इंडिया वर्सेज़ पाकिस्तान. साल 1960. कानपुर में हुए दूसरे मैच के लिए भारतीय टीम ट्रेन से पहुंची. पंजाब मेल ने शाम साढ़े 6 बजे टीम को कानपुर स्टेशन पर उतारा. टीम अंधेरा होते-होते होटल पहुंची और वहां फैन्स के भेजे ग्रीटिंग कार्ड्स और मेसेज उनका इंतज़ार कर रहे थे. कप्तान साहब ने एक कार्ड उठाया. उसपर लिखा हुआ था कि वो उनका बहुत बड़ा फैन है और पूरी टीम का बहुत बड़ा प्रशंसक है. लेकिन उस ख़त की आख़िरी लाइन थीं – “याद रखियेगा कि आप पाकिस्तान के ख़िलाफ़ खेल रहे हैं. अगर जीत नहीं सकते तो मैच ड्रॉ ज़रूर करवा लीजियेगा. आप हारे तो मैं आपकी जान ले लूंगा.”
7 मार्च 1934. बम्बई में रहने वाली एक गर्भवती महिला गुजरात के शहर दाहोद से वापसी कर रही थी. उसका अपना भाई उस ट्रेन का ड्राइवर था. बीच सफ़र में ही उन्हें इस बात का अहसास हुआ कि सब कुछ ठीक (पढ़ें नॉर्मल) नहीं है. उन्होंने ट्रेन चला रहे अपने भाई तक ये बात पहुंचाई. भाई ने अपनी बहन से आनन-फानन में गोधरा स्टेशन पर उतर जाने को कहा और इस बात का आश्वासन दिया कि अगले दिन तबीयत ठीक हो जाने पर वो उन्हें दूसरी ट्रेन से बम्बई ले जाएगा. उस रोज़ उस महिला ने एक लड़के को जन्म दिया. नरीमन जमशेदजी कांट्रेक्टर. नारी कांट्रेक्टर. अपने समय पर भारत का सबसे कम उम्र का कप्तान. वो जो था तो मुंबई का लेकिन गोधरा और ट्रेन से जुड़ी एक गैर-हिंसक घटना की वजह से गुजरात से खेलने लगा.
नारी नासिक में रह रहे थे. 1955 में एमसीए (मुंबई क्रिकेट असोसिएशन) के सिल्वर जुबिली मैचों के लिए सेलेक्शन ट्रायल में बैटिंग कर रहे थे. गुजरात के कप्तान फ़िरोज़ खम्बाटा ने उन्हें बैटिंग करते हुए देखा और उन्हें गुजरात से खेलने के लिए बुलाया. नारी का दिल मुंबई के साथ था. ट्रायल में उन्होंने अच्छी बैटिंग की थी और उन्हें इस बात का विश्वास था कि पाकिस्तान सर्विसेज़ और भावलपुर क्रिकेट असोसिएशन के ख़िलाफ़ उन्हें ज़रूर खेलने को मिलेगा. खम्बाटा का न्योता ठुकरा दिया. लेकिन मुंबई से उन्हें रिजेक्ट कर दिया गया. इसके ठीक बाद उन्होंने गुजरात क्रिकेट असोसिएशन को तार लिखा – ‘available if selected’. लेकिन उसी दिन गुजरात की टीम को बड़ौदा के ख़िलाफ़ मैच के लिए सेलेक्ट कर लिया गया था. उन्हें जवाबी तार मिला. बड़ौदा में उन्हें ट्रायल्स के लिए बुलाया गया था.
कांट्रेक्टर अब उस ज़मीन पर बैटिंग कर रहे थे जहां इत्तेफ़ाकन वो पैदा हुए थे. वहां नारी कांट्रेक्टर एक जाना-पहचाना नाम बन गया. वो बेहतरीन बल्लेबाज बन कर उभरने लगे. इसके बाद नारी कांट्रेक्टर ने रणजी ट्रॉफी में कदम रखा. बड़ौदा के ही ख़िलाफ़. नारी को एकदम अंतिम समय पर गुजरात की टीम में चुना गया. ये भी एक इत्तेफ़ाक ही था कि नारी को उसी की जगह लिया गया जिसका गुजरात आने का सबसे पहला न्योता उन्होंने ठुकराया था – फ़िरोज़ खम्बाटा. मैच की सुबह फ़िरोज़ उठे और उनकी गर्दन जकड़ी हुई थी. वो अपने सर को आसानी से घुमा नहीं पा रहे थे, लिहाज़ा उनकी जगह किसी और को ही खेलना था.
गुजरात की स्थिति भयानक बुरी चल रही थी. 81 रन पर 5 विकेट गिरने के बाद नारी कांट्रेक्टर हाथ में बल्ला थामे मैदान में उतरे. उन्होंने ज्योतींद्र शोधन के साथ 241 रन की पार्टनरशिप बनाई. गुजरात का फाइनल स्कोर था 364 रन. कांट्रेक्टर ने कुल 152 रन बनाए. जवाब में बड़ौदा की टीम 246 रन पर ही ढेर हो गई. अगली इनिंग्स में बैटिंग करने आए कांट्रेक्टर ने 102 रन बना दिए. गुजरात ने डिक्लेयर कर दिया और पहली इनिंग्स की लीड के आधार पर पॉइंट्स जीते. नारी कांट्रेक्टर के नाम अपने पहले ही फर्स्ट-क्लास मैच की दोनों इनिंग्स में दो शतकों का रिकॉर्ड लिखा जा चुका था. नारी ऐसे दूसरे खिलाड़ी थे. अब तक दुनिया में ये काम उनके अलावा बस 6 ही खिलाड़ी कर पाए हैं.
टीम इंडिया
बहुत ही जल्द 1955 में ही 21 साल के नारी कांट्रेक्टर का नाम इंडियन टेस्ट टीम की लिस्ट में दिखाई दिया. मुंबई में खेले गए दूसरे मैच में नारी कांट्रेक्टर को सातवें नंबर पर उतारा गया. अपने पहले मैच में उन्होंने 16 ही रन बनाए. हांलाकि वीनू मांकड़ और सुभाष गुप्ते ने इंडिया को एक इनिंग्स से मैच जितवा दिया. अगला मैच दिल्ली में होना था और वीनू मांकड़ उस मैच में नहीं खेल रहे थे. पूरी टीम अब अपना दूसरा मैच खेल रहे 21 साल के नारी कांट्रेक्टर की ओर ही देख रही थी. उन्हें वो करने को कहा गया जो उन्होंने जीवन में कभी भी नहीं किया था – ओपनिंग. पहला दिन ख़त्म हुआ तो मालूम पड़ा कि एक लड़का जो साल भर पहले मुंबई के लिए खेलने के लिए योग्य नहीं था, आज इंडिया के लिए हाफ़ सेंचुरी मार चुका था. अगले टेस्ट में एक बार फिर ओपनिंग करते हुए हाफ़ सेंचुरी मारने के बावजूद उन्हें नीचे उतारा गया क्यूंकि टीम में पंकज रॉय के लिए जगह बनाई जानी थी. पंकज ने सीरीज़ के पांचवे और आख़िरी मैच में वीनू मांकड़ के साथ ओपनिंग करते हुए 413 रन बनाए. ये इस दुनिया की सबसे बड़ी ओपनिंग पार्टनरशिप थी. 52 साल और 1445 मैचों बाद नील मैकेंज़ी और ग्रीम स्मिथ ने 415 रन बनाकर इस रिकॉर्ड को बांग्लादेश में अपने नाम किया. मांकड़ और रॉय दूसरे नंबर पर अभी भी हैं.
लॉर्ड्स का करिश्मा
इसके बाद एक छोटा सा पीरियड ऐसा आया जब रनों का सूखा पड़ा. नारी ने अपनी एक लीग बना ली थी. लेकिन वेस्ट-इंडीज़ की टीम ने उन्हें भारतीय पिचों पर बांधे रखा. 10 इनिंग्स में 41, 50 और 92 की 3 ही ठीक-ठाक इनिंग्स दिखीं. लेकिन इसके ठीक बाद इंग्लैंड दौरे पर भारतीय क्रिकेट की और नारी कांट्रेक्टर की सबसे साहसिक पारियों में से एक देखने को मिली. पहले टेस्ट में 15 और 0 बनाने के बाद लॉर्ड्स में दूसरे मैच ओपनिंग करने उतरे कांट्रेक्टर की पसलियों पर ब्रायन स्टेथम की एक पटकी हुई गेंद जा लगी. कांट्रेक्टर की दो पसलियां चूर हो गईं. गेंद लगते ही वो ज़मीन पर थे. लेकिन इसके बाद भी उन्होंने बैटिंग चालू रखी. टीम के 168 में 81 रन नारी कांट्रेक्टर के थे. दुनिया को देखने को मिल रहा था कि फ्रेड ट्रूमैन और ब्रायन की पेस को किस तरह से संभालना था. नारी ने पसलियों पर ढेर सारा प्रोटेक्शन लगाकर बैटिंग की और उस इनिंग्स में आउट ही नहीं हुए. इंग्लैंड ने सीरीज़ 4-0 से जीती.
ऑस्ट्रेलिया की टक्कर
इसके बाद बारी एक और इतिहास की. ऑस्ट्रेलिया और इंडिया के बीच अब तक 8 टेस्ट मैच खेले गए थे. ऑस्ट्रेलिया ने 6 जीते थे और इंडिया का खाता खुलना बाकी था. साल 1959 में 5 टेस्ट मैचों में पहले ही मैच में ऑस्ट्रेलिया ने फिर से इंडिया को दिल्ली में हरा दिया. स्कोर था 9-0. लेकिन कानपुर में तस्वीर बदली. इंडिया को ऑस्ट्रेलिया के ऊपर पहली बार टेस्ट मैच में जीत हासिल हुई. कानपुर का मैदान जहां पहली इनिंग्स में 50 रन से ज़्यादा से पिछड़ने के बाद कांट्रेक्टर के 74 और बोर्डे और नादकर्णी के 44 और 46 रनों की बदौलत ऑस्ट्रेलिया को 225 रनों का टार्गेट मिला. जेसूभाई पटेल और पॉली उमरीगार ने आपस में 9 विकेट बांटे और कोई भी ऑस्ट्रेलिया का बैट्समैन 34 रनों के पार नहीं पहुंचा. 7 बैट्समेन सिंगल डिजिट स्कोर में रहे. इंडिया ने ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ खाता खोल लिया था. ये जीत स्वदेशी पिच पर थी. ऑस्ट्रेलिया की पिच पर इंडिया ने बेदी की कप्तानी में जनवरी 1978 में पहला मैच जीता था. ऑस्ट्रेलिया पर जीत हासिल करने के बाद अगले ही टेस्ट में नारी कांट्रेक्टर ने फिर एक बड़ा काम किया. अपने करियर की पहली सेंचुरी मारी. वही मैदान जहां के क्रिकेट असोसिएशन ने उन्हें रिजेक्ट कर दिया था. नारी कांट्रेक्टर इंडिया के स्पेशलिस्ट ओपनर के रूप में स्थापित हो चुके थे. ये सीरीज़ भी ऑस्ट्रेलिया के नाम ही रही.
कप्तानी, पाकिस्तान और हनीफ़ मोहम्मद के पैर का अंगूठा
ऑस्ट्रेलिया से सीरीज़ के बाद चूंकि मांकड़ रिटायर हो चुके थे और गुलाबराय रामचंद बहुत हद तक असफ़ल साबित हुए थे, नारी कांट्रेक्टर को देश की कप्तानी दे दी गई. उनके सामने पाकिस्तान की टीम खड़ी थी. इस सीरीज़ की शुरुआत से जुड़ा एक मज़ेदार किस्सा है. पाकिस्तान की टीम में मुख्य बैट्समैन हनीफ़ मोहम्मद ताबड़तोड़ खेलते थे. उन्हें सीरीज़ से ठीक पहले पैर के अंगूठे में चोट लग गई थी. ऐसा लग रहा था कि शायद उन्हें टीम में जगह नहीं ही मिलेगी. लेकिन टॉस के वक़्त इंडिया के ताज़े-ताज़े कप्तान नारी कांट्रेक्टर को टीम की लिस्ट मिली तो उसमें हनीफ का नाम था. उन्होंने पाकिस्तानी कप्तान फज़ल महमूद से कहा कि वो हनीफ़ को रनर तब तक नहीं लेने नहीं देंगे जब तक हनीफ को वहीं पर दोबारा चोट न लग जाए. हनीफ़ ने उस मैच में बिना रनर के 160 रन बनाए. सईद अहमद ने उनका साथ देते हुए 121 रन ठोंके. मैच ड्रॉ हुआ. हनीफ़ ने बाउंसरों को ऐसे खेला जैसे कोई बच्चा उन्हें गेंद फेंक रहा हो. लेकिन उसी सीरीज़ में दिल्ली में वो बाउंसर पर यूं आउट हुए जैसे उन्हें खेलना ही नहीं आता हो. अगला मैच कानपुर में था जहां नारी कांट्रेक्टर को उस फैन की चिट्ठी मिली जो उनसे प्यार तो करता था लेकिन पाकिस्तान से हारने के चक्कर में वो उनका खून करने को भी तैयार था.
अब तक वो समय आ चुका था जब जयललिता की नज़र नारी कांट्रेक्टर पर पड़ चुकी थीं. जयललिता ने सालों बाद मुख्यमंत्री की हैसियत से एक टीवी इंटरव्यू में ये बताया कि बचपन में नारी कांट्रेक्टर पर उनका बहुत बड़ा क्रश था. वो मैच देखने सिर्फ़ उन्हें ही देखने के लिए जाती थीं. खैर, पाकिस्तान से 1960-61 की सीरीज़ ड्रॉ रही. दोनों देश अब लगातार 13 टेस्ट मैच ड्रॉ खेल चुके थे.
इंग्लैंड के ख़िलाफ़ रचा इतिहास
इसके बाद एक और इतिहास. इंग्लैंड के ख़िलाफ़ सीरीज़ की जीत. इंडिया ने घरेलू मैदान पर 2-0 से सीरीज़ जीती. पहले 3 मैच ड्रॉ रहने के बाद इंडिया ने एक के बाद एक मैच जीते. दूसरे मैच में इंडिया ने इंग्लैंड को फॉलो-ऑन तो ज़रूर खिलाया लेकिन मैच ड्रॉप ही हुआ. चौथे मैच के लिए दोनों टीमें कोलकाता पहुंचीं. कोलकाता मैच जीतने के पीछे एक अंतिम सेकंड पर किया गया बदलाव बड़ी वजह था. इंग्लैंड 421 रन के टार्गेट का पीछा कर रहा था. बैरिंगटन, जिन्होंने दूसरा टेस्ट ड्रॉ करवाया था, जल्दी आउट हो गए. रिचर्डसन और डेक्सटर अच्छी बैटिंग कर रहे थे लेकिन फिर रिचर्डसन और उसके ठीक बाद बॉब बार्बर आउट हो गए. डेक्सटर बैटिंग किये जा रहे थे. नारी कांट्रेक्टर ने गेंद अपने मीडियम फ़ास्ट बॉलर रमाकांत देसाई की ओर फेंकी. जिस वक़्त देसाई अपना रन-अप नाप रहे थे, कांट्रेक्टर ने उनसे गेंद वापस ले ली और सलीम दुरानी को पकड़ा दी. अगले छोर से अब चंदू बोर्डे आ गए और इंडिया अपने स्पिन अटैक पर आ गई.
15 मिनट के अंदर दुरानी ने डेक्सटर का विकेट लिया. इंग्लैंड की टीम धराशाई हो गई. इंडिया 1-0 से आगे थी. सारी आंखें मद्रास टेस्ट मैच पर थीं जहां कांट्रेक्टर लय में वापस आए और 86 रन बनाए. मंसूर अली खान पटौदी ने सेंचुरी मारी और फिर बापू नादकर्णी और फ़ारुख इंजीनियर ने मिलकर आठवें विकेट के लिए 101 रन बनाए. दुरानी ने कुल 10 विकेट लिए. प्रसन्ना, नादकर्णी और बाकी स्पिनर्स ने अन्ग्रेज़ों को टप्पे पर गेंदें खिलाईं. भारत ने इतिहास रचा.
एक बाउंसर और फिर पूर्ण विराम
और फिर वो सीरीज़ जो पूर्ण विराम बन गई. एक बेहतरीन क्रिकेट करियर के लिए एक डरावना पूर्ण विराम. वेस्ट इंडीज़ का टूर. साल 1962. भारत 2-0 से पीछे चल रहा था. दूसरे टेस्ट के बाद इंडिया का बारबेडोस से टूर मैच था. अब तक 4 इनिंग्स में 22 रन बनाने वाले नारी कांट्रेक्टर इस मैच में नहीं खेलने वाले थे. लेकिन उस मैच से ठीक पहले की शाम वेस्ट इंडीज़ के कप्तान सर फ्रैंक वॉरेल इंडियन टीम के पास पहुंचे और उन्हें बारबेडोस की टीम में मौजूद एक खूंखार बॉलर चार्ली ग्रिफ़िथ के बारे में बताया. भारतीय बल्लेबाजों को पहले से ही मौजूद वेस हॉल का खौफ़ सता रहा था. अचानक ही कई इंडियन बैट्समेन ‘अनफिट’ हो गए. नारी ने माजरा समझा और कहा कि वो अगले दिन खेलेंगे. नारी ने दिलीप सरदेसाई को उनके साथ ओपनिंग करने के लिए कहा. नारी कांट्रेक्टर अपने अन्धविश्वास के चलते ओपनिंग करते हुए कभी भी स्ट्राइक नहीं लेते थे. लेकिन उस रोज़ चूंकि उनके साथ वो बल्लेबाज था जो पहली बार ओपनिंग करने जा रहा था, उन्होंने स्ट्राइक ली. पहला ओवर ग्रिफ़िथ ने फेंका जिसकी सभी गेंदें नारी ने ही खेलीं. अगले ही ओवर में वेस हॉल ने दिलीप सरदेसाई को बहुत ही जल्दी निपटा दिया. मैदान पर बैटिंग करने के लिए रुसी सुरती आए.
चार्ली ग्रिफ़िथ अपने सर्किल में भरपूर बदनाम थे. उनपर समय-समय पर चकिंग अर्थात बट्टा फेंकने अर्थात इल्लीगल बॉलिंग ऐक्शन का आरोप लगता रहा था. इनिंग्स का तीसरा और ग्रिफ़िथ का दूसरा ओवर प्रगति पर था. दूसरे छोर पर खड़े सुरती ने ने नारी को आगाह किया कि ग्रिफ़िथ चकिंग कर रहा था. नारी कांट्रेक्टर ने सुरती को शांत होने को और अपने खेल पर ध्यान देने को कहा. तीसरी गेंद पर कॉनरेड हंट ने शार्ट लेग पर नारी का कैच छोड़ दिया. इस कैच छूटने का अफ़सोस बारबेडोस के खिलाड़ियों से ज़्यादा पूरे भारत को होने वाला था, मगर अगली गेंद पर. बकौल नारी कांट्रेक्टर, ठीक उसी वक़्त जब ग्रिफ़िथ गेंद फेंकने वाले थे, उनके ठीक सामने पवेलियन थी जहां किसी ने खिड़की खोल दी. उस वक़्त उनके सामने साइट स्क्रीन नहीं लगी हुई थी. खिड़की के कांच से आती चमक ने एक पल के लिए नारी का ध्यान गेंद से हटा दिया और उन्हें गेंद ठीक उस वक़्त दिखाई दी जब वो उनके मुंह के ठीक सामने थी. वो चौंक गए और उतनी ही देर में गेंद उनके सर से टकरा गई.
कांट्रेक्टर ज़मीन पर पड़े हुए थे. उनके नाक और कान से खून बह रहा था. ग़ुलाम अहमद, जो कि इंडियन टीम के मैनेजर थे, भागते हुए आए और उन्हें संभाला. कांट्रेक्टर को पवेलियन ले जाया गया. वहां उनके खून से सने कपड़े बदले गए लेकिन उनके नाक और कान से बहता खून रुकने का नाम ही नहीं ले रहा था. मैदान पर मैच चालू था. वहां ग्रिफ़िथ का अगला शिकार विजय मांजरेकर बने जिन्हें नाक पर गेंद लगी और वो भी रिटायर्ड हर्ट आउट हुए.
अस्पताल में कांट्रेक्टर की हालत खराब हुई. वहां लोगों को समझ में आया कि अंदरूनी चोट काफ़ी गड़बड़ी वाली है. वो लगातार उल्टियां कर रहे थे और उनके शरीर का एक हिस्सा बार बार काम करना बंद कर रहा था. आनन फानन में सर्जरी की तैयारियां की गईं. वहां मौजूद डॉक्टर कोई स्पेशलिस्ट नहीं था लेकिन उसने अपनी पूरी बुद्धि लगाकर इतना ज़रूर किया कि कांट्रेक्टर को कुछ राहत मिल सके. सर्जरी के दौरान काफ़ी खून बहा. चंदू बोर्डे, बापू नादकर्णी और पॉली उमरीगार के अलावा वेस्ट इंडीज़ के कप्तान वॉरेल ने भी कांट्रेक्टर को खून दिया. वॉरेल के इस कदम को बहुत सराहा गया. खुद ग्रिफ़िथ भी शाम को खेल ख़त्म होने के बाद अस्पताल पहुंचे. असल में मैदान में मौजूद खिलाड़ियों को स्थिति की गंभीरता के बारे में बाद में ही बताया गया था.
कांट्रेक्टर को 6 दिनों बाद पूरी तरह होश आया. अब तक उनकी पत्नी उनके पास आ चुकी थीं. उन्होंने अपने परिवार के साथ रिकवर होने के लिए कुछ वक़्त बारबेडोस में ही गुज़ारा. जाने से पहले जब आख़िरी बार ग्रिफ़िथ उनसे मिलने गए तो उन्होंने अपनी पत्नी से कहा, “चार्ली को दोष मत दो. वो मेरी गलती थी…”
नारी कांट्रेक्टर को इसके बाद क्रिकेट न खेलने की सलाह दी गई. लेकिन उन्हें दोबारा टेस्ट क्रिकेट खेलना था. उन्होंने दस महीने बाद ही फर्स्ट-क्लास क्रिकेट में वापसी की. लेकिन उन्हें इंडिया के लिए दोबारा कभी भी नहीं चुना गया. गुलाम अहमद, जिन्होंने नारी को चोट लगने के बाद मैदान से पवेलियन पहुंचाया था, अब टीम इंडिया के चीफ सेलेक्टर बन चुके थे. उन्होंने कांट्रेक्टर की पत्नी से पूछा कि वो उन्हें दोबारा खेलने क्यूं दे रही थीं. उनका जवाब था, “आज अगर वो फिर से खेल रहे हैं तो ये उनकी किस्मत है. मैं कौन होती हूं उनकी किस्मत से छेड़छाड़ करने वाली?”
इंडिया वो सीरीज़ 5-0 से हारा. नारी कांट्रेक्टर के बाद पटौदी इंडिया के कप्तान बने. सालों बाद अक्सर नारी कांट्रेक्टर एयरपोर्ट पर अपनी शैतानी दिखाते हुए मिल जाते हैं. सिक्योरिटी चेक के दौरान वो जान बूझकर अपना सर मेटल डिटेक्टर के सामने ला देते हैं जिससे वो बज उठता है. बार-बार चेक करने के बाद उन्हें जब अलग ले जाया जाता है तो वो मुस्कुराते हुए अपनी वेस्ट-इंडीज़ में लगी चोट और ऑपरेशन के दौरान उनके सर में लगाई गई धातु की एक प्लेट के बारे में बताते हैं.
ये भी पढ़ें:
जब अफ़रीदी ने करियर की पहली ही इनिंग्स में दुनिया की सबसे तेज़ सेंचुरी मारी थी
बिशन सिंह बेदी ने 39 साल पहले पाकिस्तान को मैच जीतने दिया था
11 नौसिखियों के बूते सौ करोड़ से भी ज्यादा लोग वर्ल्ड कप जीत गए
अनिल दलपत : पाकिस्तान के लिए खेलने वाला पहला हिन्दू क्रिकेटर