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भक्त कथा अमृत

5 जून 2022

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भक्ति की धारा प्रवाहित हो और उसमें भगवान के परम भक्तों की चर्चा नहीं हो, संभव ही नहीं। भक्तों के निर्मल चरित्र से हमें काफी कुछ सीखने-समझने का अवसर प्राप्त होता है। अब मैं आपको नारायण के ऐसे ही भक्त प्रह्लाद की कथा सुनाता हूं।

विष्णु पुराण में भक्त प्रह्लाद की कथा का उल्लेख है। साथ ही श्रीमद भागवत जी में भी भक्त प्रह्लाद की कथा है। प्रह्लाद भगवान विष्णु के अनन्य भक्तों में से एक थे। एक बार हुआ यूं कि सनकादिक ऋषि चारों भाई वैकुंठ लोक में श्री नारायण का दर्शन करने पहुंचे। परन्तु भगवान के नित्य पार्षद जय और विजय ने उनको वैकुंठ के द्वार पर ही रोक लिया। अहो!.....जय-विजय के द्वारा किए धृष्टता से सनकादिक ऋषि क्रोधित हो गए और उन्होंने जय-विजय को असुर होने का श्राप दे दिया। जब कमल नयन नारायण को इसकी जानकारी हुई, वे दौड़ कर आए और सनकादिक ऋषियों की स्तुति की। भगवान की स्तुति सुनकर सनकादिक ऋषियों का क्रोध शांत हुआ। तब वे नारायण से बोले, हे पद्धनाभ, मेरे श्राप के कारण ये तीन जन्म तक असुर बनेंगे। लेकिन ये इतने प्रतापी होंगे कि इनका उद्धार करने के लिए आपको अवतार लेना होगा।

          सनकादिक ऋषियों के शाप के कारण भगवान विष्णु के पार्षद जय एवं विजय को दैत्य योनि में जन्म लेना पड़ा था। महर्षि कश्यप की पत्नी दक्ष पुत्री दिति के गर्भ से दो महान पराक्रमी बालकों का जन्म हुआ। इनमें से बड़े का नाम हिरण्यकशिपु और छोटे का नाम हिरण्याक्ष था। दोनों भाइयों में बड़ी प्रीति थी। दोनों ही महा बलशाली, अमित पराक्रमी और आत्मबल संपन्न थे। दोनों भाइयों ने युद्ध में देवताओं को पराजित करके स्वर्ग पर अधिकार कर लिया। एक समय जब हिरण्याक्ष ने पृथ्वी को रसातल में ले जाकर छिपा दिया तब भगवान विष्णु ने वराह अवतार लेकर पृथ्वी की रक्षा के लिए हिरण्याक्ष का वध किया।

अपने प्रिय भाई हिरण्याक्ष के वध से दुखी होकर हिरण्यकशिपु ने दैत्यों को प्रजा पर अत्याचार करने की आज्ञा देकर स्वयं महेन्द्राचल पर्वत पर चला गया। वह भगवान विष्णु द्वारा अपने भाई की हत्या का बदला लेने के लिए ब्रह्मा जी की घोर तपस्या करने लगा। इधर दैत्यों के राज्य को राजा विहीन देखकर देवताओं ने उनपर आक्रमण कर दिया। दैत्य गण इस युद्ध में पराजित हुए और पाताल लोक को भाग गए।

                       देवराज इन्द्र ने हिरण्यकशिपु के महल में प्रवेश करके उसकी पत्नी कयाधु को बंदी बना लिया। उस समय कयाधु गर्भवती थी, इसलिए इन्द्र उसे साथ लेकर अमरावती की ओर जाने लगे ।रास्ते में उनकी देवर्षि नारद से भेंट हो गयी। नारद जी ने पुछा – ” देवराज ! इसे कहाँ ले जा रहे हो ? “इन्द्र ने कहा, देवर्षि ! इसके गर्भ में हिरण्यकशिपु का अंश है, उसे मार कर इसे छोड़ दूंगा। यह सुनकर नारदजी ने कहा, देवराज ! इसके गर्भ में बहुत बड़ा भगवद् भक्त है, जिसे मारना तुम्हारी शक्ति के बाहर है, अतः इसे छोड़ दो। “

                   नारदजी के कथन का मान रखते हुए इन्द्र ने कयाधु को छोड़ दिया और अमरावती चले गए। नारदजी कयाधु को अपने आश्रम पर ले आये और उससे बोले – ” बेटी ! तुम यहाँ आराम से रहो जब तक तुम्हारा पति अपनी तपस्या पूरी करके नहीं लौटता। “कयाधु उस पवित्र आश्रम में नारदजी के सुन्दर प्रवचनों का लाभ लेती हुई सुखपूर्वक रहने लगी जिसका गर्भ में पल रहे शिशु पर भी गहरा प्रभाव पड़ा। समय होने पर कयाधु ने एक पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम प्रह्लाद रखा गया। इधर हिरण्यकशिपु की तपस्या पूरी हुई और वह ब्रह्माजी से मनचाहा वरदान लेकर वापस अपनी राजधानी चला आया।

              कुछ समय के बाद कयाधु भी प्रह्लाद को लेकर नारदजी के आश्रम से राजमहल में आ गयी। भक्त प्रह्लाद की लीला जब प्रह्लाद कुछ बड़े हुए तब हिरण्यकशिपु ने उनके शिक्षा की व्यवस्था की। प्रह्लाद गुरु के सान्निध्य में शिक्षा ग्रहण करने लगे। एक दिन हिरण्यकशिपु अपने मंत्रियों के साथ सभा में बैठा हुआ था। उसी समय प्रह्लाद अपने गुरु के साथ वहाँ गए। प्रह्लाद को प्रणाम करते देखकर हिरण्यकशिपु ने उसे अपनी गोद में बिठाकर दुलार किया और कहा –” वत्स ! तुमने अब तक अध्ययन में निरंतर तत्पर रहकर जो कुछ सीखा है, उसमें से कुछ अच्छी बात सुनाओ। “

             तब प्रह्लाद बोले – ” पिताजी ! मैंने अब तक जो कुछ सीखा है उसका सारांश आपको सुनाता हूँ। जो आदि, मध्य और अंत से रहित, अजन्मा, वृद्धि-क्षय से शून्य और अच्युत हैं, समस्त कारणों के कारण तथा जगत के स्थिति और अन्त कर्ता उन श्री हरि को मैं प्रणाम करता हूँ। “यह सुनकर दैत्य राज हिरण्यकशिपु के नेत्र क्रोध से लाल हो उठे, उसने कांपते हुए होंठों से प्रह्लाद के गुरु से कहा –” अरे दुर्बुद्धि ब्राह्मण ! यह क्या ? तूने मेरी अवज्ञा करके इस बालक को मेरे परम शत्रु की स्तुति से युक्त शिक्षा कैसे दी ? गुरूजी ने कहा – ” दैत्य राज ! आपको क्रोध के वशीभूत नहीं होना चाहिए। आपका पुत्र मेरी सिखाई हुई बात नहीं कह रहा है। “

                 हिरण्यकशिपु बोला – ” बेटा प्रह्लाद ! बताओ तुमको यह शिक्षा किसने दी है ? तुम्हारे गुरूजी कहते हैं कि मैंने तो इसे ऐसा उपदेश दिया ही नहीं है। प्रह्लाद बोले – ” पिताजी ! हृदय में स्थित भगवान विष्णु ही तो सम्पूर्ण जगत के उपदेशक हैं। उनको छोड़कर और कौन किसी को कुछ सीखा सकता है। “हिरण्यकशिपु बोला – ” अरे मूर्ख ! जिस विष्णु का तू निशंक होकर स्तुति कर रहा है, वह मेरे सामने कौन है ? मेरे रहते हुए और कौन परमेश्वर कहा जा सकता है ? फिर भी तू मौत के मुख में जाने की इच्छा से बार-बार ऐसा बक रहा है। “

                      ऐसा कहकर हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद को अनेक प्रकार से समझाया पर प्रह्लाद के मन से श्री हरि के प्रति भक्ति और श्रद्धा भाव को कम नहीं कर पाया। तब अत्यंत क्रोधित होकर हिरण्यकशिपु ने अपने सेवकों से कहा – अरे ! यह बड़ा दुरात्मा है। इसको मार डालो। अब इसके जीने से कोई लाभ नहीं है, क्योंकि यह शत्रु प्रेमी तो अपने कुल का ही नाश करने वाला हो गया ।हिरण्यकशिपु की आज्ञा पाकर उसके सैनिकों ने प्रह्लाद को अनेक प्रकार से मारने की चेष्टा की पर उनके सभी प्रयास श्री हरि की कृपा से असफल हो जाते थे। उन सैनिकों ने प्रह्लाद पर अनेक प्रकार के अस्त्र शस्त्रों से आघात किए, परन्तु प्रह्लाद को कुछ नहीं हुआ। उन्होंने प्रह्लाद के हाथ-पैर बाँधकर समुद्र में डाल दिया पर प्रह्लाद फिर भी बच गए। उन सब ने प्रह्लाद को अनेकों विषैले साँपों से डसाया और पर्वत शिखर से गिराया पर भगवद् कृपा से प्रह्लाद को कुछ भी नहीं हुआ।

               रसोइयों के द्वारा विष मिला हुआ भोजन देने पर प्रह्लाद उसे भी पचा गए। प्रह्लाद को मारने के सब प्रकार के प्रयास विफल हो गए तब हिरण्यकशिपु के पुरोहितों ने अग्निशिखा के समान प्रज्वलित शरीर वाली कृत्या उत्पन्न कर दी। उस अति भयंकर कृत्या ने अपने पैरो से पृथ्वी को कंपित करते हुए वहाँ प्रकट होकर बड़े क्रोध से प्रह्लाद जी की छाती में त्रिशूल से प्रहार किया। पर उस बालक के छाती में लगते ही वह तेजोमय त्रिशूल टूटकर नीचे गिर पड़ा। उन पापी पुरोहितों ने उस निष्पाप बालक पर कृत्या का प्रयोग किया था। इसलिए कृत्या ने तुरंत ही उन पुरोहितों पर वार किया और स्वयं भी नष्ट हो गई।

           जब हिरण्यकशिपु ने सारे प्रयास कर लिए, परन्तु प्रह्लाद का अहित नहीं हुआ। परेशान होकर हिरण्यकशिपु हार कर बैठ गया, तब उसकी बहन होलिका उसके पास आई। उसे ब्रह्मा जी का वरदान प्राप्त था, कि उसके पास ब्रह्मा का दिया हुआ चादर ओढ कर जब वो अग्नि में बैठेगी, अग्नि उसका कुछ नहीं बिगाड़ेगा । इसके बाद होलिका प्रह्लाद को अपनी गोद में लेकर प्रज्वलित अग्नि में प्रवेश कर गयी पर ईश्वर की कृपा से प्रह्लाद को कुछ भी नहीं हुआ और होलिका जल कर भस्म हो गई।                                           हिरण्यकशिपु के दूतों ने उसे जब यह समाचार सुनाया तो वह अत्यंत क्षुब्ध हुआ और उसने प्रह्लाद को अपनी सभा में बुलवा। हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद से कहा – ” रे दुष्ट ! जिसके बल पर तू ऐसी बहकी- बहकी बातें करता है, तेरा वह ईश्वर कहाँ है ? वह यदि सर्वत्र है तो मुझे इस खम्भे में क्यों नहीं दिखाई देता ? 

         तब प्रह्लाद ने कहा – ” मुझे तो वे प्रभु खम्भे में भी दिखाई दे रहे हैं। यह सुनकर हिरण्यकशिपु क्रोध के मारे स्वयं को संभाल नहीं सका और हाथ में तलवार लेकर सिंहासन से कूद पड़ा और बड़े जोर से उस खम्भे में एक घूँसा मारा। उसी समय उस खम्भे से बड़ा भयंकर शब्द हुआ और उस खम्भे को तोड़कर एक विचित्र प्राणी बाहर निकलने लगा जिसका आधा शरीर सिंह का और आधा शरीर मनुष्य का था।

           यह भगवान श्री हरि का नृसिंह अवतार था। उनका रूप बड़ा भयंकर था। उनकी तपाये हुए सोने के समान पीली- पीली आँखें थीं, उनकी दाढ़ें बड़ी विकराल थीं और वे भयंकर शब्दों से गर्जन कर रहे थे। उनके निकट जाने का साहस किसी में नहीं हो रहा था। यह देखकर हिरण्यकशिपु सिंहनाद करता हुआ हाथ में गदा लेकर नृसिंह भगवान पर टूट पड़ा। तब भगवान भी हिरण्यकशिपु के साथ कुछ देर तक युद्ध लीला करते रहे और अंत में उसे झपटकर दबोच लिया और उसे सभा के दरवाजे पर ले जाकर अपनी जांघों पर गिरा लिया और खेल ही खेल में अपनी नखों से उसके कलेजे को फाड़कर उसे पृथ्वी पर पटक दिया। फिर वहाँ उपस्थित अन्य असुरों और दैत्यों को खदेड़-खदेड़ कर मार डाला। उनका क्रोध बढ़ता ही जा रहा था। वे हिरण्यकशिपु की ऊँची सिंहासन पर विराजमान हो गए।

                  उनकी क्रोध पूर्ण मुखाकृति को देखकर किसी को भी उनके निकट जाकर उनको प्रसन्न करने का साहस नहीं हो रहा था। हिरण्यकशिपु की मृत्यु का समाचार सुनकर उस सभा में ब्रह्मा, इन्द्र, शंकर, सभी देव गण, ऋषि-मुनि, सिद्ध, नाग, गंधर्व आदि पहुँचे और थोड़ी दूरी पर स्थित होकर सभी ने अंजलि बाँध कर भगवान की अलग-अलग से स्तुति की पर भगवान नृसिंह का क्रोध शांत नहीं हुआ। तब देवताओं ने माता लक्ष्मी को उनके निकट भेजा पर भगवान के उग्र रूप को देखकर वे भी भयभीत हो गयीं।

                      तब ब्रह्मा जी ने प्रह्लाद से कहा – ” बेटा ! तुम्हारे पिता पर ही तो भगवान क्रुद्ध हुए थे, अब तुम्ही जाकर उनको शांत करो। “तब प्रह्लाद भगवान के समीप जाकर हाथ जोड़कर साष्टांग भूमि पर लोट गए और उनकी स्तुति करने लगे। बालक प्रह्लाद को अपने चरणों में पड़ा देखकर भगवान दयार्द्र हो गए और उसे उठाकर गोद में बिठा लिया और प्रेम पूर्वक बोले –वत्स प्रह्लाद ! तुम्हारे जैसे एकांत प्रेमी भक्त को यद्यपि किसी वस्तु की अभिलाषा नहीं रहती पर फिर भी तुम केवल एक मन्वन्तर तक मेरी प्रसन्नता के लिए इस लोक में दैत्याधिपति के समस्त भोग स्वीकार कर लो।

                भोग के द्वारा पुण्य कर्मों के फल और निष्काम पुण्य कर्मों के द्वारा पाप का नाश करते हुए समय पर शरीर का त्याग करके समस्त बंधनों से मुक्त होकर तुम मेरे पास आ जाओगे। देवलोक में भी लोग तुम्हारी विशुद्ध कीर्ति का गान करेंगे। “यह कहकर भगवान नृसिंह अंतर्ध्यान हो गए। विष्णु पुराण में पाराशर जी ने कहा है – ” भक्त प्रह्लाद की कहानी को जो मनुष्य सुनता है उसके पाप शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं। पूर्णिमा, अमावस्या, अष्टमी और द्वादशी को इसे पढ़ने से मनुष्य को गोदान का फल मिलता है। जिस प्रकार भगवान ने प्रह्लाद जी की सभी आपत्तियों से रक्षा की थी उसी प्रकार वे सर्वदा उसकी भी रक्षा करते हैं जो उनका चरित्र सुनता है। 

                          भक्तों का चरित्र पढ़ने और सुनने, दोनों से हमें नारायण के चरणों में आश्रय मिलता है। हम नारायण के भक्ति की ओर उन्मुख होते है और हमारा एवं हमारे आश्रितों का कल्याण होता है। श्री भक्त माल में एक उद्धरण उल्लिखित है कि आज भी अयोध्या में भगवान राम के कनक भवन में भक्त कथाओं की पुस्तिका, यानी भक्त माल रखी जाती है और जब दूसरे दिन उस कथा सागर को निकाला जाता है। उसके पन्ने भीगे हुए मिलते है। इस का तात्पर्य इतना है कि जब प्रभु अपने भक्तों का निर्मल चरित्र पढ़ते है और भाव विभोर होते है। तो हम जगत के मानव का भी निश्चित ही कल्याण होगा। 

                          मैं फिर से अपनी बातों को दुहराता हूं कि हम चाहे जिस हाल में रहें, परन्तु राधा रमण के नामों का गुणगान करते रहे। जगत के सुखों का उपभोग करना गलत नहीं है, क्योंकि इसके लिए ही नारायण ने इस अखिल सृष्टि की रचना की है। परन्तु हम जो सांसारिक ऐश्वर्य में आसक्त हो जाते है, वह हमारे लिए काल कूट विष के समान है। हम इस संसार में है, जहां चारों ओर अंधकार ही फैला हुआ है। ऐसे में हमें नारायण के निर्मल नामों का करतल ध्वनि से कीर्तन और उनके भक्तों के चरित्र का ध्यान करना चाहिए। भगवान के ध्यान से ज्यादा उनके भक्तों का ध्यान ज्यादा फल दाई होता है। इसी संदर्भ में आगे मैं आपको भक्त ध्रुव की कथा बताऊँगा।

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अब मैं आपको ऐसे भक्त के बारे में बतलाऊँगा, जिसने मात्र छ वर्ष की आयु में ही नारायण के लाडले बन गए। उन्होंने नारायण कि भक्ति इस प्रकार से की कि कालजयी हो गए। वह बालक अद्भुत था, उसकी भक्ति उत्तम कोटि की थी। तभी तो उस बालक ने केवल छ महीने में ही कमल लोचन नारायण को मना लिया। 

स्वयंभु मनु और शत रूपा के पुत्र उत्तान पाद मनु के बाद सिंहासन पर विराजमान हुए। उत्तान पाद अपने पिता मनु के समान ही न्यायप्रिय और प्रजा पालक राजा थे। उत्तान पाद की दो रानियां थी। बड़ी का नाम सुनीति और छोटी का नाम सुरुचि था। सुनीति को एक पुत्र ध्रुव और सुरुचि को भी एक पुत्र था जिसका नाम उत्तम था। ध्रुव बड़ा होने के कारण राजगद्दी का स्वाभाविक उत्तराधिकारी थे परन्तु सुरुचि अपने पुत्र उत्तम को पिता के बाद राजा बनते देखना चाहती थी।

         इस कारण वो ध्रुव और उसकी माँ सुनीति से ईर्ष्या करने लगी और धीरे-धीरे उत्तान पाद को अपने मोह माया के जाल में बांधने लगी। इस प्रकार सुरुचि ने ध्रुव और सुनीति को उत्तान पाद से दूर कर दिया। उत्तान पाद भी सुरुचि के रूप पर मोहित होकर अपने पारिवारिक कर्तव्यों से विमुख हो गए और सुनीति की उपेक्षा करने लगे। एक दिन बालक ध्रुव पिता से मिलने की जिद करने लगे, माता ने तिरस्कार के भय से और बालक के कोमल मन को ठेस ना लगे इसलिए ध्रुव को बहलाने लगी । परन्तु ध्रुव अपनी जिद पर अड़े रहे। अंत में माता ने हारकर उसे पिता के पास जाने की आज्ञा दे-दी। जब ध्रुव पिता के पास पहुँचे तो देखा कि उसके पिता राजसिंहासन पर बैठे हैं और वही पास में उसकी विमाता सुरुचि भी बैठी है। अपने भाई उत्तम को पिता की गोद में बैठा देखकर ध्रुव की इच्छा भी पिता की गोद में बैठने की हुई।

                पर उत्तान पाद ने अपनी प्रिय पत्नी सुरुचि के सामने गोद में चढ़ने को लालायित प्रेम वश आये हुए अपने पुत्र को गोद में उठा न सके ।अपनी सौत के पुत्र ध्रुव को पिता की गोद में चढ़ने को उत्सुक देखकर सुरुचि को क्रोध आ गया और कहा । अरे लल्ला, बिना मेरे पेट से जन्म लिए किसी अन्य स्त्री का पुत्र होकर तू क्यों इतनी बड़ी इच्छा करता है। तू अज्ञानी है इसीलिए ऐसी अलभ्य वस्तु की इच्छा करता है। चक्रवर्ती राजाओं के बैठने के लिए बना यह राजसिंहासन तो सिर्फ मेरे पुत्र उत्तम के ही योग्य है तू इस व्यर्थ की इच्छा को अपने मन से निकाल दे। अपनी विमाता का ऐसा कथन सुनकर ध्रुव ग्लानि और अपमान से व्यथित होकर पिता को छोड़कर अपनी माता के महल को चल दिए । उस समय क्रोध से ध्रुव के होंठ कांप रहे थे और वे सिसकियाँ ले रहा थे।

                 अपने पुत्र को इस प्रकार अत्यंत क्रोधित और खिन्न देखकर सुनीति ने ध्रुव को प्रेम पूर्वक अपनी गोद में बिठाकर पूछा – ” बेटा, तेरे क्रोध का क्या कारण है? किसने तेरा निरादर किया है? ये सुनकर ध्रुव ने अपनी माता को रोते हुए वह सब बात बताई जो उसकी विमाता ने पिता के सामने कही थी। अपने पुत्र से सारी बात सुनकर सुनीति अत्यंत दुखी होकर बोली । बेटा, सुरुचि ने ठीक ही कहा है, तू अवश्य ही मंदभाग्य है जो मेरे गर्भ से जन्म लिया। पुण्यवान से उसके विपक्षी भी ऐसी बात नहीं कह सकते। पूर्वजन्म में तूने जो कुछ भी किया है उसे कौन दूर कर सकता है और जो नहीं किया है उसे तुझे कौन दिला सकता है। इसलिए तुझे अपनी विमाता की बातों को भूल जाना चाहिए। हे वत्स, पुण्यवान को ही राजपद, घोड़े, हाथी आदि प्राप्त होते हैं, ऐसा जानकर तू शांत हो जा।

यदि सुरुचि के वाक्यों से तुझे अत्यंत दुःख हुआ है तो सर्व फलदायी पुण्य के संग्रह करने का प्रयत्न कर।

तू सुशील, पुण्यात्मा और समस्त प्राणियों का हितैषी बन क्योंकि जिस प्रकार नीची भूमि की ओर ढलकता हुआ जल अपने आप ही जलाशयों में एकत्र हो जाता है। उसी प्रकार सत्पात्र मनुष्य के पास समस्त संपत्तियाँ अपने आप ही आ जाती हैं। माता की बात सुनकर ध्रुव ने कहा । माँ, अब मैं वही प्रयत्न करूँगा जिससे सम्पूर्ण लोकों में आदरणीय सर्वश्रेष्ठ पद को प्राप्त कर सकूँ। अब मुझे पिता का सिंहासन नहीं चाहिए वह मेरे भाई उत्तम को ही मिले।

मैं किसी दूसरे के दिए हुए पद का इक्षुक नहीं हूँ, मैं तो अपने पुरुषार्थ से ही उस परम पद को पाना चाहता हूँ जिसको पिताजी ने भी नहीं प्राप्त किया है। अपनी माता से इस प्रकार कहकर ध्रुव सुनीति के महल से निकल पड़े और नगर से बाहर वन में पहुँचे। फिर वे निश्चल होकर वन मार्ग की ओर बढ चले। उन्हें इस प्रकार से वन को जाता देखकर देवर्षि नारद उसके सामने प्रगट हो गए। ध्रुव ने जब उनको देखा, नन्हे से ध्रुव ने उनको प्रणाम किया। 

                         उसे आशीर्वाद देने के बाद नारद उसको समझाने लगे कि इस प्रकार से सिर्फ एक उलाहना के लिए  परिवार को त्याग कर निकलना, उचित तो नहीं।...फिर तुम तो अभी बालक हो, अभी तो तपस्या करने की तुम्हारी उम्र भी नहीं है। मेरी मानो तो महल को लौट चलो, तुम जो चाहते हो, तुम्हें मैं दिलवाऊंगा। तुम्हें पिता का गोद ही चाहिए न, मैं तुमको दिलवा दूंगा...बस तुम लौट चलो। परन्तु उस छोटे से बालक ध्रुव पर उनके उपदेश का असर नहीं हुआ। वे तो तपस्या करने जाने को उद्धत थे। उनकी ढृढता देखकर देवर्षि बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने ध्रुव को उपदेश दिया।

                 हे राजपुत्र, बिना नारायण की आराधना किए मनुष्य को वह श्रेष्ठ स्थान नहीं मिल सकता अतः तू उनकी ही आराधना कर। जो परा- प्रकृति से भी परे हैं वे परमपुरुष नारायण जिससे संतुष्ट होते हैं उसी को वह अक्षय पद प्राप्त होता है, यह मैं एकदम सच कहता हूँ। यदि तू अग्र स्थान का इक्षुक है तो जिस सर्वव्यापक नारायण से यह सारा जगत व्याप्त है, तू उसी नारायण की आराधना कर।  जो पर ब्रह्म, परमधाम और परम स्वरूप हैं उन नारायण की आराधना करने से मनुष्य अति दुर्लभ मोक्ष पद को भी प्राप्त कर लेता है।  हे सुव्रत, जिन जगत पति की आराधना से इन्द्र ने इन्द्रपद प्राप्त किया है तू उन यज्ञपति भगवान विष्णु की आराधना कर। जो परमपुरुष यज्ञ पुरुष, यज्ञ और योगेश्वर हैं, उन जनार्दन के संतुष्ट होने पर कौन सी वस्तु दुर्लभ रह जाती है।  हे वत्स, विष्णु भगवान की आराधना करने पर तू अपने मन से जो कुछ चाहेगा वही प्राप्त कर लेगा, फिर त्रिलोकी के श्रेष्ठ स्थान की तो बात ही क्या है। 

           उनके उपदेश को सुनकर नन्हा सा ध्रुव शांत हुआ। फिर उसने नारद जी से प्रश्न किया। अब कृपा करके मुझे यह भी बता दीजिये कि मैं किस प्रकार उनकी आराधना करूँ? उसके बाल वचन सुनकर देवर्षि बोले– ” हे राजकुमार, तू समस्त वाह्य विषयों से चित्त को हटा कर उस एकमात्र नारायण में अपने मन को लगा दे और एकाग्रचित्त होकर ‘ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ‘ इस मंत्र का निरंतर जाप करते हुए उनको प्रसन्न कर। 

                         नारद जी ने ध्रुव को व्रत विधि भी बतलाई। इसके बाद ध्रुव ने देवर्षि को प्रणाम किया और वहां से चल दिया। यमुना के तट पर अति पवित्र मधुवन  में पहुँचा। जिस मधुवन में नित्य श्री हरि का सानिध्य रहता है उसी सर्व पाप हारी तीर्थ में ध्रुव कठोर तपस्या करने लगे। उन्होंने नारद जी द्वारा बताए हुए नियमों का पालन करते हुए प्रथम महीने में फला हार किया और नारायण के मंत्र" ऊँ नमों भगवते वासुदेवाय का जाप किया। दूसरे महीने में सिर्फ सूखे पत्तों का आहार लिया। तीसरे महीने में सिर्फ जल और चौथे महीने में तीसरे दिन पर जल। पांचवें महीने में सिर्फ वायु। छठे महीने में तो उन्होंने वायु का भी त्याग कर दिया और श्री हरि में एकाग्रचित्त हो गए। श्री हरि अपने चतुर्भुज रुप से ध्रुव के हृदय में प्रगट हो गए और बालक ध्रुव की समाधि लग गई।

          देवराज इंद्र ने ध्रुव की तपस्या से प्रभावित होकर काफी कोशिश की, ध्रुव को डिगाने की। उन्होंने माया से कभी हिंसक जंगली पशुओं के द्वारा तो कभी राक्षसों के द्वारा ध्रुव के मन में भय उत्पन्न करने की कोशिश की परन्तु विफल रहने पर ध्रुव की माता के रूप में भी उसका ध्यान भंग करने का प्रयत्न किया। पर ध्रुव एकाग्रचित्त होकर सिर्फ भगवान विष्णु के ध्यान में ही लगा रहा और किसी की ओर देखा तक नहीं।

                            और जैसे ही ध्रुव की समाधि लगी। अखिल ब्रह्मांड में हाहाकार मच गया, क्योंकि जगत का प्राण वायु रुक गया। इस प्रकार से प्राण वायु रुकने से पूरे जगत के जीव व्याकुल हो गए। तब देवता और ऋषि गण ब्रह्मा जी के साथ वैकुंठ गए। उन्होंने नारायण की स्तुति की और कहने लगे। हे जनार्दन, हम उत्तान पाद के पुत्र की तपस्या से भयभीत होकर आपकी शरण में आये हैं। हम नहीं जानते कि वह इन्द्रपद चाहता है या उसे सूर्य, वरुण या चन्द्रमा के पद की अभिलाषा है। आप हमपर प्रसन्न होइए और उसे तप से निवृत्त कीजिये। 

श्री भगवान बोले – हे ब्रह्मा, हे ऋषिओ हे देव गण, उसे इन्द्र, सूर्य, वरूण, कुबेर आदि किसी पद की अभिलाषा नहीं है। आप सब लोग निश्चिंत होकर अपने स्थान को जाए। मैं तपस्या में लगे हुए उस बालक की इच्छा को पूर्ण करके उसे तपस्या से निवृत्त करूँगा। श्री हरि के ऐसा कहने पर देवता गण उन्हें प्रणाम करके अपने स्थान को चले गए। भगवान विष्णु अपने भक्त ध्रुव की कठिन तपस्या से संतुष्ट होकर उसके सामने प्रकट हो गए। श्री हरि बालक ध्रुव के सामने इसलिये नहीं प्रगट हुए थे कि उनको ध्रुव को दर्शन देना था। नारायण तो आप ही ध्रुव के हृदय में प्रगट हो गए थे और बालक ध्रुव उनके स्वरूप में समाधिस्थ हो चुका था। आज नारायण उस भागवत ध्रुव के दर्शन करने आए थे। श्री हरि ने बालक ध्रुव को अपने कृपा भरे नयनों से देखा और बोले। हे उत्तान पाद के पुत्र ध्रुव, तेरा कल्याण हो। परन्तु ध्रुव की समाधि नहीं टूटी। नारायण समझ गए और उन्होंने ध्रुव के हृदय से अपने स्वरूप को हटा दिया। विकल बालक ध्रुव ने आँखें खोलीं और ध्यानस्थ में देखे हुए भगवान को शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किए हुए साक्षात अपने सामने खड़े देखा।

            तब उसने भगवान को साष्टांग प्रणाम किया और सहसा रोमांचित  होकर भगवान की स्तुति करने की इच्छा की। पर इनकी किस प्रकार स्तुति करूँ, ये सोचकर ध्रुव का मन व्याकुल हो गया। नारायण तो भक्त वत्सल है, वे अपने ढृढ निश्चयी भक्त के हृदय की पीड़ा किस प्रकार से सहन करते। अतः भगवान विष्णु ने अपने शंख से ध्रुव के होंठों पर  स्पर्श किया। इसके बाद क्षण मात्र में ध्रुव भगवान की उत्तम प्रकार से स्तुति करने लगा। जब ध्रुव की स्तुति समाप्त हुई, तब भगवान बोले । हे ध्रुव, तुमको मेरा साक्षात् दर्शन हुआ है इससे निश्चित ही तेरी तपस्या सफल हो गयी है पर मेरा दर्शन तो कभी निष्फल नहीं होता इसलिए तुझे जिस वर की इच्छा हो वह मांग ले। ध्रुव बोला.... हे नारायण, आपसे इस संसार में क्या छिपा हुआ है। मैं मेरी सौतेली माता के गर्वीले वचनों से आहत होकर वन को आया था। उस समय तो हृदय में अनेकों इच्छाएँ थी। परन्तु आपको पा लेने के बाद मेरे मन से अंधकार मिट गया है। हे कमल नयन, हे भक्त वत्सल, आपको पा लेने के बाद हृदय में अब शेष इच्छाएँ ही नहीं बची है।

                 बालक ध्रुव की बातें सुनकर पद्धनाभ श्री हरि मंद-मंद मुस्करा कर बोले । वत्स, मेरे इस स्वरूप का दर्शन अमोघ है। भले ही तुम्हारी इच्छाएँ पूर्ण हो चुकी है, परन्तु तुमने जिस उद्देश्य से मेरी इतनी कठोर उपासना की है, वह व्यर्थ नहीं हो सकता। हे वत्स, तूने अपने पूर्व जन्म में भी मुझे संतुष्ट किया था इसलिए तुमने जिस स्थान की कामना से इस तप को किया है,  वह तुझे अवश्य प्राप्त होगा।

               हे पुत्र ध्रुव, तुम भू-मंडल पर छत्तीस हजार वर्षों तक रहकर संसार के ऐश्वर्य का उपभोग करो। उसके बाद सदेह ही ध्रुव लोक को गमन करोगे और अनंत काल तक वहां निवास करोगे। मेरे प्रिय भक्त ध्रुव, मैं तुझे वह निश्चल ( ध्रुव ) स्थान देता हूँ जो सूर्य, चंद्र आदि ग्रहों, सभी नक्षत्रों और सप्तर्षियों से भी ऊपर है। तेरी माता सुनीति भी वहाँ तेरे साथ निवास करेगी और जो लोग प्रातःकाल और संध्याकाल तेरा गुणगान करेंगे उन्हें महान पुण्य प्राप्त होगा। इतना कहने के बाद श्री हरि अंतर्ध्यान हो गए और ध्रुव अपने राज्य की ओर लौट गए। 

                           नगर में लौटने पर राजा उत्तान पाद ने ध्रुव का भव्य स्वागत किया। इसके बाद ध्रुव को राज्य सिंहासन पर बिठाकर वन को गमन कर गए। ध्रुव ने धर्म अनुसार राज्य किया और अपने अंतिम समय में पुत्र को राज्य सिंहासन देकर बद्रिका आश्रम आ गए और वही आश्रम बनाकर रहने लगे। जब उनका धरा धाम पर समय पूर्ण हुआ, उनको लेने के लिए भगवान के पार्षद पहुंचे। परन्तु नारायण का विमान ऊँचा था अतः ध्रुव संकोच में पड़ गए कि विमान पर किस प्रकार से चढे। तभी उनके सामने मृत्यु देव आकर खड़े हुए। मृत्यु देव ने अपने सिर को झुकाया और ध्रुव ने उनके सिर पर अपना पैर रखा और विमान पर चढ गए।

                   धन्य है ध्रुव की माता सुनीति जिन्होंने अपने हितकर वचनों से ध्रुव के साथ- साथ स्वयं भी उस सर्वश्रेष्ठ स्थान को प्राप्त कर लिया। ध्रुव के नाम से ही उस दिव्य लोक को संसार में ध्रुव तारा के नाम से जाना जाता है। ध्रुव का मतलब होता है स्थिर, दृढ़, अपने स्थान से विचलित न होने वाला जिसे भक्त ध्रुव ने सत्य साबित कर दिया। भक्त ध्रुव की कहानी से हमें ये शिक्षा मिलती है कि जिसके मन में दृढ़ निश्चय और हृदय में आत्मविश्वास हो वह कठोर पुरुषार्थ के द्वारा इस संसार में असंभव को भी संभव कर सकता है। ध्रुव तारा को इंग्लिश में नाँर्थ स्टार कहते हैं। जैसा की नाम से ही स्पष्ट है यह उत्तर दिशा की ओर दिखाई पड़ता है। सुबह के समय सूरज उगने के पहले आप इसे उत्तर दिशा में देख पाएंगे। इसकी और एक पहचान है कि यह बहुत ही चमकदार तारा है। 

                       यह होता है भक्ति की शक्ति, जो कि इंसान को उस स्थान पर पहुंचा देता है, जो देवताओं को भी दुर्लभ है। हम तो नारायण के शरणागति को उत्सुक ही नहीं है, वरना तो नारायण हमारे होने को तत्पर ही है। बस जरूरत है, उनकी ओर उन्मुख होने की, उनकी शरणागति को स्वीकार्य करने की। मैं फिर से कहता हूं कि सांसारिक ऐश्वर्य का उपभोग करने से विरक्त होने की जरूरत बिल्कुल भी नहीं है। जरूरत है, तो सिर्फ कमल नयन श्री हरि के चरणों से स्नेह जोड़ने की। उनका हो कर तो देखे, फिर हमारा मन अति निर्मल हो जाएगा और हमें किसी प्रकार की व्याधि बिलकुल भी परेशान नहीं करेगी। आपको इसी क्रम में आगे भक्त शिरोमणि हनुमान जी की कथा सुनाऊंगा। 

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क्रमशः-


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रचनाएँ
भक्ति की धारा-संभवा एकाकार स्वरुप विश्वरुप
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इस पुस्तक में धर्म और अधर्म के बारे में बताने की कोशिश की गई है। मानव जीवन का सत्य उद्देश्य क्या है, उसकी व्याख्या की गई है। मानव जीवन में भक्ति की महता को निरुपीत किया गया है। साथ ही नारायण और उनके भक्तो का मधुर संबंध दृष्टांत के द्वारा बतलाया गया है। मानव जीवन की दुविधा, उसकी उपलब्धि और जरुरतों का सचित्र चित्रण किया गया है। मदन मोहन "मैत्रेय
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भक्ति की धारा-संभवा एकाकार स्वरुप विश्वरुुप

1 जून 2022
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सबसे पहले तो मैं श्री गणेश की वंदना करता हूं। गौरी- महेश नंदन बिना विघ्न के मेरी इस रचना का पूर्ण करें। तत्पश्चात मैं वीणा धारनी शक्ति स्वरुपा जगदंबा शारदा की वंदना करता हूं। वे मुझे ज्ञान पुंज दे, जो

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भक्ति की धारा-भक्त विशेष

3 जून 2022
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जीवन तो ईश्वर प्रदत्त है, परन्तु हम जगत के प्राणी इसको अपना समझ बैठे है। हम इस शरीर को अपना समझ बैठे है, जो नाशवान है। पता नहीं कि कब यह शून्य हो जाये, कब शिथिल हो जाए। जैसे ही इसमें से आत्मा निकल जात

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भक्त कथा अमृत

5 जून 2022
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भक्ति की धारा प्रवाहित हो और उसमें भगवान के परम भक्तों की चर्चा नहीं हो, संभव ही नहीं। भक्तों के निर्मल चरित्र से हमें काफी कुछ सीखने-समझने का अवसर प्राप्त होता है। अब मैं आपको नारायण के ऐसे ही भक्त प

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भक्त कथा अमृत

7 जून 2022
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श्री बजरंग बली, अंजन सुत, पवन तनय वीर हनुमान की कथा भी इसी श्रेणी में आती है। महाबली हनुमान ग्यारहवें रुद्र है। बजरंग बली श्री राम के अनन्या-नन्य भक्त है। उनको राम नाम के अलावा जगत में कुछ भी तो प्रिय

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भक्त कथा अमृत

9 जून 2022
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भीष्म तो अपनी प्रतिज्ञा से हो गए, अन्यथा उनका नाम तो देवव्रत था। शांतनु और गंगा की आठवीं संतान और पिता के आज्ञाकारी। परशुराम शिष्य भीष्म साधारण नहीं थे, वे अजेय योद्धा थे। वे ऐसे वीर योद्धा थे कि उन्ह

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भक्त कथा अमृत

13 जून 2022
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नरसी मेहता महान कृष्ण भक्त थे. कहा जाता है कि भगवान श्री कृष्ण ने उनको बावन बार साक्षात दर्शन दिए थे। नरसी मेहता का जन्म जूनागढ़, गुजरात में हुआ था. इनका सम्पूर्ण जीवन भजन कीर्तन और कृष्ण की भक्ति में

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भक्त कथा अमृत

17 जून 2022
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धर्म की परिभाषा देना न तो सहज है और न ही सुलभ। परन्तु इसको सरल बनाते है संत। भगवान के भक्त ही हमें भगवान की ओर उन्मुख करते है। संत ही मानव जीवन के लिए जहाज रूपी साधन है, जो भवसागर रूपी संसार से पार लग

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ईश्वर की अनुभूति

26 जून 2022
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विलासिता क्या है? अतिशय गुढ प्रश्न है। क्योंकि यह अखिल संसार ही इसके पीछे अंधी दौड़ लगा रहा है। भला सुख-सुविधा और उपभोग की वस्तुएँ किस को पसंद नहीं। कौन नहीं चाहता कि वह अच्छा पहने, अच्छा खाए और अच्छी

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ईश्वर के स्वरुप एवं भक्ति भाव-:

21 सितम्बर 2022
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भगवान सगुन और निर्गुण दो भावना से पुजे जाते है। निर्गुण स्वरूप का कोई आकार-प्रकार नहीं होता, जबकि सगुन स्वरूप में नारायण की विग्रह की पुजा होती है। जो अवतार रुप में अन्यथा नारायण रुप में।

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