shabd-logo

कुएं कि आत्मा...

12 सितम्बर 2021

81 बार देखा गया 81
                " कुएं कि आत्मा..."




" यह एक काल्पनिक कहानी है। इसका वर्तमान में किसी से भी कोई संबंध नहीं है। इसे आप मनोरंजन कि दृष्टि से पढ़े धन्यवाद।"

🧿🧿🧿🧿🧿🧿🧿🧿🧿🧿🧿🧿

रोज कि तरह आज भी रविबाबू कि पत्नी शांता ने दो मटके पकड़े। घर से बाहर निकली। घूंघट किया और चल पड़ी कुएं कि ओर पानी भरने।
कुएं का निर्मल जल अपने मटके में भर रही कुछ महिलाएं परस्पर वार्तालाप कर रही है। शांता के घर से कुआं थोड़ा अधिक दूर पड़ता है। लेकिन शांता के घर के आंगन में खड़े होकर कुएं को आसानी से देखा जा सकता है। शांता कि हमउम्र महिलाएं कुएं में बाल्टी डालकर रस्सी से बाल्टी ऊपर खींच लेती है और फिर शांता के आने के बाद उनकी पंचायत जमती है।

पूरे गांव कि , आस पड़ोस कि, अपने घर कि और न जाने कहां –कहां कि बातें महिलाएं आपस में करती हुईं पानी भरा करती है।

शांता बावड़ी या कुएं के पास पहुंची। उसके कानों में एक अन्य महिला कि आवाज गई।

" सुना है कि अपनी सोनाबाई भौजाई कि नई नवेली बहू ने अपने शरीर में  मिट्टी तेल डालकर आग लगा ली थी कल रात को। फिर क्या था, जल गई। घर वाले जागे और पानी लेकर उसकी ओर भागे। बावली थी उनकी बहू, घर के पीछे अंधेरे में जागर वो जलकर मर गई। आग ऐसी लगाई थी कि कोई उसे बचा ही न पाया।" वो महिला पानी से भरे मटके को सिर पर रखे डिल्ले (गुंडरी) के ऊपर रखते हुए बोली।

" मैने भी आज सुबह ही सुना है बहन। उसके ससुर के तो दाएं हाथ भी जल गए है अपनी बहू को बचाते हुए।" दूसरी महिला ने कुएं के जल में बाल्टी गिराते हुए कहा फिर रस्सी पकड़कर ऊपर कि ओर बाल्टी खींचने लगी।

" अरे जब घर गृहस्थी चलानी ही नहीं थी तो शादी ही क्यों करी? फिजूल में उसके सास– ससुर और उसके पति को पुलिस थाने के चक्कर काटने पड़ सकते है। उसके मां –बाप भी तो आए हैं पता नहीं कौनसी पंचायती होगी अब।" खाली मटके को कुएं के पास जमीन पर रखती हुई अधेड़ उम्र कि महिला बोली।

" ओ शांता! यहां आओ, वहां खड़ी रहोगी तो तुम्हारी पारी ही नहीं आएगी पानी भरने की।" सुजिता भाभी ने शांता को देखते हुए कहा।

थोड़ी देर बाद शांता और सुजिता भाभी को छोड़कर बाकी महिलाएं कुएं से पानी भरकर अपने घर के रस्ते कि ओर चल पड़ी।


" सुजिता ! क्या सच में सोनाबाई काकी कि बहू में कोई ऐब था? मुझे तो भली लगती थी बेचारी।" शांता ने बाल्टी कुएं में गिराते हुए पूछा।

" नहीं री! कोई ऐब नहीं था लेकिन काकी और काका को दहेज का चस्का लगा हुआ था और अभी भी लगा हुआ है। बेचारी कविता (सोनाबाई काकी कि बहू) हाजरी बजाती थी उनकी, सारा काम करने में लगी रहती थी। सुबह से शाम तक घर के काम करती,फिर दो मटके पकड़कर इसी कुएं में पानी भरने आती। बड़ी सीधी साधी थी। मां बाप गरीब है लेकिन फिर भी खूब दहेज देकर बिदा किया था कविता को। लेकिन उसके सास –ससुर और उसके पति कि दहेज पिपासा शांत नहीं हुई बल्कि समय के साथ– साथ बलवती होती जा रही थी। कविता और उसके मां बाप पर दबाव बनाने लगे कि 50 हजार नगद दे। मुझे तो लगता है कि पैसे न मिलने पर उन लोगों ने मिलकर कविता को रात में आग के हवाले कर दिया होगा। झूठ मूठ का जख्म लोगों को दिखाते फिर रहे हैं ताकि कोई उन पर शक न करें और बहू ने आत्महत्या कि है यह साबित हो जाए और अब तो यह साबित भी हो ही गया है।" आखिर के शब्द गुस्से से सुजिता भाभी बोलीं।


शांता का मन भारी होने लगा। कविता पानी भरने इसी कुएं में आया करती थी फिर चुपचाप चली जाती थीं।
न किसी से बात ही करती थी ना किसी कि चुगली।
शांता से कुछ कहा न गया। सुजिता ने एक मटका लाया था। पानी भरकर वो चली गई। अकेली कुएं के पास दो मटको में पानी भर रही शांता कुछ बैचेन होने लगी।

बाल्टी को कुएं में गिराते हुए उसकी नजर पानी में दिख रही परछाई पर गई। शांता के हाथ कांप उठे।
वो झट से कुएं से दूर हो गई। एक मटके में पूरा और दूसरे में आधा पानी भरा हुआ था जिसे पकड़कर शांता अब अपने घर कि ओर मुखातिब हुई।

अजीब –सी कराहनें, चीखने कि आवाजे कुएं के जल से निकलकर शांता के कानों में गूंजने लगी। पैर तेज गति से चलने लगे।
रात्रि का भोजन ग्रहण कराने और करने के बाद शांता अपने कमरे में पलंग पर लेटी हुई है। खिड़की रोज खुली रखती थीं लेकिन आज एक अंजाने से डर के चलते उसने खिड़की बन्द कर दी है। नींद कोसों दूर हैं और अजीब सी सिहरन दौड़ रही है उसके देह में आबाद गति से।
रात के 10 बजे उसने महसूस किया कि वह बुखार के ताप से तप रही है। रविबाबू पड़ोस के गांव गए हुए है किसी काम से। घर में  सास– ससुर ही है और वे सोए हुए हैं।

शांता अपने माथे पर हाथ फेरते हुए उठी और रसोई कि ओर बढ़ गई।
रसोई में जाकर कोने में रखे हुए मटके के ढक्कन को खोलते ही उसे जल में अपने चेहरे कि जगह किसी और महिला का बेहद डरावना चेहरा नजर आया। झटके से वो दूर हटी। श्वांसे तेज गति से चलने लगी। पसीने से वो तरबतर हो गई फिर एक आवाज़ उसके कानों में गई।

" शांता,, जानती हूं कि तुम बाकी गांववालो कि जैसी नहीं हो।"
"मुझ निरापराध , लाचार और बेबस को उन वहशी दरिंदो ने पैसों के खातिर जला डाला।"

"मेरे कोख में पल रही बेटी कि निर्मम हत्या की गई है शांता।"
" अब मैं एक रूह, एक आत्मा बनकर भटक रही हूं शांता, भटक रही हूं।" आवाज में अब रुदन स्वर मिल गया और आवाज काफ़ी दर्दनाक सुनाई देने लगी। शांता के आंखो में आंसू आ गए लेकिन वह कुछ भी समझ नहीं पा रही थी कि कौन है यह आत्मा? 

" कृपया मुझे सविस्तर बताओ। कौन हो तुम और क्या हुआ है तुम्हारे साथ? मुझसे तुम्हे क्या चहिए?" साहस बटोरती हुई शांता ने कांपते होंठ हिलाते हुए कहा और दीवार से सटकर खड़ी हो गई। उसे अहसास होने लगा कि अब उसका शरीर सामान्य हो चुका है।


" सारे सवालों के जवाब जानने के लिए तुम्हें कुएं कि आत्मा यानि कि मेरी बात माननी पड़ेगी और मेरी सहायता भी करनी पड़ेगी शांता। करोगी ना मेरी सहायता? बोलो शांता?" इस बार बर्फ सी सर्द आवाज़ शांता को दाईं ओर से सुनाई दी। शांता कुछ बोल ना पाई लेकिन हामी भरते हुए उसने सिर " हां" में हिला दिया।


रसोई में सफेद कोहरा या कहें तो सफेद धुआं छाने लगा। शांता कि आंखे बंद होने लगी। देखते ही देखते वह बेहोश हो कर एक अदृश्य सफेद साए के बांहों में जा गिरी।

20 मिनट बाद।


शांता को होश आया। चारों ओर उसकी निगाहें दौड़ पड़ी। घुप्प अंधेरे में भी एक रोशनी उसे नजर आ रही है। उसने देखा कि कुएं के अन्दर से एक खौफनाक चेहरे वाली आत्मा, सफेद साड़ी में लिपटी हुई बाहर निकल रही है। बाल बिखरे हुए हैं। एक बार फिर दिल के दर्द या जख्म जुबां पर आ गए और वह आत्मा चीख पड़ी।
शांता के रोंगटे खड़े हो गए। उसने सपने में भी नहीं सोचा था कि किसी कुएं कि आत्मा से उसका पाला पड़ने वाला है।

खैर।


आत्मा अब शांता के सामने जाकर खड़ी हो गई। अपने आप दो मशालें जलती हुई वहां पर हवा में झूलने लगी। शांता ने देखा कि आत्मा के सर से लेकर पांव तक के अंगों में जलने के निशान दिख रहे है। मानों बुरी तरह से उसे जलाया गया हो। शांता उठकर खड़ी हो गई। उसके कानों में आत्मा कि कर्कश आवाज गई।

"आज अमावस्या कि वह काली रात है जो नकारात्मक शक्तियों को बलवती बनाती है। यह एक तरह से मेरे लिए आज वरदान साबित होने वाली है लेकिन तुम्हे पहले मैं अपनी सच्ची कहानी बताने जा रही हूं। आशा है कि तुम सुनोगी और समझने कि कोशिश भी करोगी।" वो अब कुएं के सीमेंट से बने हुए गोल घेरे या रेलिंग पर जाकर बैठ गई।
शांता ने हामी भरी। 


" मैं यानि कि कविता। एक मामूली किसान कि बेटी थी। मैं शादी नहीं करना चाहती थी लेकिन एक बाप को अपनी बेटी ब्याहनी ही पड़ती हैं नहीं तो यह समाज लड़की में कोई ऐब ढूंढने में माहिर तो है ही। मेरी सास ( सोनाबाई), मेरे ससुर ( भुवन) और मेरे पति ( अशराज) तीनों ही मेरे गांव गए थे लड़की देखने। उन्हें कुछ पड़ोसियों ने हमारे घर का पता बता दिया। मां बाप ने उन्हें साफ कह दिया था कि वे दहेज नहीं दे पाएंगे। मेरे ससुरालियों ने भी वायदा किया था कि वे बगैर दहेज के शादी कराने को तैयार हैं। मेरे बाप के पास 10 बीघा जमीन थी खेती करने लायक । उन्होंने वह जमीन गिरवी रख दी, ताकि मेरा ब्याह अच्छे से हो जाए। लेकिन बारात कि रात मेरे ससुरालियों ने अपनी एक चाल चली। उन्होंने मेरे बाप से ऊंची आवाज़ में कहा कि–" 30 हजार नगद दे तभी डोली उठेगी। बगैर दहेज के विवाह करने में कोई रस नहीं है। पैसे मिलने पर ही डोली उठेगी, वरना बारात वापस चली जाएगी और साथ में हमारा सम्मान भी।" 
पिताजी उनके पैरों तले गिरकर उन्हें मानाने लगे लेकिन वे अडिग रहे। गिरवी रखी हुई जमीन रातोरात बिक गई। 30 हजार नगद मेरे ससुर को मिलने के बाद ही मेरी डोली उठी।" कहते हुए कविता कि रूह क्रोध के मारे कांप उठी।
शांता के आंखो में आंसू आ गए।

" ससुराल आई तो मेरे साथ जानवरों कि तरह बर्ताव किया जाने लगा। पति रात में सोने आते और मेरी देह  नोचने के बाद आराम से सोते फिर दिन में मुझे अपना चेहरा तक नहीं दिखाते थे। सास, ससुर सारा काम सौंपकर ऐशो आराम कि जिंदगी बिता रहे थे। मैं सह रही थी सारी जिल्लते। मां –बाप से क्या कहती? कोई संपर्क नहीं था मेरा मेरे मां बाप से वरना उन्हें मैं अपनी आपबीती सुना चुकी होती। मेरे ससुरालियों ने मुझे मेरे मां बाप के सामने बदचलन कहा। मुझे उनसे मिलने नहीं दिया गया आजतक। सारे जुल्म सह लेने के बाद भी मैं चुप रहती थी क्योंकि मुझे लगता था कि एक न एक दिन जरूर मुझे अपने पति का , अपने सास –ससुर का प्यार, स्नेह मिलेगा। लेकिन मैं गलत साबित हुई शांता.. सारे अरमान आंसू बनकर आंखो से बह गए। सिवाय दर्द के मुझे कुछ नहीं मिला।" दर्द से चीखती हुई वह रूह अब झटके से हवा में उछली और एक पत्थर पर दाएं पैर से वार किया। वह त्रिकोणाकार पत्थर टूट कर बिखर गया।

" फिर क्या हुआ था कविता?" इस बार शांता ने उसके सामने जाकर कहा। शांता के सजल नेत्रों में उस रूह को अपनापन नजर आया। उसे थोड़ी शांति मिली।

" मैं गर्भवती हुईं। एक जीव मेरी कोख में प्रवेश कर चुकीं थीं यह जानकर मैं सारे जख्म भुल गई ।मैं अपने आने वाले बच्चे  को लेकर सपने संजोने लगी जो अधूरे ही रह गए हैं और इन्ही सपनों ने मुझे कुएं कि आत्मा बना दिया।
मेरे ससुरालियों ने मुझे जबरन सोनोग्राफी कराने के बहाने हॉस्पिटल का मुख दिखाया। नर्स और डॉक्टर के मुंह में पैसे मारकर मेरे पति ने सोनोग्राफी के बहाने यह पता लगा लिया था कि मैं एक बेटी कि मां बनने वाली थी। मुझे बेहोश कर दिया गया। मात्र तीन माह तक ही मैं अपने कोख में अपनी बेटी को रख पाई थी। उन पापियों ने गर्भ में ही मेरी बच्ची को मार डाला। उसके हर एक अंग को नोच गिराया। वो तो नन्ही सी जान थी भला कितनी देर तक सहती। गर्भ में चीखी, चिल्लाई होगी। फिर चली गई वहां, जहां से मेरे गर्भ में आई थी।" कविता कि रूह रो पड़ी। शांता ने उसे छूना चाहा लेकिन एक रूह को वह छू नही सकती थीं और छू नही पाई।

" मुझे जब पता चला कि मेरी बच्ची मेरे गर्भ में ही मारी गई थी तो मै लाश बन चुकी थी लेकिन फिर भी मेरे ससुरालियों ने जरा सी भी दया न दिखाई। मेरे मां बाप को यह कह डाला था कि मैंने चोरी से कुछ दवाइयां खाकर बच्चा गिरा दिया। मेरे मां –बाप टूट से गए थे। वे मुझसे मिलना चाहते थे लेकिन मेरे ससुर ने एक शर्त रख दी कि मेरे मां –बाप  मुझसे तभी मिल सकते है जब वे मेरे पति को 50 हजार नगद दे देंगे। उनके पैरों तले से जमीन खिसक गई। उन्हें बड़ा अफ़सोस हुआ कि क्यों उन्होंने मेरा ब्याह ऐसे घराने में कर दिया था। चार माह बाद भी जब मेरे पति को 50 हजार नगद नही मिले तो फिर सास, ससुर ने मिलकर उन्हें पट्टी पढ़ाई कि मुझे मारकर वे दूसरी शादी कर ले। काली अंधेरी रात को मुझे जबर्दस्ती घर के पीछे सुनसान जगह पर ले जाया गया। मुंह पर कपड़े ठूंस दिए। मेरे हाथ, पैर बांध दिए। मिट्टी तेल डालकर उन्होंने बड़ी सहजता से माचिस कि तीली जलाई और मुझे आग के हवाले करके मेरी दर्दनाक मौत का तमाशा देखने लगे। जानबूझ कर मुझे बचाने कि कोशिश करने का नाटक किया, झूठे जख्म बनाए और मेरी हत्या को आत्महत्या का नाम दे दिया गया। मेरी चीखे निकल नहीं पा रही थी क्योंकि कपड़े मजबूती से मेरे मुंह में ठूंसे गए थे और आग लगने पर वे कपड़े जलकर पिघल गए और मुंह को जला गए। मेरे गले तक,पिघले हुए कपड़े का धधकता हुआ तरल पदार्थ चला गया। मैं भगवान से मौत कि भीख मांगने लगी। आग में बुरी तरह से मैं झुलस रही थी। सारा शरीर पिघलता जा रहा था और फिर मौत के साक्षात दर्शन हुए।
मुझे पागल, बदचलन, गिरी हुई औरत के नामों से नवाजा  गया। यह कुआं ही मेरी रूह को रास आई। जिसके बाद मेरी आत्मा यहां रहने लगी। लेकिन मै जब तक उन तीनों को मौत से रूबरू नहीं करवा दूंगी तब तक ऐसे ही कुएं कि आत्मा बनी रहूंगी और मुझे मुक्ति नहीं मिल पाएगी।" कहते हुए वो भयानक अट्टहास करती हुईं चीखी। आपबीती सुनाकर उसे हल्केपन का अहसास हुआ।

" सच में तुम्हारे साथ अन्याय हुआ है। वे तीनों इन्सान नहीं बल्कि हैवान है। इतने नीच है कि नर्क में भी जगह न मिले। मैं तुम्हारे साथ हूं। मैं सबको बताऊंगी तुम्हारी दर्दनाक कहानी।" शांता उसके चेहरे को देखते हुए बोली।



" मेरी कहानी बांचने से कुछ नहीं होगा। मुझे बस तुम्हारा शरीर चहिए आज रात के लिए। बिना शरीर के मेरी काली शक्तियां कुछ भी नहीं है। बस आज रात के लिए मैं तुमसे तुम्हारा शरीर मांगना चाहती हूं इसलिए तुम्हें यहां लेकर आई हूं। क्या तुम मुझे अपना बदला लेने के लिए अपना शरीर दोगी?" सवालिया निगाहें रूह ने शांता पर डाली।

" पर,,मेरा,,।" शांता से कुछ कहते नहीं बन रहा है।

" तुम निश्चिन्त रहो। आज अमावस्या कि रात है। यह उपयुक्त है मेरे कार्य के लिए। सुबह होने पर तुम अपनी यही सामान्य अवस्था पुनः प्राप्त कर लोगी। तुम्हे या तुम्हारे शरीर को कोई नुकसान नहीं पहुंचेगा। यकीन करो शांता। मुझ पर भरोसा कर के देखो।" रूह ने दिव्य प्रकाश से जगमगाता हुआ अपना दोनो हाथ उसके आगे फैला दिया मानों भीख मांग रही हो। उस रूह कि लाल आंखो में असीम दर्द साफ नजर आ रहा है।


" ठीक है मैं अपना शरीर तुम्हे देती हूं। जाओ और जाकर उन तीनों का संहार करो कविता, जाओ।" शांता ने भी अपने गालों पर लुढ़क आए आंसू पोंछे और दृढ़ स्वर में बोली।

वह रूह या आत्मा अर्थात् कविता कि आत्मा जो कुएं कि आत्मा बनी हुई थी उसके जले हुए होठों पर मुस्कुराहट नाचने लगी। देखते ही देखते वह रूह जाकर शांता के शरीर में प्रवेश कर गई। असीम प्रकाश पुंज शांता के शरीर से बाहर निकलने लगी। वो स्वयं प्रकाशमान हो कर खुद में ही शक्ति का अनुभव करती हुईं मुस्कुरा रही है।


🔺🔺🔺🔺🔺🔺🔺🔺🔺🔺🔺🔺


कविता के मां और बाप को सोनाबाई ने घर में 10 मिनट भी रुकने नहीं दिया। जैसे आए थे वैसे ही वे दोनों चले गए पश्चाताप के अश्रु बहाते हुए।
भुवन यानि कि कविता का ससुर पलंग में सोया हुआ खर्राटे ले रहा है। सोनाबाईं दूसरी ओर पलंग के छोर में लेटी हुई सो रही है। अचानक से उस कमरे कि खिड़की खट,,, कि आवाज करती हुई खुली। झटके से खिड़की खुली और उसके पल्ले टूटकर फर्श पर जोर कि आवाज़ करते हुए जा गिरे। सोनाबाई और भुवन झटके से उठे।

देखते ही देखते धुआं सफेद रंगत लिए कमरे में प्रवेश कर गया।

" चैन से सो रहे हो,,, अब बेचैन होने का समय आ चुका है।" एक भयानक अट्टहास और हंसी से भरी हुई कर्कश आवाज कमरे में गूंजी। उन्हें कोई नजर न आया।

दोनों ही कांप उठे। होठ मानों सिल से गए है।

वे दोनों एक झटके से पलंग पर से हवा में उछले फिर फर्श पर औंधे मुंह जा गिरे। जोर से कराहते हुए दोनों उठने कि कोशिश कर ही रहे थे कि लाइट चली गई।
घुप्प अंधेरा छा गया। फिर उन दोनों कि तीखी चीख कमरे में गूंजी। दूसरे कमरे में सो रहे कविता के पति अशराज के कानों में ये चीखें गई तो उसका दिल दहल गया। लेकिन अगले ही पल पूरे घर कि लाइट चली गई। अशराज को घुटन महसूस हुई। चक्कर खाते हुए वो धम्म से फर्श पर जा गिरा।


कुछ देर बाद।



सियारों और कुत्तों कि चीखों और उनके रोने कि आवाजो से झुलस रहा वातावरण बेहद भयावह नजर आ रहा है। रूह ने उसी घर के पीछे सुनसान वाली जगह पर उन तीनों को जमीन पर एक दूसरे से सटाकर बैठा दिया है और मोटी रस्सी से तीनों को बांधा गया है। मुंह में कपड़े ठूंसे गए हैं। तीनों कि पीठ एक –दूसरे कि पीठ से सटी हुई है।

" देखो मैं कौन हूं?" कविता कि रूह ने तेज आवाज में कहा।
वह रूह नहीं बल्कि इस बार कविता के रूप में उन तीनों के सामने जाकर खड़ी हो गई। हाथ में जलते हुए मशाल को पकड़ी हुई वो बेहद डरावनी नजर आ रही है।

तीनों बोलना चाहते हैं लेकिन बोल पाने में असमर्थ है बिल्कुल वैसे ही जैसे कविता असमर्थ थी। 

" तुम तीनों ने मुझे जिंदा जलाया था न? आज खुद जलोगे। आज इंसाफ करूंगी मैं। मुझे मेरा न्याय आज मिलकर रहेगा। तुम तीनों तड़प तड़प कर आज मेरे सामने मरने के लिए मजबूर हो जाओगे और मैं तमाशा देखूंगी।" कविता कि रूह ने भयानक अट्टहास किया। उसके आंखो में आंसू अभी भी दिख रहे है।

एक मिट्टी तेल का डिब्बा प्रकट हुआ। ढक्कन खुला। उन तीनों के शरीर पर मिट्टी तेल गिरने लगी। गोल चक्कर लगाते हुए डिब्बा घूम रहा है और मिट्टी तेल उन तीनों के ऊपर गिरकर उनके शरीर को भिगोता जा रहा है।

तीनों ही मिट्टी तेल से भीग गए। रात के 2 बज रहे हैं। वे तीनों अपनी  मौत को इतने करीब से देखकर होश गवा बैठे। रूह ने दाएं हाथ में पकड़ी हुई धू– धू करती जल रही मशाल तेजी से उन तीनों के ऊपर फेंक दिया। तीनों अब आग से झुलसने लगे।
अट्टहास करती हुईं कुएं कि आत्मा यह देखकर रो भी रही है और हंस भी रही है। वे तीनों अपने किए कि सजा भोग रहे है। मुंह में ठूंसे गए कपड़े जलकर गल गए फिर तरल पदार्थ में बदलकर मुंह के अंदर से होते हुए गले तक फिर श्वांस नली तक जाकर जम से गए। उन तीनों कि बेहद दर्दनाक मौत को देखने के बाद कविता कि आत्मा को शांति मिली, तृप्ति मिली।

तीनों का शरीर जलकर खाक हो गया। राख ही वहां कि जमीन पर बची हुई है।



कविता कि आत्मा शांता का शरीर त्याग देती है। शांता को सकुशल उसके घर पहुंचा कर कविता कि रूह यानि कुएं कि आत्मा ने उससे सप्रेम विदा लिया। सजल नेत्रों से उस रूह को देखते हुए शांता ने उसे विदा दी।

अगली सुबह गांववालो को उन तीनों कि मुट्ठी भर रख देखने को मिली।

।। समाप्त।।


1
रचनाएँ
कुएं कि आत्मा...
5.0
स्त्री का दहेज प्रथा से कैसे होता है जीवन अभिशापित देखिए एक झलक इस कहानी में।

किताब पढ़िए

लेख पढ़िए