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भाग-1

27 मई 2023

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भाग-1
अस्पृश्यता या छुआछूत एक प्रेम कहानी है जो समाज में निचले तबके के लोगों के प्रति रखी जाने वाली हीन मानसिकता पर सीधा प्रहार करती है। इस रचना में नायिका योग्य , सुंदर , सुशील और निम्न वर्ण की लड़की अवश्य है। लेकिन ज्ञान और गुणों में वह अच्छे -अच्छे ज्ञानियों को मात दे सकती थी। समाज के निचले होने के बाबजूद पिता की नौकरी ने उसकी जिंदगी में परिवर्तन किया और उसके भाइयों के साथ उसे भी शिक्षा मिल गई। हम उसे उसकी किस्मत तो नहीं कह सकते क्योंकि वह उस परिस्थिति में पैदा हुई जहां घर की स्त्रियों को चूल्हा, चोंका और बर्तन साफ करने से ज्यादा कुछ नहीं मिलता था। समय ने करवट ली और मौका मिलते ही भारत माता की उस बेटी ने अपने बाजुओं की ताकत लोगों के सामने प्रकट कर दी।।
इंजीनियरिंग शशि कुमार के द्वारा रचित रचना एक प्रेम कहानी है जो निम्न और उच्च वर्ग के लोगों के मध्य पलने वाले सामाजिक मतभेदों को दूर करके समाज को एक नई दिशा और दशा देने के लिए रची गई है। प्रेम मनुष्य की जिंदगी में एक बहुत ही सुन्दर इमोशन है जो कभी भी मनुष्य की पहचान करके नहीं होता । क्योंकि जो लोग जाति और धर्म को नहीं जानते उन्हें प्रेम की दुनिया में मानवता से प्यार होता है। लेकिन दकियानूसी विचारधारा के कुछ जहरीले डंक जो समाज में ऊंच-नीच का भेद पैदा करते हैं। वे मानवता के सामने जाति और धर्म को सर्वोपरि मानते हैं । अगर उनकी सर्वोच्चता पर चोट आने लगी तो वे लोग समाज में ऐसा तूफान मचायेंगे कि उसमें किसी ना किसी का विनाश अवश्य होता आया है। सामाजिक भेदभाव मानव की व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं बल्कि हक और अधिकारों की लड़ाई है।
“एक घर के दो बच्चे जब अपने कर्मों के आधार पर एक दूसरे के विचारों के विरूद्ध हो जाते हैं तो उस वक्त उनके अंदर मतभेद पैदा हो जाते हैं और अपने आप को सर्वोच्च साबित करने की कोशिश करते हैं। अगर एक भाई ताकतवर है तो वह अपने से कमजोर भाई से उसके हक और अधिकारों को छीनने की कोशिश करता है और यह हक और अधिकारों की लड़ाई पीढ़ी दर पीढ़ी बढ़ती ही चली जाती है। यही कारण है कि सामाजिक असमानता बढ़ती ही चली जाती है”।
आजादी मिलने के बाद अस्पृश्यता में कभी आने लगी लेकिन छुआछूत आज भी अपनी जगह पर दृढ़ता के साथ खड़ी हुई है। दम घुटने लगता है उन प्राणियों का जो निम्न तबके में जन्म लेकर अपनी किस्मत को कोसते हैं। धिक्कार है समाज के उन लोगों को जो इस चाम, मांस और रक्त से बने ढांचे से इतनी नफ़रत करता है जो एक को सिर का ताज और दूसरे को पैर की जूती समझे।
सिर का ताज पहनने के लिए पैर की जूती होना जरूरी है। तभी तुम्हारी जिंदगी की राह सरल हो सकती है। अगर राह में कांटे हैं तो ताज तुम्हारे चुभते हुए पैरों के कांटों से कभी भी सुरक्षा नहीं देगा।।
रमन सिंह और गौरी गांव के परिवेश में पले बढ़े हुए जिन्होंने हर माहौल कै देखा लेकिन ऐसा मेल जोल बैठा कि दोनों ही सामाजिक बदलाव की राह पर निकल पड़े । रमन सिंह के घर में अछूत और निम्न जाति के लोगों से दूर रहने का खूब पाठ पढाया गया लेकिन उसके समझ में यह बात नहीं आ रही थी कि जब हम एक ही ईश्वर के बच्चे हैं तो हमारे जाति धर्म अलग कैसे हो सकते हैं। शिक्षा समाज का दर्पण है और वह सत्य और असत्य में अंतर करना सिखाती है। वह मनुष्य के चरित्र की असलियत बताती है और चरित्र में बदलाव के लिए मौका देती है।
आत्मचिंतन और आत्म मंथन करने वाला व्यक्ति कभी भी मानव में फर्क नहीं समझता है। वह इस बात को अच्छी तरह से जानता है कि मनुष्य ने के द्वारा ही भेदभाव पैदा किया है। छोटे बड़े का अंतर किसी को जन्म से इसलिए मिला हुआ है कि उनके पुरूखों के द्वारा उसे स्वीकार कर लिया गया या उस पर जबरदस्ती थोपा गया है। मनुष्य की असली पहचान उसके विचार होते हैं । जो मनुष्य को अच्छा या बुरा बनाते हैं। मनुष्य को उसके पूर्वजों से या समाज से मिले संस्कार ही उसके वर्तमान में चलते हैं। जन्म के समय किसी के माथे पर धर्म या जाति का कोई ताज नहीं होता है । बल्कि धरती पर पैदा की धर्म जाति उसके जन्म के साथ ही निर्धारित हो जाती है।
(रचना को रचित करते समय असामाजिक तथ्यों को ध्यान में रखते हुए एक-एक लफ्ज को चुना है। यह रचना एक प्रेम , सामाजिक परिवर्तन की राह , सामाजिक कर्तव्य की दिशा और आधुनिक विचारधारा को ध्यान में रखते हुए लिखी जा रही है। इस रचना के सभी पात्र काल्पनिक है और रचना में दर्शाये हुए गांव ,जाति, धर्म,जिला और प्रदेश सभी पूरी तरह से काल्पनिक है। इस रचना को किसी की भावनाओं को आहत करने के उद्देश्य से नहीं लिखा गया है। ना ही किसी राष्ट्र,जाति, धर्म, व्यक्ति और स्थान से किसी तरह का कोई संबंध है।
समाज के बीच उपस्थित असमानता और भेदभावपूर्ण रवैए के कारण इस दुनिया के कुछ लोग अपने अधिकारों से वंचित रह जाते हैं और कुछ लोग उच्च जाति और दबंगई के कारण मानवों के एक समूह को निम्न जाति का समझते हैं । उनसे पशुओं के समान बर्ताव किया जाता है । उनकी हिम्मत और ताकत को अपनी जाति की ताकत से इस तरह कुचला जाता है जैसे किसी लाठी से सांप का फन कुचला जा रहा हो । लेकिन सांप के जहरीले फन जैसा इनका अस्तित्व नहीं जो एक बार मौका मिलते ही जहरीले विष से उनका सामना करने की कोशिश कर ले। यह बिना विष के , बिना किसी हानि दिये रौब से मसले जानी वाली ताकत का घमंड है।
समाज से बड़ी मुश्किल से अस्पृश्यता का रंग निकलने लगा लेकिन छुआछूत का रंग इतनी गहराई से रंग गया है कि वह निकलने का नाम नहीं ले रहा है। सामाजिक भेदभाव भी आज पीपल के पेड़ की तरह जमीन के अंदर गहरी जड़ें जमाएं बैठा है।।)
अस्पृश्यता/अछूत :- जो स्पर्श योग्य न हो या फिर जिसे स्पर्श नहीं किया जा सकता हो।
छुआछूत:- एक वक्त जिसमें छुआछूत भी अस्पृश्यता के समान ही रखती है लेकिन इस वक्त छुआछूत की परिभाषा को बदल दिया गया है जिसमें मनुष्य को छुआ जा सकता है मगर उसके साथ सामाजिक भेदभाव रखा जाता है।
प्रेम भी यही कहता है कि तुम्हें भी समाज ,जाति और धर्म को देखकर ही कदम रखने है। अगर तुमने अपने कदम की दूसरे ,समाज , धर्म और जाति में रखे तो ईश्वर के अनुसार यह पाप होगा।
लेकिन प्रेम भी इतना पागल है कि जिधर इमोशन्स मिलते हैं उधर ही अपनी जीभ ललचाने लगता है क्योंकि उसे नारी के रुप , यौवन और सौन्दर्य से मतलब होता है । वह कभी भी उसकी जाति, धर्म और समाजिक पहचान नहीं पूछता है। जिस तरह चिकने घाट से पैर फिसलते है। उसी तरह यह फिसलते हुए उस कुएं की तरफ जा गिरता है जहां उसके गिरने पर उसकी मौत या स्थायी क्षति सुनिश्चित है।।
प्रेम एक लालची बालक है जो बच्चे की तरह जिद्द कर बैठता है कि उसे केवल उसकी पसंद की लड़की या लड़का चाहिए।।

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छुआछूत या अस्पृश्यता
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यह एक सामाजिक संवेदना युक्त रोमांटिक रचना की शुरुआत है।।
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