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आतंकवाद तेरे कितने रूप ?

3 जून 2016

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वे हमारी जड़ों में तीखा जहर बो रहे हैं ,

और हम हैं  कि जाग कर भी सो रहे हैं .

दूसरों को अंगुली दिखा कर बनते हैं  होशियार

अपने नाक के तले बसे चोरों से न हों ख़बरदार।

                

हम और हमारे नेता सभी कहते फिरते हैं कि पाकिस्तान आतंकवादियों की पाठशाला है और वहाँ पर विभिन्न संगठनों को शरण दी जा रही है। वहाँ की सरकार उनको संरक्षण दे रही है। हम खुद क्या कर रहे हैं ? अपने गिरेबान में झांक कर देखने कि फुरसत किसे है?

हाँ मेरा आशय कल मथुरा के जवाहर बाग में हुए पुपुलिस और वहां में जमें लोगों ने जिस तरह से हिंसा का तांडव किया और फिर उसके घातक परिणाम सामने हैं . दो साल से वहां पर काबिज ये लोग अपनी मनमानी शर्तों को मनवाने के लिए समानांतर  सरकार चलाते रहे और हम सोते रहे . अब जानहानि का ज़िम्मेदार किसे कहेंगे ? 

हम अपने घर में पलने वाले और पाले  जाने वाले आतंकियों की ओर नजर ही नहीं डाल पा रहे हें . हम आतंकवादी शब्द  पुनर्परिभाषित करने की सोचें क्या ? देश में दहशत फैलाने वालों को हम नक्सली , उग्रवादी , अलगाववादी, माफिया  और दबंग कहते हैं . क्या ये  किसी न किसी तरीके से आम नागरिक के जीवन में मुश्किल पैदा नहीं करते हैं। नक्सली प्रभावित क्षेत्रों में वे खुले आम घोषणा करते हैं कि हमें हर परिवार  सदस्य अपनी विद्रोही सेना में बढ़ोत्तरी करने  लिए चाहिए।  हमने कभी सोचा है कि उन परिवारों में कितनी दहशत फैली होगी।  हमें  आतंक के चेहरे से इतने मुखौटे हटा कर सिर्फ एक नाम देना है और  उससे निबटना भी बहुत जरूरी है क्योंकि आतंक सिर्फ एक होता है और उसका सहारा लेकर---- 

जो दहशत फैलाये , 

लोगों का जीवन मुश्किल कर दे , 

उनका शोषण करे ,

 उनके संवैधानिक अधिकारों से वंचित कर उन्हें अपनी मर्जी  अनुसार जीने को विवश करे।  

 आम आदमी के घर की बहू और बेटियां जहाँ सुरक्षित न हों।  बहू बेटियां तो बड़ी हो जाती हैं , यहाँ  दुधमुंही बच्चियों से लेकर बचपन के आगोश में बेखबर बच्चियों का जीवन तक सुरक्षित न हो , 

बलात श्रम करवाकर अपने स्वार्थ सिद्ध करने वाले लोगों को हम किस श्रेणी में रख सकते हैं। 

माफिया चाहे वे किसी भी क्षेत्र के क्यों न हों ? 

 ये सभी तो अपने दबदबे को प्रयोग करके लोगों को आतंकित कर रहे हैं।  फिर इसको भी हमें  आतंकवादी  की श्रेणी में क्यों नहीं रखना चाहिए ? 


आम तौर पर तो हम देश की सीमाओं में बलात घुस कर आने वाले पडोसी देशों या एक विचारधारा विशेष के शिकार लोग, क़ानून भंग  करके लोगों में दहशत फैलाने वालों,  को  ही आतंकवादी कहते आ रहे हैं।  इस अलगाववादी विचारधारा वाले लोग देश के नागरिकों को भी बरगला कर अपने कामों को अंजाम देने के लिए मजबूर करने वाले , या फिर नयी पीढ़ी को धन का लालच देकर उन्हें दिग्भ्रमित करने वाले , उनका ब्रेन वाश करके अपने घर के विरुद्ध खड़े करने वाले भी इसी श्रेणी में आते हैं लेकिन वे धर्म विशेष से जुड़े हुए लोग हैं , जो सिर्फ हमारे देश में ही नहीं बल्कि अपनी अलग क़ानून व्यवस्था को स्थापित करने के लिए दूसरे देशों में भी सक्रिय हैं।  


  उनसे निपटने के लिए हमारी सेना है , हमारी खुफिया एजेंसी हैं जो हमें इसके आगमन और इसके बुरे इरादे से अवगत करा कर सतर्क करती हैं।  कई बार हम बच जाते हैं और इन आतंकवादियों के मंसूबे ध्वस्त कर देते हैं और कई बार हमारे जवान इनकी चालों का शिकार होकर शहीद हो जाते हैं।


हमारे अपने देशवासी , इसी जमीन पर जन्मे ,पले और जीवन जीने वाले जब उपरिलिखित कामों को अंजाम देते हैं तो उन्हें आतंकवादी क्यों न कहा जाय ?  उनके लिए ही सजा मुक़र्रर क्यों न की जाय ? देश के इन आतंकवादियों को बचाने के लिए - राजनैतिक हस्तियां , दबंग , बड़े बड़े पैसे वाले और रसूख वाले खड़े होते हैं।  उन्हें सजा तो क्या बाइज्जत बरी तक दिया जाता है। खतरा हमें बाहर के दुश्मनों से जितना है उससे कहीं अधिक देश में फैले हुए सफेदपोश आतंकवादियों से है। उनको बेनकाब करने का काम न पुलिस कर पाती है और न ही मीडिया। क्योंकि इन लोगों के शरणदाता  रसूखवाले होते हैं

गुरमुख सिंह

गुरमुख सिंह

अति सुंदर रचना !

3 जून 2016

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रचनाएँ
merasarokar
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लघुकथा ! बहुत दिनों से सोच रही थी कि कभी किसी वृद्धाश्रम में जाऊं और वहाँ रहने वाले बुजुर्गों से मिलूँ - कुछ पल उनके साथ बैठ कर शायद कुछ पा सकूं और कुछ दे सकूं। पता चला कि घर से कुछ ही किलोमीटर की दूर पर एक वृद्धाश्रम है। उस दिन निकल ही ली। वृद्धाश्रम के परिसर में गुट बनाकर बैठे बुजुर्ग हँस रहे थे , बातें कर रहे थे, पुरुष औरमहिलायें दोनों ही थे। लग रहा था कि जैसे एक परिवार जैसा हो। वही देखा दूर बेंच पर एक</s
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जल संरक्षण !

3 मई 2016
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         इस समय सिर्फ एक जगह नहीं बल्कि सम्पूर्ण देश के कई भागों में जल के लिए त्राहि त्राहि मची हुई है . पथरीले इलाकों और सूखा ग्रस्त क्षेत्रों में तो हालत और भी ख़राब है . इसी देश की बात कर रहे हैं और अपने शहर की भी . कई इलाके पानी की कमी से जूझ रहे हैं और जहाँ पर अभी पानी मिल रहा है , वहां के कुछ 

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रूटीन चैकअप डे

14 मई 2016
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जीवन की बढ़ती  आपाधापी और दूर दूर फैले कार्यक्षेत्र में लगने वाले समय ने और खाने पीने की नयी नयी सुविधाओं ने जीवन  सहज बना दिया है लेकिन शरीर को जल्दी ही दवाओं पर निर्भर भी बनाता जा रहा है।                      हम रोज ही किसी न किसी रोग को लेकर 'दिवस ' मनाते है किसलिए ? सिर्फ लोगों में उसके प्रति जाग

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तुलना करें : सोच समझ कर !

20 मई 2016
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                                     हम जीवन में बेटों को दोष देते हैं कि वह  पत्नी और बच्चों पर अधिक ध्यान देते हैं।  ऐसा है भी कहीं बेटे अपने माता पिता के प्रति  गैर जिम्मेदार भी होते हैं ,लेकिन वहां पर माता पिता उनकी आलोचना करने में संकोच भी करते हैं . लेकिन वहां पर जहाँ  जब बेटा पूरा पूरा ध्यान

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तस्वीरें और यादें

21 मई 2016
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कुछ धुँधली सी यादों पर जब पड़ जाती है उजली सी तस्वीरों का चमकता हुआ सूरज। फिर क्यों ?वापस हम जीने लगते हैं अतीत के उन पीले होते हुए पन्नों को। कुछ मधुर कुछ तिक्त कुछ कटु सब गुजरे  हुए पल फिर से जीने के लिए उन तस्वीरों में घुस जाऊं। उन पलों को फिर से चुरा लाऊँ। कैसे भी ?बस एक बार बच्चों का वही बचपन वह

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रिश्तों की बगिया

21 मई 2016
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हाँ मैं रिश्ते बोती हूँ , धरती पर उन्हें रोपकर निश्छल प्यार ,निस्वार्थ भाव,और अपनेपन की खाद - पानी देकर उनको पालती हूँ। धूप , पानी और शीत से कभी बहा कर पसीना कभी देकर सहारा कभी पौंछ कर आंसू उन्हीं के लगाकर काँधे समेत कर सिसकियाँ बेटी , बहन और बहू के रिश्ते जीवन में संजोती हूँ । बेटे , भाई और दोस्त क

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अनुबंध - प्रतिबन्ध !

23 मई 2016
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शब्दों पर पहरे,कलम पर पहरे,कहाँ देखे?किसने देखे?उसके  जख्म गहरे .जुबां वह बोले जो उन्हें पसंद हो,जो उनके अहम् को बनाये रखने का अनुबंध हो।फिर क्या समझे ?एक रोबोट ही न काम सारे , दायित्व सारे,अधिकारों पर प्रतिबन्ध हो।क़ानून बने और बनते रहेंगे,इस चारदीवारी में वही क़ानून और वही दंड है। अकेले बंद कमरे में

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पाठ्यक्रम : नैतिक और सांस्कृतिक मूल्य !

2 जून 2016
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                           शिक्षा मानव जीवन की ऐसी नींव डालता है , जो उसके मनो-मष्तिष्क में गहरे पैठ जाती है और इसके कारण ही बच्चों के जीवन में संस्कार या फिर अपने समाज , देश और परिवार के प्रति एक अवधारणा बन जाती है।  चाहे घर हो , स्कूल हो या फिर उसका अपना दायरा - उसके चरित्र के निर्माण में महत्वपूर

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                               दिन पर दिन बढती जा रही  हमारी वैज्ञानिक प्रगति और नए संसाधनों से हम सुख तो उठा रहे हैं लेकिन अपने लिए पर्यावरण में विष भी घोल रहे हैं . हाँ हम ही घोल रहे हैं . प्रकृति के कहर से बचने के लिए हम अब कूलर को छोड़ कर किसी तरह से ए सी खरीद कर ठंडक का सुख उठाने लगे हैं लेकिन उ

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पीड़ा का अहसास

15 जून 2016
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अंतर की ज्वालामुखी जब पिघलती है लावा बन वो कलम से बहती है .आग उगलती है ,वाह ! वाह ! सुनकर वो सिर पटक कर रो देती है ,दर्द सहा उसने जहर पिया उसने क्या उसकी तपन का अहसास किसी को नहीं होता .नहीं बची संवेदनाएं जो कोई उसकेदर्द को महसूस कर सकता ,जो उस कलम से निकले लफ़्ज़ों की बेबसी , तपिश और खामोशी को तोड़ती

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दोहरी मानसिकता : आखिर कब तक ?

15 जून 2016
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             मेरी एक सहेली वर्षों तक मेरे साथ काम करती आ रही थी।  हम एक दूसरे के साथ करीब २४ साल काम किया है।  उनकी मानसिकता से  मैं परिचित तो अच्छी तरह हूँ।  उन्होंने अपनी बेटी की शादी अंतर्जातीय की और बेटे की खुद खोज कर सजातीय।  फिर शुरू हुआ उनके परिवार में शादी का सिलसिला।   साथ रहे तो एक दूसरे क

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अतीत का दंश

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                  काम करने वाली की पोती आई -' दादी के हाथ में कील घुस गयी है , वो आज नहीं आ पायेगी। 'सुनकर गृहस्वामिनी के पैरों तले जमीन खिसक गयी , कैसे करेगी यह सब, अपने ही काम नहीं निबट पाते  हैं . अचानक मालकिन वाली बुद्धि जागृत हुई - 'सुन तू मेरे सारे  बर्तन साफ कर दे। तेरी दादी अब तुझे बना कर त

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पितृ दिवस पर

18 जून 2016
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पापा बहुत याद आते हो ,अनजाने में पकड़ा कर कलम विरासत में दीं ये कवितायेँ ये कहानियां और ये लेख .सारी संवेदनाएं सारी ममता , करुणा कब दे दी मुझे ये पता ही नहीं चला .मैं लिखती रही तुम पढ़ते रहे पर कभी न बताया ये कलम विरासत में मिली है .उन्मुक्त सी हंसी बेफिक्री जहाँ की ,गैरों के दुःख को बाँटते सदा देखा .

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लावारिस

19 जून 2016
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                       यह एक कविता मात्र नहीं है बल्कि कितने पिताओं की कहानी है , बहुत पहले लिखी थी और आज पितृ दिवस पर पिता के स्वरूप को सभी परिभाषित कर रहे हैं और मैंने एक पिता के दुःखद अंत को बयां कर श्रद्धांजलि दी है .सुबह का अखबारजब हाथ में आयानजर पड़ीएक तस्वीर परफिर उसका शीर्षक पढ़ासड़क पर फ़ेंक द

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यक्ष प्रश्न

24 जून 2016
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नारी हूँतो यही  प्रश्न है , जीवन समर्पित किया अपनी हर उम्र में बेटी बनी,एक गर्भ से,एक घर में, जन्म लेकर पली बढ़ी  सब कुछ किया.पर कही पराया धन ही गयी.बेटा सब कुछ पा  गया.उसका वही घर बना। मुझको कहा गया --ऐसा 'अपने घर ' जाकर करना ये मेरे वश में नहीं.पराया धनअपनी समझ सेसब कुछ देकर विदा कियाजिनकी अमानत

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साहस तो करती माँ तुम!

24 जून 2016
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माँ मुझको बतलाओक्यों मुझको सौपातुमने इन हत्यारों को?दूर कहीं जाकरफेंका था मुझकोनिर्जन  गलियारों में.बोल नहीं सकती थीपर अहसास तोकर ही सकती थी ,एक फटे कपडे मेंलिपटीकब तक झेल सकी थीमैंबारिश के तेज थपेडों कोचली गईदुनिया की नजरों में.पर बसी हूँअब भीतुम्हारी सूनी आंखों मेंमैंने भी देखा थामाँ तुमकोओंठ भीं

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बनो दीप से

29 जून 2016
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बन सको तो दीपक की मानिंद बनो ,जग रोशन कर जाता है ,खुद जल कर ही सही ,उसका नाम बन चुका है उजाले का पर्याय। कितने दीप बचते हैं जहाँ में ?फिर भी दीप नाम अमर ही तो है।  कौन  जानता है माटी , बाती और तेल को,कुछ भी तो नहीं है सब का संयोग ही कहें  या कहें संगठन कहें मिलकर ही सही कोई शिकवा नहीं किसी को किसी

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30 जून 2016
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कोई शब्द या वाक्य क्या एक पूरे विचार और लेख का वॉयस बन जाता है . बेटी या लड़कियों के प्रति हमारा नज़रिया दिन पर दिन बदलता जा रहा है लेकिन वह कितने प्रतिशत में ? हम क्या इसके बारे में कोई अनुमान लगा सकते हैं ? शायद नहीं .            आज सिर्फ एक संवाद सुना और पता नहीं कितने सवाल पैदा हो गये ? क्या पुरुष

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1 जुलाई 2016
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आज डॉक्टर्स डे है और वाकई डॉक्टर्स जो भगवान का रूप है इसी दुनियां में हैं।  उनका एक ही धर्म होता है और वह है मानव सेवा।  कभी कभी तो वह अपने पास से पैसे भी देकर सेवा कर जाते हैं।  आज का दिन वाकई ऐसे ही लोगों के लिए नमन का दिन है।  आज के दिन मैं एक डॉक्टर के साथ अपने अनुभव को साझा कर रहे है।         

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1 जुलाई 2016
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अखबार में पढ़ी हुई कई घटनाएँ हमें विचलित कर जाती हैं लेकिन कुछ तो  अपने पीछे इतने सारे प्रश्न छोड़ जाती हैं कि उनके उत्तर खोजने में और कितने सवाल सामने उठ खड़े होते हैं।  सभी प्रश्न हमारे समाज के हो रहे नैतिक अवमूल्यन से जुड़े होते हैं।  हमें झकझोर  देते हैं लेकिन फिर भी उन घटनाओं को पढने वालों में से क

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फर्ज बेटे का !

8 अगस्त 2016
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           जीवन में बेटे अपना फर्ज निभाते है और अपने माता-पिता या फिर अपने पालने वाले की देखभाल करते हैं और हमारे सामाजिक मूल्यों के अंतर्गत यही न्यायसंगत माना जाता है. लेकिन बदलते हुए परिवेश और सामाजिक वातावरण में बेटे इस कार्य को न भी करें तो कोई अचरज की बात नहीं समझी जाती है. माता-पिता अगर सक्षम

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तीन चरित्र : आज फिर

28 सितम्बर 2016
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जीवन में लोगों के लिए , ये तीनों महान आत्माएं प्रश्नों के उत्तर लेकर फिर से आयीं हैं। कलयुग में उठ रहे प्रश्नों को लेकर अपने चरित्र पर उछलते कीचड से बचाने को अपने अस्तित्व को खुद आये हैं। ये तीनों राम , सीता और लक्ष्मण हैं। हम बार बार उठाते है प्रश्न ?राम को कायर , विवश और स्वार्थी

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ठंडा ठंडा - कूल कूल : कितना घातक ?

2 अक्टूबर 2016
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आज की जीवन शैली और जीवन में बढ़ता तनाव - इंसान को परेशान करके रखा है। चाहे ऑफिस वालों , चाहे बिज़नेस वालों या फिर चाहे कॉर्पोरेट जगत में लगे लोग हों। अपनी जगह को , अपनी साख को या फिर अपने परिवार को सुख से रखने के लिए संघर्ष की स्थिति से गुजरने वालों लोगों की संख्या करीब करीब 80 % है। इसमें महिला

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अपनी पसंद !

14 अक्टूबर 2016
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हम लड़के और लड़कियों के भेद को ख़त्म करने के लिए सतत प्रयास कर रहे है लेकिन आज भी आज की पीढी में ऐसे लोग हैं , जिन्हें सिर्फ और सिर्फ लड़के चाहिए। इसके पीछे उनकी क्या मानसिकता है ? इसको इस घटना से समझा जा सकता है। बात अभी कल की ही है मेरे एक रिश

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