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इंद्रधनुष के कितने रंग

डॉ. पीयूष रंजन

3 अध्याय
0 लोगों ने खरीदा
5 पाठक
24 मार्च 2023 को पूर्ण की गई
ISBN : 9789355620194
ये पुस्तक यहां भी उपलब्ध है Amazon Flipkart

भावनाओं के कई रंग होते हैं और सभी रंगों का अपना एक अलग ही मजा होता है। जब से जिंदगी को समझा है, जिंदगी को सिर्फ अपने दिल की सुनकर, भावनाओं से परिपूर्ण जीया है। यह पुस्तक इंसान के इंद्रधनुषी भावनाओं के उन रंगों को सहेजने का एक प्रयास है, जिसका अनुभव जिंदगी के किसी-न-किसी मोड़ पर मुझे हुआ है। ‘इंद्रधनुष के कितने रंग’ जिंदगी के विविध रंगों को पन्नों पर उतरने की एक कोशिश है। ‘फलसफा’ में जिंदगी के मूल्य को समझते हुए, अपने कृत्य के द्वारा जिंदगी को और भी ज्याद मूल्यवान बनाने का संदेश दिया गया है। ‘जिंदगी दो पल की’ होती है। अफसोस, ज्यादातर लोग इस बात को जब तक समझ पाते हैं, तब तक ये पल बीत गए होते हैं। 

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behtreen kavya pustak


"इंद्रधनुष के कितने रंग" एक अद्भुत कथा है जो रंगों के जादू से भरपूर है, और डॉ. पीयूष रंजन ने इसे अत्यंत मनोरंजन से पेश किया है।


"इंद्रधनुष के कितने रंग" डॉ. पीयूष रंजन की पुस्तक है जो हमें आपसी संबंधों, जीवन के रंग और दुनिया के विविधता के बारे में सोचने के लिए प्रोत्साहित करती है। इस पुस्तक में लेखक ने इंद्रधनुष की तरह हमारे जीवन की विविधता को बताया है और हमें यह याद दिलाते हैं कि हमारे जीवन में रंग हमारे स्वागत हैं, चाहे वो कितने भी हों। यह पुस्तक सुंदर शब्दों में लिखी गई है और आत्म-समर्पण की भावना से भरपूर है। इसे पढ़कर आपका मनोबल बढ़ेगा और आपको नए दृष्टिकोण देखने के लिए प्रोत्साहित करेगा।

पुस्तक की झलकियां

1

रचनाकार के दो शब्द

25 मार्च 2023
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"वनाओं के कई रंग होते हैं और सभी रंगों का अपना एक अलग 1 अपने दिल की सुनकर, भावनाओं से परिपूर्ण जीया है। यह पुस्तक इनसान के इंद्रधनुषी भावनाओं के उन रंगों को सहेजने का एक प्रयास है, जिसका अनुभव जिंदगी

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वक्त बदलता जरूर है

25 मार्च 2023
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जो कभी सुखरू थे, उन्हें दीवारों पर टैंगते देखा है  वक्त कैसा भी हो, हर वक्त को बदलते देखा है हमेशा जो चला करते हैं, आसमाँ की तरफ देखकर  गाहे-बगाहे हमने उन्हें जमीन पर फिसलते देखा है। जरा जरा सी

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दो पल सिर्फ दिल की सुनते हैं

25 मार्च 2023
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मैंने अपनी बहुत कह ली  तुमने अपनी बहुत कह ली  अपनी-अपनी खूब कह ली  हल तो कुछ निकला नहीं मैंने अपना दिमाग खूब चलाया  तुमने भी बहुत चालाकियाँ की  बात तो बिगड़ती ही चली गई  और हल कुछ निकला नहीं

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