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"बस इतना ही"

10 अक्टूबर 2015

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 बस इतना ही


न कहो कि इनसानियत अब जीवित नहीं,


न कहो कि जीवन मूल्यों की अब कीमत नहीं।


न कहो कि है कल्पना सब, यह हकीकत नहीं।


हाँ कभी, कहीं इनसानियत सोयी है,


तुम्हें है बस जगाना ही ।


***हाँ कभी, कहीं जीवन-मूल्यों का मूल्य,


तुम्हें है बस याद दिलाना ही ।


यह सब कल्पना नहीं, यथार्थ भी,


तुम्हें बस इतना है पहचानना ही ।

आशा  “क्षमा”

आशा “क्षमा”

प्रोत्साहन के लिए धन्यवाद !

13 अक्टूबर 2015

ओम प्रकाश शर्मा

ओम प्रकाश शर्मा

पूर्णतः सत्य है यह, कितने ही जीवन सिर्फ औरों के लिए ही जीते चले जाते हैं, जहाँ कोई स्वार्थ निहित नहीं होता ! वस्तुतः लोगों को सिर्फ जगाना है ! बहुत सुन्दर रचना !

12 अक्टूबर 2015

चंद्रेश विमला त्रिपाठी

चंद्रेश विमला त्रिपाठी

उम्मीद वाकई कायम रखनी चाहिए । अच्छी रचना ।

12 अक्टूबर 2015

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“ भारतीय संस्कृति, हिन्दी और भारत का बाल एवम् युवा वर्ग “

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कृष्ण स्तोत्र 1

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क्या यह धरा वही हैजहाँ था गार्गी नेकिया शास्त्रार्थ?राजगुरु की समझ केबाहर,थे विद्योत्तमा केभावार्थ।विद्या, वाणी, बुद्धि,विवेक,ज्ञान करेगाअनुसंधान।शक्ति की देवीदुर्गा तो,करती है रिपु का सर–संधान।वाणी चाहती सदैवसम्मान, वरना शक्ति के लिएखुलता है द्वार।किरण शक्ति की वेदीपरकरती वार, प्रहार,संहार।”ज्ञान व

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माँबच्चे को जन्म देकरजान पायीईश्वर को !क्योंकि-वह देख पायीबच्चे में अपना विश्वऔर विश्व कोईश्वर की दृष्टि से । --x--

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"जो इनसान होते हैं जीवट वाले"

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"धर्मनिरपेक्षता"

8 अक्टूबर 2015
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“धर्मनिरपेक्षता” इसे मात्र संयोग ही कहा जा सकता है कि आज जो विषय "धर्म" भारतवर्ष में सर्वाधिक चर्चा का विषय बन गया है, आज से ठीक एक शताब्दी पूर्व अर्थात् सन् 1893 ईस्वी में स्वामी विवेकानन्द इसी विषय से सम्बन्थित एक महासभा में भाग लेने शिकागो गये एवम् अपनी विचारधारा को सर्वोच्च स्थान दिलाने में भी स

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"बस इतना ही"

10 अक्टूबर 2015
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 बस इतना हीनकहो कि इनसानियत अब जीवित नहीं,नकहो कि जीवन मूल्यों की अब कीमत नहीं।नकहो कि है कल्पना सब, यह हकीकत नहीं।हाँकभी, कहीं इनसानियत सोयी है,तुम्हेंहै बस जगाना ही ।***हाँ कभी, कहीं जीवन-मूल्यों का मूल्य,तुम्हेंहै बस याद दिलाना ही ।यहसब कल्पना नहीं, यथार्थ भी,तुम्हेंबस इतना है पहचानना ही ।

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13 अक्टूबर 2015
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