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एकात्म मानववाद

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एकात्म मानववाद एक राजनीतिक कार्यक्रम के रूप में  पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी  द्वारा तैयार की गई अवधारणा थी   और 1965 में जनसंघ के आधिकारिक सिद्धांत के रूप में इसे  अपनाया गया था। इस सिद्धांत की व्याख्य

बुआ शब्द सुन,लता की आंँखें फटी की फटी रह गईं।प्रश्न भरी निगाहों से सुनील की तरफ देखा।वो नजरें चुरा रहा था।सुनील से बोली, "क्या जवाब दूंँ !बताइए ना।"दूर से, तरसती आंँखों से माँ भी बेटे के जवाब का इंतजा

निशा मेरा टावल कहां है ।ओहो कितनी बार कहा है तुमसे मेरी सारी चीजें निकाल कर सही समय पर मुझे दे दिया करो पर तुम हो के सुनती ही नही।" पचपन साल के सुरेंद्र जी अपनी बावन साल की पत्नी निशा पर बरसने लगे जब

हाय राम ! ये बहू है या आलस की पुड़िया। कोई काम भी पूरा नही करती ।ये देखो कोने मे कचरा पड़ा रह गया और ये महारानी कह रही है कि इसने झाड़ू लगा दी।देखो सूखे कपड़े भी ज्यों के त्यों पड़े है यूं नही कि सब क

मां ... मां  तुम रो कयो रही हो ,बताओ ना मां.."शिल्पी एकदम से हड़बड़ा कर उठी। कर्ण ने उसको झिंझोड़कर उठाया,"क्या हुआ है शिल्पी तुम नींद मे बडबडाते हुए क्यों रो रही हो?"शिल्पी ने जब अपने आप को सम्ह

आज हर जगह निर्भया ही निर्भया का जिक्र हो रहा है।क्या आप ने कभी सोचा।केवल शारीरिक शोषण ही शोषण नही होता ।मानसिक शोषण भी एक प्रकार का बलत्कार ही है बस कोई घटना प्रकाश मे आ जाती है तो चारों तरफ त्राहि त्

आज निशा का मन बडा उदास था।मन किसी भी काम में नही लग रहा धा।पति और बच्चों  को स्कूल और ऑफिस  भेज कर वह बरतनों  को समेटने लगी।पर मन तो कहीं  टिक ही नहीं  रहा था।सब कुछ छोड़ कर न

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परिचय: "एकात्म मानववाद" एक विचारशीलता है जो मानवता के समानता, एकता, और सामाजिक न्याय की प्रमुख भूमिका देती है। इस विचारशीलता के अनुसार, सभी मानवों को बिना किसी भिन्नता के समान अधिकार और स्वतंत्रता की

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