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आपका बंटी

मन्नू भंडारी

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11 मई 2022 को पूर्ण की गई
ISBN : 9788171194469

आपका बंटी मन्नू भंडारी के उन बेजोड़ उपन्यासों में है जिनके बिना न बीसवीं शताब्दी के हिन्दी उपन्यास की बात की जा सकती है न स्त्री-विमर्श को सही धरातल पर समझा जा सकता है। तीस वर्ष पहले (1970 में) लिखा गया यह उपन्यास हिन्दी की लोकप्रिय पुस्तकों की पहली पंक्ति में है। दर्जनों संस्करण और अनुवादों का यह सिलसिला आज भी वैसा ही है जैसा धर्मयुग में पहली बार धारावाहिक के रूप से प्रकाशन के दौरान था। बच्चे की निगाहों और घायल होती संवेदना की निगाहों से देखी गई परिवार की यह दुनिया एक भयावह दुस्वप्न बन जाती है। कहना मुश्किल है कि यह कहानी बालक बंटी की है या माँ शकुन की। सभी तो एक-दूसरे में ऐसे उलझे हैं कि एक की त्रासदी सभी की यातना बन जाती है। शकुन के जीवन का सत्य है कि स्त्री की जायजश् महत्त्वाकांक्षा और आत्मनिर्भरता पुरुष के लिए चुनौती है - नतीजे में दाम्पत्य तनाव उसे अलगाव तक ला छोड़ता है। यह शकुन का नहीं, समाज में निरन्तर अपनी जगह बनाती, फैलाती और अपना क़द बढ़ाती ‘नई स्त्री’ का सत्य है। पति-पत्नी के इस द्वन्द्व में यहाँ भी वही सबसे अधिक पीसा जाता है बंटी, जो नितान्त निर्दोष, निरीह और असुरक्षित है। बच्चे की चेतना में बड़ों के इस संसार को कथाकार मन्नू भंडारी ने पहली बार पहचाना था। बाल मनोविज्ञान की गहरी समझ-बूझ के लिए चर्चित, प्रशंसित इस उपन्यास का हर पृष्ठ ही मर्मस्पर्शी और विचारोत्तेजक है। हिन्दी उपन्यास की एक मूल्यवान उपलब्धि के रूप में आपका बंटी एक कालजयी उपन्यास है। 

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'आपका बंटी' जो हिन्दी उपन्यासों के इतिहास में मील का पत्थर मानी जाती है, मन्नू भंडारी का अत्यन्त चर्चित उपन्यास है जो समकालीन अनुभवों से युक्त है। स्त्री आर्थिक मोर्चे पर आजाद हुई। उसने अपनी इच्छाएँ व्यक्त करना सीख लिया। दूसरी तरफ परिवार में इस आजादी को लेकर कईं मुश्किलें खड़ी हो गई। इस सिलसिले में उसे पुरुषवादी अहम से टकराना पड़ा। इससे स्त्री-पुरुष के संबंध सवालों के कठघरे में खड़े हो गए। ‘आपका बंटी’ इसे अपने मौलिक नजरिए से प्रस्तुत करता है। इसमें मन्नू भण्डारी इस त्रासद सत्य को रेखांकित करने की कोशिश करती हैं। टूटते परिवारों के बीच बच्चों को किस मानसिक यातना से गुजरना पड़ता है, इस उपन्यास में लेखिका ने उसे बहुत ही सरल ढंग से अंकित किया है। एक मां के दिल का दर्द, बेटे से दूर होने के बाद भी एक पिता का अपने के लिए प्यार और एक मासूम बेटे का इस बात से बेखबर होना कि आखिर क्यों उसके मम्मी-पापा साथ नहीं है। लेखिका ने बेहद ही संवेदनशीलता और स्नेह से अपने उपन्यास में इस कृति को पेश किया है। यह उपन्यास शकुन, अलग हो चुके उसके पति अजय और उनके नौ साल के बेटे बंटी की कहानी है। बंटी एक छठी में पढ़ने वाला मासूम, जिसके माता-पिता सम्बन्ध-विच्छेद के बाद अलग-अलग रहते हैं, लेकिन बंटी अंजान था कि वो अलग-अलग क्यों हैं? माँ शकुन के साथ रह रहे बंटी का आधा मन अपने पापा की याद में खोया रहता है। अजय के साथ तलाक की प्रक्रिया, शकुन के एक परिचित डॉ. जोशी का उसके नजदीक आना, डॉ. जोशी से शादी को लेकर शकुन के मन में चलने वाली ऊहापोह की स्थिति और फिर शादी का फैसला जैसे पड़ावों को पार कर उपन्यास उस वक्त एक ममस्पर्शी मोड़ ले लेता है, जब शकुन बंटी को लेकर डॉ. जोशी के यहाँ रहने चली जाती है, लेकिन बंटी का मन डॉ. जोशी को पापा के रूप में स्वीकार नहीं कर पाता। डॉ. जोशी को दी जाने वाली शकुन की तवज्जो बंटी को नागवार गुजरती है। नतीजा, माँ भी उसे बेगानी लगने लगती है और वो अपने पापा (अजय) के पास जाने का फैसला करता है। लेकिन अजय के पास जाकर भी बंटी खुश नहीं था। क्योंकि पापा के पास भी वो जिस खुशी के लिए गया था वो नसीब नहीं हुईं और खतों की जरिए बंटी की कहानी 'आपका बंटी' बन कर रह गया। मन्नू भण्डारी टूटते हुए परिवार में अकेले होते और टूटते बच्चे का मनोविज्ञान प्रस्तुत करती हैं। इसमें प्रयोगशीलता है लेकिन इसमें प्रयोगवाद का अतिरेक नहीं हैं।

पुस्तक की झलकियां

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