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वाह रे! विधाता

18 सितम्बर 2021

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भाग-4 ("वाह रे! विधाता")

दुलहन को घर में लाया गया, आगे की रस्मों की तैयारी होने लगी। आस-पास की जो महिलायें वहाँ उपस्थित थी उनमें से किसी ने बड़े दुलार से पूछा, "बिटिया, तोहार नाम का है?"।
"जी, हमार नाम...लतिया...लतिया नाम है" थोड़ा सकुचाती हुई और थोड़ा सा शर्माती हुई दुलहन ने  हल्के मुस्कराहट के साथ जवाब दिया।
इतना तो बस सुनना था जैसे सबके चेहरे पर साँप सूंघ गये। सब दुलहन की चेहरे की ओर बड़ी ध्यान और उत्सुकता से देख रहे थें, लेकिन दुलहन ने जैसे अपना नाम बताया इतने में इन्होन्नें वो देख लिया जो उनके लिए किसी शर्मनाक बात से कम न थीं।
हाँ! बात तो कुछ ऐसी ही थी, अधिकत्तर लोगों ने वहाँ से किनारा कर लिया, सभी स्त्रियाँ अपने अपने घरों को लौट गई। यह खबर फैलते देर न लगी। जैसे जंगल में आग फैलती है वैसे ही यह खबर फैली। यहाँ तो आग जंगल से भी तेज फैली, पूरे गांव में खबर में तो यह खबर फैली ही अन्य गांवों में भी यह खबर फैल गई।
जैसे जंगल में आग की लपटों के साथ-साथ धुआँ और राख उड़कर अपने चारों तरफ फैलती है वैसे ही यहाँ इस खबर के साथ-साथ अफवाहों का भी सिलसिला शुरू हो गया।
    जब यह बात चन्दन को पता चली कि, "दुलहन के दाँत इतने भद्दे व खराब हैं,,,मसूड़े तो जैसे सड़ ही गये हैं,,,, दाँत पूरे काले हो चुके हैं " तो अब क्या? उसकी तो जिंदगी की जैसे लुटिया ही डूब गई। विधाता ने उसके साथ ये कैसा क्रूर मजाक किया? अब करता भी क्या? सिर पिट कर रह गया।  जिसने भी यह खबर सुनी सबके मुहँ से एक ही बात निकली- "वाह रे! विधाता"। इतना ही कहकर सब मन मसोस कर रह गये।
शाम हो गई लेकिन चन्दन अकेले कमरे में सोया रहा और ईश्वर को कोसता रहा। वह दुलहन के पास न गया। घर में किसी के भी पास न गया ना किसी से कुछ बोला। चन्दन के ऊपर जो बीत रही थी वह दूसरा कोई क्या समझता? लेकिन इससे थोड़ी ही किसी को मतलब था उस दुलहन पर क्या बीत रही होगी, वह भी अपने भाग्य को कोसने लगी कि ईश्वर ने उसे अपने पास क्यों नहीं बुला लिया। आखिर उसमें उसका क्या कसूर है? पर होनी को तो जो होना था वो हो चुका था या यूँ कहें कि होनी को जो होना चाहिए वो नहीं हुआ था।
चन्दन को अपनी माँ और पिता हरखू दोनों पर खींझ आ रही थीं। वह अकेले बिस्तर पर लेटा, तरह-तरह की बातें सोचता रहा। अचानक उसे कुछ याद आया, मंटों की एक कहानी "इश्क-ए-हकीकी" यहीं याद आया उसे। घर आते समय जब वह ट्रेन में यात्रा कर रहा था तब उसने बगल वाले सीट पर बैठे यात्री के पास से मांगकर जो किताब पढ़ी थी उसका नाम तो भले ही न मालूम हो लेकिन यह किस्सा जरूर याद आया। उस वक्त तो पढ़कर खूब आनन्द आया था लेकिन जब इस समय याद आया तो उतना ही मंटो से नफरत सा हो गया।
     जिंदगी की तो यही सच्चाई है, किसी और की जिंदगी के किस्से पढ़कर जितना आनन्द आता है। यदि वहीं किस्से हमारी जिंदगी में घटित होने लग जाये तो वह आनंद, दु:ख के सिवा और कुछ नहीं रह जाता। हर किसी को एक दूसरे की जिंदगी आसान और अपनी कठिन लगती है। 


इस किताब "बाबू चंदन" श्रेणी का अगला और अन्तिम अध्याय पढ़े - "जो हुआ सो हुआ"

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धन्यवाद!  🙏

-रवि कुशवाहा 

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बाबू चंदन
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एक सामाजिक व मनोरंजक किस्म का व्यंग्यात्मक लहजे में आपके सामने पेश होने जा रही है यह छोटी सी कहानी "बाबू चंदन "। जो चंदन की जिंदगी की किस्सों के सााथ-साथ उस मोड़ पर पहुँँचती है, जहाँ एक पल के लिए चंदन ठगा सा रह जाता है जिसकी अभी नयी-नवेली शादी हुई है। लेकिन कहते हैं ना किस्मत का पहिया हमेशा घूमता है, तो आगे क्या होता है? यह जानने के लिए पूरा पढ़े "बाबू चंदन"।

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