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शरद ऋतु

4 दिसम्बर 2016

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घनी सी ओस हर कली पे, बुझ गई अब प्यास है। नरम से घास कह रहे हैं, पाँव की तलाश है। झुकी कमर निकल पड़े, सुबह की धूप के तले। जवान हाथ-पैर सब, रजाई में ही बस मले। उठो भई, अब तुम भी क्यों शरद ऋतु गँवा रहे। बिन रजाई ओढ़े ही, सब पक्षी चहचहा रहे। ज़मीं से आसमा तलक की, बुझ चुकी सब प्यास है। मना ले तू दिल को "आनन्द" जो बरसों से उदास है। #अमिराज_कुमार_आनन्द
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Hamdard

30 अप्रैल 2016
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Chal uske sath jo sath tere chal sake.Tere bina ghamgin ho dard se machal sake. Tooti huyi chhani ko jo mahal tera samajh gya. Wahi tere badan pe lage zakhma par pighal sake.

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शरद ऋतु

4 दिसम्बर 2016
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घनी सी ओस हर कली पे, बुझ गई अब प्यास है।नरम से घास कह रहे हैं, पाँव की तलाश है।झुकी कमर निकल पड़े, सुबह की धूप के तले।जवान हाथ-पैर सब, रजाई में ही बस मले।उठो भई, अब तुम भी क्यों शरद ऋतु गँवा रहे।बिन रजाई ओढ़े ही, सब पक्षी चहचहा रहे।ज़मीं से आसमा तलक की, बुझ चुकी सब प्यास है।मना ले तू दिल को "आनन्द" जो

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मेरा गाँव

26 फरवरी 2017
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छोड़ आया वो शहर जहाँ आत्मा बस्ती थी।लिपटे पुराने चादरों में ख्वाहिशें पलती थीं।टूटी सड़क पे चलते, न दर्द थे न आह थे।बस हर कोई समझते, खुद को बादशाह थे।जिसके मिज़ाज़ थे भरे आशिक़ी के शौक सेछोड़ के घर-बार सारा आते गाँधी-चौक पे।लड़कर-मिले, मिलकर-लड़े एक अपनी आन मेंखेल कम झगड़े बड़े, बस होते थे मैदान में।होली-दिवा

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