगे कि मन के बिना भी करती हैं तो वे कुछ भी नहीं कर रही होतीं। जब आप टी.वी. देख रहे होते हैं और आपका 'मन' अन्यत्र भटक रहा होता है तब टी.वी.में दिखाये गये प्रसंग को आप अक्षरशः नहीं बता सकते। विचार करें, जब आप पुस्तक के अक्षर आँखों से देखकर मौन होकर पढ़ रहे होते हैं किन्तु मन' कहीं अन्यत्र घूम रहा होता है तो उस समय तक का पुस्तक में लिखा विषय आपके पल्ले नहीं पड़ सकता। ...._ रोग और आरोग्य में मन की गोष्ठी चल ही रही थी, कि एक महत्वपूर्ण प्रश्न आया ,कि, *#हम_रोगी_क्यों_होते_हैं?*
प्राकृतिक चिकित्सा में कहा है कि
🙏 जीवनी शक्ति की कमी होना।
🙏 शरीर में स्थिति रक्त, लसीका द्रव्य तथा अन्य जीवनीय द्रव पदार्थ का संगठन असामान्य होना।
🙏 शरीर में विजातीय द्रव्य, शरीर के मृत पदार्थ और शरीर द्धारा ही उत्पादित विषों का एकत्र हो जाना।
अन्य लोकरीत अनुसार:
🙏किसी ने कहा जो समय से दवाइयाँ नहीं खाते।
🙏किसी ने कहा कि रोगी के छुआछूत यानी संक्रमण से।
🙏किसी ने कहा रोग के कीटाणु हवा में उड़ते रहते हैं और वे अन्दर जाकर रोग उत्पन्न कर देते हैं।
🙏 किसी ने कहा कि अलाभकारी खान-पान से।
🙏🙏 यहां, जो जिज्ञासा के मूल पर चिन्तन करके निकाला गया था। उसका सारांश निकलता था कि *#रोगी_होने_में_हमारे_स्वयं_के_कर्म_ही_कारण_होते_हैं* जिससे हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता क्षीण हो जाती है और हम रोगी हो जाते हैं।
*#रोगों_का_कारण
1. इन्द्रियों के विषय का अतियोग, अयोग, मिथ्यायोग
2. कर्मों का अतियोग, अयोग, मिथ्यायोग।
3. काल का अतियोग, अयोग, मिथ्यायोग।
#चक्षुरिन्द्रिय_के_अतियोगादि-*
अति चकाचौंध वाले पदार्थों, सूर्य आदि को सीधी आँखों से अधिक देर तक देखते रहना नेत्रेन्द्रिय का अतियोग हुआ, प्रकाश आदि को बिल्कुल न देखना नेत्र इन्द्रिय का अयोग हुआ। आँखों से अत्यन्त सटे, अति महीन, अधिक दूर, उग्रस्वरूप, भयानक, अदभुत, द्वेषपूर्ण, घिनौने, विरूप विशेष रूप से डरावने रूपों को देखना नेत्र इन्द्रिय का मिथ्यायोग (दुरुपयोग) है।
*#कर्णेन्द्रिय_के_अतियोगादि-*
बादलों का भयंकर गर्जन, नगाड़े या ऐसे कठोर शब्द जो कानों को कष्ट दें उन्हें सुनना और घमण्ड से तीव्रता से चिल्लाना कान के विषय का अतियोग
हैं। कोई शब्द कदापि न सुनना श्रवणेन्द्रिय का अयोग है। कठोर शब्द, प्रियजन के विनाश से सम्बन्धित बात, हानिसूचक, मानसिक आघात, तिरस्कार, अपमान, भयभीत करने वाले शब्दों को सुनना श्रवणेन्द्रिय का मिथ्यायोग यानी दुरुपयोग है।
*#नासेन्द्रिय_के_अतियोगादि-*
अत्यन्त तीव्र, उग्र, नासा स्राव कराने वाली, क्षोभ पैदा करने वाली गन्धों का सूँघना घ्राणेन्द्रिय का अतियोग है। किसी भी गन्ध को अल्प भी न सूँघना उसका अयोग है। दुर्गन्धित, जिस गन्ध से द्वेष (Allergy) हो, सड़नयुक्त गन्ध, अपवित्र गन्ध, विषैली गन्ध या वायु को सूँघना, मृत शरीर से निकलने वाली गन्ध सूँघना, घ्राणेन्द्रिय का सर्वथा मिथ्यायोग यानी दुरुपयोग है।
*#जिह्वेन्द्रिय_के_अतियोगादि -*
प्रिय रसों (स्वादों) का अधिकाधिक सेवन उसका अतियोग है। किसी भी रस का स्वाद न लेना या कम मात्रा में लेना जिह्वेन्द्रिय का अयोग है।
आहार विधि में जिनका वर्णन किया गया है, जिस रस को जैसा ग्रहण करने का निर्देश दिया गया है, उसका ध्यान न रखकर अन्य रसों के साथ स्वादेन्द्रिय का संयोग करना 'मिथ्यायोग' यानी जिव्हा का दुरुपयोग है।
*#त्वचा_इन्द्रिय_के_अतियोगादि-*
अत्यन्त शीतल तथा अत्यन्त दाहक गरम द्रवों से स्नान करना, उबटन, मर्दन आदि का अधिक सेवन करना ऐसे ही स्पर्शेन्द्रिय का अधिक उपयोग इसका अतियोग है। अधिक शीतल जल में स्नान, डुबकी लगाना, खौलते या अधिक गर्म तेल की मर्दन करना त्वचा का अतियोग है। त्वचा से शीतल या गरम पदार्थों का क्रमपूर्वक सेवन न करना, ऊँच नीच स्थानों पर बैठने से होने वाले कष्ट, चोट का लगना, अशुद्ध, संक्रमित, दूषित पदार्थों, कृमि कीटों का स्पर्श, ये त्वचेन्द्रिय के मिथ्यायोग या दुरुपयोग हैं।
*#मन_वाणी_कर्म_के_अतियोगादि-*
जो चेष्टायें की जाती हैं उन्हें 'कर्म' कहा जाता है। मन, वाणी और कर्म का अतियोग अयोग और मिथ्यायोग रोगजनक होता है।
*#मन_के_अतियोगादि-*
डरना, शोकाकुल रहना, क्रोध करना, लोभ, मोह, मान (घमण्ड), ईर्ष्या, मिथ्यादर्शन (किसी को दुर्विचार से देखना या समझना) मन के मिथ्यायोग हैं।
*#वाणी_के_अतियोग-*
चुगली करना, झूठ बोलना, असमय झगड़ा करना, अप्रिय भाषण, बिना किसी प्रसंग के बातचीत करना, कठोर वचनों को बोलना इत्यादि वाणी के मिथ्यायोग हैं।
*#शरीर_के_अतियोग-*
वात, मूत्र, पुरीष (Stool) आदि के वेगों को रोकना, जो वेग उत्पन्न न हुये हों उन्हें उभाडना, या बलपूर्वक लाना, ऊबड़ खाबड़ रास्तों पर गिर जाना, अधिक चलना, गिर जाना, शरीर को टेढ़ा मेढ़ा रखना, शरीरावयवों को दूषित रखना, अंगों पर चोट या आघात पहुँचाना, अधिक मर्दन करवाना, प्राणवायु को देर तक रोकना और शरीर को किसी भी प्रकार का क्लेश या दुःख देना, ये शरीर के मिथ्यायोग हैं।
*#ध्यान_रखें-*
- किसी कार्य विशेष में अतिप्रवृत्ति होना ही अतियोग है। |
-इनकी बिल्कुल प्रवृत्ति न होना अयोग है।
-दुरुपयोग करना मिथ्यायोग है। |
इस प्रकार मन, वाणी, शरीर की चेष्टाओं का अतियोग, अयोग, मिथ्यायोग, बुद्धि यानी प्रज्ञा का अपराध अर्थात् असामाजिकता है। इसी को चरक ने अपने शब्दों में इस प्रकार कहा है कि बुद्धि, धैर्य और स्मृति (शून्यता) को नष्ट कर जब व्यक्ति असामाजिक कार्य करने लगता है, उसे *#प्रज्ञापराध_कहते_हैं* यह शारीरिक और मानसिक सभी दोषों को असंतुलित कर देता है।' परिणामतः हम रोगी होने लगते हैं।
🙏डॉ त्रिभुवन नाथ श्रीवास्तव, प्राचार्य, विवेकानंद योग प्राकृतिक चिकित्सा महाविद्यालय एवम् चिकित्सालय, बाजोर, सीकर, राजस्थान 🙏🙏❤️🙏🙏