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दुनिया की महफ़िलों से उक्ता गया हूँ / इक़बाल

28 अप्रैल 2023

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दुनिया की महफ़िलों से उक्ता गया हूँ या रब

क्या लुत्फ़ अंजुमन   महफ़िल    का जब दिल ही बुझ गया हो

शोरिश   शोर    से भागता हूँ दिल ढूँडता है मेरा

ऐसा सुकूत   शांति    जिस पर तक़रीर भी फ़िदा हो


मरता हूँ ख़ामुशी पर ये आरज़ू है मेरी

दामन में कोह   पहाड़    के इक छोटा सा झोंपड़ा हो

आज़ाद फ़िक्र से हूँ उज़्लत   अकेलापन    में दिन गुज़ारूँ

दुनिया के ग़म का दिल से काँटा निकल गया हो


लज़्ज़त   आनंद    सरोद की हो चिड़ियों के चहचहों में

चश्मे की शोरिशों में बाजा सा बज रहा हो

गुल की कली चटक कर पैग़ाम दे किसी का

साग़र ज़रा सा गोया मुझ को जहाँ-नुमा   विहंगम दृश्य    हो


हो हाथ का सिरहाना सब्ज़े   हरियाली    का हो बिछौना

शरमाए जिस से जल्वत   दिखावट    ख़ल्वत   एकांत    में वो अदा हो

मानूस इस क़दर हो सूरत से मेरी बुलबुल

नन्हे से दिल में उस के खटका न कुछ मिरा हो


सफ़   कतार    बाँधे दोनों जानिब बूटे हरे हरे हों

नद्दी का साफ़ पानी तस्वीर ले रहा हो

हो दिल-फ़रेब ऐसा कोहसार   पर्वतों की श्रृंखला    का नज़ारा

पानी भी मौज बन कर उठ उठ के देखता हो


आग़ोश में ज़मीं की सोया हुआ हो सब्ज़ा   हरियाली   

फिर फिर के झाड़ियों में पानी चमक रहा हो

पानी को छू रही हो झुक झुक के गुल की टहनी

जैसे हसीन कोई आईना देखता हो


मेहंदी लगाए सूरज जब शाम की दुल्हन को

सुर्ख़ी लिए सुनहरी हर फूल की क़बा   पहनावा    हो

रातों को चलने वाले रह जाएँ थक के जिस दम

उम्मीद उन की मेरा टूटा हुआ दिया हो


बिजली चमक के उन को कुटिया मिरी दिखा दे

जब आसमाँ पे हर सू बादल घिरा हुआ हो

पिछले पहर की कोयल वो सुब्ह की मोअज़्ज़िन   प्रार्थना के लिये आवाज़ देने वाली   

मैं उस का हम-नवा   साथ देने वाला    हूँ वो मेरी हम-नवा हो


कानों पे हो न मेरे दैर   मंदिर     ओ हरम   मस्जिद    का एहसाँ

रौज़न   छोटी खिड़की    ही झोंपड़ी का मुझ को सहर-नुमा   जादुई    हो

फूलों को आए जिस दम शबनम वज़ू कराने

रोना मिरा वज़ू हो नाला मिरी दुआ हो


इस ख़ामुशी में जाएँ इतने बुलंद नाले   पुकार   

तारों के क़ाफ़िले को मेरी सदा   आवाज़    दिरा   ज्ञात    हो

हर दर्दमंद दिल को रोना मिरा रुला दे

बेहोश जो पड़े हैं शायद उन्हें जगा दे

मुहम्मद इक़बाल 'अल्लामा इक़बाल' की अन्य किताबें

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रचनाएँ
इक़बाल की प्रतिनिधि रचनाएँ
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इक़बाल की प्रतिनिधि रचनाएँ
1

तराना-ए-हिन्दी (सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोसिताँ हमारा ) / अल्लामा इक़बाल

28 अप्रैल 2023
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सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोसिताँ हमारा हम बुलबुलें हैं इसकी यह गुलसिताँ हमारा ग़ुर्बत परदेस   में हों अगर हम, रहता है दिल वतन में समझो वहीं हमें भी दिल हो जहाँ हमारा परबत वह सबसे ऊँचा, हम्साया पड़ोस

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तस्कीन न हो जिस से / इक़बाल

28 अप्रैल 2023
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तस्कीन   तसल्ली    न हो जिस से वो राज़ बदल डालो जो राज़ न रख पाए हमराज़ बदल डालो तुम ने भी सुनी होगी बड़ी आम कहावत है अंजाम का जो हो खतरा आगाज़   शुरुआत    बदल डालो पुर-सोज़   दु:खी    दिलों को जो

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डरते-डरते दमे-सहर से / इक़बाल

28 अप्रैल 2023
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डरते-डरते दमे-सहर   सुबह    से, तारे कहने लगे क़मर   चाँद    से । नज़्ज़ारे रहे वही फ़लक पर, हम थक भी गये चमक-चमक कर । काम अपना है सुबह-ओ-शाम चलना, चलन, चलना, मुदाम   लगातार    चलना । बेताब है इ

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लब पे आती है दुआ बनके तमन्ना / इक़बाल

28 अप्रैल 2023
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लब पे आती है दुआ बनके तमन्ना मेरी ज़िन्दगी शमा की सूरत   दीपक की भाँति    हो ख़ुदाया मेरी दूर दुनिया का मेरे दम से अँधेरा हो जाये हर जगह मेरे चमकने से उजाला हो जाये हो मेरे दम से यूँ ही मेरे व

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दुनिया की महफ़िलों से उक्ता गया हूँ / इक़बाल

28 अप्रैल 2023
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दुनिया की महफ़िलों से उक्ता गया हूँ या रब क्या लुत्फ़ अंजुमन   महफ़िल    का जब दिल ही बुझ गया हो शोरिश   शोर    से भागता हूँ दिल ढूँडता है मेरा ऐसा सुकूत   शांति    जिस पर तक़रीर भी फ़िदा हो मरत

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शिकवा / इक़बाल

28 अप्रैल 2023
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क्यूँ ज़ियांकार बनूँ, सूद फ़रामोश रहूँ फ़िक्र-ए-फ़र्दा   कल की चिन्ता    न करूँ, महव   खोया रहना   -ए-ग़म-ए-दोश रहूँ नाले बुलबुल की सुनूँ और हमा-तन-गोश   चुपचाप सुनना     रहूँ हमनवा    साथी    मैं

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जवाब-ए-शिकवा / इक़बाल

28 अप्रैल 2023
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दिल से जो बात निकलती है असर रखती है । पर नहीं, ताकत-ए-परवाज़ मगर रखती है । क़दसी अलासल है, रफ़ात पे नज़र रखती है । ख़ाक से से उठती है गर्दू पे गुज़र रखती है । इश्क था फ़ितनागर व सरकश व चालाक मेर

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आम मशरिक़ के मुसलमानों का दिल मगरिब में जा अटका है / इक़बाल

28 अप्रैल 2023
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आम मशरिक़ के मुसलमानों का दिल मगरिब में जा अटका है वहाँ कुंतर सब बिल्लोरी है, यहाँ एक पुराना मटका है इस दौर में सब मिट जायेंगे, हाँ बाक़ी वो रह जायेगा जो क़ायम अपनी राह पे है, और पक्का अपनी हट का

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हर मुक़ाम से आगे मुक़ाम है तेरा / इक़बाल

28 अप्रैल 2023
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ख़िर्द के पास ख़बर के सिवा कुछ और नहीं तेरा इलाज नज़र के सिवा कुछ और नहीं हर मुक़ाम से आगे मुक़ाम है तेरा हयात ज़ौक़-ए-सफ़र के सिवा कुछ और नहीं रंगों में गर्दिश-ए-ख़ूँ है अगर तो क्या हासिल हय

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जिस खेत से दहक़ाँ को मयस्सर नहीं रोज़ी / इक़बाल

28 अप्रैल 2023
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उट्ठो मेरी दुनिया के ग़रीबों को जगा दो ख़ाक-ए-उमरा के दर-ओ-दीवार हिला दो गरमाओ ग़ुलामों का लहू सोज़-ए-यक़ीं से कुन्जिश्क-ए-फिरोमाया को शाहीं से लड़ा दो सुल्तानी-ए-जमहूर का आता है ज़माना जो नक

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असर करे न करे सुन तो ले मेरी फ़रियाद / इक़बाल

29 अप्रैल 2023
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असर करे न करे सुन तो ले मेरी फ़रियाद नहीं है दाद का तालिब ये बंद-ए-आज़ाद ये मुश्त-ए-ख़ाक ये सरसर ये वुसअत-ए-अफ़लाक करम है या के सितम तेरी लज़्ज़त-ए-ईजाद ठहर सका न हवा-ए-चमन में ख़ेम-ए-गुल यही

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अगर कज-रौ हैं अंजुम आसमाँ तेरा है या मेरा / इक़बाल

29 अप्रैल 2023
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अगर कज-रौ हैं अंजुम आसमाँ तेरा है या मेरा मुझे फ़िक्र-ए-जहाँ क्यूँ हो जहाँ तेरा है या मेरा अगर हँगामा-हा-ए-शौक़ से है ला-मकाँ ख़ाली ख़ता किस की है या रब ला-मकाँ तेरा है या मेरा उसे सुब्ह-ए-अज़

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एक आरज़ू / इक़बाल

29 अप्रैल 2023
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दुनिया की महफ़िलों से उक्ता गया हूँ या रब क्या लुत्फ़ अंजुमन का जब दिल ही बुझ गया हो शोरिश से भागता हूँ दिल ढूँढता है मेरा ऐसा सुकूत जिस पर तक़रीर भी फ़िदा हो मरता हूँ ख़ामुशी पर ये आरज़ू है मेरी

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उक़ाबी शान से झपटे थे जो बे-बालो-पर निकले / इक़बाल

29 अप्रैल 2023
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उक़ाबी    गिद्ध पक्षी जैसी   शान से झपटे थे जो बे-बालो-पर   बिना बालों और परों के    निकले सितारे शाम को ख़ूने-फ़लक़   सूर्यास्त-समय की क्षितिज की लालिमा    में डूबकर निकले हुए मदफ़ूने-दरिया    दर

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सख़्तियाँ करता हूँ दिल पर ग़ैर से ग़ाफ़िल हूँ मैं / इक़बाल

29 अप्रैल 2023
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सख़्तियाँ करता हूँ दिल पर ग़ैर से ग़ाफ़िल हूँ मैं हाय क्या अच्छी कही ज़ालिम हूँ मैं जाहिल हूँ मैं है मेरी ज़िल्लत ही कुछ मेरी शराफ़त की दलील जिस की ग़फ़लत को मलक रोते हैं वो ग़ाफ़िल हूँ मैं बज

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परीशाँ हो के मेरी ख़ाक आख़िर दिल न बन जाए / इक़बाल

29 अप्रैल 2023
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परीशाँ होके मेरी खाक आखिर दिल न बन जाये जो मुश्किल अब हे या रब फिर वही मुश्किल न बन जाये न करदें मुझको मज़बूरे नवा फिरदौस में हूरें मेरा सोज़े दरूं फिर गर्मीए महेफिल न बन जाये कभी छोडी हूई मज़िलभी

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है कलेजा फ़िग़ार होने को / इक़बाल

29 अप्रैल 2023
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है कलेजा फ़िगार   घायल    होने को दामने-लालाज़ार होने को इश्क़ वो चीज़ है कि जिसमें क़रार   चैन    चाहिए बेक़रार होने को जुस्तजू-ए-क़फ़स   पिंजरे की अभिलाषा    है मेरे लिए ख़ूब समझे शिकार होन

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अक़्ल ने एक दिन ये दिल से कहा / इक़बाल

29 अप्रैल 2023
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अक़्ल ने एक दिन ये दिल से कहा भूले-भटके की रहनुमा हूँ मैं दिल ने सुनकर कहा-ये सब सच है पर मुझे भी तो देख क्या हूँ मैं राज़े-हस्ती अस्तित्व के रहस्य को तू समझती है और आँखों से देखता हूँ मैं 

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नसीहत / इक़बाल

29 अप्रैल 2023
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बच्चा-ए-शाहीं   बाज़(पक्षी)के बच्चे से    से कहता था उक़ाबे-साल -ख़ुर्द   बूढ़ा उक़ाब    ऐ तिरे शहपर   पंख    पे आसाँ रिफ़अते- चर्ख़े-बरीं   आकाश की ऊँचाई    है शबाब   यौवन   अपने लहू की आग मे‍ जल

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ख़ुदी में डूबने वालों / इक़बाल

29 अप्रैल 2023
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जहाने-ताज़ा   नये संसार    की अफ़कारे-ताज़ा   ताज़ा चिंतन    से है नमूद कि संगो-ख़िश्त   ईंट-पत्थर    से होते नहीं जहाँ पैदा ख़ुदी में डूबने वालों के अज़्मो-हिम्मत   हिम्मत और इरादे    ने इस आबे-

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लेकिन मुझे पैदा किया उस देस में तूने / इक़बाल

29 अप्रैल 2023
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इक वलवला-ए-ताज़ा   नया भाव    दिया मैंने दिलों को लाहौर से ता-ख़ाके-बुख़ारा-ओ-समरक़ंद    बुख़ारा और समरकंद की भूमि तक    लेकिन मुझे पैदा किया उस देस में तूने जिस देस के बन्दे हैं ग़ुलामी पे रज़ाम

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सफ़र कर न सका / इक़बाल

5 मई 2023
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ढूँढने वाला सितारों की गुज़रगाहों का अपने अफ़कार फ़िक्र का बहुवचन/चिंताएँ की दुनिया में सफ़र कर न सका अपनी हिकमत दुस्साहस  के ख़मो-पेच उलझनों में उलझा ऐसे आज तक फ़ैसला-ए-नफा-ओ-ज़रर लाभ-हानि का नि

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