shabd-logo

पुस्तक समीक्षा : बनारस टाकिज

10 जुलाई 2015

613 बार देखा गया 613
बनारस टॉकीज : इस पुस्तक का मैंने हाल ही में बड़ा नाम सुना था ,काफी चर्चा हो रही थी शोशल जगत की आभासी दुनिया में ! हम तो ठहरे पुस्तक प्रेमी ,तो भला हम इससे कैसे अछूते रहते भला ! वैसे भी आजकल हिंदी लेखन भी अपनी पुख्ता पहचान बना रही है ,जो कुछ समय पहले तक लुप्तप्राय समझी जाती थी ,किन्तु नए लेखको ने इसमें जीवन का संचार किया है ! नए लेखक कुछ नया लिखने और उसकी नयी प्रस्तुती जो के आजके युवा मन को छू जाए और हल्का फुल्का मनोरंजन भी करे के प्रयास में ज्यादा रहते है ! और अधिकतर उनमे सफल भी रहते है , वैसे भी कुछ समय पहले या कहू एक –दो वर्ष पहले ही हिंदी के नाम पर मूल ‘अंग्रेजी ‘ पुस्तक का हिंदी रूपांतर ही मिलता था ! हिंदी में लिखा गया उपन्यास तो क्वचित या न के बराबर था , यहाँ पल्प फिक्शन के धुरंधरों की बात नहीं करूँगा जो हमेशा से अपनी शैली और जेनर में अव्वल रहे है और रहेंगे ! या यु कहू के इनके बाद भारतीय पल्प फिक्शन ,क्राईम राईटिंग अनाथ हो जाएगी तो अतिश्योक्ति नहीं होगी ,खैर बात कर रहा हु नए लेखको की जिन्होंने अपनी लेखन शैली पाठको को प्रभावित किया है , तो हमने भी नयी पीढ़ी के लेखको को समझने एवं कुछ नया पढने की गरज से ‘भगत ‘ जी को पढना शुरू किया और जल्द ही मन उकता गया , पता नहीं क्यों इनमे वो गहराई नहीं मिल पा रही थी जो होनी चाहिए ! मसालेदार कहानी ,रोमांस ,खुलापन ,कॉलेज युवा ,कैम्पस ,बस उनका हर उपन्यास इन्ही चीजो के चारो ओर सिमट के रहा गया ,जो शुरू शुरू में अच्छा लगा किन्तु जल्द ही उकताहट का कारन बनने लगा तो हमने तौबा कर ली ! इसी के साथ कुछ अन्य लेखको के हिंदी प्रयास देखे जिन्होंने बिना किसी शोर शराबे और विग्यापनो के चुपचाप आकर और अपनी दमदार उपस्थिति प्रस्तुती करके अपनी लेखन शैली और प्रस्तुती की खूब वाह वाही बटोरी . गत दिनों इसी कड़ी में तीन पुस्तके खरीदी ,जिनमे क्रमवार है ‘जिंदगी ऐस पैस ,बनारस टाकिज ,और इश्क में शहर होना ! पहली फुर्सत में ही ‘बनारस टाकिज ‘ निपटा डाली ,अन्य अभी कतार में है और खाली क्षणों की प्रतीक्षा में भी ! तो ‘बनारस टाकिज ‘ कहानी है कुछ दोस्तों की जो ‘भगवानदास होस्टल ‘ में है ! और अपनी वकिली पढ़ाई निपटा रहे है ! इनमे एक से एक नमूने भरे पड़े है ,कुछ सीनियर कुछ जूनियर, कही रैगिंग का डर तो कही नए दोस्त जो न चाहते हुए भी दोस्त बन गए ! जिंदगी बेफिक्र सी लापरवाह आवारा हवा के झौंको की तरह बह रही है ! यहाँ ‘बुद्धिजीवी ‘ कहना आपको ‘गंवार ‘ की श्रेणी में शामिल कर सकता है तो आप यहाँ ‘बी .डी ,जीवी ‘ शब्द का ही प्रयोग करे ,इस होस्टल में एक है ‘जयवर्धन जी , जो हर बात में ‘घंटा ‘ शब्द का प्रयोग करते है , फिर मिलना होगा ‘अनुराग डे ‘ से जो जो विदेशी नाम से प्रसिद्ध है , पुरखे बंगलादेशी रहे होंगे ,ये दादा नाम से जाने जाते है ! फिर है ‘सूरज ‘ जो बाबा भी कहलाते है , रामप्रताप उर्फ़ दुबे जी हर जुगाड़ में माहिर ,हर मर्ज की दवा इनके पास है ! आगे ज्ञान के सागर ‘पाण्डेय जी ‘ भी मिलेंगे , ‘नवेंदु ‘ भी है जो चलता फिरता विकिपीडिया है ‘फिल्मो ‘ का ,और इनकी हर बात फ़िल्मी है !और ये सब है अपने ‘बनारस ‘ में , भोलेनाथ जी की नगरी ! बनारस हिन्दू विश्व विद्यालय के होस्टल में ! सभी किरदार जाने पहचाने है ! क्योकि आप इन सबसे मिल चुके होंगे पहले भी ,स्कूल में ,कॉलेज में , और सबसे डरावना और उकताहट भरे शब्द ‘ फैकल्टी ‘ में ! ( इस शब्द से सबसे ज्यादा चिढ और खीज होने लगी है ‘भगत ‘ जी के कारण ) पता नहीं क्यों आजकल हर पुस्तक में इस शब्द का वर्णन अवश्य होता है , जहा इस शब्द का जिक्र आया वहा मूड खराब हुवा ही समझो ! किन्तु कहानी का प्रस्तुतिकरण जल्द ही फैकल्टी भुलाने में सहायक बनता है और हम बनारसी छात्रो में घुल मिल जाते है ! उनकी रोजमर्रा की समस्याए ,पढाई की चिंता ,सेमेस्टर का तनाव , चाय की गुन्टी और दुनिया भर की बकलोली ! एकदम देसी मिजाज ! इस उम्र में जो हर युवा की समस्या है वह इनकी भी है जिन्हें ये कोई समस्या नहीं मानते ,वह है लापरवाही और गैरजिम्मेदारी , जिसे लिया हल्के में ही जाता है ,तब तक ,जब तक के कोई बड़ा सबक न मिल जाए ! तो ऐसा सबक कैसे मिले ? अब सब यही चेप देंगे तो पुस्तक में का ‘सम्पादकीय ‘ पढोगे ? ( वो तो है ही नहीं पुस्तक में ) हां जिन्हें सुखा सुखा पसंद नहीं है ,उनके लिए ‘लभ इश्टोरी ‘ भी है ! माने हर किसी के लिए कुछ न कुछ है , किन्तु एक बात काफी अखरती रही जिसके चलते हम पृष्ठ कुतरते रहे ,हर दो तीन पृष्ठों के पश्चात ! वह थी गालियाँ , दोस्तों में गालियाँ चलती है किन्तु इतना अधिक भी क्या गलियों का आग्रह ? क्या बनारस की पृष्ठभुमी का उल्लेख आते ही ‘गालियाँ ‘ आवश्यक हो जाती है ? जो बनारस के नहीं है वे इन्ही पुस्तको से बनारस को जानते है ! ऐसे में क्या बनारस में ‘गालियाँ ‘ प्यार दर्शाती है ,दर्शाकर भ्रामकता फैलाना सही है ? ( माना लेखक का यह उद्देश नही रहा हो ,) क्या हम इस तरह से बनारस का एक विपरीत स्वरूप नहीं प्रस्तुत कर रहे ? सब कुछ सही था किन्तु यही बात कचोटती रही और जहा भी गाली दिखी वहा कुतर दिए ! अब पुस्तको के साथ ऐसा करना मुझे अच्छा नहीं लगता किन्तु रोक न पाया , उम्मीद करता हु के मै लेखक की अन्य किसी विषय पर आधारित उपन्यास भी जल्द ही पढू ! ( जब प्रकाशित हो ),और उसमे कुछ ऐसा पढू जो अब तक कही और नही पढ़ा , ऐसा न लगे के विषय वही पढ़ रहा हु बस लेखक ‘भगत ‘ के बजाय कोई और है . मिली जुली प्रतिक्रिया रही हमारी .
ओम प्रकाश शर्मा

ओम प्रकाश शर्मा

वैसे भी आजकल हिंदी लेखन भी अपनी पुख्ता पहचान बना रही है ,जो कुछ समय पहले तक लुप्तप्राय समझी जाती थी ,किन्तु नए लेखको ने इसमें जीवन का संचार किया है...देवेन जी, बहुत बढ़िया लिखा है आपने ! धन्यवाद !

11 जुलाई 2015

शब्दनगरी संगठन

शब्दनगरी संगठन

देवेन जी, समीक्षा लेखन जैसा श्रमसाध्य कार्य करने हेतु आपके प्रति हमारी शुभकामनायें ! हमारे अन्य मित्रों की टिप्पड़ियां इस पुस्तक के बारे में अधिक महत्त्वपूर्ण होंगी ! लेख प्रकाशन हेतु बधाई !

11 जुलाई 2015

1

गहन खामोशी

7 मई 2015
0
3
1

2

माँ और सिरका

10 मई 2015
0
3
0

वो हमेशा माँ की नाक में दम किये रहता था। माँ हमेशा हैरान रहा करती थी। उसकी एक आदत बड़ी खराब थी, घर में रखे "सिरके" को चाटने की । सिरके का खट्टा स्वाद उसे बहुत पसंद था, जब भी मौका देखता दो चार चम्मच मार लेता । माँ ने इस तरह से सिरके को जूठा करने के लिये जमकर लताड़ा ,लेकिन उसे न समझना था। सो नही समझा

3

बुफे सिस्टम

12 मई 2015
0
4
1

गाँव कथा दिनांक 14 अप्रैल 2015 चंदनवा के यहाँ तिलक था ! राम आसरे यु तो न्योता खाने के बड़े शौक़ीन थे ,किन्तु उस दिन ज्यो न्योते में गए तो तुरंत ही वापस आ गए ! कल्लन ने भी सोचा न्योते में जाने के लिए राम आसरे को लेता चलु ,अकेले जाने से थोडा संकोच तो होता ही है खाने में ! दो जन रहेंगे तो थोड़ी बेफिक्

4

फिल्म एक नजर में ( क्लासिक्स ) : गाईड ( १९६५ )

14 मई 2015
0
2
0

निर्देशन: विजय आनंद निर्माता: देव आनंद कलाकार: देव आनंद, वहीदा रहमान, किशोर साहू,लीला चिटनिस लेखक: आर. के. नारायण (उपन्यास) संगीत: एस.डी.बर्मन

5

धर्म के सेल्समैन !

19 मई 2015
0
5
2

आज शाम को ऑफिस से आकर ज्यो ही आराम करने बैठा के दरवाजे पर दस्तक हुयी ! मैंने दरवाजा खोला तो सामने दो युवक खड़े थे ,दोनों के हाथ में हैंडबैग थे , मैंने पहले उन्हें देखा उन्होंने मुस्कुराहट दिखाई और न जाने क्यों मुझे ऐसा लगा के ये या तो सेल्समैन है या किसी धर्म के प्रचारक ! मन तो किया के दरवाजा तुरंत ब

6

फिल्म एक नजर में : बॉम्बे वेलवेट

20 मई 2015
0
3
1

अग्ली ‘ के बाद अनुराग कश्यप अपनी नई फिल्म लेकर आये है , जो उनकी अब तक बनाई गई सभी फिल्मो से अलग है ! वैसे ‘बॉम्बे वेलवेट’ अनुराग का सपना रही है ,जिस पर उन्होंने वर्षो मेहनत की है , फिल्म देखते वक्त आपको वह मेहनत साफ़ नजर आती है ,उनकी लगन फिल्म में साफ़ झलकती है ! किन्तु सिर्फ फिल्मांकन तक ही ,कह

7

पुस्तक समिक्षा : कोहबर की शर्त

28 मई 2015
1
2
1

बड़े दिनों से इस पुस्तक की तलाश थी , बड़ी मुश्किल से मिली और मैंने एकाध पृष्ठ पलट कर देखे , पुस्तक कोई नया संस्करण नहीं था ! पुराना ही संस्करण था ,जिसमे से पुरानी पुस्तक की महक आ रही थी ,जो भीनी भीनी सी थी ! और इसी महक के कारण पुस्तक पढने का वातावरण भी तैयार हो गया , गंवई भाषा को देखकर पुस्तक से अप

8

पुस्तक समीक्षा : बनारस टाकिज

10 जुलाई 2015
0
4
2

बनारस टॉकीज : इस पुस्तक का मैंने हाल ही में बड़ा नाम सुना था ,काफी चर्चा हो रही थी शोशल जगत की आभासी दुनिया में ! हम तो ठहरे पुस्तक प्रेमी ,तो भला हम इससे कैसे अछूते रहते भला ! वैसे भी आजकल हिंदी लेखन भी अपनी पुख्ता पहचान बना रही है ,जो कुछ समय पहले तक लुप्तप्राय समझी जाती थी ,किन्तु नए लेखको ने इस

9

फिल्म एक नजर में : बाहुबली दी बिगनिंग

12 जुलाई 2015
0
7
3

एस राजामौली इ ऐसे निर्माता निर्देशक है जिनकी फिल्मो की प्रतीक्षा केवल टोलीवूड ही नहीं अपितु हिंदी दर्शक भी बेसब्री से करता है , उनकी पिछली फिल्मो के बारे में कुछ कहने की जरुरत नहीं है ! बाहुबली जैसी वरिश्द कथानक देने के पश्चात उनका नाम इसी फिल्म से जाना जायेगा यह कहना कोई आतिश्योक्ति नहीं ह

10

फिल्म एक नजर में : बजरंगी भाईजान

19 जुलाई 2015
0
5
1

कबीर खान ने बतौर निर्देशक अपनी फिल्म ‘काबुल एक्सप्रेस ‘ से काफी प्रशंषा बटोरी थी , कुछ समय बाद वे सलमान के साथ ब्लॉकबस्टर फिल्म ‘ एक था टाईगर ‘ में नजर आये जो उनकी पिछली फिल्म से एकदम अलग थी और मसालेदार एक्शन से भरी थी ! सलमान भी लगातार एक्शन भूमिकाओं में दिखने लगे जिसमे वे काफी जमते

11

कारवाँ : ग्राफिक नावेल समीक्षा

2 अगस्त 2015
1
3
1

कारवाँ : ग्राफिक नावेल समीक्षा कारवां : एक खुनी यात्रा , कुछ अरसे पहले कॉमिक्स जगत काफी सदमे झेल चूका था , बड़ी बड़ी दिग्गज कॉमिक्स कम्पनीज बंद हो रही थी ! वजह कुछ भी रही हो ,पाठको की बदलती रूचि ,मनोरंजन के बढ़ते साधन , पढने में रूचि कम होना , एवं बदलते समय के साथ कॉमिक्स पाठको के विचार बदलना .

12

मांझी दी माउन्टन मैन : ‘शानदार ,जबरजस्त ,जिंदाबाद ‘

22 अगस्त 2015
0
6
2

बिहार के अतिपिछडे इलाके में जन्मे ‘दशरथ मांझी ‘ की सत्य कथा पर आधारित इस फिल्म के निर्माण होने की घोषणा होने पर उत्सुकता जगी थी के अब बॉलीवूड में कुछ तो सार्थक देखने को मिलेगा .और फिल्म देखने के पश्चात यह बात सत्य प्रतीत हुयी ,वैसे भी बॉलीवूड की हवा आजकल कुछ बदली हुयी है ! काफी रचनात्मक प्रयास आ रहे

13

टैक्सीवाले भाईजान

21 सितम्बर 2015
0
6
2

कल कही से वापसी में ऑटो मिल नहीं रही थी ! बारिश की वजह से ट्रैफिक बहुत थी .रिक्शा मिल नहीं रही थी ,एक काली पिली वैगन मिली जिसमे बैठ गया .ड्राइवर चालु भाषा का इस्तेमाल कर रहा था ,,ट्रैफिक लगेली है ,मूड की माँ बहन हो रेली है !!!!!! वगैरह वगैरह .खैर बैठा और गाडी चल पड़ी , रस्ते में ट्रैफिक की वजह से काफ

14

फिल्म एक नजर में : वजीर

13 जनवरी 2016
0
1
0

वजीर के ट्रेलर ने ही काफी उत्सुकता जगा दी थी ,जिसकी मुख्य वजह इसकी स्टारकास्ट भी थी .अमिताभ बच्चन ,फरहान अख्तर ,जॉन अब्राहम ,नील नितिन मुकेश , आदि ,ऊपर से विधु विनोद चोपड़ा का प्रोडक्शन एवम बिजॉय  नाम्बियार का निर्देशन जिनके निर्देशन में हमेशा कुछ हटके मिला है बोलीवूड को ,किन्तु सफलता हमेशा औसत ही र

15

नटसम्राट

13 जनवरी 2016
0
1
0

नटसम्राट ‘’एक त्रासदीपूर्ण एवम मर्मान्तक कथानक का नाट्य रुपंतरण एवंम फिल्म संस्करण .‘’महाराष्ट्र ‘’ नाम लेते ही आँखों के सामने मुगलों को नाको चने चबवा देनेवाले शिवाजी का चेहरा सामने आता है , यहाँ का इतिहास गौरवशाली है ! यहाँ की संस्कृति में कला को जो सम्मान है वह शायद ही कही और देखने को मिले , यहाँ

16

फिल्म एक नजर में : एयरलीफ्ट

25 जनवरी 2016
0
3
0

फिल्म एक नजर में : एयरलीफ्टपिच्छले कुछ समय से अक्षय काफी बढ़िया फिल्मो में नजर आ रहे है जो लीक से हटकर और उम्दा होती है ,कुछ अपवादों को यदि छोड़ दिया जाए तो .यदि बॉलीवुड के पिछले कुछ सालो को खंगाला जाये तो बेशक अक्षय ऐसे सुपरस्टार के तौर पपर उभरते है जो बिना किसी शोरशराबे के अपनी जगह बना रहे है जिससे

---

किताब पढ़िए

लेख पढ़िए