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22.अपयश से बचने साहसी चुनते हैं वीरता  

23 जून 2023

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 22.अपयश से बचने साहसी चुनते हैं वीरता

 

गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है:-

 

अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम्।

 

संभावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते।।2/34।।

 

अर्थात (अगर तू इस धर्म युद्ध को नहीं करेगा तो……. )सब लोग तेरी निरंतर अपकीर्ति करेंगे, और माननीय पुरुषके लिए तो अपकीर्ति मरने से भी बढ़कर है ।

 

इस श्लोक से हम अपयश शब्द को एक सूत्र के रूप में लेते हैं। वास्तव में एक मनुष्य के रूप में हमारा कर्तव्य अपने व्यक्तिगत जिम्मेदारियों के निर्वहन के साथ-साथ सार्वजनिक सेवा और मानव कल्याण के लिए समर्पित होने का भी है। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वह परिवार, पास-पड़ोस, शहर, गांव जिला, प्रांत और देश में रहता है। उसे कई बार अपने जीवन में दूसरों की टीका टिप्पणी और निंदा का भी शिकार होना पड़ता है। कई बार तो स्थिति यह बनती है कि मनुष्य का कार्य कहीं से भी निंदनीय नहीं होता, लेकिन उसकी फिर भी निंदा की जाती है; या तो किसी गलतफहमी के कारण या फिर मानव की सहज प्रवृत्ति और बैठे ठाले टिप्पणी करते रहने की आदत के कारण। ऐसे में मनुष्य को विचलित नहीं होना चाहिए।उसे अपयश की परवाह न करते हुए अपने कार्य को सुचारू रूप से संचालित करने पर ही ध्यान केंद्रित करना चाहिए। हालांकि यह कठिन होता है।भारत रत्न पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी पर जब सार्वजनिक जीवन में एक बार आरोप लगे तो उन्होंने संसद में बहस के समय जवाब में एक संस्कृत श्लोक का शुरुआती अंश कहा था। पूरा श्लोक इस तरह है:-

 

भीतो मरणादस्मि केवलं दूषितं यशः।

 

विशुद्धस्य हि मे मृत्युः पुत्रजन्मसमः किलं॥

 

मैं मृत्यु से नहीं डरता; मुझे यही दुःख है कि मेरी कीर्ति कलंकित हो गई। यदि कीर्ति शुद्ध रहे और मृत्यु भी आ जाए, तो मैं उसको पुत्र के जन्म के उत्सव के समान मानूंगा।' उन्होंने भगवान राम का उद्धरण देते हुए कहा था-मैं मृत्यु से नहीं डरता। डरता हूं तो बदनामी से।

 

निंदा और आरोप किस पर नहीं लगते? लेकिन उससे विचलित होकर मनुष्य अपना काम तो नहीं छोड़ देता।

 

शायर वज़ीर आग़ा के शब्दों में:-

 

दिए बुझे तो हवा को किया गया बदनाम

 

क़ुसूर हम ने किया एहतिसाब उस का था।

 

निंदा और झूठे आरोपों से अविचलित रहना बहुत मुश्किल तो है लेकिन अपने मुख्य लक्ष्य से न भटकने के लिए कभी-कभी यह करना ही होता है।

 

श्री कृष्ण ने अर्जुन को समझाया कि अपकीर्ति लोक में बहुत समय तक रहती है। एक सम्मानित पुरुष के लिए अपकीर्ति मृत्यु से भी बढ़कर है। साथ ही कायरता के कारण मनुष्य जिन व्यक्तियों की दृष्टि में सम्मानित था अब उन्हीं की दृष्टि में वह लघुता को प्राप्त हो जाएगा। श्री कृष्ण ने कहा कि हे अर्जुन !ऐसे लोग तुम्हें भय के कारण ही युद्ध से हटा हुआ मानेंगे।(2/35)

 

वीर चुनते हैं युद्ध

 

कायरों के हिस्से में आता है पलायन,

 

वीर शस्त्र उठाते हैं, और जाते हैं युद्ध भूमि में

 

कायर शस्त्र नीचे रखकर

 

करते हैं प्रार्थना युद्ध टल जाने की

 

पर जब यह सुनिश्चित हो

 

कि तमाम शांति प्रयासों के बाद भी

 

अगर युद्ध है अपरिहार्य

 

तो ऐसे में युद्ध बन जाता है

 

वीरों का उत्सव

 

और युद्ध से पलायन कर

 

कायर जीते हैं अपयश

 

युद्ध टल जाने

 

या युद्ध की समाप्ति के

 

बरसों बाद भी ।

 

डॉ. योगेंद्र कुमार पांडेय

 

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रचनाएँ
भगवान श्रीकृष्ण उवाच
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परिचय श्रीमद्भागवतगीता भगवान श्री कृष्ण द्वारा वीर अर्जुन को महाभारत के युद्ध के पूर्व कुरुक्षेत्र के मैदान में दी गई वह अद्भुत दृष्टि है, जिसने जीवन पथ पर अर्जुन के मन में उठने वाले प्रश्नों और शंकाओं का स्थाई निवारण कर दिया।इस स्तंभ में कथा,संवाद,आलेख आदि विधियों से श्रीमद्भागवत गीता के उन्हीं श्लोकों व उनके उपलब्ध अर्थों को मार्गदर्शन व प्रेरणा के रूप में लिया गया है।भगवान श्री कृष्ण की प्रेरक वाणी किसी भी व्याख्या और विवेचना से परे स्वयंसिद्ध और स्वत: स्पष्ट है। श्री कृष्ण की वाणी केवल युद्ध क्षेत्र में ही नहीं बल्कि आज के समय में भी मनुष्यों के सम्मुख उठने वाले विभिन्न प्रश्नों, जिज्ञासाओं, दुविधाओं और भ्रमों का निराकरण करने में सक्षम है। इस धारावाहिक में लेखक द्वारा अपने आराध्य श्री कृष्ण से संबंधित द्वापरयुगीन घटनाओं व श्रीमद्भागवत गीता के श्लोकों व उनके उपलब्ध अर्थों व संबंधित दार्शनिक मतों की साहित्यिक प्रस्तुति है,जिसमें कहीं-कहीं लेखक की रचनात्मक कल्पना और भक्तिभाव भी भरे हैं।यह धारावाहिक -"भगवान श्री कृष्ण उवाच" भगवान श्री कृष्ण की प्रेरक वाणी से वर्तमान समय में जीवन सूत्रों को ग्रहण करने और सीखने का एक भावपूर्ण रचनात्मक लेखकीय प्रयत्नमात्र है,जो सुधि पाठकों के समक्ष प्रतिदिन प्रस्तुत करने का प्रयत्न है, कृपया पढ़िएगा अवश्य…….✍️🙏
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20:वीरों के सामने ही आती हैं जीवन की चुनौतियां गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है:- यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम्। सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम

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21.चुनौतियों में जन सेवा धर्मयुद्ध के समान गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है:- अथ चैत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि। ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हि

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22.अपयश से बचने साहसी चुनते हैं वीरता  

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22.अपयश से बचने साहसी चुनते हैं वीरता गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है:- अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम्। संभावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते।।2/34।।

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23 आत्म सम्मान की सीमा रेखा की रक्षा करें भगवान कृष्ण ने गीता में कहा है: - अवाच्यवादांश्च बहून् वदिष्यन्ति तवाहिताः। निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम्।(2/3

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24. आगे बढ़ें तो सारे विकल्प उपलब्ध होते रहेंगे अर्जुन श्रीकृष्ण की इस बात से पूरी तरह सहमत हैं कि अगर वे युद्ध से हटते हैं तो उन्हें "अर्जुन कायरता के कारण युद्ध से हट गया" ऐसे निंदा और अपमान

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