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नैतिकमूल्य

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शालिनी ( प्यारी सी बालिका ) बात हाल ही के कुछ वर्ष पहले की है । जब हमारे विद्यालय में शालिनी का प्रवेश कक्षा एक में हुआ था । एक बहुत सुंदर - सी, बहुत प्यारी - सी और विद्यालय का गृह कार्य समय पर क

हे ईश्वर दे ऐसा वरदान हर जन का हो कल्याण . हर जन प्रेम और अपनापन राखे जन जन का चाहूँ उत्थान                  ,     हाथ मिलाकर चले सदा हम नहीं किसी को पीछे छोड़े  दीन दुखी के बने सहारे मानवता के रिश्

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मनी-प्लांट (1) क्या कर रही हो दादी? इस पौधे को क्यों तोड़ रही हो? क्या दिक्कत हो रही है इनसे तुमको? बोलती क्यों नहीं दादी? अपने पोते के एक के बाद एक प्रश्नों को अनसुना कर मिथलेश कुमारी अपने काम में

अपने कम्प्यूटर के लिए मैं एक नया रंगीन प्रिंटर लाया था। घर में सबको बुला कर शेखी बघारते हुए बताया," ये बहुत अच्छी तकनीक से बना है और किसी भी चीज को हू-बहू प्रिंट कर देता है।" फिर मैंने सबको आदेश दिया

 अजय की बेटी की शादी में जाने के लिए जब सब तैयार हो रहे थे तो मैंने इस काम के लिए ले जाने वाले एक लिफाफे को निकाला और सोचा इसमें कितनी रकम डालूं। आम तौर पर मेरी पत्नी इस जिम्मेदारी को निभाती थी और इस

"चांद पर तिरंगा"चंद्रमा पर आज तिरंगा फहरायेगा,हिंदुस्तानहर हिंदुस्तानी के चेहरे पर छायेगी,मुस्कानजब चंद्रमा सतह पर उतरेगा,हमारा चंद्रयानलड्डू बटेंगे,विश्वभर में होगा हिंद का गुणगानविक्रम लेंडर आज तेरा

दिल की गहराइयों में बसा है ख़ुदा, मेरे रब का नूर जगमगाता है। तन्हाईयों में आवाज़ बन कर, मेरे दिल को चैन से सुलाता है। इश्क़ की राहों पर चलते चलते, अपने आप को खो दिया हैं। उस एक बाबा की आवाज़ म

एक थे राम-एक था रावण, दोनों अपनी-अपनी जगह शक्तिशाली। रावण के पास - सोने की लंका, तो राम के पास - सम्पूर्ण धरा। रावण के पास - विभिषण, तो राम के पास - भरत। रावण के पास - अहंकार, तो राम के पास - न

जब गाड़ी ट्रैफिक लाइट पर रेंग रही थी, आशा ने ताज्जुब से कहा, ‘आज दोपहर में भी इतना ट्रैफिक है इस रोड पर’। ‘सारा शहर ही जब देखो तब कहीं भागता रहता है’, लता ने उसकी हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा। सुदीप उन

जब तक ये पत्र तुम्हारे हाथ में होगा, मैं अर्पणा और खुशबू को लेकर जा चुका होऊंगा, एक नए शहर में। सच पूछो तो ये ट्रांसफर मैंने जानबूझकर और ज़िद कर के लिया था वर्ना मेरा सबकुछ ठीक चल रहा था ऑफिस में। बल्

शिखाकुछ ख़ामोश सा था दिल है । न जाने क्यों ? पर बार - बार उसकी याद आ रही थी । चार साल हो चुके मेरे विच्छेद को पर शायद ही कोई पल गया हो उसे याद किए बिना ।   कितने खुश थे हम दोनों । छोटा सा पर

ढूँढने वाला सितारों की गुज़रगाहों का अपने अफ़कार फ़िक्र का बहुवचन/चिंताएँ की दुनिया में सफ़र कर न सका अपनी हिकमत दुस्साहस  के ख़मो-पेच उलझनों में उलझा ऐसे आज तक फ़ैसला-ए-नफा-ओ-ज़रर लाभ-हानि का नि

लडका अपनी छोटी बहन के साथ बाजार से जा रहा था।अचानक से उसे लगा की, उसकी बहन पीछे रह गयी है।वह रुका, पीछे मुडकर देखा तो जाना कि, उसकी बहन एक खिलौने के दुकान के सामने खडी कोई चीज निहार रही है।लडका पीछे आ

जब बस में सफर कर रहा था...और ड्राइवर के बगल में खड़ा था...इतने में एक महिला ने ड्राइवर से बोला की "भैया" मुझे यहीं उतार दो...ड्राइवर ने उसे उतार दिया और फिर बस चलाते हुए मुझसे कहने लगा की दिनेश जी एक ब

इक वलवला-ए-ताज़ा   नया भाव    दिया मैंने दिलों को लाहौर से ता-ख़ाके-बुख़ारा-ओ-समरक़ंद    बुख़ारा और समरकंद की भूमि तक    लेकिन मुझे पैदा किया उस देस में तूने जिस देस के बन्दे हैं ग़ुलामी पे रज़ाम

जहाने-ताज़ा   नये संसार    की अफ़कारे-ताज़ा   ताज़ा चिंतन    से है नमूद कि संगो-ख़िश्त   ईंट-पत्थर    से होते नहीं जहाँ पैदा ख़ुदी में डूबने वालों के अज़्मो-हिम्मत   हिम्मत और इरादे    ने इस आबे-

बच्चा-ए-शाहीं   बाज़(पक्षी)के बच्चे से    से कहता था उक़ाबे-साल -ख़ुर्द   बूढ़ा उक़ाब    ऐ तिरे शहपर   पंख    पे आसाँ रिफ़अते- चर्ख़े-बरीं   आकाश की ऊँचाई    है शबाब   यौवन   अपने लहू की आग मे‍ जल

अक़्ल ने एक दिन ये दिल से कहा भूले-भटके की रहनुमा हूँ मैं दिल ने सुनकर कहा-ये सब सच है पर मुझे भी तो देख क्या हूँ मैं राज़े-हस्ती अस्तित्व के रहस्य को तू समझती है और आँखों से देखता हूँ मैं 

है कलेजा फ़िगार   घायल    होने को दामने-लालाज़ार होने को इश्क़ वो चीज़ है कि जिसमें क़रार   चैन    चाहिए बेक़रार होने को जुस्तजू-ए-क़फ़स   पिंजरे की अभिलाषा    है मेरे लिए ख़ूब समझे शिकार होन

परीशाँ होके मेरी खाक आखिर दिल न बन जाये जो मुश्किल अब हे या रब फिर वही मुश्किल न बन जाये न करदें मुझको मज़बूरे नवा फिरदौस में हूरें मेरा सोज़े दरूं फिर गर्मीए महेफिल न बन जाये कभी छोडी हूई मज़िलभी

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