समस्त बेटियों को समर्पित ....
जब हुयी प्रस्फुटित वह कलिका
कोई उपवन ना हर्षाया
उसकी कोमलता को लख कर
पाषाण कोई न पिघलाया!
वह पल प्रति पल विकसित होती
इक दिनचर्या जीती आई
बच बच एक एक पग रखती वह
शैशव व्यतीत करती आई!
जिसने था उसका सृजन किया
उसने न मोल उसका जाना
वह था जो उसका जनक स्वयम्
उसने न मोह उससे बाँधा !
वह थी कन्या यह दोष मान
वे उसे प्रताड़ित करते थे
जो पुत्र रत्न घर में आया
उस पर ही जान छिड़कते थे!
जब पुष्प बनी वह कुसुमित हो
प्रतिभा अनेक थी ,धनी बड़ी
जितने भी सद्गुण सम्भव थे
वह थी उन सब से भरी हुई!!
था आँखों में आकाश भरा
सतरंगे पुष्प खिले जिसमें
मन पर था ज़ोर नहीं चलता
वह बुनती थी कितने सपने!
जब स्वप्न सभी साकार हुये
वह तोड़ कूल को बह निकली
अपनी सारी प्रतिभा समेत
वह कलिका बन कर पुष्प खिली!
है ऐसा क्षेत्र नहीं कोई
जो रहे अछूता कन्या से
जो मात पिता को बोझ लगे
वो ही समाज की धुरी बने!
वह घर को गुंजित करती है
वह स्वप्न तुम्हारे गुनती है
दो बेटी को विस्तार सदा
क्षमता असीम वह रखती है!!