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क्रासिंग की परिचित बाला !

22 सितम्बर 2015

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featured imageनीर भरे नयनों का प्याला, रुधी ज़बान, पैरों में छाला, अपलक देख रही क्रासिंग पे, कोई सेठ, कोई ठेठ, कोई बनता हुआ दिवाला, क्या आज मिल सकेगा मुझे पेट भर निवाला? एक आम आदमी का आम सच, सोच रही, सुस्त सी, कुछ पस्त सी, सिसकी लिए सकुचा रही, इक दबी आवाज़ में, अपनी दुआ का मोल मांग रही.... अनायास पड़ी जो दृष्टि मेरी, उस भाव-शून्य बाला पर, पशोपेश में फूट पड़ा, मन में इक जलता लावा, देकर उसे रुपैय्या, कहीं मैं, दे तो नहीं रहा, भिक्षावृत्ति को बढ़ावा? आखिर हैं हम पढ़े-लिखे, सम्भ्रान्त, सामाजिक, संस्कारी, हर पाप-बुराई को दूर करने की, हम पर है नैतिक जिम्मेवारी..... पर हार गई यह क्षणिक सोच, जीती मन की समझदारी, सहसा बढ़ गया मेरा कर, लिए पांच रुपये की रेज़गारी....... कुछ आत्मिक शांति से मुदित हुई, आपाधापी से मेरी काया, मानों, सजल कातर दृग से मिल गया हो, परमात्मा की अदृश्य छाया..... हजारों बातें घूम रहीं, कुछ अपूर्ण कहानी बुन रहीं, सहसा समक्ष आँखों के, अंधियारा गहराया, दुर्घटना का ग्रास बना, लहू-स्रोत से सना, किंकर्तव्यविमूढ सा पड़ा रहा, देख परमात्मा की अबूझ माया.... अवचेतन खोया हुआ, जो मैंने अपना पाया, तीन महीनों के लिए, स्वयं चिकित्सालय में समाया.... ठीक होने पर, जीवन-भर के लिए, अपना इक पैर गंवाया, जान बची, जो हुआ-ठीक हुआ, इन बातों ने भरमाया..... इक नया जीवन पुनः जीने को, मन को ढाढस बंधाया..... फिर वही दुनिया, वही लोग, वही आपाधापी, खुश रहने की जद्दोजहद में, बन गया औरों की कॉपी... उधेड़बुन में ज्यों गुज़रा आज, उसी मुए क्रासिंग से, आँखें फटीं, मन छितर गया, मानों, किसी ने मार दिया हो, बॉक्सिंग से..... चुस्त सी, कुछ लयबद्ध, आवाज़ लिए चिल्ला रही, जोर-जबरदस्ती से दबंग की भांति, सबसे पांच रुपैया मांग रही, एक रुपैया मिला मिला अगर जो, कुढ़-कुढ़ कर संभाल रही.......... चबर-चबर चबा रही, ज़बान में मसाला, फटे गले से गा रही, पहन गालियों की माला, अपलक देख रही क्रासिंग पे, कोई सेठ, कोई ठेठ, कोई बनता हुआ दिवाला, उसी ताम-झाम से बढ़ी, मेरी ओर, रुपैये का बोल निकाला, इस बार मैंने, मन के सैलाब को संभाला, बैसाखी लिए, झिड़क, कुछ बिगड़ कर, ज्यों आगे कदम बढ़ाया, मान-अपमान का घूंट पिला, कह कंगाल, लंगड़ा, साला, भाग पड़ी, लिए डेग बड़ी, वह, क्रासिंग की परिचित बाला !!!
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रचनाएँ
poetry
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मनोभावों को समर्पित मौलिक कविताओं-कहानियों का मुक्त संसार...
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क्रासिंग की परिचित बाला !

22 सितम्बर 2015
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नीर भरे नयनों का प्याला, रुधी ज़बान, पैरों में छाला,अपलक देख रही क्रासिंग पे,कोई सेठ, कोई ठेठ, कोई बनता हुआ दिवाला,क्या आज मिल सकेगा मुझे पेट भर निवाला?एक आम आदमी का आम सच, सोच रही,सुस्त सी, कुछ पस्त सी, सिसकी लिए सकुचा रही,इक दबी आवाज़ में, अपनी दुआ का मोल मांग रही....अनायास पड़ी जो दृष्टि मेरी, उस भा

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अब क्या मार ही डालोगे ?

8 अक्टूबर 2015
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जन्म दिया, मुंह फेर लिया,फिर, इस संसार ने घेर लिया,कभी पढाई, कभी दवाई,कभी मिलाई, कभी जुदाई,कुछ पाया चाहे कभी नहीं,पर चुक गई, पाई-पाई,रोज़ झाँकता दरवाज़े पर,क्या आज सफलता आई ?घर-समाज की बेड़ियाँ,बस बंधन, जकड़न लाईं,बहुत हुआ उपकार आपका,बस मुंह, मुंह की खाई,क्या इस हाल मेंभी, मेरे लिये,इम्तिहान नया लाओगे ?

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... मौलिक सौंदर्यपरक पद्य रचना ...

19 नवम्बर 2015
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लाल क्षितिज के उर आँगन मेंखेल रहा था थोड़ा दिनकर,मन-मंदिर में प्रेम-किरणतूने चमकाया दीपक बनकर ।नेत्र त्रिसित पुनि पुलकउठे दर्शन रमणी का करने को,भांति उसी दिनकर भी दौड़ानिशि आंचल में छिपने को ।आशा लिए निशा से बोला कुछतो मुझपे रहम करो,अपने तारा वाले गहनों कोअंग-अंग में खूब भरो ।बाजा बजा बंद आंगन मेंनीरव

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सुन सज-धज आ गई बसंत-बहार !!! (बसंत-पंचमी पर विशेष)

12 फरवरी 2016
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प्रकृति की पीत प्रीत पुकार,सुन सज-धज आ गई बसंत-बहार| सौंधी-सौंधी सुगन्धित बयार,लेके खुशियों की बहार,सुन सज-धज आ गई बसंत-बहार| आनंदित है श्रृंगार रस छेड़ मन के झंकृततार,अनंत आकाश वासंती वसुंधरा का मनभावनमुदित मनुहार,सुन सज-धज आ गई बसंत-बहार| मंद-मंद मुस्काते माघ-फागुन का नौलखाहार,निम्मी-निम्मी ठंड में

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मां शारदे ! रच दे वो तान ! (बसंत-पंचमी पर विशेष)

12 फरवरी 2016
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मां शारदे ! रच दे वो तान !शाश्वत संगीत का सदा रहे मान|      गीत गाते जीये जायें हम,जीवन में हो स्वाभिमान|मां शारदे ! रच दे वो तान !शाश्वत संगीत का सदा रहे मान| वीणा तेरे कर में,हम हैं तेरी शरण में,भक्ति भरी है ज्ञान की,मनोकामना मेरी तेरे वर में|गीत गाते जीये जायें हम,हर क्षण रहे तू उर में विराजमान|म

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ना लीजिए सब्र का अब मेरे इम्तिहान !

26 अप्रैल 2016
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ना लीजिए सब्र का अब मेरे इम्तिहान ! दुआ बददुआ में जल उठेगा आपका प्राण, चला देँगे आपपे जो शब्दों का तेज बाण, फिर एक ही शख्स होगा ढ़ेर या महान, याद रखेगा ये तकरार अब तो सारा जहान, किसी ना किसी एक का तो तय है अब अवसान, ना लीजिए सब्र का अब मेरे इम्तिहान !  कितने आये और चले गए देख मेरी म्यान,आँखें निकल गई

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अनुपमा का प्रेम / शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय

28 अप्रैल 2016
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ग्यारह वर्ष की आयु से ही अनुपमा उपन्यास पढ़-पढ़कर मष्तिष्क को एकदम बिगाड़ बैठी थी। वह समझती थी, मनुष्य के हृदय में जितना प्रेम, जितनी माधुरी, जितनी शोभा, जितना सौंदर्य, जितनी तृष्णा है, सब छान-बीनकर, साफ कर उसने अपने मष्तिष्क के भीतर जमा कर रखी है। मनुष्य- स्वभाव, मनुष्य-चरित्र, उसका नख दर्पण हो गया

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