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द्वाभा के एकाकी प्रेमी

30 अप्रैल 2022

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द्वाभा के एकाकी प्रेमी,

नीरव दिगन्त के शब्द मौन,

रवि के जाते, स्थल पर आते

कहते तुम तम से चमक--कौन?

सन्ध्या के सोने के नभ पर

तुम उज्ज्वल हीरक सदृश जड़े,

उदयाचल पर दीखते प्रात

अंगूठे के बल हुए खड़े!

अब सूनी दिशि औ’ श्रान्त वायु,

कुम्हलाई पंकज-कली सृष्टि;

तुम डाल विश्व पर करुण-प्रभा

अविराम कर रहे प्रेम-वृष्टि!

ओ छोटे शशि, चाँदी के उडु!

जब जब फैले तम का विनाश,

तुम दिव्य-दूत से उतर शीघ्र

बरसाओ निज स्वर्गिक प्रकाश!

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रचनाएँ
पल्लविनी
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पल्लव सुमित्रानंदन पंत का तीसरा कविता संग्रह है जो 1928 में प्रकाशित हुआ था। यह हिन्दी साहित्य में छायावादी युग के प्रारंभ का समय था और इसकी लगभग सभी कविताएँ प्रकृति के प्रति प्रेम में डूबी हुई हैं। माना जाता है कि पल्लव में सुमित्रानंदन पंत की सबसे कलात्मक ऐसी 32 कविताओं का संग्रहीत हैं जो 1918 से 1925 के बीच लिखी गई थीं। इस संबंध में हजारी प्रसाद द्विवेदी जी कहते हैं- ‘‘पल्लव बिलकुल नये काव्य-गुणों को लेकर हिन्दी साहित्य जगत में आया।..पन्त में कल्पना शब्दों के चुनाव से ही शुरू होती है। छन्दों के निर्वाचन और परिवर्तन में भी वह व्यक्त होती है। उसका प्रवाह अत्यन्त शक्तिशाली है। जब प्रकृति और मानव-सौन्दर्य के प्रति कवि के बालकोचित औत्सुक्य और कुतूहल के भावों का सम्मिलन होता है तो ऐसे सौन्दर्य की सृष्टि होती है |
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विनय

30 अप्रैल 2022
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मा! मेरे जीवन की हार तेरा मंजुल हृदय-हार हो, अश्रु-कणों का यह उपहार; मेरे सफल-श्रमों का सार तेरे मस्तक का हो उज्जवल श्रम-जलमय मुक्तालंकार। मेरे भूरि-दुखों का भार तेरी उर-इच्छा का फल हो, तेरी

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झर पड़ता जीवन डाली से

30 अप्रैल 2022
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झर पड़ता जीवन-डाली से मैं पतझड़ का-सा जीर्ण-पात! केवल, केवल जग-कानन में लाने फिर से मधु का प्रभात! मधु का प्रभात!--लद लद जातीं वैभव से जग की डाल-डाल, कलि-कलि किसलय में जल उठती सुन्दरता की स्वर्

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आशंका

30 अप्रैल 2022
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यदि जीवन संग्राम नाम जीवन का, अमृत और विष ही परिणाम उदधि मंथन का सृजन प्रथा तब प्रगति विकास नहीं है बुद्धि और परिणति ही कथा सही है! नित्य पूर्ण यह विश्व चिरंतन पूर्ण चराचर, मानव तन मन, अंतर्वा

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मोह

30 अप्रैल 2022
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छोड़ द्रुमों की मृदु-छाया, तोड़ प्रकृति से भी माया, बाले! तेरे बाल-जाल में कैसे उलझा दूँ लोचन? भूल अभी से इस जग को! तज कर तरल-तरंगों को, इन्द्र-धनुष के रंगों को, तेरे भ्रू-भंगों से कैसे बिंधवा द

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याचना

30 अप्रैल 2022
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बना मधुर मेरा जीवन! नव नव सुमनों से चुन चुन कर धूलि, सुरभि, मधुरस, हिम-कण, मेरे उर की मृदु-कलिका में भरदे, करदे विकसित मन। बना मधुर मेरा भाषण! बंशी-से ही कर दे मेरे सरल प्राण औ’ सरस वचन, जैस

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प्रथम रश्मि

30 अप्रैल 2022
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प्रथम रश्मि का आना रंगिणि! तूने कैसे पहचाना? कहाँ, कहाँ हे बाल-विहंगिनि! पाया तूने वह गाना? सोयी थी तू स्वप्न नीड़ में, पंखों के सुख में छिपकर, ऊँघ रहे थे, घूम द्वार पर, प्रहरी-से जुगनू नाना।

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बादल

30 अप्रैल 2022
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सुरपति के हम हैं अनुचर , जगत्प्राण के भी सहचर ; मेघदूत की सजल कल्पना , चातक के चिर जीवनधर; मुग्ध शिखी के नृत्य मनोहर, सुभग स्वाति के मुक्ताकर; विहग वर्ग के गर्भ विधायक, कृषक बालिका के जलधर !

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परिवर्तन

30 अप्रैल 2022
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(१) अहे निष्ठुर परिवर्तन! तुम्हारा ही तांडव नर्तन विश्व का करुण विवर्तन! तुम्हारा ही नयनोन्मीलन, निखिल उत्थान, पतन! अहे वासुकि सहस्र फन! लक्ष्य अलक्षित चरण तुम्हारे चिन्ह निरंतर छोड़ रहे हैं ज

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आज शिशु के कवि को अनजान

30 अप्रैल 2022
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आज शिशु के कवि को अनजान मिल गया अपना गान! खोल कलियों के उर के द्वार दे दिया उसको छबि का देश; बजा भौरों ने मधु के तार कह दिए भेद भरे सन्देश; आज सोये खग को अज्ञात स्वप्न में चौंका गई प्रभात; ग

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लाई हूँ फूलों का हास

30 अप्रैल 2022
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लाई हूँ फूलों का हास, लोगी मोल, लोगी मोल? तरल तुहिन-बन का उल्लास लोगी मोल, लोगी मोल?   फैल गई मधु-ऋतु की ज्वाल, जल-जल उठतीं बन की डाल; कोकिल के कुछ कोमल बोल लोगी मोल, लोगी मोल? उमड़ पड़ा पा

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तेरा कैसा गान

30 अप्रैल 2022
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(क) तेरा कैसा गान, विहंगम! तेरा कैसा गान? न गुरु से सीखे वेद-पुराण, न षड्दर्शन, न नीति-विज्ञान; तुझे कुछ भाषा का भी ज्ञान, काव्य, रस, छन्दों की पहचान? न पिक-प्रतिभा का कर अभिमान, मनन कर, मनन,

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कब से विलोकती तुमको

30 अप्रैल 2022
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कब से विलोकती तुमको ऊषा आ वातायन से? सन्ध्या उदास फिर जाती सूने-गृह के आँगन से! लहरें अधीर सरसी में तुमको तकतीं उठ-उठ कर, सौरभ-समीर रह जाता प्रेयसि! ठण्ढी साँसे भर! हैं मुकुल मुँदे डालों पर,

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प्रिये, प्राणों की प्राण

30 अप्रैल 2022
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प्रिये, प्राणों की प्राण! न जाने किस गृह में अनजान छिपी हो तुम, स्वर्गीय-विधान! नवल-कलिकाओं की-सी वाण, बाल-रति-सी अनुपम, असमान-- न जाने, कौन, कहाँ, अनजान, प्रिये, प्राणों की प्राण! जननि-अंचल

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मुसकुरा दी थी क्या तुम प्राण

30 अप्रैल 2022
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मुसकुरा दी थी क्या तुम, प्राण! मुसकुरा दी थी आज विहान? आज गृह-वन-उपवन के पास लोटता राशि-राशि हिम-हास, खिल उठी आँगन में अवदात कुन्द-कलियों की कोमल-प्रात। मुसकुरा दी थी, बोलो, प्राण! मुसकुरा दी थ

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तुम्हारी आँखों का आकाश

30 अप्रैल 2022
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तुम्हारी आँखों का आकाश, सरल आँखों का नीलाकाश खो गया मेरा खग अनजान, मृगेक्षिणि! इनमें खग अज्ञान। देख इनका चिर करुण-प्रकाश, अरुण-कोरों में उषा-विलास, खोजने निकला निभृत निवास, पलक-पल्लव-प्रच्छाय-न

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नवल मेरे जीवन की डाल

30 अप्रैल 2022
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नवल मेरे जीवन की डाल बन गई प्रेम-विहग का वास! आज मधुवन की उन्मद वात हिला रे गई पात-सा गात, मन्द्र, द्रुम-मर्मर-सा अज्ञात उमड़ उठता उर में उच्छ्वास! नवल मेरे जीवन की डाल बन गई प्रेम-विहग का वास!

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मधुवन

30 अप्रैल 2022
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आज नव-मधु की प्रात झलकती नभ-पलकों में प्राण! मुग्ध-यौवन के स्वप्न समान, झलकती, मेरी जीवन-स्वप्न! प्रभात तुम्हारी मुख-छबि-सी रुचिमान! आज लोहित मधु-प्रात व्योम-लतिका में छायाकार खिल रही नव-पल्ल

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आज रहने दो यह गृह-काज

30 अप्रैल 2022
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आज रहने दो यह गृह-काज, प्राण! रहने दो यह गृह-काज! आज जाने कैसी वातास छोड़ती सौरभ-श्लथ उच्छ्वास, प्रिये लालस-सालस वातास, जगा रोओं में सौ अभिलाष। आज उर के स्तर-स्तर में, प्राण! सजग सौ-सौ स्मृतिया

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प्राण! तुम लघु-लघु गात

30 अप्रैल 2022
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प्राण! तुम लघु-लघु गात! नील-नभ के निकुंज में लीन, नित्य नीरव, निःसंग नवीन, निखिल छबि की छबि! तुम छबि-हीन, अप्सरी-सी अज्ञात! अधर मर्मर-युत, पुलकित अंग, चूमतीं चल-पद चपल-तरंग, चटकतीं कलियाँ प

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जग के उर्वर आँगन में

30 अप्रैल 2022
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जग के उर्वर-आँगन में बरसो ज्योतिर्मय जीवन! बरसो लघु-लघु तृण, तरु पर हे चिर-अव्यय, चिर-नूतन! बरसो कुसुमों में मधु बन, प्राणों में अमर प्रणय-धन; स्मिति-स्वप्न अधर-पलकों में, उर-अंगों में सुख-यौ

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वन-वन, उपवन

30 अप्रैल 2022
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वन-वन, उपवन छाया उन्मन-उन्मन गुंजन, नव-वय के अलियों का गुंजन! रुपहले, सुनहले आम्र-बौर, नीले, पीले औ ताम्र भौंर, रे गंध-अंध हो ठौर-ठौर उड़ पाँति-पाँति में चिर-उन्मन करते मधु के वन में गुंजन!

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तप रे मधुर-मधुर मन

30 अप्रैल 2022
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तप रे मधुर-मधुर मन! विश्व-वेदना में तप प्रतिपल, जग-जीवन की ज्वाला में गल, बन अकलुष, उज्ज्वल औ’ कोमल, तप रे विधुर-विधुर मन! अपने सजल-स्वर्ण से पावन रच जीवन की मूर्ति पूर्णतम, स्थापित कर जग में

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मैं नहीं चाहता चिर सुख

30 अप्रैल 2022
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मैं नहीं चाहता चिर-सुख, मैं नहीं चाहता चिर दुख; सुख-दुख की खेल मिचौनी खोले जीवन अपना मुख। सुख-दुख के मधुर मिलन से यह जीवन हो परिपूरण; फिर घन में ओझल हो शशि, फिर शशि से ओझल हो घन। जग पीड़ित है

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देखूँ सबके उर की डाली

30 अप्रैल 2022
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देखूँ सबके उर की डाली किसने रे क्या क्या चुने फूल जग के छबि-उपवन से अकूल? इसमें कलि, किसलय, कुसुम, शूल! किस छबि, किस मधु के मधुर भाव? किस रँग, रस, रुचि से किसे चाव? कवि से रे किसका क्या दुराव!

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आँसू की आँखों से मिल

30 अप्रैल 2022
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आँसू की आँखों से मिल भर ही आते हैं लोचन, हँसमुख ही से जीवन का पर हो सकता अभिवादन। अपने मधु में लिपटा पर कर सकता मधुप न गुंजन, करुणा से भारी अंतर खो देता जीवन-कंपन विश्वास चाहता है मन, विश्वास

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कुसुमों के जीवन का पल

30 अप्रैल 2022
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कुसुमों के जीवन का पल हँसता ही जग में देखा, इन म्लान, मलिन अधरों पर स्थिर रही न स्मिति की रेखा! बन की सूनी डाली पर सीखा कलि ने मुसकाना, मैं सीख न पाया अब तक सुख से दुख को अपनाना। काँटों से कुट

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क्या मेरी आत्मा का चिर धन

30 अप्रैल 2022
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क्या मेरी आत्मा का चिर-धन? मैं रहता नित उन्मन, उन्मन! प्रिय मुझे विश्व यह सचराचर, तृण, तरु, पशु, पक्षी, नर, सुरवर, सुन्दर अनादि शुभ सृष्टि अमर; निज सुख से ही चिर चंचल-मन, मैं हूँ प्रतिपल उन्मन,

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एक तारा

30 अप्रैल 2022
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नीरव सन्ध्या मे प्रशान्त डूबा है सारा ग्राम-प्रान्त। पत्रों के आनत अधरों पर सो गया निखिल बन का मर्मर, ज्यों वीणा के तारों में स्वर। खग-कूजन भी हो रहा लीन, निर्जन गोपथ अब धूलि-हीन, धूसर भुजंग-सा ज

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नौका-विहार

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शांत स्निग्ध, ज्योत्स्ना उज्ज्वल! अपलक अनंत, नीरव भू-तल! सैकत-शय्या पर दुग्ध-धवल, तन्वंगी गंगा, ग्रीष्म-विरल, लेटी हैं श्रान्त, क्लान्त, निश्चल! तापस-बाला गंगा, निर्मल, शशि-मुख से दीपित मृदु-करतल,

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चाँदनी

30 अप्रैल 2022
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नीले नभ के शतदल पर वह बैठी शारद-हासिनि, मृदु-करतल पर शशि-मुख धर, नीरव, अनिमिष, एकाकिनि! वह स्वप्न-जड़ित नत-चितवन छू लेती अग-जग का मन, श्यामल, कोमल, चल-चितवन जो लहराती जग-जीवन! वह फूली बेला की

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जग के दुख दैन्य शयन पर

30 अप्रैल 2022
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जग के दुख-दैन्य-शयन पर यह रुग्णा जीवन-बाला रे कब से जाग रही, वह आँसू की नीरव माला! पीली पड़, निर्बल, कोमल, कृश-देह-लता कुम्हलाई; विवसना, लाज में लिपटी, साँसों में शून्य समाई! रे म्लान अंग, रँग

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सुन्दर मृदु-मृदु रज का तन

30 अप्रैल 2022
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सुन्दर मृदु-मृदु रज का तन, चिर सुन्दर सुख-दुख का मन, सुन्दर शैशव-यौवन रे सुन्दर-सुन्दर जग-जीवन! सुन्दर वाणी का विभ्रम, सुन्दर कर्मों का उपक्रम, चिर सुन्दर जन्म-मरण रे सुन्दर-सुन्दर जग-जीवन! सु

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अप्सरा

30 अप्रैल 2022
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निखिल-कल्पनामयि अयि अप्सरि! अखिल विस्मयाकार! अकथ, अलौकिक, अमर, अगोचर, भावों की आधार! गूढ़, निरर्थ असम्भव, अस्फुट भेदों की शृंगार! मोहिनि, कुहकिनि, छल-विभ्रममयि, चित्र-विचित्र अपार! शैशव की त

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द्रुत झरो जगत के जीर्ण पत्र

30 अप्रैल 2022
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द्रुत झरो जगत के जीर्ण पत्र! हे स्रस्त-ध्वस्त! हे शुष्क-शीर्ण! हिम-ताप-पीत, मधुवात-भीत, तुम वीत-राग, जड़, पुराचीन!! निष्प्राण विगत-युग! मृतविहंग! जग-नीड़, शब्द औ' श्वास-हीन, च्युत, अस्त-व्यस्त प

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गा कोकिल, बरसा पावक कण

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गा, कोकिल, बरसा पावक-कण! नष्ट-भ्रष्ट हो जीर्ण-पुरातन, ध्वंस-भ्रंस जग के जड़ बन्धन! पावक-पग धर आवे नूतन, हो पल्लवित नवल मानवपन! गा, कोकिल, भर स्वर में कम्पन! झरें जाति-कुल-वर्ण-पर्ण घन, अन्ध-न

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वे डूब गए

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वे डूब गए--सब डूब गए दुर्दम, उदग्रशिर अद्रि-शिखर! स्वप्नस्थ हुए स्वर्णातप में लो, स्वर्ण-स्वर्ण अब सब भूधर! पल में कोमल पड़, पिघल उठे सुन्दर बन, जड़, निर्मम प्रस्तर, सब मन्त्र-मुग्ध हो, जड़ित हु

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वे चहक रहीं कुंजों में

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वे चहक रहीं कुंजों में चंचल सुंदर चिड़ियाँ, उर का सुख बरस रहा स्वर-स्वर पर! पत्रों-पुष्पों से टपक रहा स्वर्णातप प्रातः समीर के मृदु स्पर्शों से कँप-कँप! शत कुसुमों में हँस रहा कुंज उडु-उज्वल, लगत

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ताज

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हाय! मृत्यु का ऐसा अमर, अपार्थिव पूजन? जब विषण्ण, निर्जीव पड़ा हो जग का जीवन! संग-सौध में हो शृंगार मरण का शोभन, नग्न, क्षुधातुर, वास-विहीन रहें जीवित जन? मानव! ऐसी भी विरक्ति क्या जीवन के प्रति

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बाँसों का झुरमुट

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बाँसों का झुरमुट संध्या का झुटपुट हैं चहक रहीं चिड़ियाँ टी-वी-टी--टुट-टुट! वे ढाल ढाल कर उर अपने हैं बरसा रहीं मधुर सपने श्रम-जर्जर विधुर चराचर पर, गा गीत स्नेह-वेदना सने! ये नाप रहे निज घर का

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झर पड़ता जीवन डाली से

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झर पड़ता जीवन-डाली से मैं पतझड़ का-सा जीर्ण-पात! केवल, केवल जग-कानन में लाने फिर से मधु का प्रभात! मधु का प्रभात!--लद लद जातीं वैभव से जग की डाल-डाल, कलि-कलि किसलय में जल उठती सुन्दरता की स्वर्

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द्वाभा के एकाकी प्रेमी

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द्वाभा के एकाकी प्रेमी, नीरव दिगन्त के शब्द मौन, रवि के जाते, स्थल पर आते कहते तुम तम से चमक--कौन? सन्ध्या के सोने के नभ पर तुम उज्ज्वल हीरक सदृश जड़े, उदयाचल पर दीखते प्रात अंगूठे के बल हुए खड

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चंचल पग दीप-शिखा-से

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चंचल पग दीप-शिखा-से धर गृह,मग, वन में आया वसन्त! सुलगा फाल्गुन का सूनापन सौन्दर्य-शिखाओं में अनन्त! सौरभ की शीतल ज्वाला से फैला उर-उर में मधुर दाह आया वसन्त, भर पृथ्वी पर स्वर्गिक सुन्दरता का प

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विद्रुम औ मरकत की छाया

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विद्रुम औ' मरकत की छाया, सोने-चाँदी का सूर्यातप; हिम-परिमल की रेशमी वायु, शत-रत्न-छाय, खग-चित्रित नभ! पतझड़ के कृश, पीले तन पर पल्लवित तरुण लावण्य-लोक; शीतल हरीतिमा की ज्वाला दिशि-दिशि फैली कोम

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वह विजन चाँदनी की घाटी

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वह विजन चाँदनी की घाटी छाई मृदु वन-तरु-गन्ध जहाँ, नीबू-आड़ू के मुकुलों के मद से मलयानिल लदा वहाँ! सौरभ-श्लथ हो जाते तन-मन, बिछते झर-झर मृदु सुमन-शयन, जिन पर छन, कम्पित पत्रों से, लिखती कुछ ज्यो

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मंजरित आम्र वन छाया में

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मंजरित आम्र-वन-छाया में हम प्रिये, मिले थे प्रथम बार, ऊपर हरीतिमा नभ गुंजित, नीचे चन्द्रातप छना स्फार! तुम मुग्धा थी, अति भाव-प्रवण, उकसे थे, अँबियों-से उरोज, चंचल, प्रगल्भ, हँसमुख, उदार, मैं स

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अँधियाली घाटी में

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अँधियाली घाटी में सहसा हरित स्फुलिंग सदृश फूटा वह! वह उड़ता दीपक निशीथ का, तारा-सा आकर टूटा वह! जीवन के इस अन्धकार में मानव-आत्मा का प्रकाश-कण जग सहसा, ज्योतित कर देता मानस के चिर गुह्य कुंज-वन

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मानव

30 अप्रैल 2022
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सुन्दर हैं विहग, सुमन सुन्दर, मानव! तुम सबसे सुन्दरतम, निर्मित सबकी तिल-सुषमा से तुम निखिल सृष्टि में चिर निरुपम! यौवन-ज्वाला से वेष्टित तन, मृदु-त्वच, सौन्दर्य-प्ररोह अंग, न्योछावर जिन पर निखिल

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मिट्टी का गहरा अंधकार

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सृष्टि मिट्टी का गहरा अंधकार डूबा है उसमें एक बीज, वह खो न गया, मिट्टी न बना, कोदों, सरसों से क्षुद्र चीज! उस छोटे उर में छिपे हुए हैं डाल-पात औ’ स्कन्ध-मूल, गहरी हरीतिमा की संसृति, बहु रूप-रं

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बापू के प्रति

30 अप्रैल 2022
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तुम मांस-हीन, तुम रक्तहीन, हे अस्थि-शेष! तुम अस्थिहीन, तुम शुद्ध-बुद्ध आत्मा केवल, हे चिर पुराण, हे चिर नवीन! तुम पूर्ण इकाई जीवन की, जिसमें असार भव-शून्य लीन; आधार अमर, होगी जिस पर भावी की संस

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खोलो, मुख से घूँघट

3 अगस्त 2022
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खोलो, मुख से घूँघट खोलो, हे चिर अवगुंठनमयि, बोलो! क्या तुम केवल चिर-अवगुंठन, अथवा भीतर जीवन-कम्पन? कल्पना मात्र मृदु देह-लता, पा ऊर्ध्व ब्रह्म, माया विनता! है स्पृश्य, स्पर्श का नहीं पता, है दृ

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नक्षत्र

3 अगस्त 2022
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मेरे निकुंज, नक्षत्र वास! इस छाया मर्मर के वन में तू स्वप्न नीड़ सा निर्जन में है बना प्राण पिक का विलास! लहरी पर दीपित ग्रह समान इस भू उभार पर भासमान, तू बना मूक चेतनावान पा मेरे सुख दुख, भा

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बादल

3 अगस्त 2022
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सुरपति के हम हैं अनुचर , जगत्प्राण के भी सहचर ; मेघदूत की सजल कल्पना , चातक के चिर जीवनधर; मुग्ध शिखी के नृत्य मनोहर, सुभग स्वाति के मुक्ताकर; विहग वर्ग के गर्भ विधायक, कृषक बालिका के जलधर !

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जीवन-यान

3 अगस्त 2022
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अहे विश्व! ऐ विश्व-व्यथित-मन! किधर बह रहा है यह जीवन? यह लघु-पोत, पात, तृण, रज-कण, अस्थिर-भीरु-वितान, किधर?--किस ओर?--अछोर,--अजान, डोलता है यह दुर्बल-यान? मूक-बुद्बुदों-से लहरों में मेरे व्

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याचना

3 अगस्त 2022
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बना मधुर मेरा जीवन! नव नव सुमनों से चुन चुन कर धूलि, सुरभि, मधुरस, हिम-कण, मेरे उर की मृदु-कलिका में भरदे, करदे विकसित मन। बना मधुर मेरा भाषण! बंशी-से ही कर दे मेरे सरल प्राण औ’ सरस वचन, ज

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मौन-निमन्त्रण

3 अगस्त 2022
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स्तब्ध ज्योत्सना में जब संसार चकित रहता शिशु सा नादान, विश्व के पलकों पर सुकुमार विचरते हैं जब स्वप्न अजान,            न जाने नक्षत्रों से कौन            निमंत्रण देता मुझको मौन ! सघन मेघों का भ

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परिवर्तन

3 अगस्त 2022
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अहे निष्ठुर परिवर्तन! तुम्हारा ही तांडव नर्तन विश्व का करुण विवर्तन! तुम्हारा ही नयनोन्मीलन, निखिल उत्थान, पतन! अहे वासुकि सहस्र फन! लक्ष्य अलक्षित चरण तुम्हारे चिन्ह निरंतर छोड़ रहे हैं जग के

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विनय

3 अगस्त 2022
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मा! मेरे जीवन की हार तेरा मंजुल हृदय-हार हो, अश्रु-कणों का यह उपहार; मेरे सफल-श्रमों का सार तेरे मस्तक का हो उज्जवल श्रम-जलमय मुक्तालंकार। मेरे भूरि-दुखों का भार तेरी उर-इच्छा का फल हो, ते

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वसन्त-श्री

3 अगस्त 2022
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उस फैली हरियाली में, कौन अकेली खेल रही मा! वह अपनी वय-बाली में? सजा हृदय की थाली में क्रीड़ा, कौतूहल, कोमलता, मोद, मधुरिमा, हास, विलास, लीला, विस्मय, अस्फुटता, भय, स्नेह, पुलक, सुख, सरल-हुल

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झर पड़ता जीवन डाली से

3 अगस्त 2022
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झर पड़ता जीवन-डाली से मैं पतझड़ का-सा जीर्ण-पात! केवल, केवल जग-कानन में लाने फिर से मधु का प्रभात! मधु का प्रभात!--लद लद जातीं वैभव से जग की डाल-डाल, कलि-कलि किसलय में जल उठती सुन्दरता की स्वर्

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मोह

3 अगस्त 2022
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छोड़ द्रुमों की मृदु-छाया, तोड़ प्रकृति से भी माया, बाले! तेरे बाल-जाल में कैसे उलझा दूँ लोचन? भूल अभी से इस जग को! तज कर तरल-तरंगों को, इन्द्र-धनुष के रंगों को, तेरे भ्रू-भंगों से कैसे बिंधवा द

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