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पादरी सैमुअल बील और जोसफ नीडम की चीन में भूमिका

4 अप्रैल 2023

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अनेक पादरियों की चीन को तोड़ने और उसके झूठे इतिहास को रचने तथा अपने हितों के अनुसार उसके बारे में प्रचार करने एवं आंत- रिक विद्रोह फैलाने में निर्णायक भूमिका रही है। इनमें सैमुअल बील और जोसफ नीडम मुख्य हैं। अतः दोनों के बारे में संक्षेप में जानना उप- योगी होगा।

सैमुअल बील 19वीं शताब्दी के एक अंग्रेज विद्वान पादरी हैं। वे इंग्लैंड के डेवान क्षेत्र के डेवान बंदरगाह कस्बे में 1825 में जन्मे थे। वहीं स्कूली पढ़ाई की, फिर 22 वर्ष की उम्र में 1847 में पादरियों के गढ़ कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से एक स्नातक पादरी बने। उनका संपूर्ण परिवार कट्टर ईसाई था। पिता भी पादरी थे। 1848 से 1850 तक उन्होंने यॉर्कशर में ईसाई बच्चों को उपदेश दिया, फिर वे डीकन (चर्च के उपपुरो- हित) बनाए गए। उन दिनों संपूर्ण यूरोप में सेना के प्रमुख पदों पर तथा शिक्षा संस्थानों के समस्त पदों पर केवल पादरियों की ही नियुक्ति होती थी। अत: उन्होंने नौसेना में चैप्लिन (प्रमुख पादरी) बनने के लिए आवेदन दिया। उन्हें वह नौकरी मिल गई।

फिर वे यूरोपीय देशों से चीन के युद्ध के दौरान ब्रिटिश सेना के प्रमुख पादरी बनकर 1856 से 1858 तक चीन में रहे। उन्होंने चीनी भाषा सीखी और फिर वे सेना के लिए जासूसी करने लगे तथा चीन और जापान के विषय में अधिकाधिक गुप्त जानकारियाँ संग्रह करने लगे। उन दिनों पादरियों का एक मुख्य काम अन्य देशों की जासूसी करना भी था। अपनी जासूसी के बाद उन्होंने एक गुप्त पर्चा लिखा, जो सेना के अधिकारियों और ब्रिटिश राजपुरुषों के बीच बाँटा गया, उसमें बील ने दावा किया कि तोकुगावा शोगुन जापान के वास्तविक सम्राट नहीं हैं। और इसलिए उनसे की गई संधियाँ अधिकृत नहीं है। वस्तुतः इसी तरह के भेद और फूट डालते हुए ही यूरोपीय देश दुनिया में कई जगह लगभग 100 वर्षों तक सफल होते रहे हैं। भेद फैलाने और जासूसी करने तथा झूठ फैलाने में इंग्लैंड के अनेक पादरी अग्रणी रहे हैं। इसके लिए उन्हें सम्मानित भी किया जाता रहा है।

1861 में उन्होंने मार्था से विवाह किया। 16 वर्ष तक वे चीन और जापान की इंग्लैंड के लिए जासूसी करते रहे। इसके बाद 1872 में उन्हें लंदन के इंडिया ऑफिस पुस्तकालय में चीनी बौद्ध ग्रंथों के अध्ययन के लिए परीक्षक बनाया गया। परीक्षण के नाम पर चीन और भारतीय शास्त्रों और इतिहास ग्रंथों में छलपूर्ण मिलावट, मिथ्या दोषारोपण और छिद्रान्वेषण करते हुए अर्थ का अनर्थ करने की जिम्मेदारी चर्च द्वारा पादरियों को दी जाती थी, जिसे वे निष्ठापूर्वक निभाते थे। जाली इतिहास ग्रंथों की अरबी, फारसी, चगताई, तुर्की और चीनी भाषा में रचना करना इसी निष्ठापूर्ण दायित्व का अंग था।

बहुत परिश्रम करके बील ने अर्थ का अनर्थ करते हुए भारतीय बौद्ध मत और चीनी बौद्ध मत में भारी भेद प्रतिपादित किया। उदाहरण के लिए, उन्होंने कहा कि भारत में निर्वाण का अर्थ है 'अस्तित्व की सत्यता का अस्वीकार, जबकि चीन में निर्वाण का अर्थ है— संपूर्णता की प्राप्ति'। इस प्रकार उन्होंने भारतीय निर्वाण का अर्थ शून्यता और चीनी निर्वाण का अर्थ पूर्णता बता दिया और तब से यूरो- ईसाई विद्वानों के भारतीय हिंदू शिष्य भी वहीं दोहराए जा रहे हैं, जबकि चीन में वस्तुतः वेदांत की एक शाखा के रूप में बौद्ध विचार फैले थे। पूर्णता की बात उपनिषदों और वेदांत दर्शन में ही है। 'महापरिनिब्बान सुत्त' की भारतीय और चीनी प्रतियों में उन्होंने भेद दिखाया। 1877 में उन्हें लंदन में चीनी भाषा का प्राध्यापक बना दिया गया, फिर वे नार्थम्बरलैंड में रेक्टर रहे। चीनी बौद्ध मत के इस तरह के शोधों के लिए उन्हें 'डी.सी.एल.' की सम्मानित उपाधि दी गई। इसके बाद वे चीन के विषय में विशेषज्ञ माने जाने लगे। उन्होंने कई चीनी यात्रा-वृत्तांतों का भी अंग्रेजी में अनु- वाद किया।

1856 से 1860 तक ब्रिटिश और फ्रेंच सेनाओं ने चीन के किंग सम्राट के विरुद्ध संयुक्त आक्रमण किया। 8 अक्तूबर, 1856 से प्रारंभ हुआ यह युद्ध 4 वर्षों से अधिक समय तक चला। बाद में इस अभियान में संयुक्त राज्य अमेरिका भी शामिल हो गया।

वस्तुतः चीन में अफीम की तस्करी का अपना अधिकार यूरोपीय ईसाई देश 19वीं शताब्दी के आरंभ से ही जता रहे थे। उस दावे को बल देने के लिए तथा चीनी समाज और जापानी समाज में टकराव पैदा करने तथा आंतरिक विद्रोह उभारने के लिए ही सैमुअल बील जैसे पादरियों को वहाँ भेजा जाता था। चीन की सेनाओं से ईस्ट इंडिया कंपनी की पहली टकराहट 1841 में ही हो गई थी। केंटन में अंग्रेज अफीम की तस्करी कर रहे थे, जिसे चीनी शासन ने रोका। इस पर मुक्त व्यापार को रोकने का आरोप लगाकर ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारतीय सेनाओं के द्वारा चीनी सेनाओं पर आक्रमण करा दिया। अंग्रेजों के नेतृत्व में भारतीय नौसेनाओं ने बंदरगाह से चीनी नौसेना को मार भगाया, फिर अनेक छिटपुट युद्ध हुए और अंत में नानकिंग नामक शहर में संधि हुई।

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कम्युनिस्ट चीन : अवैध अस्तित्व
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"यह अल्पज्ञात तथ्य है कि चीन का ‘चीन’ नाम भारत का दिया हुआ है। चीन तो स्वयं को झुआंगहुआ कहता है। इससे भी अल्पज्ञात तथ्य यह है कि महाभारत काल में चीन भारत के सैकड़ों जनपदों में से एक था। प्रशांत महासागर के तट पर पीत नदी के पास यह लघु राज्य भारत से हजारों किलोमीटर दूरस्थ था। पाठकों को यह जानकर आश्चर्य होगा कि अपने इतिहास के अधिकांश में चीन भरतवंशी शासकों के अधीन अर्थात् परतंत्र रहा है। आज के विशाल चीन का निर्माण तत्कालीन सोवियत संघ, ब्रिटेन, संयुक्त राज्य अमरीका आदि के अनुग्रह, हस्तक्षेप और प्रत्यक्ष-परोक्ष सहयोग से ही संभव हुआ है। अन्यथा पुराने चीन को कभी भी बाहरी शक्तियों से ऐसी व्यापक एवं प्रभावकारी सहायता नहीं मिलती। इसलिए यह चीन न होकर, विस्तारवादी और उपनिवेशवादी कम्युनिस्ट चीन है और इस प्रकार यह नैसर्गिक राष्ट्र न होकर कृत्रिम देश है। कम्युनिस्ट चीन के आततायी और दमनकारी साम्राज्यवाद से तिब्बतियों, मंगोलों, मांचुओं, तुर्कों और हानों की मुक्ति आवश्यक है और इसमें भारत की महती भूमिका हो सकती है। यह वैसे भी भारत का कर्तव्य है कि सदा से हमारे अभिन्न तथा आत्मीय रहे तिब्बत पर चीन का बलात् कब्जा कराने में मुख्य भूमिका भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री की ही रही। उन्होंने ही इतिहास में पहली बार चीन को भारत का पड़ोसी बनाया। अत: इस भयंकर भूल को सुधारना भारत का नैतिक दायित्व है। इन सभी दृष्टियों से यह पुस्तक महत्त्वपूर्ण पथ-प्रदर्शक तथा अवश्य पठनीय है।"

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