shabd-logo
Shabd Book - Shabd.in

सुक्के का ब्याह

Satish Bhardwaj

0 अध्याय
0 व्यक्ति ने लाइब्रेरी में जोड़ा
0 पाठक
निःशुल्क

“सुक्का” अपने नाम से ही एक फजुलियत बिखेरता किरदार| सुक्का होने को तो कभी के प्रसिद्द साहूकार रतन शर्मा का पोत्र था| रतन शर्मा का ब्याज का बड़ा काम था अंग्रेजो के ज़माने से| उनके दो पुत्र थे बड़े चन्द्र दत्त और छोटे सोमदत्त| चन्द्र दत्त पढ़-लिख कर अध्यापक बने और अपने दोनों पुत्रो को भी पढ़ा कर अध्यापक बना दिया और अपनी दोनों पुत्रियों का सही घर देखकर विवाह कर दिया| परन्तु उन्हें अपने पिता की नकद संपत्ति ज्यादा नहीं मिली वो ज्यादा मिली सोमदत्त जी को| सोम दत्त जी ने उस संपत्ति का उपयोग नहीं किया बल्कि दोहन किया और अपने बच्चो के जवान होने से पहले ही संपत्ति निपट ली बस रह गया तो रतन दत्त जी का नाम| इस समय में उनका ब्राह्मण होना उनके काम आया और उन्होंने ब्राह्मण कर्म काण्ड करके आजीविका चलानी शुरू कर दी| सोम दत्त के दो पुत्र और तीन पुत्रियाँ थी| उनकी सबसे छोटी संतान थी सुक्का| सुक्के के जन्म की कथा भी उसके नाम की तरह अनूठी है| चन्द्र दत्त और सोमदत्त जी में एक वैचारिक टकराव रहता था| चन्द्र दत्त के दो पुत्र थे और तो सोमदत्त के एक ही पुत्र| सोमदत्त की पत्नी बेला को ये बात सालती थी| तो शादी के बहुत समय बाद उन्हें एक पुत्र की इच्छा और हुई वो भी तब जब उनकी सबसे छोटी संतान उनकी पुत्री 9 वर्ष की हो चुकी थी| उन्होंने सोमदत्त के पौरुष को ललकारने का निर्णय लिया| अब सोमदत्त पत्नी के निकट कम ही आते थे लेकिन उस रात बेला ने फैसला कर लिए था| छेड़-छाड़ से बेला को जब सफलता नहीं मिली तो वो फट पड़ी| बेला : क्या है अभी इतने भी ना बुढाए गए हो जो दूर भागते फिरते हो| सोमदत्त : क्या बुद्धि मलिन हो गयी है| औलादे बड़ी हो गयीं हैं और तुझे जवानी चढ़ रही है, दूर हट कुलटा| सोमदत्त ने बेला को दूर धकेलते हुए कहा| बेला धक्के से रुआंसी हो गयी थी बेला : 14 साल की थी जब मुझे धकेल दिया था तुम्हारे साथ| जब तो चैन ना थी एक बरस में गोना कर लाये और पेट का ढोल बना दिया| ये बात बेला ने जरा ऊँचे वोल्यूम में कही थी| सोमदत्त : चुपकर दुष्टनी...सोने दे मुझे, बुडैती में आग लग रही है, तेरी| बेला : आये हाय कौन है बूढी... 13 साल की ब्याह कर आ गयी थी (अब बेला अपनी उम्र एक वर्ष और कम कर दी थी)| कितने बरस हुए ब्याह को, बस 15 बरष| 30 की भी ना हुई मै तो| बेला ने देखा सोमदत्त सोने की प्रक्रिया को प्रारंभ कर चुकें हैं| तो उन्होंने और ज्यादा शक्ति झोकनी शुरू की| मै क्यूँ बूढी भला जब बारात आई थी जभी बोल्ला था गाँव वालो ने कि ब्याहले की उम्र तो ज्यादा ई निकलती है| 30 कु कुदरे थे जभी.... अब मुझे बुड्ढी बताओ| सोमदत्त को ये आरोप असहनीय था| सोमदत्त : क्या भोंकरी तू, 30 का था मै, 16 का था| बेला : तो अब क्यूँ मरे पड़े हो? कोई दूसरी कर रखी बाहर, शक तो मुझे था| ये बेला का लगातार दूसरा हमला था सोमदत्त अब बैकफुट पर आ गए थे वो उठकर बैठ गए और प्यार से बोले “तेरी बुद्धि फिरगी क्या? क्या खाया था आज जो तेरै आग लगरी? बेला : मेरै ना आग लगरी, एक ही लोंडा है| वहाँ चरतो के दो लट्ठ हैं (चरतो, चन्द्र दत्त की पत्नी और बेला की जेठानी का नाम था) अब सोमदत्त के कुछ माजरा समझ आया था| वैसे तो ये बात सोमदत्त को भी परेशान करती ही थी| उसके दिल में छुपी हुई इच्छा थी कि एक पुत्र और हो| और इस तरह बेला के त्रिया पाश के सामने सोमदत्त ने समर्पण कर ही दिया और सोमदत्त रण में कूद गए| ....... सोमदत्त ने पुत्र प्राप्ति के लिए जड़ी-बूटि, तंत्र-मंत्र और टोने-टोटके जो भी हो संभव हो सकता था कुछ नहीं छोड़ा| क्योंकि वो इस प्रयास में पुत्र ही चाहते थे और दूसरा प्रयासों में सफलता भी नहीं मिलती दिख रही थी| उनके इन प्रयासों में इतना समय लगा कि सुक्के के इस धरा पर अवतरण के समय सोमदत्त की छोटी पुत्री 13 वर्ष की हो चुकी थी| बहुत कठिन यात्रा रही थी सोमदत्त की| अब इतने लम्बे अंतराल के बाद एक और औलाद के लिए उन्हें काफी चुहल भी सुननी पड रही थी| परन्तु सोमदत्त संतुष्ट थे और भगवान् से प्रार्थना करते थे कि पुत्र ही हो और उनके पुत्रो की संख्या उनके बड़े भाई चन्द्रदत्त के बराबर हो जाए| लोग कहते थे कि वो गुप्त अनुष्ठान भी कर रहें हैं इसके लिए| आखिर दाई ने खुश खबरी दी कि उनके पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई है| लेकिन ये ख़ुशी फीकी पड गयी जब उन्होंने पुत्र के दर्शन किये| वो कुछ ज्यादा ही कमजोर और काले वर्ण का था| उसे देखकर दाई के मुहँ से निकला “सुक्का” और फिर इस नाम से ही प्रसिद्द हो गया सुक्का| हालाँकि शुरू में सुक्के की सेहत के हालात कुछ ऐसे थे कि उसके जीवित रह पाने की भी आशा कम ही थी| लेकिन इश्वर की कृपा बनी रही और सुक्के बड़ा होता गया| सुक्के के अवतरण से सोमदत्त के पुत्रो की संख्या तो दो हो गयी थी परन्तु सोमदत्त को सुक्का भाया कभी नहीं| लेकिन बेला को अपने बुढापे की औलाद सुक्का बहुत प्यारा था| सुक्का बड़ा हआ लेकिन अपने बड़े भाई के समान पढ़ाई से उसका भी रिश्ता नहीं जुड़ पाया| जहाँ सुक्के का बड़ा भाई ज्ञानचंद अपने पिता के साथ कर्मकांड सीख रहा था तो सुक्के इससे भी दूर ही रहा क्योंकि सोमदत्त उसे अपने साथ कहीं ले ही नहीं जाते थे| सोमदत्त के बारे में अफवाह फैली थी की उनके पुत्र रत्न उनके गुप्त अनुष्ठान से हुआ है तो सोमदत्त को आशा थी एक नया धंदा भी चल जायेगा| लोग पुत्र की प्राप्ति के लिए उनकी देहलीज पर मत्था रगड़ेंगे और कमाई होगी| पर सुक्के के एकदम लिकड़े से बदन, काले वर्ण, मोटे काले होठ, माथे पर अपेक्षाकृत छोटी आँख और ऊपर के दो दांत जो मुहँ बाहर निकल कर इस दुनिया का दर्शन करते रहते थे| उसके रूप यौवन के ऐसे चर्चे थे कि लोग ऐसी औलाद के बजाये बे औलाद ही रहना पसंद करें| सोमदत्त को सुक्के के इन आगे को दो दांत से खासी चिढ होती थी| और इनके कारण सुक्के के होंठ भी खुले ही रहते थे| सोमदत्त का मानना था कि जिसके होंठ खुले रहतें हैं वो कम दिमाग होता है| सुक्के अपनी हरकतों से इस बात को प्रमाणित भी करता रहता था| सुक्के को अपनी भैंसे ही पसंद थी| इस भैंस प्रेम में 14 वर्ष की उम्र में एक हादसा हुआ| एक दिन भैंस ने ऐसा सींग मारा कि सुक्के का होठ फट गया और सामने के बाहर निकले दो में से डेड़ दांत भी अपनी दन्त-परी लोक की यात्रा पर चले गए| अब सुक्के का रूप और भी निखर गया था| होठ चोट के कारण एक तरफ से हमेशा के लिए मोटा हो गया था और मुहँ खोलने पर वो टूटे डेड़ दांत भी दिखते थे, वैसे अब भी सुक्के का मुहँ खुला ही रहता था| अब सोमदत्त को कभी-कभी ख्याल आता था कि काश उस दिन अपनी पत्नी के आवाहन पर थोडा सा सब्र कर लिए होता| तो कभी कभी वो जड़ी बूटियों को और कभी भगवान् को कोस लेते थे| ........ सुक्के की हरकतें भी किस्से बना देती थी, जैसे एक बार मोहल्ले के लडको ने सुक्के से कहा कि डीजल माँ होती है घासलेट की| तो अगर रात में थोडा सा डीजल पिया जाए तो तीन दिन तक पेशाब में घासलेट निकलता है| सुक्के जी को इसमें छुपी ख़ोज समझ आ गयी और एक रात सुक्के जी ने थोडा सा डीजल का वन किया| अगली सुबह उठते ही सुक्के ने लघु शंका का निवारण अपने पिता की लालटेन में किया| रात में सोमदत्त अपने कमरे, जो एक बाहरी बैठक नुमा कमरा था उसमें आये और लालटेन जलाने का प्रयास किया| लेकिन लालटेन को आज सुक्के की खोज के परिणाम से निकले दिव्य इंधन की प्राप्ति हुई थी, तो लालटेन ने भी विलक्षणता दिखाई| सोमदत्त प्रयास में लगे हुए थे तभी वो लड़के वहाँ आ गए जिन्होंने सुक्के को इस दिव्य विद्या का ज्ञान करवाया था| उनमें से एक लड़के ने बड़े ही सामान्य अंदाज़ में पूछा “क्या हुआ पंडज्जी? जल ना री”| सोमदत्त : हाँ.. पता नि? भभक री कुछ| लड़का : हटो जरा मै भी देक्खुं, क्या होरा? सोमदत्त ने लालटेन उस लड़के के सुपुर्द कर दी| लड़के कुछ देर उसे जलाने का प्रक्रम किया फिर उसको सूंघते हुए बोला “पंडज्जी यो तो मिट्टी का तेल ना लगरा इसमै”| सोमदत्त : मिट्टी तेल ना तो और क्या? कल ई तो भरी ही| समूह में से दूसरा लड़का आगे आया और अपनी घ्राण शक्ति का सदुपयोग करते हुए अन्वेषण करने लगा और परिणाम घोषित करते हुए बोला “अजी पंडज्जी यो तो मूत रक्खा किसी नै, यो कहाँ बल जागी”| इतना सुनते ही सोमदत्त ने भी अपनी घ्राण क्षमता को जगाया और सूंघकर देखा| सूंघने के बाद सोमदत्त ने तुरंत उन लडको से कहा “चलो भगो यहाँ सै, सूतरे मज़ाक फोडनै आजां| काम धंदा तो कुछ है ई ना”| लड़के वहाँ से निकले और कुछ दूर जाकर उनके जोर से हसने की आवाज़ सोमदत्त तक पहुंची| सोमदत्त समझ गए थे की लड़के सही कह रहें हैं, परन्तु उन लडको के सामने स्वीकार नहीं करना चाहते थे| वैसे वो पूरा मामला समझ चुके थे| बाद में वो ही हुआ जो सामन्यतया होता था| सुक्के की इस वैज्ञानिक खोज का भूत सोमदत्त ने अपनी लठिया से उसकी सुताई करके उतार दिया| ...... सुक्के ने ऐसी पता नहीं कितनी खोजें की| ज्यादातर में मोहल्ले के लडको ने ही उसे प्रेरणा दी थीं| उन लडको को भी कुछ दिन के लिए एक किस्सा मिल जाता था| इस तरह सुक्के ने अपनी जीवन यात्रा के 26 वसंत पार कर लिए लेकिन उसका रूप योवन उसके नाम के अनुरूप ही रहा| सुक्के के बड़े भाई ज्ञानचंद का बेटा भी 14 साल का हो गया था| एक दिन सोमदत्त की बैठक में कुछ लोग बैठे थे| तो किसी ने यूँ ही सोमदत्त से पुछ लिया कि क्या अपने पोते का रिश्ता लेंगे? सोमदत्त ने मना कर दिया| अन्दर से ये बात बेला के कान में भी पड़ी तो वो घूँघट किये आई और रिश्ते का प्रस्ताव रखने वाले से बोली “अभी तो इसका चाच्चा बी बैट्ठा, यो कौन सी नयी रित जोडरे तम... पहले तो सुक्के का ब्याह होगा|” इस बात पर उन बुजुर्ग के मुहँ से एकदम से निकला “अरी मिशराणी क्या कहरी? सुक्के के चक्कर मै तो यो भी रह जागा... उस्कै कौन मत्थे चावल धररा?” इतना सुनते ही बेला जी फट पड़ी “दिके सुनलो मेरी बात.... यहाँ बैठकै फालतू मुहँ मारने की तो जरूत ना| आजा पता नि ठाल्ली टेम फोडन कु.. थारे तो दारुबाज़ भी ब्याहे जावैंगे अर रतन के पोत्ते रंडवे रहंगे| याद रखियो मेरी बात... ब्याह तो होकै रहवैगा पर तुम्हारा कोइसे का मुहँ ना फुन्कू ब्याह मै” सोमदत्त और बाकी लोगो ने मामले की नजाकत को देखते हुए चुप लगाना ही बेहतर समझा और सोमदत्त की बैठक खाली हो गयी| मोहल्ले के लडको ने ये बात सुनी तो उन्हें एक और किस्से की सम्भावना इसमें दिख गयी| उन लडको ने एक ताजा किस्से के लिए सुक्के को सिनेमा में फिल्म दिखाई| एक ताजातरीन मजेदार किस्से के लिए इतना तो खर्च बनता भी था| फिल्म में हिरोइन के लटके झटको का असर कुछ ऐसा हुआ कि अब जो कभी कभी होता था तो वो रोज होने लगा| सुक्का अपनी खाट पर अकेला ही धमाचोकड़ी करके अपनी कामाग्नि को शांत कर रहा था| परन्तु एक स्त्री देह सुख की आग और भी ज्यादा भड़क रही थी| एक दिन सुक्का अपने उन मित्रों के साथ बैठा था तभी उनमें से एक बोला “बै सुक्के भाई दावत आरी तेरे घर मै तो” सुक्के ने अनभिज्ञता जताती दृष्टी उस पर डाली तभी दूसरा लड़का सुक्के की दृष्टि का मंतव्य समझते हुए बोला “भाई तेरे भातिज्जे के रिश्ते की बात चलरी ही” तुरंत दुसरे लड़के ने अपने हाथ मसलते हुए बड़े ही मादक अंदाज़ में जोड़ा “भाई मज़े आ जांगे अब तो उसके... रोज सनीमा उसकी खाट पै ई चलैगा, उसका तो” तुरंत एक लड़के ने कहा “बै सुक्के तू तो हाथ हिलाता रहिये भाई या फिर खाट के सांके ढील्ले करता रहिये|” तुरंत एक लड़का बोल पड़ा “ना भाई सुक्के की माँ नै तो भोत बढ़िया तारी उसकी जो रिश्ते की बात कररा हा| साफ़ कही बाई पहलै सुक्के का ब्याह होगा” तभी एक लड़का बोला “पर भाई होवैगा कब, जब करंट ख़तम हो जागा सुक्के का” फिर वो ही लड़का मादक अंदाज़ में सुक्के के कंधे पर हाथ रखकर बोला “वैसे कोई बात ना भाई सुक्के मोहाल्ले वाले तो आइ जांगे मोहल्लेदारी निभान कू| भले तेरे बसकी कुछ ना रहियो, नाम तो तेरा ही बजैगा” सुक्का जो अब तक गर्दन घुमा-घुमा कर उनकी बातें सुन रहा था अब उसके चेहरे ने रंग बदल लिया था| वो लड़के समझ चुके थे कि काम हो गया अब बस सुक्के के घर पर नज़र रखनी है| उस रात सुक्के की कुश्ती खाट से कुछ ज्यादा ही तगड़ी हुई| इतनी तगड़ी कि सोमदत्त को भी उसकी आहट जमकर सुनाई दी| वैसे सोमदत्त ने तो पहले भी ये आहटें सुनी थी लेकिन जानते थे कि कुछ तो करेगा ही| भले रूप ना हो जवानी तो चढ़ ही रही है| सुक्के को ब्याह होने की चिंता हो गयी थी, वो भी करंट ख़त्म होने से पहले| सुक्के ने एक दिन अपनी माँ से कह ही दिया “माँ मेरा ब्याह ना होवै” बेला ने अचकचा कर सुक्के को देखा और लानत देते हुए बोली “पढ़ा तू ना, कहूँ थी बापू के गैल रहले, पूजा पाठ सिख ले, वो भी ना सिक्खा.....अब तुझै बन्नो कहाँ से लाऊ?” बेला ने फिर धीरे से बुदबुदा कर कहा “कौन अपनी धी कु झेरे में धक्का देगा?” सुक्के की ये आखरी उम्मीद थी, जो टूट गयी और सुक्के को लगा कि उसका वैवाहिक जीवन बस उसकी खाट और उसके हाथ के साथ ही चलने वाला है| ...... मोहल्ले के लडको को सुक्के ने ये बात बता दी और उन लडको को भी एक नए किस्से के लिए नयी युक्ति मिल ही गयी| एक दिन सुक्के के साथ जब वो लड़के बैठे हुए थे तो एक लड़के ने कहना शुरू किया “बै तुम्हे उसका पता वो जो था नावला में लंगड़?.... भाई उसका ब्याह हो गिया” तभी एक लड़के ने भरपूर आश्चर्य जताते हुए कहा “कैसै भाई? कौन बाँध दी? वो लंगड़ा तो चलै भी भाई बलखा कै है” उस लड़के ने राज़ खोलते हुए कहा “भाई ब्याह तो ना हो रा हा| पर एक दिन उसने एक लुगाई पकड़ ली.. भाई भंजाई तो काम्बल हुई| पर घर वालो कु दिक्गी के ब्याह ना करा तो होर कहीं बी सीन्ग मारैगा” सारे लड़के मस्ती में हसें और तभी एक लड़के ने एक दूसरा किस्सा सुनाया “भाई मेरे माम्मा के यहाँ बी एक हा, उसका बी ब्याह ना करै थे घर वाले” फिर वो लड़का खुद ही हंसा “उसने तो भाई एक लोंडा ई पकड़ लिया हा” तभी एक लड़का बोला “भाई देख इसके बिना क्या रहा जा? सब सुक्के थोड़ी| भाई सुद्दा सा हिसाब है यातो ब्याह करो ना तो भाई दुसरे भाई की लुगाई में साज्झा करवाओ” तुरंत एक लड़का बोला “साज्झे मै बी कोई दिक्कत ना, जब उसकी ज़मीन तुम बरत रे तो उसे बी तो अपनी लुगाई बरतन दो” सुक्के को जो ज्ञान वो लड़के करवाना चाहते थे, वो ज्ञान का उड़ता तीर सुक्के ने ले लिया था| ........ रात को सोमदत्त के घर के भीतर भूचाल आ गया| माज़रा क्या था? सुक्के ने अपनी भाभी को ही छेड दिया था| आज सोमदत्त के साथ ज्ञानचंद भी सुक्के की सुताई कर रहा था| बेला खड़ी हुई रो रही थी और कोस रही थी भगवान् को| आज सुक्के के इरादे कुछ और ही थे वो पिटते हुए ही बोल पड़ा “बै या तो ब्याह करो मेरा ना तो फेर सोमे की लुगाई में सज्झा करूँगा..जब मेरी ज़मीन यो बरतैगा तो मुझै बी तो कुछ होना चाह” ये बात सुनकर सोमदत्त और ज्ञानचंद का हाथ रुक गया| सुक्का फिर जोर देकर बोला “ब्याह क्यू ना कररे मेरा फेर” इतना कहकर सुक्का घर से निकल लिया| यहाँ सुक्के की भाभी शुरू हो गयी थी “मेरे बाप कु ना पता हा ऐसा खानदान है| जब तो यो कही ही कि बड़े साहूकार रतन का पोत्ता है...पर यहाँ है क्या?” ज्ञानचंद ने अपनी बीवी को चुप होने को कहा लेकिन वो और ज्यादा फट पड़ी “चुप कर लो मुझै ई...मेरे बाप कु पता लगैगा तो सर फोड़ लेगा, कैसे घर में ब्याह दी? कहन कु साहूकार अर कर्मकांडी..... पर लुगाई साज्झे में धरी जा यहाँ” फिर ज्ञानचंद की पत्नी ने दिवार में सर मारते हुए कहा “आग लग जाओ ऐसे सहुकारे मै थारे|” ...... उस रात का मामला लगभग शांत हो चूका था| परन्तु बेला के मन में एक उद्विग्नता उत्त्पन्न हो गयी थी और उन्होंने एक और निर्णय ले लिया था कि सुक्के का ब्याह जरुर होगा| रात को बेला सोमदत्त की खाट पर आयीं| सोमदत्त ने उठकर कहा “क्या हुआ? कुछ बात करनी है?”| बेला ने बुझे हुए मन से कहा “यो जो होरा यो ठीक ना, तम कुछ करो जी” सोमदत्त : क्या करूँ तेरी इस औलाद का? इस रुपंते कु लुगाई चाह, कहाँ से लाके दूँ? बेला : ऐसा बी गिरा पड़ा ना जी...देखियों लोगो के तो कैसे कैसे शराब्बी-कबाब्बी बी ब्याहे जारे| सोमदत : हाँ भोत बड़ा राजकुमार है तेरा तो? शकल, वो ना दी भगवान नै...अकल वो भी देनी भूल गिया| बेला : आद्धा बावला तो तुमने बना रक्खा, अर इन मोहल्ले वालो नै| नि तो सारी खेत्ति, ढोर-डांगर वो ई देखरा| सोमदत्त जी को इस बात में सच्चाई महसूस दी लेकिन फिर एक मौन के बाद बोले “बिरसे कितने पड़े तेरे, थोड़ी सी खेत्ती है बस|” बेला : गाम मैं कई सै कम है तो कई सै जादा बी| दिक्कत कोई ना तुम कोशिश करो तो....थोडा कमजोर है तो वो तो खिलाई-पिलाई कर दूंगी मै| सोमदत्त : उस मामले में कमजोर ना बिलकुल बी साल भार मै ई खाट बेकार कर दे तेरा राजकुमार| ये बात सोमदत्त ने बड़े ही मादक अंदाज़ में कही थी और एक बड़ी ही मादक हरकत भी की थी बेला के साथ| बेला ने भी मोहक अंदाज़ में कहा “लाज तो आ ना री, कुवांरे बेटे की खाट देक्खो बस” बेला को सोमदत्त से सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली थी अपने प्रस्ताव के बारे में तो सोमदत्त का जो हक बनता था वो बेला ने उन्हें दिया| ....... सोमदत्त परेशान थे कि आखिर क्या जुगत भीडायें जो सुक्के का ब्याह हो जाये| तभी उन्हें अपने मामा के लड़के गोपालचंद की याद आई| गोपालचंद अध्यापक था और ब्याह करवाने या ब्याह तुडवाने दोनों ही कामो में माहिर था| और पास के गावँ में रहता था| वैसे तो गोपालचंद बेहद ही कुटिल किस्म का आदमी था और झूठ बोलने में माहिर था लेकिन सोमदत्त का बेहद ही घनिष्ठ था| सोमदत्त उस पर विश्वास भी बहुत करता था और इस मामले में सोमदत्त की मदद भी गोपालचंद ही कर सकता था एक दिन सोमदत्त, गोपालचंद से मिलने उसके घर पर पहुँच ही गए| गोपालचंद ने सोमदत्त का अच्छा स्वागत किया और परिवार की कुशल-क्षेम पूछते हुए बीडी का मंडल सोमदत्त की तरफ बढा दिया| सोमदत्त ने दो बीडी निकाल कर एक अपने लिए लगाई और एक गोपालचंद के लिए| और फिर एक लंबा कश खींचकर धुवाँ छोड़ते हुए बोला “भाई सब बढ़िया इ है..... जो भगवान् कर दे” गोपालचंद को सोमदत्त का ये बढ़िया कहना कुछ ज्यादा बढ़िया नहीं लगा और उसके समझ आ गया कि कुछ तो समस्या जरुर है| गोपालचंद ने सोमदत्त के कंधे पर हाथ रखकर कहा “भाई सोमे खुल कै बोल क्या चिंता है| इलाज सब बात्तो का मेरे धोरै| सोमदत्त ने आशा भरी दृष्टि गोपालचंद पर डाली और बोला “भाई इसलिए इ तो तेरे पास आया”| गोपालचंद : भाई पहले कुछ खा-पी लें, फेर बात करेंगे| दोनों ने मिलकर जलपान किया| और हुक्का गर्म करवाकर गोपालचंद ने सोमदत्त के सामने किया| सोमदत्त ने हुक्के का एक मुलायम कश खिंचा| हुक्के की गुडगुडाहट ने कमरे की ख़ामोशी को तोडा| अब सोमदत्त ने असली मुद्दा रखा “भाई गोपाल बाकी सब तो बढ़िया इ चलरा| बस तेरी भाभी एक बात कु लेकै परेशान है” तुरंत गोपालचंद बोल पड़ा “भाई भाभी कु परेशानी ना होनी चाहिए....बात बता क्या है?” सोमदत्त ने हुक्के का नेच्चा गोपालचंद की तरफ किया और बोला “भाई तेरी भावज की इच्छा है कि सुक्के का ब्याह हो जा, किसी जुगाड़ सै” गोपालचंद जो लम्बा कश खींचते हुए सोमदत्त की बात सुन रहा था वो ये बात सुनकर धुवाँ छोड़ते हुए कुछ देर शांत रहा| हुक्के के कई कश दोनों खींचते रहे लेकिन ये ख़ामोशी बनी रही| कुछ कशो के बाद गोपालचंद के दिमाग में कुछ आया और बोला “भाई चिंता ना कर.... अर भाब्भी से कह दे कि बेफिकर होकै ब्याह की तैयारी करै” सोमदत्त का चेहरा एकदम से खिल गया और वो बोला “भाई यो इ उम्मीद थी” लेकिन सोमदत्त कुछ सोचकर बोला “भाई देख रतन के नाम की भी लाज रखिये| कहीं किसी ओच्छे-पछिन्ने सै तो भिड्वा ना दिए| बस ऐसि लड़की हो जो निभ जा” गोपालचंद ने अपनी छाती पर हाथ रखकर कहा “भाई भरोस्सा रख” ......... सोमदत्त चला गया था और गोपालचंद उसको विदा करके छ: वर्ष पुरानी यादों में खो गया| छ: वर्ष पूर्व गोपालचंद विद्यालय के मैदान में पेड़ की छाँव में बैठे थे| वैसे अधिकतर अध्यापक ये ही करते थे यदि विद्यालय में आते थे तो| तभी गोपालचंद को विद्यालय के पीछे मैदान में कुछ अजीब सी हलचल की आवाजें सुनाई दी| मैदान के पीछे की तरफ कुछ पुराने कमरे बने हुए थे। जिनका कोई उपयोग नहीं होता था लेकिन उनका कुछ अलग उपयोग युवा कर लेते थे कभी-कभी| गोपालचंद ऐसी ही किसी उम्मीद में उन कमरों की तरफ गए| वहां उन्होंने नज़ारा देखा वो कुछ हटकर था| कमरे में 7-8 लडको ने एक लड़के और लड़की को पकड़ रखा था| लड़की और लड़के दोनों ही बिना कपड़ो के थे| ये जोड़ा थोड़ी सी प्यार की रूमानियत बटोरने इस तरफ आया था तो इन लडको ने पकड लिया| वैसे झगडा तो ये हो रहा था कि अब ये लड़के भी अपनी हिस्सेदारी वसूलना चाहते थे| लेकिन संख्या 7-8 होने के कारण मामला बनने के बजाय बिगड़ गया| गोपालचंद को देखकर तुरंत लडको के मुहँ से निकला “मास्टर जी” फिर लडको में हलचल एकदम शांत हो गयी| गोपालचंद मामला समझ गए थे| तुरंत ही एक लड़का बोला देखियो जी इसकूल में कैसे कैसे काम कररे ये मास्टर जी| अर जब इसे यहाँ सै जान कु कहा तो हेकड़ी दिखारा” वो लड़की जो हाथ से अपने बदन के जरुरी हिस्सों को छुपाने का प्रयास कर रही थी तुरंत बोल पड़ी “जान कु कैरा था तू....मेरी सलवार दे” भीड़ में से एक लड़के ने तुरंत उसकी सलवार उसे दे दी, दुसरे लड़के ने उसका सूट दे दिया और एक लड़के ने समीज भी पकड़ा दी| गोपालचंद जी ने एक दम से उस लड़की के साथ पकडे गए लड़के के जोरदार झापड़ जड़ दिए और बाकी लडको से बोले चलो भागो यहाँ से| वो लड़के वहां से चले गए लेकिन शायद ये ही गलत हो गया था| लड़की सुन्दर तो बिलकुल नहीं थी लेकिन कहते हैं ना कि दीवाना चढ़ती जवानी बनाती है खूबसूरती नही| और इस आकर्षण से गोपालचंद भी बचा नहीं था। ये उसकी दृष्टी देखकर ही पता चल रहा था। गोपालचंद ने लड़की से पुछा “तू स्कुल मै तो ना पढ़ती, है कहाँ की? किसकी तू?” लड़की नज़रे नीची किये ही जवाब दिया “जी श्रीचंद की हूँ” गोपालचंद पहचानते थे श्रीचंद को, वो गोपालचंद की ही जाति का था| जिस गावं में विद्यालय था उस ही गाँव का था और एक छोटी सी दूकान थी| बाद में गोपालचंद ने लड़के की तरफ ध्यान दिया “बै तू तो अबकी बार फेल हो गिया था” इतना कहते ही गोपालचंद जी ने बढ़िया वाली गाली और लात घूंसों से उस लड़के का स्वागत किया| लड़का लड़की की जाति का था| गोपालचंद गुस्से में ही बोला “सूतरे जेल सुक्खी ना अर जवान्नी चढ़ गी| पढता तो है नि, इशक लडवा लो” लेकिन जिन लडको को गोपालचंद ने भगाया था उन्होंने बाहर जाकर बाकी लोगो को भी बता दिया| वैसे जब कुछ मिल ना रहा हो तो बिखेर देना ये ही उन्हें सही लगा| उस कमरे में बाकी अध्यापक, और भी कई लोग आ गए| मामला तूल पकड़ गया और लड़के और लड़की के परिजनों को बुलाकर बच्चे उनके सुपुर्द कर दिए गए| फैसला ये हुआ कि दोनों का विवाह कर दिया जाएगा| उसके पांच वर्ष बाद श्रीचंद गोपालचंद को एक दिन टकरा गया तो उन्होंने पूछ ही लिया और पंडितजी सुमन का ब्याह कर दिया?” श्रीचंद : अजी उस लोंडे से तो ना करै हम, करता-धरता भी कुछ ना, ज़मीन बी ना... अर दारु और पियै| फिर श्रीचंद ने कहा “मास्स्जी कोई ठीक सा लोंडा हो तो बताईयो जरुर” गोपालचंद ने आश्वासन देकर विदा ली| वैसे विवाह ना होने की वजह कुछ और थी| उस लड़की सुमन को उस लड़के ने कभी किसी और लड़के के साथ पकड़ा था और अपना मामला जोड़ लिया था| तो वो लड़का ही उससे विवाह नहीं करना चाहता था| और वैसे भी उस लड़की के जीवन का फलसफा कुछ और ही था। वो अपने यौवन का पूर्ण दोहन कर रही थी| और बहुत से लडको की आशाएं पूरी की थी| उस लड़के के उस दिन के घटनाक्रम के बाद भी उस लड़की को अन्य लडको के साथ सम्बन्ध बने थे| गोपालचंद एकदम से भूतकाल से बाहर आये और सोचा कि ये ही है सही जुगाड| और फिर मन ही मन बुदबुदाये “सुक्का थाम लेगा”| गोपालचंद जब कभी सोमदत्त के घर जाता था तो सुक्के और उसकी खाट की खिंच-तान की आवाज़े उसने भी सुनी थी| एक बार वो मस्ती में सोमदत्त से कह भी गया था “भाई वैसे भले ही सुक्का सा हो पर इस मामले में करंट पूरा सुक्के में” ......... दुसरे दिन ही गोपालचंद श्रीचंद की दूकान पर पहुँच गया| श्रीचंद दूकान पर ही बैठा था, काफी गर्मी का दिन था| श्रीचंद गोपालचंद को देखकर बोला “आओ आओ मास्स्जी इतनी भरी दफैरी मैं कहाँ घुमरे?” गोपालचंद : बस पंडिज्जी थारे पास इ आया हा| श्रीचंद : अजी पता भिजवा देत्ते, मै तो वहीँ इस्कूल मै इ आ जात्ता....बेकार परेशान हुए| तभी सुमन पानी लेकर आ गयी और पानी पकडाते हुए गोपालचंद को नमस्ते किया| गोपालचंद ने सुमन को देखा और नमस्ते स्वीकार करने के लिए गर्दन हिलाई| सुमन पानी देकर चली गयी| गोपालचंद जी ने पानी समाप्त करके कहना शुरू किया “बई शर्मा जी थारी सुमन के लिए रिश्ता लाया एक.... बता करना हो तो” श्रीचंद : अजी करना तो है ही| पर यो तो बताओ है कहाँ से” गोपालचंद ने सोमदत्त के गाँव का नाम बताया श्रीचंद ने थोडा सोचकर कहा “कोई नजदीक ना है जी यो तो दूर है” और दूकान में से एक सिगरेट का पैकेट उनकी तरफ बढाया गोपालचंद जी ने एक सिगरेट निकाल कर कहा “शर्मा जी बीडी इ पि लेत्ते हम तो... यो कमण्डर तो जी आजकल के लोंडो का चोचला है” वैसे ये बात कहते कहते गोपालचंद ने सिगरेट सुलगा ली थी| एक लम्बा कश खीँच कर धुवाँ छोड़ते हुए गोपालचंद बोले “भाई यो जो लोंडा है यो म्हारा रिश्तेदार भी है” फिर गोपालचंद ने एक और कश खीँचा और बोले “मेरी बुआ का पोत्ता भाई....मेरा फूफ्फा का बड़ा साहूकारा था” फिर गोपालचंद ने सिगरेट श्रीचंद को थमा दी| श्रीचंद ने भी एक कश खिंचा और बोला “अजी बाब्बा का साहूकारा था लोंडा क्या कररा?” गोपालचंद जी ने फिर कहा “भाई खेत्ति भी है अर भाई शर्माजी बाप का अपना पंडताई का काम बी चलरा...गाम गवांड में कोई और पंडत है बी ना” श्रीचंद ने दो तीन कश खींचकर सिगरेट गोपालचंद को पकड़ा दी और बोला “अजी बात तो जूं की तूं रही...लोंडा क्या कररा” गोपालचंद समझ गए थे कि ये घाग है ऐसे मामला नहीं पटेगा। और फिर वो अपने आजमाए हुए टोटको पर आ गए| गोपालचंद बोले “बई शर्मा जी होश तो कर ले एक सिगरेट मैइ सब उगल दू क्या?” श्रीचंद हंस पड़ा और बोला “अजी सिगरेट तो और ले लियो...पूरी दूकान थारी” गोपालचंद ने बहुत ही गंभीर मुद्रा बनाते हुए कहा “भाई शर्मा जी, लड़का है कुरूप एकदम म्हारी सुमन सै बी ज्यादा” श्रीचंद को ये बात कुछ समझ नहीं आई फिर गोपालचंद ने आगे कहा “भाई लोंडे नै बी. ऐ. कर लिया अर दो साल तै फिल्ड अफसर की नौकरी कररा...सरकारी” ये सरकारी शब्द गोपालचंद ने जोर देकर कहा था| श्रीचंद की भी “सरकारी” शब्द सुनकर भावभंगिमा बदल गयी और एकदम से बोला “अजी लड़के का रूप तो उसकी कमाई हो” गोपालचंद को तीर निशाने पर लगता दिखाई दिया था| तुरंत ही श्रीचंद ने दूसरा प्रश्न दाग दिया “उमर क्या होगी जी लोंडे की” गोपालचंद : 26 साल श्रीचंद : सुमन की 21 साल होरी...कोई दिक्कत ना जी गोपालचंद : तो फेर भाई चल किसी दिन.... घुमीया अर देखीया ........... गोपालचंद ने झूठ तो बोल दिया था की लड़का नौकरी करता है और पढ़ा लिखा है| लेकिन अब इस झूठ को सच भी तो बनाना था| वो पहुंचे सीधे सोमदत्त के पास| विषय की गोपनीयता को देखते हुए सोमदत्त ने बात भीतरी कमरे में करनी उचित समझी| बेला भी कमरे में ही थी| गोपालचंद ने बात का समां बाँधने के लिए पहले लड़की और लड़की के बाप की सराफत और सज्जनता के कसीदे गढ़े| बताया कि लड़की एकदम गउ और घरेलु है| जब गोपालचंद ने देखा अब मामला एक दम चरम पर है तो उसने कहा “देख भाभ्भी थोड़ी सी रडक है बात मै| तो उसकू दूर करण कु मैंन्ने एक बात कही” सोमदत्त जी ने एकदम माथे में सलवट डालते हुए कहा “क्या बीज बो दिया?” सोमदत्त जानते थे गोपालचंद के आचरण को इसलिए समझ गए अब वो है जो बाकी रह गया| सोमदत्त की बात सुनकर गोपालचंद का स्वाद एकदम से खराब हो गया| गोपालचंद ने आँखें गोल करते हुए कहा “वो बीज बोया भाई जो तू चाहरा हा, तेरे लोंडे के ब्याह कु भाग्गा फिररा, सारा काम छोड़ कै| तू थोडा ढंग का बीज बो देत्ता तो फेर कुछ बी दिक्कत ना ही। अब तेरा बोया बीज, अर झेलना मुझै पडरा” फिर धीरे से बुदबुदाते हुए गोपालचंद बोला “क्या बीज बो दिया” बेला इस तरह की बहस के लिए बिलकुल तैयार नहीं थी| उसने झल्लाते हुए सोमदत्त को उलाहना दिया “पहले पूरी बात तो सुन लो या बस एकदम चढन कु इ तैयार रहो” सोमदत्त ने नज़रे नीची करके क्षमा प्रार्थना का अनुक्रम किया| गोपालचंद ने फिर कहा “भाभ्भी देख पहलै बता दे मेरी जुबान की कीमत है कुछ? तुम ना करते हो तो किसी और कु देक्खुं मै| अब मुझै तो कुछ करना इ पड़ेगा, जुबान दे दी लड़की के बाप कु” ये बात सुनकर बेला एकदम से अधीर हो उठी और बोली “क्यूँ देवर जी तुम्हारा भतीजा क्या कुवाँरा रहगा?” गोपालचंद जंग में प्रभावी स्थिति बना चूका था| सोमदत्त गर्दन झटक कर चुप हो गए| गोपालचंद को ये रिश्ते करवाने से किसी प्रकार का कोई लाभ होता था ऐसा भी नहीं है| लेकिन गोपालचंद जब किसी रिश्ते को जुडवाने की ठान लेते थे तो उसके लिए किसी भी हद तक गुजर जाते थे| उनके बारे में कहा जाता था कि जिसका ब्याह कहीं ना होता हो गोपालचंद उसका ब्याह भी करवा दे| रिश्ते जुडवाने को पता नहीं कितनो को उन्होंने कलेक्टर तक घोषित कर दिया था तो किसी को जमींदार बना डाला था| झूठ खुलता भी था लेकिन समाज में विवाह संस्था के प्रति एक आस्था थी कि एकबार विवाह बंधन में बंधने के बाद तो ये गठबंधन समाज की प्रतिष्ठा का प्रश्न होता था| इसलिए एक बार शादी हो जाने पर तो फिर रिश्तेदारी निभायी ही जाती थी| विवाह सम्बन्ध विच्छेद 80-90 के दशक में भी बहुत ही बड़ा सामाजिक अपराध माना जाता था| वो अलग बात है कि अपने द्वारा बनवाये गए कई रिश्तो के बाद गोपालचंद का उस गाँव में घुसना तक प्रतिबंधित हो गया था| लेकिन ये कुछ समय के लिए ही था| क्योंकि कोई ना कोई पीड़ित जिसकी लड़की या लड़के के रिश्ते में अड़चन आ रही होती थी आखिर आता तो गोपालचंद की देहलीज पर ही था| चलिए वापस कमरे में आते हैं जहाँ सुक्के के ब्याह के अनुष्ठान की तैयारी की जा रही थी| सोमदत्त ने बहस को समाप्त करते हुए कहा “यो बता रडक क्या है? क्या करना पड़ेगा?” गोपालचंद :देख भाई म्हारे घर में कमी तो कुछ बी ना| अर रही बात सुक्के की तो भाई खेती-बाड़ी अर ढोर डांगर वो ई देखरा” सोमदत्त और बेला ने सहमती में सर हिलाया, गोपालचंद ने फिर बोलना शुरू किया “भाई मैंने कुछ कहा लड़की वालो से, बस जो मैंने कहा उस्पै इ रहियो तुम भी” सोमदत्त इस तुषारापात के लिए ही तैयार थे “कहा क्या? यो बता|” गोपालचंद ने कहा “भाई ज़मीन जैसे मैंने बता रक्खी बस तुम उसै ई मन लियो” सोमदत्त : कितनी बता दी गोपालचंद : बढ़ा कै ना बताई जितनी है उतनी ई बताई, 30 बिगेह बता दी लोंडे पै सोमदत्त : इतनी तो सारी ई है एकदम से बेला बोल पड़ी “तो गलत क्या कह दिया? संभाल तो सुक्का ई रा” सोमदत्त : इतनी बी तो ना है इससे बी कम इ बैट्ठेगी गोपालचंद ने झल्लाते हुए कहा “भाभ्भी यो नु इ तो सैडी है, इतना तो चलै” बेला एकदम बोल पड़ी “तुम चुप रहो जी, गाँम मै देक्खू.... क्या क्या बोल कै रिश्ते करवाए औरो नै” गोपालचंद : अर भाभ्भी मेरी बात होगी नौकरी जल्दी ई लग जागी इसकी यो मेरी जिम्मेदारी, लड़की के बाप सै कहदी भाई सरकारी नौक्कर आगा तेरे यहाँ। एकदम से सोमदत्त तड़क पड़े और बोले “यो क्या ??? यो क्या कह दिया?? अभी कौन सी नौकरी कररा यो| तू हमारी इज्ज़त मिट्टी मै मिलवावैगा” गोपालचंद : ओ सुन नौकरी मेरी जिम्मेदारी... यो तो तू यो मान ले बस की लग्गी। फेर झूठ कैसे? बेला ने आँख गोल करके उनके अन्दर जलती ज्वाला से सोमदत्त को परिचित करवाया| दिल के किसी कोने में सोमदत्त जी भी अब चाहते थे कि सुक्के का ब्याह हो जाए, किसी भी तरह से| तो आखिर सबने इस झूठ में साथ निभाने की मौन स्वीकृति दे दी| गोपालचंद को मालुम था कि मामला श्रीचंद का भी कमजोर है| उसकी लड़की की बदनामी के कारण उसे भी रिश्ता करने में समस्या आ रही थी| ......... इस तरह ब्याह की तैयारी शुरू हो गयीं| आज सुक्के का लग्न लिखा जा रहा है| सोमदत्त वैसे तो ये ही काम करते थे लेकिन आज उनके कुछ मित्र भी आये हुए थे| उनमे से ही एक लग्न लिखवा रहे थे| पंडित जी ने लग्न लिखते हुए दुल्हे का नाम पूछा ज्ञानचंद के मुहँ से एकदम निकला “सुक्का” सुनते ही पंडित जी का जयका एकदम से ख़राब हो गया| तुरंत सोमदत्त ने गोपालचंद की तरफ देखा और पुछा “क्या नाम बताया वहाँ?” गोपालचंद ने अचकचाकर कहा “भाई याद नि आरा बताया तो था, अब सुक्का तो बतला ना सकूँ था” तुरंत सोमदत्त दांत मिस्मिसाते हुए बोले “अरै जनम कुंडली सै थोड़ी सुझरा हा ब्याह, नाम सै ई तो सुझाया था तैन्नै” तभी पंडित जी बोल पड़े “क्या मास्टर जी आप भी जानो यो विद्या?” गोपालचंद जी ने दांत दिखाकर एक बड़ी मुस्कान बिखेरी और कहा “अब जी जो कर्म है वो तो जानेंगे ही ना, चाल्लू-काम तो कर ही लें” सोमदत्त झल्लाकर “यार यो तो बता नाम क्या बताया हा? होर काम बी देखने फेर” गोपालचंद ने दिमाग पर थोडा जोर डालते हुए एक मुस्कान के साथ कहा “जयराम! हाँ भाई यो इ बताया हा” तुरंत पंडित जी ने आगे की प्रक्रिया शुरू कर दी और सुक्के मतलब जयराम दूल्हा बन गया| हल्दी का उबटन होता ही कुछ ऐसा है की किसी को भी निखार दे और कुछ ब्याह का उमाह भी था जो दुल्हा बना सुक्का वाकई जयराम लग रहा था| हालाँकि कुछ पेचीदगियां आई थी। जब फेरो के समय पंडित जी कभी जयराम नाम बोलते थे तो या तो सुक्का ध्यान ही नहीं देता था और अगर ध्यान देता भी था तो अचकचा जाता था| लेकिन सुक्के का ब्याह संपन्न हो गया था बढ़िया तरह से| जो उसके दोस्त सुक्के से नए नए प्रयोग करवा रहे थे उन्होंने भी पूरा सहयोग किया| क्योंकि सुक्के का ब्याह पुरे गाँव के लिए सम्मान का प्रश्न बन गया था अब| श्रीचंद ने जब सुक्के के बारे में जानकारी की तो पुरे गाँव ने वो ही जानकारी दी जो गोपालचंद ने बताई थी| आखिर पूरा गाँव कृतबद्ध था सुक्के के ब्याह को लेकर| ये अब गाँव की प्रतिष्ठा का प्रश्न जो बन गया था| शादी बहुत ही अच्छी तरह से संपन्न हुई| पुरे विवाह समरोह के दौरान सुक्के के मन में सुहाग रात की कल्पनाएँ ही तैरती रहीं| आखिर उसके लिए शादी का निहितार्थ ही बस एक था| स्त्री सौंदर्य के साक्षात् दर्शन जो होने वाले थे| अब वो अपने मन में घुमड़ने वाली काम क्रीडा की सारी कल्पनाओं को साकार करने की तरफ अग्रसर था| अब तक अपनी कल्पनाओं को तुष्ट करने हेतु सुक्के का सहारा बस उसकी खाट और उसका हाथ ही था| विवाह के साथ ही उसे इससे मुक्ति मिल गयी और सुक्के उर्फ़ जयराम सुमन के साथ अपने प्रेम पथ पर बढ़ चला| सुहाग रात को सुक्के ने अपनी समस्त कल्पनाओं को सुमन के साथ बिस्तर पर उतार दिया| वैसे तो सुमन ने अपने यौवन का पूरा लुत्फ़ उठाया था और एक से एक लड़के देखे थे| लेकिन सुक्के के जोश के आगे सब फीके थे| क्योंकि उन लडको में से किसी के भी जीवन का लक्ष्य सुमन का यौवन नहीं था| बाकी लडको के लिए वो बस एक मस्ती के पल थे| परन्तु सुक्के के जीवन का लक्ष्य बन गयी थी एक दुल्हन| उसका विवाह हो गया था वो भी करेंट ख़तम होने से पहले| बल्कि ये कहो कि सुक्के के भीतर जोरदार करेंट दौड़ रहा था| और जब ये करेंट सुमन के भीतर दखिल हुआ तो जैसे वो सब कुछ भूल गयी| सुक्के के जोश ने पहली रात ही सुमन को उसका गुलाम बना दिया| भले ही सुक्का पतला-दुगला था लेकिन उसका जोश अत्यंत हाहाकारी सिद्ध हुआ| सुमन धाक मान गयी थी सुक्के की जवानी की| उस दिन जो धमाल सुक्के ने मचाया उसकी हलचल बाहर तक कुछ ज्यादा ही महसूस हुई| इन हलचलों ने तो सोमदत्त और ज्ञानचंद के खोये जोश को भी जैसे जगा दिया| ......... तो क्या इतनी ही रही सुक्के की विजय यात्रा या कुछ और भी हुआ? जी होना ही था, सुक्के के वैवाहिक जीवन में अभी कुछ और नाटकीयता बाकी थी| उस नाटकीय प्रसंग की तरफ बढ़ता हूँ, ये सुनिश्चित करते हुए कि इस कथा का अंत सुखद ही होगा ........ जयराम का नववैवाहिक जीवन बहुत ही उमंग भरा था| बल्कि जयराम और सुमन की उमंग ने तो सोमदत्त और ज्ञानचंद के भीतर भी उमंग जगा दी थी| अब जयराम को कोई भी सुक्का नहीं बुला रहा था बल्कि सब जयराम ही कहते थे| सुमन का गौना भी जल्दी ही करवा लिया गया| फिर श्रीचंद भी ज्यादा समय सुमन को मायके में नहीं रहने देना चाहता था| क्योंकि उसे डर था कि कहीं सुमन अपनी कोई पुरानी कहानी ना पुनर्जीवित कर दे| बहुत ही मुश्किल से पढ़ा-लिखा और सरकारी नौकरी करने वाला दामाद मिला था आखिर| गौना होने के बाद एक दिन सुमन ने जयराम से पूछ ही लिया “तम नौकरी पै ना जात्ते जी” जयराम इस प्रश्न से अचकचा गया था| वो तो ये भी भूल गया था कि आखिर क्या नौकरी बताई थी श्रीचंद को गोपालचंद ने? और जयराम को तो इस मसले से कोई सरोकार भी नहीं था| वो स्त्रीगमन की अपनी कल्पनाओं में उड़ रहा था विवाह के दौरान| लेकिन सुमन का ये प्रश्न तो जैसे जयराम के इस प्रेमलोक की यात्रा पर तुषारापात कर गया| जयराम, वाकई में इस नाम को आत्मसात कर चूका था जयराम| लेकिन सुमन के प्रश्न के साथ ही उसके चेहरे पर एक बार फिर सुक्के की मलिनता आ गयी| ये तो अच्छा हुआ कि तभी बाहर से आवाज़ आई और जयराम वापस सुक्का बनने से बच गया और प्रश्न का उत्तर दिए बिना ही बाहर को दौड़ पड़ा| जयराम ने तुरंत बेला के पास जाकर उससे पूछा “माँ मेरी कुन सी नौकरी बतला रक्खी ही चच्चा नै सुमन के बाप कु” बेला जो अपने काम में लगी हुई थीं थोडा चिढ़ते हुए बोली “क्यूँ आज ही दफ्तर सम्भालेग्गा” जयराम ने घबराते हुए कहा “वो... माँ....सुमन बुझ री ही” बेला एकदम से सतर्क हो गयी और बोली “क्या बुझरी ही” जयराम : यो ई कि तम नौकरी पै तो जात्ते ई ना बेला ने माथा पकड़ लिया, इस बारे में तो उसने सोचा भी नहीं था| बेला ने शांत होकर कहा “कहदे अबी कुछ काम ना हा, नु ना जारा हा” जयराम : माँ वो नु तो बता मेरी नौकरी क्या बतला रखी ही बेला : रै फिल्ड अफसर बता रखी ही जयराम : यु क्या हो? बेला : सारा पर्चा आज ही बांचैगा?...क्या अब काम बी सिखावैगा उसै तू” जयराम चुपचाप चला गया| ये जयराम के वैवाहिक जीवन के नाटकीय घटनाक्रम का प्रारंभ था| ...... शाम को ही बेला सोमदत्त के पास आ गयी, ज्ञानचंद भी वहीँ था| बेला ने सारा माजरा सोमदत्त को बताया| वैसे अब जयराम का वैवाहिक जीवन अच्छी तरह से चले इसकी सबसे ज्यादा चिंता ज्ञानचंद को थी सोमदत्त और बेला से भी ज्यादा| क्योंकि उसके छोटे भाई सुक्के उर्फ़ जयराम ने विवाह ना होने की सुरत में जो शर्त रख डाली थी वो ज्ञानचंद को भीतर तक हिला गयी थी| और सुहाग रात के जयराम के जलवे के झोंके जो कमरे से बाहर तक आये थे वो सबने महसूस किये थे| तो एक रात ज्ञानचंद की पत्नी ने प्रेमालाप के क्षणों में ज्ञानचंद से कह दिया “कुछ बी कहो सुक्का शिकल सूरत का कैसा बी हो.... अर भले लिकड़ा सा हो, पर हांगा बड़ा ले रा| सुमन चोक्खी होत्तड है पर उसका बी दाब्बा सा ई दाब दिया” ज्ञानचंद ने जब अपनी पत्नी के मुहँ से ये वचन सुने तो उसका सर भन्ना गया और एक अजीब से असुरक्षा के भाव से घिर गया था वो| ज्ञानचंद को हीनभावना ने घेर लिया था| अपनी इस हिन् भावना से बाहर आने को अगले दिन से शिलाजीत का नित्य सेवन ज्ञानचंद ने प्रारंभ कर दिया था| हालाँकि उसकी पत्नी ने ये बात सामान्य रूप से कही थी| लेकिन जैसे कोई स्त्री किसी दूसरी स्त्री के सौन्दर्य की प्रशंशा नहीं सुन सकती ऐसे ही कोई पुरुष किसी दुसरे पुरुष के पौरुष की प्रशंशा नहीं सुन सकता है| इस विवाह से सुक्के के जीवन में बदलाव तो आ गया था| जो अबतक बेचारगी या हास्य का पात्र था अब वो दुसरो के लिए डाह का कारण बन गया था| लेकिन पता नहीं क्यों अपने वैवाहिक जीवन के लिए अब ज्ञानचंद को लगता था कि जयराम का वैवाहिक जीवन भी अच्छे से चले| ज्ञानचंद ने तुरंत अपनी माँ बेला से और अपने पिता सोमदत्त से कहा “कल से सुक्के” इतना कहते ही बेला ने ज्ञानचंद की तरफ जलती हुई दृष्टी डाली और ज्ञानचंद को अपनी त्रुटी का भान हुआ और सँभलते हुए बोला “जयराम....जयराम सै कह दिए माँ कल सै सूबा होत्ते ई शहर कु निकल ले| जो उसकी बहु कु भी यो लगै कि नौकरी पै ई गया” सोमदत्त जी ने अपनी शंका व्यक्त की “ढोर-डांगर अर खेत्ति बाड़ी का क्या? वोई देखरा था सारा काम तो” ज्ञानचंद ने झल्लाकर कहा “वो काम सुनील देख लेगा (सुनील ज्ञानचंद का पुत्र था जो 15 वर्ष का हो चूका था) सोमदत्त और बेला को ये युक्ति उचित लगी| वैसे भी अभी उनके पास अन्य कोई उपाय भी नहीं था| तुरंत सोमदत्त जी ने जयराम को बुलाया और तीनो ने मिलकर उसे ताकीद की| ये निश्चित हुआ कि उसे खाना बांध कर दिया जायेगा और किराये से अलग सिनेमा देखने के पैसे भी मिलेंगे, क्योंकि समय गुजारने के लिए और करेगा ही क्या? सिनेमा देख लिया करेगा| उससे अगले दिन से जयराम ने नौकरी के लिए पेंट में कमीज दबाकर शहर जाना शुरू कर दिया| शहर जाकर 12 से 3 बजे तक का फिल्म का शो देखा जाता था| इसके बाद थोडा घूमकर गाँव वापस आ जाया करता था| लेकिन यहाँ ज्ञानचंद के बेटे सुनील की मुसीबत शुरू हो गई थी| अब उसे खेत-खलिहान और पशुओ का सारा काम देखना पड रहा था| हालाँकि शाम को जयराम आते ही अपने इस काम में लग जाया करता था| लेकिन शाम तक ये जिम्मेदारी सुनील के ऊपर थी| 10 दिन तक यूँ ही चला और जब देखा कि सुनील से काम नहीं संभल पा रहा है तो ज्ञानचंद, ज्ञानचंद की पत्नी और सोमदत्त को भी इन कामों में हाथ बटाना पड़ा| अगले 15 दिन में ही इन सब की हालत ख़राब हो चुकी थी वो भी तब जबकि शाम के बाद और रविवार को छुट्टी के नाम पर जयराम सारे काम को खुद देखता था| लेकिन फिर भी ना तो खेती में वो बात दिख रही थी और ना ही पशुओ में| बेला ने एक दिन सोमदत्त से बोल ही दिया “अब पता चला जयराम क्या करता था| पूरा कुनबा लगा पड़ा फेर बी ना सिम्भ्लरा काम| अर जब वो था तो खेत बी अर डांगर बी कैसे चमके रह थें!...वो तो अब बी आद्धा काम वो इ देखरा” ये बात सुनकर सोमदत्त जी झल्ला गए थे “हाँ बाक्की आदधे दिन तो बड़ा पुंगे मै तीर मारकै आवै वो” फिर बडबडाते हुए बोले “ब्याह क्या करवाया अपनी जान कु जंड कर लिया” बेला चुपचाप अपने काम में लग गयी| ये बात निश्चित थी कि खेती बाड़ी और पशुओ को सँभालने में जयराम से ज्यादा पारंगत गाँव में कोई नहीं था| लोग उससे इन मामलो में सलाह भी लेते थे| लेकिन उसके परिवार को कभी उसकी ये पात्रता दिखी ही नहीं| अब जब वो उन कामों को कर रहे थे जो जयराम करता था तो उन्हें उसकी पात्रता दिखाई दी| ........ जयराम की नौकरी का नाटक चल रहा था| लेकिन इस नाटक की वजह से जो सबसे ज्यादा परेशान था वो था जयराम का भतीजा सुनील| क्योंकि अब उस बेचारे को सारा काम देखना पड़ रहा था| और ये काम उससे हो नही पा रहा था| जिसके कारण ऐसा कोई दिन नही गुजरता था जब उसे ज्ञानचंद या सोमदत्त की गालियाँ ना सुननी पड़ती हों| वो अपनी इस हालत पर झल्लाया रहता था| सारा परिवार वैसे तो काम में हाथ बटा रहा था लेकिन मुख्य जिम्मेदारी सुनील की ही थी| दो महीने बाद ही सबको ये तो दिखने लगा था कि जयराम के बिना उनसे ना ही तो खेती संभल रही है और ना ही पशु| लेकिन सुनील को तो जैसे चिढ हो गयी थी जयराम से| एक दिन जयराम शाम को जब अपनी नौकरी के नाटक का समापन करके आया तो वो आदतन सीधा अपने पशुओ को देखने गया| वहाँ उसने एक भैस को बीमार पाया, उसको अफारा हुआ था शायद| जयराम ने जरुरी घरेलू उपचार देने के बाद सीधा घर का रुख किया| जयराम को अपने पशुओ से बहुत प्रेम था| पिछले दो महीने से वो देख रहा था कि सुनील से उसके पशुओ की देखभाल अच्छी तरह से नहीं हो पा रही है| लेकिन आज उसका गुस्सा ज्यादा ही था| घर जाते ही जयराम ने गुस्से में सुनील के दो हाथ जमा दिए| सुनील को बहुत गुस्सा आया और वो तू तडाक पर उतर आया “क्या है बै मार क्यूँ रहा तू” जयराम को वैसे इस तू तड़क में कोई ख़ास अपमान पहले कभी नहीं लगता था| लेकिन शादी के बाद से सोमदत्त के निर्देशानुसार सुनील जयराम को सुक्का ना कहकर चाचा जी ही बुलाता था| तो दो महीने में सुक्का या तू सुनने की आदत छुट गयी थी जयराम की| आज उसे सुनील का यों तू बोलना ज्यादा ही बुरा लगा| और उसने दो-तीन और खीँच दिए उसमें| अब तो सुनील सब कुछ भूल गया और सीधा बोला “ओये सुक्के फेर हाथ लगाया तो टांग तोड़ दूंगा तेरी, बेफ़िज़ूल माररा” जयराम जिसे अब खुद अपने इस नाम सुक्के को सुनने की आदत नहीं रही थी, ये संबोधन अपने लिए सुनकर उसका गुस्सा फिर और बढ़ा और वो फुफकारते हुए बोला “अबै यहाँ एसी-तेसी मरवाओ जा, ना खेत की फिकर ना डांगरो की...वहाँ वो भैंस मरण कु होरी, तू यहाँ खाट तोड़रा” घर के बाकी लोग भी जमा हो गए थे| सब इन दोनों को रोकने में और अलग करने में लगे थे| सुनील ने फुफकारते हुए कहा “तू देखले ना...तू ई क्या करै पुरे दिन? जानता ना मै.... नौकरी के नाम पै शहर मै जाकै रोज चाट पकोड़ी खावै अर सिनेमा देक्खै” ये बात सुनते ही बेला और बाकी लोग एकदम से घबरा गए क्योंकि सुमन भी वहीँ खड़ी ये सब देख रही थी| जयराम ये बात सुनकर और पागल हो गया और सुनील के दो तीन और जमा दिए| अब सुनील ने भी पलटवार कर दिया और दोनों गुत्थमगुत्था हो गए| इस गुत्थमगुत्था में गालियों के साथ साथ सुनील ने सारी पोल-पट्टियाँ भी खोल दी| सुमन के सामने सारा सच आ गया था| ज्ञानचंद ने सुनील को पागलो की तरह मार लगायी| सब अपने अपने कमरों में घुस गए, सुमन बस रोये जा रही थी| ........ इस घटना के बाद पुरे घर में मातम का माहोल था| सुमन ने उस रात खाना ही नहीं खाया और अगले पुरे दिन भी खाना नहीं खाया| बेला ने सुमन को समझाने का प्रयास किया लेकिन वो अपने पिता और भाई को बुलाने की जिद पर अडी रही| परेशान होकर सोमदत्त ने गोपालचंद को बुलवाया| ....... गोपालचंद और सोमदत्त भीतरी कमरे में बैठे थे| सोमदत्त ने बीडी में लम्बा कश खींचकर गुस्से में गोपालचंद से कहा “तो भाई जो यो बीज बोये तैन्नै....अब काट्टण का जुगाड़ बता| या बस म्हारे गले मैं घाल कै अपना मस्त हो लिया” गोपालचंद ने सोमदत्त की तरफ देखा और गर्दन को हिलाते हुए सोचते सोचते फिर से बीडी फूंकने लगा| सोमदत्त पुन: बोले “क्या भाई? बता दे कहाँ मरू मै जाकै...या तू ई गला घोंट दे मेरा| भाई इतनी बेज्जती आज तक ना हुई मेरी जितनी आज होरी तेरी बजह सै” गोपालचंद ने चुपचाप कहा “भाई काम तो सब सही ही हुआ हा| पर जब तेरे घर मै सारे बावले हुए रहं तो भाई फेर क्या किया जा?” सोमदत्त उछलकर खड़े होते हुए बोले “बढ़िया भाई बढ़िया, चल भाई अब तू मस्त रो| जब तो नु कहवै हा, अभी तो हो जानदो काम| नौकरी तो मै एक महीने पिच्छै ई लगवा दूंगा, सब बढ़िया होगा.....यो होरा बढ़िया| मैंने तो पहले ई ना करी ही झूठ बोलके ब्याह मत करवा| पर जब तो सारो कु बन्नो बिठाने की लगरी ही” बेला ने भी एकदम से गोपालचंद पर लानत भेजते हुए कहा “अब यो ई करवाओगे तम....एक काम करो देवर जी, जहर दे जाओ अपने भैया कु भी अर मुझै भी| छुट्टी....अपना फेर कुछ बी होत्ता रहियो” सोमदत्त बेला की बात के जवाब देने के अंदाज़ में तुरंत बोल पड़ा “ना री यो तो घेर कै चला गया....अब निफराम| यो जहर की पुडिया बी अब हम दोनों कु ई खानी होगी” सोमदत्त ने गोपालचंद का कन्धा पकड़ कर हिलाते हुए कहा “भाई तेरे पै कोई बात ना आवै, तू तो एकदम बेफिकर रह” अब गोपालचंद ने सोमदत्त का कन्धा पकड़ उसे निचे बैठाया और बेला की तरफ उन्मुख होकर बोला “भाब्भी देख इतनै तेरा देवर बैठ्ठा, इतनै तो किसी कु जहर खान ना दे| अर रही बात झूठ की तो भाई सुक्के का ब्याह सच बोल कै तो ब्रह्मा जी ई करवा सकै हें बस| भाई झूठ ना बोलता तो ब्याह बी ना होना हा” फिर गोपालचंद ने दूसरी बीडी सुलगाई| बेला कुछ बोलने को थी लेकिन गोपालचंद ने हाथ के इशारे से चुप किया और बोला “अब क्या कहरी यो सुमन?” बेला : ना खारी ना पीरी| बस नु ई अडी परी कि घर वालो कु बुलाओ, मेरे बाप कु बुलाओ अर मेरे भाई कु बुलाओ| गोपालचंद : बुलाओ भाई.... इसके भाई कु भी अर इसके बाप कु भी| सोमदत्त : हाँ भाई बुलाओ जो थोड़ी भोत बचरी, वे आकै उसे भी उछाल जांगे| गोपालचंद : भाई अब मेरे पै छोड़ दै सारी बात तू, बीडी पी| गोपालचंद ने सोमदत्त को बीडी पकड़ा दी और सोमदत्त ने बीडी पीनी शुरू कर दी| ......... गोपालचंद के कहने पर सुमन के भाई और सुमन के बाप श्रीचंद को बुलवा लिया गया| दोनों ही आ गए थे| वो दोनों घबराए हुए थे ये सोचकर कि कहीं सुमन ने यहाँ भी तो कोई काण्ड नहीं कर दिया| उन दोनो को सुमन के पास भेज दिया गया उसके कमरे में| सुमन ने पूरा मामला उन्हें समझा दिया| जो दोनों अभी तक घबराए हुए थे, अब वो एकदम से शेर बनकर कमरे से बाहर निकले और चीखना चिल्लाना शुरू कर दिया| सुमन का भाई तो कुछ ज्यादा ही चिल्ला रहा था “नाल घुसेड दूंगा, गोली मार दूंगा, मेरी बहन की जिन्नगी बर्बाद कर दी” उधर श्रीचंद भी काफी कुछ चिल्ला रहा था| सोमदत्त और बेला बहुत ज्यादा घबरा गये थे| लेकिन गोपालचंद के चेहरे पर घबराहट नहीं थी| फिर गोपालचंद ने सुमन के भाई का कन्धा पकड़ कर उसे दुसरे कमरे में ले जाने की कोशिश की तो उसने हाथ झटक दिया और अब वो गलियां देने लगा| लेकिन फिर गोपालचंद ने थोडा जबरदस्ती करके उसे कमरे में ले ही गए| सुमन के भाई ने बडबडाते हुए कहा “गोली मरूँगा अभी” गोपालचंद ने तुरंत कहा “बेट्टा गोली तो तेरी भोत देख रक्खी, दो बेर तो सुमन कु मैन्ने ई पकड़ा हा| उन्मै सै तो किसी बी लोंडे कु तैन्ने गोली ना मारी” इतना सुनते ही सुमन का भाई अब एकदम शांत हो गया था| गोपालचंद ने फिर कहा “अर उस दुसरे वाले लोंडे नै तो तेरी बाहन के गैल क्या नि करा? भरी पंचात फैसला हुआ हा अक ब्याह होगा| क्या हुआ? फेर खुल्कै घुमाई आर टैम पै नाट गिया वो ब्याह कु” सुमन के भाई को समझ ही नहीं आ रहा था क्या कहे? उसने शब्दों को मुहँ में ही घुमाते हुए कहा “मास्जी मज़बूरी का फादा ठारे तम तो.....जो इन्होनै करा यो ठीक है क्या?....अर ये क्यूँ करते म्हारे गैल तो तमनै ई करा यो धोक्खा” गोपालचंद ने सुमन के भाई के दोनों कंधो अपने हाथो से को दबाते हुए कहा “भाई यो हो गिया तो भला हो गिया| ना तो सुमन का कुछ होत्ता दिख ना राहा| क्या होत्ता? बदनाम्मी इतनी होगी ही के रिश्ता तो होना भारी होरा हा| कुछ दिन बाद जहर खात्ति या फान्सी खात्ति” इन सवालो का वाकई में सुमन के भाई के पास कोई जवाब नहीं था| वो चुप हो गया था| अब गोपालचंद ने श्रीचंद को भी कमरे के भीतर बुला लिया| श्रीचंद की आँखों में हलके से आंशु थे| श्रीचंद के आते ही गोपालचंद ने कहना शुरू किया “भाई श्रीचंद मेरी बात सुनिए थोडा ठन्डे दिमाग सै| भाई यो बता ज़मीन-जायदाद, घर-घेर, रहन-सहन, खान-पान इन मामलो में कोई कमजोरी यहाँ?... तो बता भाई|” श्रीचंद के पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं था| गोपालचंद ने फिर कहा “भाई शर्मा जी तेरे घर बार सै जादा जुगाड़ ना हो तो बता दे..... तेरै एक लोंडा, अर भाई यहाँ दो लोंडे...फेर बी तेरे लोंडे सै जादा जुगाड़ जयराम के हिस्से मै ना आवै तो बता दे| भाई जब तू जुत्ते घिसता फिररा हा, अर कहीं बी जुगाड़ ना बनरा हा तो भाई तुझै सपना बी हा कि ऐसा रिश्ता हो जागा” थोडा रूककर गोपालचंद ने पुन: कहा “भाई शिकल सूरत बी देक्खै तो जैसी लोंडी वैसा लोंडा” श्रीचंद इन सब सवालो पर चुप था| क्योंकि सारी बाते अक्षरश: सही थीं| सोमदत्त की आर्थिक स्थिति और जीवन स्तर श्रीचंद से कहीं ज्यादा बेहतर थी और पुराने साहूकार घराने के वंशज होने के नाते सोमदत्त की श्रीचंद से कहीं ज्यादा सामाजिक प्रतिष्ठा थी| श्रीचंद और उसके बेटे के कुछ समझ ही नहीं आ रहा था क्या कहें? श्रीचंद के बेटे ने कहा “मास्जी नौकरी कु कही ही अर यो तो कुपढ़ है” गोपालचंद ने तुरंत कहा “लाल्ला यो रतन सेन का घराना है| नौकरी के मायने तेरे लिए होंगे इनके लिए ना” इस बात पर तुरंत ही श्रीचंद बोल पड़ा “रतन सेन का तो बस नाम है मास्टरजी। उसकी तो बात इ ना करो” गोपालचंद ने तुरंत प्रत्युत्तर किया “भाई शर्मा जी बड़ी हांडी की पुच्छन बी भतेरी हो” गोपालचंद ने दोनों बाप-बेटे के चेहेरों को देखा| दोनों पर गोपालचंद की बातों का सकारात्मक असर हो रहा था| गोपालचंद ने फिर कहा “भाई जितना मामला बिगड़ा पड़ा हा उसके बाद भी सुमन का भले अर बड़े घर मै रिश्ता जुड़ गिया| अब अगर तुम दोन्नो इस बात कु नूं बिगड़ना चाहरे तो भाई थारी मर्जी| पर यो तो बता दो के सुमन का क्या करोगे? घर बिठा कै कद लोक रख लोगे?” एक उच्छ्वास के उपरान्त गोपालचंद ने पुन: कहा “भाई शर्मा जी तू रख लेगा तेरी बेट्टी है| पर तेरे बाद तेरा लोंडा या कल कु जब इसका ब्याह हो जागा तो इसकी बहु बी रख लेगी क्या?” गोपालचंद ने अब श्रीचंद की हथेलियों को अपनी हथेलियों में दबाते हुए कहा “अर भाई रही बात कुपढ की तो वो तो जोन से दर्जे की जुरुत होगी वो इ बनवाउआं| वो भाई जब नौकरी का मामला कोई बनेगा तब की तब देक्खेंगे” अब श्रीचंद ने आशा भरी दृष्टी गोपालचंद पर डाली| गोपालचंद ने देखा कि मामला अब पूरी तरह से बन रहा है तो कहा “भाई शर्मा जी नौकरी तो मेरे जिम्मे तो वो तो चिंता ई छोड़ दो| अर भाई यो वो घर है जहाँ नौकरियों सै घर के खर्चे ना चलते” अब दोनों बाप-बेटे को गोपालचंद पूरी तरह संतुष्ट कर चूका था| श्रीचंद ने कहा “मास्टर जी सुमन तो बिगड़ी पड़ी जी उसै कैसै समझाऊं” गोपालचंद ने कहा “शर्मा जी सुमन कु बी समझाओ, समझ जागी वो भी.....बात बननी चाह बिगडनी ना चाह” इस सब के बाद गोपालचंद ने सुमन से भी अकेले में बात की| सुमन को समझाना गोपालचंद के लिए कोई मुश्किल काम था ही नहीं क्योंकि दो बार सुमन को उसके अलग अलग आशिकों के साथ रंगे हाथो पकड़ा था गोपालचंद ने और मामले को भी दबाया था| .......... इस तरह आखिर सुक्के??? क्षमा चाहूँगा जयराम का वैवाहिक जीवन कितने ही नाटकीय घटनाक्रमो के बाद अपनी सीधी राह पर चल निकला| सुमन को जयराम पूर्ण सुख दे रहा था और फिर सयुंक्त परिवार के बन्धनों ने उसे भी एक शुशील बहु बना दिया| जयराम को अब नौकरी पर जाने का बहाना नहीं करना पड़ता था तो वो अब दिवास्त्रीगमन का सुख भी मौका लगने पर भोग लेता था| जयराम जो पढ़ा लिखा नहीं था, ज्यादा समझदार भी नहीं था बल्कि कहिये बेवकूफ था| उसने वो ही काम शुरू किया जिसे करने में उसे सुख की प्राप्ति होती थी और जिसमें उसे महारथ प्राप्त था, खेती और पशु पालन| अपने नौकरी के नाटक में उसने शहर की गलियों की खूब ख़ाक छानी थी और वहां के हलवाइयों से बढ़िया जानकारी हो गयी थी| उन हलवाइयो के लिए वो एक निपट बेवकूफ था जिससे वो थोडा मनोरंजन कर लेते थे| जयराम ने दुधारू पशुओ की संख्या बढाई और उन हलवाइयों को ही दूध बेचना शुरू किया| उसकी बेवकूफी एक ब्रांड और विश्वसनीयता का सर्टिफिकेट बन गयी| बेवकूफ था तो इमानदार भी होगा ही, मिलावट नहीं करेगा| वैसे भी इमानदारी को भी तो हमारा समाज बेवकूफी ही मानता है| जयराम का दूध का व्यवसाय खूब चल निकला| अब वो किसी नौकरी वाले से भी ज्यादा कमा रहा था| तो हुआ ना सुखद अंत इस कहानी का जैसा मैंने आपको सुनिश्चित किया था| 

sukke ka byah

0.0(0)

पुस्तक के भाग

no articles);
अभी कोई भी लेख उपलब्ध नहीं है
---

किताब पढ़िए

लेख पढ़िए