shabd-logo

गीता और धार्मिक सहिष्णुता की भावना

6 जनवरी 2023

84 बार देखा गया 84
गीता द्वारा मानव समाज को दी गई धार्मिक सहिष्णुता की शिक्षा आज भी अनुकरणीय है। इसकी शिक्षा सार्वभौम है ,धर्म जाति ,संप्रदाय, देश काल ,परिस्थिति की सीमाओं से परे है। गीता को  सभी उपासना पद्धतियों से सहानुभूति है। श्रीकृष्णा  स्वयं घोषणा करते हैं जो भक्त जिस देवता को श्रद्धा से पूजना चाहता है मैं उसकी श्रद्धा को उसी में दृढ करता हूं और वह उसी से अपने इच्छित भोगों को प्राप्त करता है। वे पुनः घोषणा करते हैं जो श्रद्धा से युक्त होकर अन्य देवताओं को पूजते हैं वे भी  मुझे ही पूजते हैं। इस प्रकार आज के सामाजिक एवं राजनीतिक परिवेश में गीता की धार्मिक सहिष्णुता ,पंथ संप्रदाय निरपेक्षता का दर्शन और भी प्रासंगिक है ,क्योंकि आज के युग में हम ना जाने कितने पंथो कितने धर्म में अपने आपको बांटे हुए हैं। आज हम धर्म,  जाति, मजहब, ऊंच-नीच की भावनाओं को अपने में भरकर नफरत, हिंसा, आतंकवाद
की समस्याओं से भरे हैं। इस्लामी आतंकवाद, लिट्टे, खालि स्तान जैसी समस्याएं धार्मिक असहिष्णुता की देन है। गीता का दृष्टिकोण ही हमें विश्व बंधुत्व, मानव मूल्य की सच्ची शिक्षा देता है। व आतंकवाद जैसी समस्याओं का समाधान देता है। गीता मनुष्य की शक्तियों के जागरण की अमृतवाणी है। यह ज्ञान, भक्ति ,कर्म के समन्वय पर जोर देती है आधुनिक मनुष्य को उसके जीवन समस्याओं का समाधान देती है उसकी   अंतः प्रेरणा को जागृत करती है। तभी तो एनी बेसेंट कह उठी यह संगीत अपनी जन्मभूमि में ही नहीं बल्कि सभी भूमियों पर गया है और उसने प्रत्येक देश में भावुक हृदय में वही प्रतिध्वनि जगाई है ।आज तक गीता पर जितनी टिकाए लिखी गई शायद किसी ही अन्य ग्रंथ पर लिखी गई हो। इसका प्रत्येक श्लोक  व्यापक अर्थ रखता है, मानवीय अंतःकरण को जगाने की सामर्थ्य रखता है। विलियम ब्रान हंबोल्ट  ने कहा है गीता किसी ज्ञात भाषा में उपस्थित गीतों में संभवत सबसे अधिक सुंदर और एकमात्र दार्शनिक गीत है। गीता वीरों का ओज है मानव के लिए वह संजीवनी है ,जो उसके जीवन की मार्गदर्शक है, उसकी चेतना है ,उसकी प्रेरणा है। धार्मिक सहिष्णुता का ऐसा उदाहरण कहीं मिलना असंभव है। गीता की धार्मिक सहिष्णुता आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी पहले थी।
                                                              (© ज्योति)
9
रचनाएँ
आज के युग में गीता दर्शन की प्रासंगिकता
0.0
यह किताब गीता दर्शन पर आधारित है। आज के युग में गीता दर्शन की प्रासंगिकता एक ऐसा विषय है जो हमें सोचने पर मजबूर करता है की गीता केबल महाभारत के युद्ध क्षेत्र का वर्णन नहीं है, अर्जुन और कृष्ण के मध्य संवाद नहीं है बल्कि युद्ध क्षेत्र में अर्जुन के मन में जो भी प्रश्न उठ रहे हैं उनका उत्तर है। यह हमारे मन क्षेत्र मे उठने वाले विचारों द्वंद्वों का समाधान है। यह वह अमृतवाणी है, जिसे सुनने से, जिसे पढ़ने से मनुष्य को शांति, उत्साह, ऊर्जा मिलती है।
1

आज के युग में गीता की प्रासंगिकता

28 दिसम्बर 2022
1
0
0

मैं भगवत गीता से ऐसी शक्ति पाता हूं जो मुझे पर्वत पर उपदेश देने पर भी नहीं मिलती। जब निराशा मेरे सम्मुख उपस्थित होती है और नितांत एकाकी मैं प्रकाश की एक किरण भी नहीं देख पाता तब मैं भगवत गीता की और लौ

2

आधुनिक युग में निष्काम कर्म की अवधारणा

4 जनवरी 2023
0
0
1

निष्काम कर्म के अनुसार भगवान श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं हे अर्जुन !तू कर्म कर !फल की इच्छा मत कर। कर्तव्य के लिए कर्म कर। आज के युग में भी गीता के निष्काम कर्म योग की उपयोगिता निर्विवाद

3

गीता में स्वधर्म की अवधारणा

6 जनवरी 2023
0
0
1

गीता में स्वधर्म के महत्व को स्वीकार कर इसे प्रतिपादित किया गया है। गीता में श्री कृष्ण जी ने कहा है की चार वर्णों ब्राह्मण क्षत्रिय ,वैश्य ,शूद्र की रचना गुण एवं कर्म के आधार पर मेरे द्वारा की गई है।

4

गीता और धार्मिक सहिष्णुता की भावना

6 जनवरी 2023
0
0
0

गीता द्वारा मानव समाज को दी गई धार्मिक सहिष्णुता की शिक्षा आज भी अनुकरणीय है। इसकी शिक्षा सार्वभौम है ,धर्म जाति ,संप्रदाय, देश काल ,परिस्थिति की सीमाओं से परे है। गीता को सभी उपासना पद्धतियों स

5

गीता में कर्म ,ज्ञान एवं भक्ति का समन्वय

7 जनवरी 2023
1
0
1

गीता का अमर संदेश सार्वकालिक और सार्वदेशिक है। इसमें कर्म ,ज्ञान और भक्ति का समन्वय किया गया है। भारतीय विचारधारा के निर्माण में इसकी महती भूमिका है। मनुष्य के हृदय में ज्ञान ,भक्ति ,कर्म का समन

6

गीता का उदभव

7 जनवरी 2023
0
0
0

भगवत गीता भारतीय विचारधारा का एक अत्यंत लोकप्रिय दार्शनिक, धार्मिक एवं नैतिक काव्य है ।यह महाभारत के भीष्म पर्व का एक भाग है ।गीता को सभी उपनिषदों का निचोड़ कहा जाता है ।गीता के इस ग्रंथ का उद्भव कुरु

7

गीता में कर्म योग का अर्थ

8 जनवरी 2023
0
0
1

कर्म योग गीता का प्रतिपाद्य प्रमुख विषय है ,इसमें निष्काम कर्म योग अर्थ पर हम विचार करेंगे। निष्काम शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के नि:+ काम शब्द से हुई है जिसका शाब्दिक अर्थ है पर

8

निष्काम कर्म योग में प्रवृत्ति एवं निवृत्ति

9 जनवरी 2023
0
0
0

निष्काम कर्म योग में प्रवृत्ति एवं निवृत्ति के दो परस्पर विरोधी आदर्शों का समन्वय होता है। प्रवृत्ति का आदर्श कर्म का आदर्श है इस से प्रेरित व्यक्ति समाज में रहते हुए सुख प्राप्ति के लिए कर्म कर

9

निष्काम कर्म का महत्व

10 जनवरी 2023
0
0
1

यह गीता का निष्काम कर्म ही है जो आज के मानव को उसकी समस्याओं से ऊपर उठकर कर्तव्य के लिए कर्तव्य करने की प्रेरणा देता है। आधुनिक पाश्चात्य नैतिक दर्शन में प्रसिद्ध वैज्ञानिक दार्शनिक कांट ने भी गीता के

---

किताब पढ़िए

लेख पढ़िए