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माँ हूँ मैं

3 नवम्बर 2018

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गर्व सृजन का पाया बीज प्रेम अंकुराया कर अस्तित्व अनुभूति सुरभित मन मुस्काया स्पंदन स्नेहिल प्यारा प्रथम स्पर्श तुम्हारा माँ हूँ मैं,बिटिया मेरी तूने यह बोध कराया रोम-रोम ममत्व कस्तूरी जीवन की मेरी तुम धुरी चिड़िया आँगन किलकी ऋतु मधुमास घर आया तुतलाती प्रश्नों की लड़ी मधु पराग फूलों की झड़ी "माँ" कहकर बिटिया मेरी माँ हूँ यह बोध कराया नन्हें पाँव की थाप से डोले रूनझुन भू की वीणा बोले थम समीर छवि देखे तेरी ठिठका इंद्रधनुष भरमाया जीवन पथ पर थामे हाथ भरती डग विश्वास के साथ शक्ति स्वरुपा कहकर बिटिया "माँ" का सम्मान बढ़ाया आशीष को मन्नत माने तू सानिध्य स्वर्ग सा जाने तू उज्जल,निर्मल शुभ्र लगूँ मुझे गंगा पावन बतलाया जगबंधन सृष्टि क्या जाने तू? आँचल भर दुनिया माने तू स्त्रीत्व पूर्ण तुझसे बिटिया माँ हूँ मैं, तूने ही बोध कराया --श्वेता सिन्हा
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कृष्ण जैसे कृष्ण ही हैं।

3 सितम्बर 2018
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कृष्ण शब्द के उच्चारण से एक माधुर्य मन वीणा की तारों में झंकृत होता है और एक अलौकिक संगीत का प्रवाह शिराओं को जग के बंधनों से मुक्त कर अनंत सुख का अनुभव कराते है। रटते है जो कृष्ण का नाम, नहीं पड़ते है जग बंधन में ढ़ाई आखर कृष्ण नाम का भवपार करे चिर नंदन में रहस्यमयी कृष्ण की अद्भुत लीलाएँ आम जन के

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शिक्षक

5 सितम्बर 2018
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नित नन्हे माटी के दीपक गढ़ते, नव अंकुरित भविष्य के रक्षक हैं । सपनों में इंद्रधनुषी रंग भरने वाले, अद्वितीय चित्रकार शिक्षक हैं। कृषक, शिष्यों के जीवन के कर्मठ, बंजर भूमि पर हरियाली लाते हैं। बोकर बीज व्यक्तित्व निर्माण के, समय के पन्नों पर इतिहास बनाते हैं। जनगणना और मतगणना करना अब रह गय

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हिंदी:वर्तमान संदर्भ में

13 सितम्बर 2018
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"किसी देश की सांस्कृतिक सभ्यता तभी समृद्ध होगी जब उस देश की राजभाषा का उचित सम्मान होगा।"मात्र एक सुंदर भावपूर्ण पंक्ति से ज्यादा उपर्युक्त कथन का अभिप्राय हमने कभी समझा ही नहीं या यों कहें हिंदी की औपचारिकता पूरी करने में हम हिंदी को आत्मसात करना भूल गये।सोच रही हूँ हिंदी दिवस की बधाई किसे देनी चाह

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गीत सुनो

19 सितम्बर 2018
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दुःख,व्यथा,क्षोभ ही नहीं भरा बस विरह, क्रोध ही नहीं धरा मकरंद मधुर उर भीत सुनो जीवन का छम-छम गीत सुनो ज्वाला में जल मिट जाओगे गत मरीचिका आज लुटाओगे बनकर मधुप चख लो पराग कुछ क्षण का सुरभित रंग-राग अंबर से झरता स्नेहप्रीत सुनो कल-कल प्रकृति का गीत सुनो क्यूँ उर इतना अवसाद भरा? क्यूँ तम का गहरा गाद

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तृष्णा

22 सितम्बर 2018
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मदिर प्रीत की चाह लिये हिय तृष्णा में भरमाई रे जानूँ न जोगी काहे सुध-बुध खोई पगलाई रे सपनों के चंदन वन महके चंचल पाखी मधुवन चहके चख पराग बतरस जोगी मैं मन ही मन बौराई रे "पी"आकर्षण माया,भ्रम में तर्क-वितर्क के उलझे क्रम में सुन मधुर गीत रूनझुन जोगी राह ठिठकी मैं चकराई रे उड़-उड़कर हुये पंख शिथिल

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तुम खुश हो तो अच्छा है

27 सितम्बर 2018
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तुम खुश हो तो अच्छा है मुस्कानों का करके गर आखेट तुम खुश हो तो अच्छा है मरु हृदय में ढूँढता छाया तृण तरु झुलसा दृग भर आया सींच अश्रु से "स्व" के सूखे खेत तुम खुश हो तो अच्छा है कोरे कागद व्यथा पसीजी बाँच प्रीत झक चुनरी भींजी बींधें तीर-सी प्रखर शब्द की बेंत तुम खुश हो तो अच्छा है मन लगी मेंहदी गह

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अनुभूति

11 अक्टूबर 2018
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माँ का ध्यान हृदय सदा शान्ति सुधा बरसाती मलयानिल श्वासों में घुल हिया सुरभित कर जाती मौन मगन दैदीप्त पुंज मन भाव विह्वल खो जाता प्लावित भावुक धारा का अस्तित्व विलय हो जाता आतपत्र आशीष वलय रक्षित जीवन शूल,प्रलय वरद-हस्त आशंकाओं से शुद्ध आत्मा मुक्त निलय आँचल छाँह वात्सल्यमयी भय-दुःख, मद-मोह, मुक

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माँ हूँ मैं

3 नवम्बर 2018
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गर्व सृजन का पाया बीज प्रेम अंकुराया कर अस्तित्व अनुभूति सुरभित मन मुस्काया स्पंदन स्नेहिल प्यारा प्रथम स्पर्श तुम्हारा माँ हूँ मैं,बिटिया मेरी तूने यह बोध कराया रोम-रोम ममत्व कस्तूरी जीवन की मेरी तुम धुरी चिड़िया आँगन किलकी ऋतु मधुमास घर आया तुतलाती प्रश्नों की लड़ी मधु पराग फूलों की झड़ी "मा

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छठ: आस्था का पावन त्योहार त्योहार

11 नवम्बर 2018
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धरा के जीवन सूर्य और प्रकृति के उपासना का सबसे बड़ा उत्सव छठ पर्व के रूप में मनाया जाता है।बिहार झारखंड एवं उत्तर प्रदेश की ओर आने वाली हर बस , ट्रेन खचाखच भरी हुई है।लोग भागते दौड़ते अपने घर आ रहे है।कुछ लोग साल में एक बार लौटते है अपने जड़ों की ओर,रिश्तों की टूट-फूट के मरम्मती के लिए,माटी की सोंध

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