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इसी का नाम जिन्दगी है....!

9 नवम्बर 2022

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न जाने क्यों यह बाबा कुछ महीनों बाद बार-बार हमारे यहां आ जाते हैं और अगर आना ही है तो कम से कम साफ-सुथरे कपड़ों में तो आयें, उनके जूते भी कितने गंदे हैं, सारे फर्ष में मिट्टी-मिट्टी फैला दी। चिल्लाते हुए प्रीति अपनी मां प्रियंवदा से बोली।

प्रियंवदा - बेटा, थोड़ा धीरे बोलो, वो बाहर बैठे सुन लेंगे।

प्रीति - सुनते हैं तो सुन लें, ज्यादा से ज्यादा बुरा ही तो मान जायेंगे। कम से कम उनसे पीछा तो छूटेगा और न जाने क्यों पापा उन्हें इतना मुंह लगाते हैं। मम्मी आपको पता है, मेरे दोस्त और पड़ोसी पीछे से हम पर हंसते हैं कि इनके कैसे-कैसे रिष्तेदार हैं।

प्रियंवदा - बेटा, थोड़ी देर की ही तो बात है, चाय-पानी पीकर चले जायेंगे। तेरा क्या जाता है। चुपचाप अपने कमरे में जाकर पढ़ाई कर।

तभी बाहर से उसका छोटा बेटा राहुल चिढ़ता हुआ अंदर आता है, जो अभी 10 साल का है। मम्मी देखो न, उन अंकल ने मेरा मुंह गंदा कर दिया। जबरदस्ती मुझे गोद में बिठाकर मेरे गालों को चूमने लगे। मुझे वो बिल्कुल भी अच्छे नहीं लगते।

प्रियंवदा खिझती हुई बोली - जल्दी से अंदर जाकर अपना काम कर। स्कूल का होमवर्क कर लिया?

राहुल चिढ़ता हुआ अपने कमरे में चला जाता है।

प्रियंवदा बाहर बैठे बुजुर्ग के सामने आकर बैठ जाती है जहां उसका पति मनोहर पहले से उनके साथ बातचीत में व्यस्त था।

बुजुर्ग - कैसी हो, बेटी प्रियंवदा और घर परिवार कैसा चल रहा है, तुम्हारा?

प्रियंवदा अनमने मन से - बस सब आपका आर्षीवाद है।

बुजुर्ग - और मनोहर, तुम्हारा कपड़ों का कारोबार कैसा चल रहा है। दुकान अब भी किराये पर है या अपनी है?

मनोहर मन ही मन सोचता हुआ कि कहीं वह उसे कुछ धन मांग न लें - लाला जी, बस पिछले ही महीने खरीदी है। बैंक से लोन लेकर और कुछ जान पहचान के लोगों से उधार लेकर बड़ी मुष्किल से खरीदा है। कुछ भी नहीं बचता। जो कमाता हूं, सब बैंक वाले और कर्ज वाले ले जाते हैं। बस, मरकर जिन्दगी चल रही है।

प्रियंवदा जल्दी से उठकर बोलती है - अभी आपके लिए चाय लेकर आती हूं, बड़ी दूर से आये हैं, थक गये होंगे।

बुजुर्ग - ठीक है बेटी, जैसा तुम्हें ठीक लगे।

मनोहर - लाला जी, आपकी जिन्दगी कैसी चल रही है आजकल?

बुजुर्ग - अब क्या जिन्दगी? जिन्दगी ने तो देना था, दे दिया। अब तो बस एक अकेली जान बची है, सरकार थोड़ी पेंषन दे देती है, उसी से गुजारा चला लेता हूं। तुम्हें तो पता ही है बेटा, कष्मीर में अच्छा खासा व्यापार था मेरा। जमीन, जायदात, बीवी, बच्चे सब कुछ तो था। पर षायद ईष्वर को यही मंजूर था जो बुढ़ापे में उसने ये दिन दिखाये।

वो दिन भी कितने दहषत भरे दिन थे, जिन्हें हम अपना समझते थे, उन्होंने ही हमसे घात किया। रोज किसी न किसी की मौत की खबर सुनने में आती थी कि उन लोगों ने क्या नहीं किया, कहते-कहते बुजुर्ग का गला भर जाता है।

मनोहर वह सब याद करके भावुक हो जाता है और बुजुर्ग से जिन्हें वह लाला जी कहकर संबोधित करके कहता है - लाला जी, आप ही के कारण आज मैं यहां तक पहुंच सका हूं। अगर आप न होते तो न जाने मेरे साथ और मेरे परिवार के साथ क्या होता। मैं तो बस आपके यहां काम करने वाला एक छोटा सा मुलाजिम ही तो था।

बुजुर्ग - ऐसा न कहो बेटा, मैंने तुम्हें कभी अपना मुलाजिम नहीं समझा, तुम और तुम्हारा परिवार मेरे बच्चों के समान है। मैंने इन्हें अपनी आंखों के सामने बड़े होता देखा है। तो क्या हुआ, अगर मेरी बीवी और बच्चों को उन दहषतगर्दों ने मार दिया और मेरा सबकुछ छीन लिया। वो तो अच्छा हुआ समय रहते मैंने तुमको बच्चों के साथ पहले ही इतना कुछ देकर वहां से बाहर निकाल दिया जिससे तुम अपने परिवार के साथ अच्छा वक्त बिता सको। नहीं तो न जाने वो दरिन्दे क्या करते? कहकर बुजुर्ग रोने लगता है। सिसकते हुए - “तुम लोगों को देखकर मेरा दिल का दर्द कम हो जाता है इसलिए तुम लोगों से मिलने कभी कभार आ जाता हूं।”

मनोहर - चुप हो जाता है।

प्रियंवदा - लाला जी, चाय लीजिए कहकर चाय का प्याला सामने मेज पर रख देती है।

बुजुर्ग - कुछ नहीं बोलते, थोड़ी देर सन्नाटा पसर जाता है। फिर बुजुर्ग धीरे से चाय का प्याला उठाकर पीते है। जिन्हें चाय पीता देख मनोहर और प्रियंवदा एक दूसरे की ओर देखते हैं। चाय खत्म होते ही मनोहर बोलता है - लाला जी आपको बाहर तक छोड़ देता हूं।

बुजुर्ग व्यक्ति संभलते हुए खड़े होते हैं और धीरे-धीरे बाहर की ओर चलने लगते हैं। बाहर सड़क पर छोड़कर मनोहर और प्रियंवदा गेट बंद करके अंदर चले जाते हैं। वहीं सड़क पार बुजुर्ग उस बड़े गेट और उस बड़े घर को देखते हुए, पैदल अंतहीन लम्बी सड़क पर धीरे-धीरे चलने लगते हैं। शायद इसी का नाम जिन्दगी है....!

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रचनाएँ
कही-अनकही कहानियाँ
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विज्ञान और धर्म (बुद्धि और हदय) में मात्र इतना ही अंतर है कि विज्ञान मानता है काला रंग वास्तव में कोई रंग न होकर समस्त रंगों की अनुपस्थिति मात्र है। जहां कोई रंग नहीं वहां काला अर्थात् अंधकार ही होगा । इसी प्रकार सफेद रंग वास्तव में सभी रंगों के मिश्रण से प्राप्त होता है। यही भौतिकी के सिद्वान्त कहते हैं। इसके विपरित इसी विषय में हदय का प्रयोग करने वाले कला प्रेमी लोगों का इसके विपरित ही तर्क है। उनके अनुसार वास्तव में काला रंग समस्त रंगों के मिश्रण का नाम है। आप किसी चित्रकार से पूछिए कि उसे काला रंग बनाने के लिए क्या करना होगा, उत्तर में यही मिलेगा कि समस्त रंगों को मिला दीजिए, जो रंग प्राप्त होगा वह काला और समस्त रंगों की अनुपस्थिति से सफेद रंग प्राप्त होता है। यहां दोनों ही अपने-अपने स्थानों पर बिल्कुल सही हैं। दोनों वर्ग अनेकों प्रकार के प्रयोग करने के पष्चात ही इस निर्णय तक पहुंचे हैं जिसका गलत होने की कोई संभावना नहीं। मात्र दृष्टि का अंतर है। सही दोनों हैं। यह दोनों को मानना भी होगा कि वैज्ञानिक और चित्रकार दोनों ही सही हैं। विरोध को कोई प्रष्न नहीं और कभी इस विषय को लेकर किसी ने इनके मध्य कोई लड़ाई भी न सुनी होगी। मानव चेतना भी इन्ही चुनौतियों का सामना करना पड़ता है जिसमे अक्सर मनुष्य का अंतर्मन सदा आपस में काले-सफेद को लेकर लड़ता रहता है, सदा दोनों और चलने वाली इस खींच तान के बीच कभी भी यह सुनिष्चित नहीं हो पाता कि वैज्ञानिक सही या चित्रकार? मानव मस्तिष्क के भीतर चलने वाले द्वन्द को इस पुस्तक में क्रमबद्ध पिरोया गया है, जिसमे उसके अंतर जगत को प्रतिबिंबित करता है....
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