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ना लीजिए सब्र का अब मेरे इम्तिहान !

26 अप्रैल 2016

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ना लीजिए सब्र का अब मेरे इम्तिहान ! 

दुआ बददुआ में जल उठेगा आपका प्राण, 

चला देँगे आपपे जो शब्दों का तेज बाण, 

फिर एक ही शख्स होगा ढ़ेर या महान, 

याद रखेगा ये तकरार अब तो सारा जहान, 

किसी ना किसी एक का तो तय है अब अवसान, 

ना लीजिए सब्र का अब मेरे इम्तिहान !  


कितने आये और चले गए देख मेरी म्यान,

आँखें निकल गईं कट गए दोनों हाथ और कान,

धूल धूसरित हो गई दुश्मन की आन बान शान, 

याद रखेगा ये तकरार अब तो सारा जहान, 

किसी ना किसी एक का तो तय है अब अवसान, 

ना लीजिए सब्र का अब मेरे इम्तिहान !  

कॉपीराइट @ चंद्रेश विमला त्रिपाठी 


ओम प्रकाश शर्मा

ओम प्रकाश शर्मा

जोशपूर्ण सुन्दर भावाभिव्यक्ति !

26 अप्रैल 2016

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रचनाएँ
poetry
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मनोभावों को समर्पित मौलिक कविताओं-कहानियों का मुक्त संसार...
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क्रासिंग की परिचित बाला !

22 सितम्बर 2015
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नीर भरे नयनों का प्याला, रुधी ज़बान, पैरों में छाला,अपलक देख रही क्रासिंग पे,कोई सेठ, कोई ठेठ, कोई बनता हुआ दिवाला,क्या आज मिल सकेगा मुझे पेट भर निवाला?एक आम आदमी का आम सच, सोच रही,सुस्त सी, कुछ पस्त सी, सिसकी लिए सकुचा रही,इक दबी आवाज़ में, अपनी दुआ का मोल मांग रही....अनायास पड़ी जो दृष्टि मेरी, उस भा

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अब क्या मार ही डालोगे ?

8 अक्टूबर 2015
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जन्म दिया, मुंह फेर लिया,फिर, इस संसार ने घेर लिया,कभी पढाई, कभी दवाई,कभी मिलाई, कभी जुदाई,कुछ पाया चाहे कभी नहीं,पर चुक गई, पाई-पाई,रोज़ झाँकता दरवाज़े पर,क्या आज सफलता आई ?घर-समाज की बेड़ियाँ,बस बंधन, जकड़न लाईं,बहुत हुआ उपकार आपका,बस मुंह, मुंह की खाई,क्या इस हाल मेंभी, मेरे लिये,इम्तिहान नया लाओगे ?

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... मौलिक सौंदर्यपरक पद्य रचना ...

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सुन सज-धज आ गई बसंत-बहार !!! (बसंत-पंचमी पर विशेष)

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मां शारदे ! रच दे वो तान ! (बसंत-पंचमी पर विशेष)

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ना लीजिए सब्र का अब मेरे इम्तिहान !

26 अप्रैल 2016
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ना लीजिए सब्र का अब मेरे इम्तिहान ! दुआ बददुआ में जल उठेगा आपका प्राण, चला देँगे आपपे जो शब्दों का तेज बाण, फिर एक ही शख्स होगा ढ़ेर या महान, याद रखेगा ये तकरार अब तो सारा जहान, किसी ना किसी एक का तो तय है अब अवसान, ना लीजिए सब्र का अब मेरे इम्तिहान !  कितने आये और चले गए देख मेरी म्यान,आँखें निकल गई

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अनुपमा का प्रेम / शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय

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ग्यारह वर्ष की आयु से ही अनुपमा उपन्यास पढ़-पढ़कर मष्तिष्क को एकदम बिगाड़ बैठी थी। वह समझती थी, मनुष्य के हृदय में जितना प्रेम, जितनी माधुरी, जितनी शोभा, जितना सौंदर्य, जितनी तृष्णा है, सब छान-बीनकर, साफ कर उसने अपने मष्तिष्क के भीतर जमा कर रखी है। मनुष्य- स्वभाव, मनुष्य-चरित्र, उसका नख दर्पण हो गया

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