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"गज़ल"

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काफ़िया- अर, रदीफ़- जाना चाहिए"गज़ल"ए जिंदगी तुझे अब सँवर जाना चाहिए अपने वजूद पर तो गुजर जाना चाहिए तुने इन दिक्कतों को महल बनाया कैसे गर उठी दीवार तो बिखर जाना चाहिए।।कभी तो तकते बगैर दिल ईंट जुड़ जाते जिगर दिलदार है तो उभर जाना चाहिए।।सीधी तस्वीर भी ताकती तिरछी होकर टंग जा

काफिया --आते, रदीफ़ - हैं लोग "गज़ल" परिंदों को दाना खिलाते हैं लोग मुंडेर पर कागा बुलाते हैं लोग घरौंदे काँव कचकच सजाते नहीं नट नटी नौटंकी नचाते हैं लोग।। जश्ने जरुरत में जंगल जुगाली दिवाली में दीया जलाते हैं लोग।। अपने दरों पर झालरें लगाकर परदों पे परदा लगाते है

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