shabd-logo

सोना के बेटे की-" हीरा" बनने की कहानी

25 अक्टूबर 2018

346 बार देखा गया 346
featured image article-image

चलिये ,सोना की कहानी को आगे बढ़ाते है और जानते है कि -कैसे उनका बेटा हीरा बन चमका और अपने माँ के जीवन में शीतलता भरी रौशनी बिखेर दी।

सोना की बाते सुन माँ ने उन्हें पहले चुप कराया और फिर सारी बात बताने को कहा। सोना ने बताया कि- मेरी बहन ने मेरे बेटे को अब आगे पढ़ाने से मना कर दिया है। क्युकी मेरे बेटे के साथ ही उसका बेटा भी 10 वी का परीक्षा दिया था लेकिन वो फेल हो गया है इस बात से मेरी बहन नाराज़ है और बेटा आगे पढ़ने के ज़िद में खाना पीना छोड़ रखा है। फिर वो सकुचाती हुई बोली - मालकिन आप के भाई तो प्रोफ़ेसर है न ,आप अगर मेरे बेटे को उनके यह रखवा देगी तो आप का बड़ा एहसान होगा वो उनके घर का सारा काम करेगा ,बर्तन -चौका ,खाना -पीना ,बाजार- हाट सब करेगा बस वो मेरे बेटे को कॉलेज में दाखिला करवा देंगे ,मेरी बहन के घर भी तो वो ये सारे काम करके ही पढ़ा है। माँ एकदम से चौकी - क्या, अपनी सगी मौसी के घर वो ये सब कर के पढ़ा है ?लानत है उस मौसी पर। फिर माँ ने सोना को समझाया कि - मैं कुछ करती हूँ , चिंता नहीं करो और बेटे को भी जाकर खाना खिलाओ ,सब ठीक हो जायेगा।

सोना का मझला बेटा बचपन से बड़ा मेघावी था। अपने भाई बहनो से बिलकुल अलग ,उसके भाई बहनो को जो मिल जाता वो खाते पीते और गांव के बच्चो के साथ खेलने में मगन रहते। सोना ने उनका दाखिल सरकारी स्कूल में करा रखा था लेकिन उन्हें पढ़ाई लिखाई से कुछ खास मतलब नहीं रहता। लेकिन मझला बेटा जैसे जैसे बड़ा हुआ उसकी पढ़ने की लग्न बढ़ती गई। ये देख सोना ने उसे अपनी बहन जो की टीचर थी उसके पास रख दिया ये सोच कर कि वहाँ उसे खाना पीना भी अच्छा मिल जायेगा और पढाई का माहौल भी।

लेकिन सोना की बहन एक बेरहम औरत थी उसने ये सोच कर उस लड़के को रख लिया की उसे मुफ्त का एक नौकर मिल गया। वो उससे घर का पूरा काम करती थी और तब जाकर उसे खाना देती थी। वो लड़का जिसका नाम अनिल था वो सब कुछ सह जाता सिर्फ इसलिए क्युकी उसे पढ़ने को किताबे और अच्छा खाना मिल जाता था। स्वादिस्ट खाना खाने और बनाने दोनों के ही बड़े शौकीन थे वो। सोना को जब पता चला तो उसे वापस घर लाना चाहती थी लेकिन अनिल ने उन्हें समझाया कि -माँ मुझे पढ़ना है और यहाँ वो सारी सुबिधा है जिससे मैं पढ़ सकता हूँ। सोना मान गई। समय के साथ अनिल बड़ा होने लगा और उस औरत के ज़ुलम भी बढ़ते गए,वो जान बुझ कर उसे सारा दिन काम में उलझाए रखती ताकि वो पढ़ न सके। जब सारा घर का काम खत्म कर रात को वो पढ़ने जाते तो लाइट बंद कर देती। गन्दी गालिया दे कर कहती -बिजली बिल तुम्हारा बाप देगा। कितनी बार वो औरत उन्हें बेरहमी से मारती भी थी।

एक बार बातो बातो में अनिल भैया ने हमे बताया था कि -कभी कभी वो औरत गुस्से में उनके ऊपर गरम चाय तक फेक देती थी। वो सब सेह लेते थे क्युकी उन्हें पढ़ना था। वो एक दीया छुपा कर रखते थे और जब सब सो जाते तो उस दीये की रोशनी में पढ़ते और कोई जग जाता तो फुक मार कर बुझा देते थे। इतने जुल्म करने के वावजूद जब वो अच्छे नंबर लेकर आये और उसका बेटा फेल हो गया तो ये जलन वो बर्दास्त न कर सकी और आगे पढ़ाने से मना कर दिया।

जब मेरे मामा को माँ ने सारी बात बताई तो उन्होंने कहा कि -मैं पहले उस लड़के से मिलुंगा। माँ ने अनिल भैया को बुलाया ,मेरे मामा उन्हें सर से पैर तक देखे और फिर थोड़ी बहुत बात की। मामा ने माँ से कहा -इस लड़के का लालट चमक रहा है ये भविष्य में जरूर कोई बड़ा आदमी बनेगा ,मैं इसे अपने घर में नौकर की तरह नहीं रख सकता क्युकी कल को जब वो कुछ बन जायेगा जो की इसका बड़ा आदमी बनना तय है तो मैं इससे नज़रे नहीं मिला पाऊंगा ,मैं इसे ले जाऊँगा लेकिन घर का सदस्य बना कर ,अपना बेटा बना कर।

मामा की बाते सुन माँ पहले तो अपने भाई पर गर्व की लेकिन फिर माँ -पापा सोच में पड़ गये। क्युकी मामा के पास पहले से ही मेरे बड़े भैया रहते थे,माँ उन पर ज्यादा बोझ डालना नहीं चाहती थी। माँ को पता था की मामा माँ पापा का एहसान उतरने के लिए अनिल को रखने से मना नहीं करेंगे। क्युकी मेरे मामा को मेरे पापा ने ही अपने पास रख पढ़ाया था और आज वो एक कामयाब प्रोफ़ेसर थे। माँ पापा सोच में पड़ गए कि अब इस समस्या का समाधान कैसे करे। काफी सोच बिचार करने के बाद पापा ने ये फैसला किया कि -अनिल हमारे साथ रहेगा।

पापा ने सोना से कहा -सोना अनिल हमारे साथ रहेगा। सोना जो की पापा से पर्दा करती थी सकुचाते हुए बोली -मालिक यहां कैसे रहेगा ,आप सब को परेशानी होगी , यहाँ भी तो दो ही कमरा है और रहने वाले सात -आठ लोग ,मैं आप पर और बोझ डालना नहीं चाहती। पापा ने कहा -मैंने फैसला कर लिया है वो यही रहेगा,मैं सर्वेन्ट क्वाटर में एक कमरा उसे दिला दुगा जो हमारे क्वाटर से लगा ही है अनिल जहां सुकून से अपनी पढ़ाई कर पायेगा और बाकी खाना पीना सब हम सब के साथ होगा। और पापा अनिल भैया को घर ले आये। हम भाई बहन इन सारे बातो से अनजान थे। हमारे लिए तो ये एक रोचक वाक्या था जिसने हमारे होश उड़ा दिए थे।

राखी के दिन की बात है। हम दोनों बहने अपने सारे भाइयो को राखी बांध चुके थे और खाना खाने जा रहे थे तो माँ ने कहा - थोड़ी देर रूक जाओ ,तुम्हारे पापा तुम सब के लिए एक सरप्राइज़ गिफ्ट ला रहे है। हम सब खुश हो गए। थोड़ी देर में पापा आये उनके साथ एक लड़का था, पापा दरवाज़े पर ही रूक गये और बोले - रानी ,गुड़िया पूजा की थाल ले कर आओ और अपने नये भाई को राखी बांधो। हम दोनों ने बिना कोई सवाल किये उन्हें राखी बँधा और उनके पैर छुये।फिर पापा ने उनसे कहा -बेटा अब घर के अंदर चलो आज से ये तुम्हारा ही घर है। हम भाई बहन ये सुन कर चौक गये और एक दूसरे की तरफ देखने लगे कि ये क्या हुआ ये घर में नया सदस्य कौन आ गया। पापा ने हमे पास बुलाया और कहा - मैं हमेशा तुम सब से कहता था न कि मेरा एक बेटा है जो पटना में रहता है और पढ़ने में अवल है। हम सब ने हां में सर हिला दिया। पापा ने कहा - आज में उसे हमेशा के लिए घर ले आया। हमारे तो होश गायब हो गये रोना आने लगा,हमने कुछ नहीं कहा और चुपचाप दूसरे कमरे में चले गये।


हमारे दुखी होने के पीछे एक अलग ही वाक्या है। बात ये थी कि जब भी हम भाई -बहन कोई बदमाशी करते,मन लगा कर नहीं पढ़ते या हमारे नंबर काम आते तो पापा हमसे यही कहते थे कि -तुम सब बदमाशी करते हो न इसी लिए मैं तुम सब को कम प्यार करता हूँ ,मेरा एक अच्छा बेटा पटना में है वो पढ़ने में काफी तेज़ है इसलिए मैं उसे ज़्यादा प्यार करता हूँ। और आज पापा सचमुच उस बेटे को घर ले आये थे। हमे लगा अब पापा हमे प्यार नहीं करेंगे, ये सोच हम बहुत दुखी हो रहे थे।


हम उदास हो कमरे में बैठे थे तभी पापा माँ दोनों हँसते हुए आये और बोले -- "डरो नहीं हमने तुम सब से वो सारी बाते झूठ कही थी लेकिन बिधाता ने मेरे उस झूठ को सच कर दिया है आज से ये सचमुच हमारा बेटा और तुम सब का भाई है तुम सब इसको भी उतना ही प्यार और आदर देना जितना सगे बड़े भाई को देते हो।" फिर पापा ने सारी बात बताई फिर हम सब जाकर उनके गले लग गए और उन्हें दिल से अपना भाई स्वीकार कर लिया,फिर हम सब ने साथ खाना खाया। वो दिन है और आज का दिन ना हम ने कभी अनिल भैया को पराया समझा ना अनिल भैया ने हमे। उन्होंने भाई होने का हर कर्तव्य निभाया और प्यार भी भरपूर दिया। हमारी मदद तो वो भाई बहन दोनों की तरह करते थे। बाहर का कोई काम हो या हम बहनो की रखवाली करनी हो तो भाई बन जाते थे और अगर घर में कोई काम बढ़ जाये तो बहन की तरह रसोई में भी मदद करते थे।खाना बनाने के शौकीन थे इस कारण किचन में कई बार सब्जी बनाने को लेकर हम दोनों की लड़ाई भी हो जाती थी। वैसे भी हम दोनों हम उम्र थे तो हम दोनों में कभी पटती नहीं थी

लेकिन प्यार भी इतना था कि एक घंटा भी एक दूसरे से बात किये वगैर रह भी नहीं सकते थे।


भैया 10 वी पास करके आये थे और मैं 10 वी में थी।दोनों ही किशोरावस्था में थे। कॉलोनी वालो को जब पापा के इस फैसले का पता चला तो वो परेशान हो पापा को समझने लगे कि -सिन्हा जी ये आपने ठीक नहीं किया आप के घर में सायानी लड़की है और लड़का भी सायना है कल को कुछ ऊंचनीच हो गया तो ?पापा ने जबाब दिया -उस लड़के को तो मैं अभी ठीक से नहीं जानता लेकिन मुझे अपनी बेटी पर पूरा भरोसा है वो हमारे इस फैसले को कभी शर्मसार नहीं करेगी। हम बहन -भाई ने पापा का वो मान रखा ,भगवान ने भी हमारा भरपुर साथ दिया।अनिल भैया सूरत सकल से भी हम भाई बहनो से बिलकुल मिलते थे। हमारे बड़ी भइया और वो दोनों जब साथ चलते थे तो कोई ये नहीं कह सकता था की दोनों एक माँ के बच्चे नहीं है। माँ पापा तो ये कहते थे की पूर्बजन्म का मेरा बिछड़ा बेटा है। माँ तो उन्हें हमेशा अपना अच्छा बेटा कह कर ही बुलाती थी। आज भी हम भाई बहन माँ को छेड़ते है तो कहते है कि -आप का अच्छा बेटा तो अनिल भइया है न। माँ हँस कर कहती है -बेशक है।


अनिल भइया ने कड़ी मेहनत और लगन से पढाई की और M.A किया। थोड़े दिन तो उनके संघर्ष के रहे, पापा के मना करने पर भी वो अपने ऊपर के खर्चे के लिए ट्युसन पढ़ते थे वो पापा पर ज्यादा बोझ नहीं डालते थे। क्युकी उन्हें लेकर हम पांच भाई बहन और दादा दादी सब की जिम्मेदारी पापा पर ही थी। ये बात वो अच्छे से समझते थे। पापा ने उनकी मदद कर टुयुशन सेंटर खोल दिया।

लेकिन जल्द ही उनकी मेहनत ने रंग लाया और वो लोक सेवा आयोग की परीक्षा पास किये और आज वो एक सफल ब्लॉक डेवलपमेंट ऑफिसर के रूप में कार्यरत है। जब तक हम उस कॉलोनी में रहे सोना हमारे घर काम करती रही एक सदस्य की तरह। फिर धीरे धीरे हम सब बड़े हो गये अपने अपने मज़िल की तरफ चल पड़े, सब की अलग अलग शहर में नौकरी हो गई, हम बहनो की शादी हो गई,और हम एक दूसरे से बिछड़ते चले गये। "बिछड़ना "यानि शारीरिक रूप से बिछड़ गये मानसिक रूप से हम आज भी जुड़े है। हमारा प्यार वैसा ही है। साल दो साल पर किसी अवसर पर हम मिलते है ,हमारे बच्चे भी आपस में सगे भाई बहनकी तरह ही रहते है। अनिल भइया आज भी हर सुख दुःख में हमारे साथ है। भाभी भी बहुत अच्छी है। पापा को जब डॉक्टरों ने जबाब दे दिया और हमने भैया को खबर की तो ऑफिस से छुट्टी नहीं मिलने के वावजूद वो अपने नौकरी को खतरे में डाल दिल्ली आये ,आर्धिक रूप से भी हमारी मदद की।

हमारी सोना आज अपने कामयाब बेटे -बहु और पोते पोतियो के साथ एक सुखी जीवन व्यतीत कर रही है। लेकिन आज भी वो अपना अतीत नहीं भूली,कभी भी "अफसर बेटे की माँ " होने का घमंड नहीं किया। आज भी जब वो हमारे घर आती है तो माँ उनके लिए मालिकन ही है ,मना करने के वावजूद आज भी वो किचन में जा कर भाभियो का हाथ बटाने लगती है। थोड़ा सा हमने ये बोला नहीं कि सर दर्द हो रहा है या पैर दर्द हो रहा है तेल ले कर मालिस करने आ जाती है। हमे उन्हें कसम दे कर रोकना पड़ता है।


सोना जो तपते धुप में अकेली एक बृक्ष के समान खड़ी थी उन्होंने अपने प्यार और व्यवहार से हमे अपना बनाया। उन्ही के कारण पापा माँ ने उनकी मदद की और उनके बेटे को भी अपना बनाया , जो एक दिन हीरा बन कर चमका और अपनी माँ सोना के तपस्या को पूरा कर उनके जीवन में सुनहरी धुप बन रौशनी ही रौशनी बिखेर दी। ये थी हमारी " सोना " की कहानी , जो आज भी हमारे साथ है, भगवान उनका साथ बनाये रखे।


रेणु

रेणु

आपको संदेश भेजा था मैंने शायद देखा नहीं | एक बार जरुर देख लें

25 नवम्बर 2018

रेणु

रेणु

वाह प्रिय कामिनी -- निशब्द हूँ आपके परिवार के इस अतुलनीय सुकृत्य के लिए -- आखिर इस स्वार्थी संसार में ऐसे भी लोग रहते हैं ये विश्वास हो ही गया | पिताजी की पारखी दृष्टि और संवेदनशीलता से एक मेधावी बच्चे का भविष्य संवर गया ये कितना सुखद लग रहा है | अपने विशुद्ध आचरण से उन्होंने अपनी संतानों के मन में कितना उंचा स्थान बनाया ये पढ़कर मन बहुत भावुक हो रहा है | दिवंगत पिताजी के मानवतावादी दृष्टिकोण को कोटि- कोटि नमन | काश ! सभी सर्व समर्थ लोग ऐसा आचरण अपनाएं तो ना जाने कितने सुविधाविहीन बच्चे एक सुखद भविष्य का वरण कर पाने में सक्षम हो सकते हैं | इस प्रेरक संस्मरण के लिए आपको सस्नेह हार्दिक बधाई और मेरा प्यार |

25 नवम्बर 2018

1

टूटते - बिखरते रिश्ते

19 जून 2018
0
5
3

आज कल के दौड के टूटते बिखरते रिश्तो को देख दिल बहुत वय्थित हो जाता है और सोचने पे मज़बूर हो जाता है कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है?आखिर क्या थी पहले के रिश्तो की खुबिया और क्या है आज के टूटते बिखरते रिश्तो की वज़ह ? आज के इस व्यवसायिकता के दौड में रिश्ते

2

परिवर्तन या पीढ़ियों में अन्तर

23 जून 2018
0
3
4

उम्र के तीसरे पड़ाव में हूँ मैं .बचपन और जवानी के सारे खुबसुरत लम्हो को गुजर कर प्रौढ़ता के सीढ़ी पर कदम रख चुकी हूँ .तीन पीढ़ियों को देख लिया है या यूँ कहे की उनके साथ जी लिया है. बदलाव तो प्रक्रति का नियम है इसलिए घर परिवार, संस्कार और समाज में भी निरंतर बदलाव होत

3

समंदर - " मेरी नज़र में "

5 जुलाई 2018
0
4
6

क्या कभी आपने समंदर किनारे बैठ कर उसकी आती जाती लहरों को ध्यान से देखा हैं .सागर दिन में तो बिलकुल शांत और गंभीर होता है. ऐसा लगता है जैसे अपने अंदर अनको राज छुपाये ,अपना विशाल आँचल फैलाये एक खामोश लड़की हो जिसने सारे जहान के दर्द और सारी दुनिया की गन्दगियो को अपने दामन मे समेट रखा है. ले

4

प्रकृति और इंसान

18 जुलाई 2018
0
4
1

नदी,सागर ,झील या झरने ये सारे जल के स्त्रोत है. यही हमारे जीवन के आधार भी है. ये सब जानते और मानते भी है कि " जल ही जीवन है." जीवन से हमारा तातपर्य सिर्फ मानव जीवन से नहीं है. जीवन अर्थात " प्रकृति " अगर प्रकृति है तो हम है .लेकिन सोचने वाली बात है कि क्या हम है

5

हर पल सिखाती ज़िंदगी

22 जुलाई 2018
0
6
5

दोस्तों,मैं कोई शायरा,लेखिका या कवित्री नहीं हूँ। मैंने जवानी के दिनों में डायरी के अलावा कभी कुछ नहीं लिखा। हां, बचपन से कुछ लिखने की चाह जरूर थी। लेकिन किस्मत कुछ ऐसी रही कि छोटी उम्र से ही जो पारिवारिक जिमेदारियो में उलझी तो उलझी ही रह गई। उम्र के तीसरे पड़ाव में आ

6

आत्ममंथन

27 जुलाई 2018
0
4
2

आराधना का मन आज बहुत व्यथित हो रहा था। वो फुट फुट कर रो रही थी और खुद को कोसे भी जा रही थी। अपने आप में ही बड़बड़ाये जा रही थी "क्या मिला मुझे सबको इतना प्यार करके,सब पर अपना आप लुटा के ,बचपन के सुख ,जवानी की खुशियाँ तक लुटा दी तुमने ,सबको बाटा ही कभी

7

स्वतंत्रता दिवस -" एक त्यौहार "

10 अगस्त 2018
0
3
2

15 ऑगस्त " स्वतंत्रता दिवस " यानि हमारी आज़ादी का दिन .हां ,सालो गुलामी का दंस झेलने के बाद ,लाखो लोगो के कुर्बानियो के फ़लस्वरुप हमे ये दिन देखने नसीब हुए .हम हिन्दुस्तानियो के लिए हर त्यौहार से बड़ा सबसे पवन त्यौहार है ये . यकीनन होली, दिवाली

8

फुर्सत के चंद लम्हे -"एक मुलाकात खुद से "

18 अगस्त 2018
0
7
3

फुर्सत के चंद लम्हे जो मैं खुद के साथ बिता रही हूँ। घर से दूर,काम -धंधे,दोस्त - रिस्तेदार से दूर,अकेली सिर्फ और सिर्फ मैं। हां,आस बहरी दुनिया है कुछ लड़के - लड़किया जो मस्ती में डूबे है,कुछ बुजुर्ग जो अपने पोते - पोतियो के साथ खेल रहे है,कुछ और लोग है जो शायद मेरी तरह ब

9

रक्षाबंधन -" कमजोर धागे का मजबूत बंधन "

24 अगस्त 2018
0
2
4

सावन का रिमझिम महीना हिन्दुओ के लिए पवन महीना होता है। आखिर हो भी क्यों न ये देवो के देव महादेव का महीना जो होता है। और इसी महीने के आखिरी दिन यानि पूर्णिमा को रक्षा बंधन का त्यौहार मनाया जाता है। रक्षाबंधन भाई बहन के प्रेम को अभिवयक्त करने का एक जश्न है। जिसे आम बोल चाल में राखी कहते है। सुबह सुबह

10

हमारी प्यारी बेटियाँ

28 सितम्बर 2018
0
6
5

"बेटियाँ "कहते है बेटियाँ लक्ष्मी का रूप होती है ,घर की रौनक होती है। ये बात सतप्रतिस्त सही है। इसमें कोई दो मत नहीं हो सकता कि बेटियाँ ही इस संसार का मूल स्त

11

" बृद्धाआश्रम "बनाम "सेकेण्ड इनिंग होम "

3 अक्टूबर 2018
0
4
5

" बृद्धाआश्रम "ये शब्द सुनते ही रोंगटे खड़े हो जाते है। कितना डरावना है ये शब्द और कितनी डरावनी है इस घर यानि "आश्रम" की कल्पना। अपनी भागती दौड़ती ज़िन्दगी में दो पल ढहरे और सोचे, आप भी 60 -65 साल के हो चुके है ,अपनी नौकरी और घर की ज़िम्मेदारियों से आज़ाद हो चुके है। आप के

12

दिल तो बच्चा है जी

18 अक्टूबर 2018
0
1
3

ज़िंदगी हर पल एक चलचित्र की तरह अपना रंग रूप बदलती रहती है।है न , जैसे चलचित्र में एक पल सुख का होता है तो दुसरा पल दुःख का ,फिर अगले ही पल कुछ ऐसा जो हमे अचम्भित कर जाता है और एक पल के लिए हम सोचने पर मजबूर हो जाते है कि "क्या

13

कहानी सोना की

24 अक्टूबर 2018
0
2
2

"सोना "हाँ ,यही नाम था घुंघट में लिपटी उस दुबली पतली काया का। जैसा नाम वैसा ही रूप और गुण भी। कर्म तो लौहखंड की तरह अटल था बस तक़दीर ही ख़राब थी बेचारी की। आज भी वो दिन मुझे अच्छे से याद है जब वो पहली बार हमारे घर काम करने आई थी। हाँ ,वो एक काम करने वाली बाई थी। पहली नज़र मे देख कर कोई उन्हें काम वाली

14

सोना के बेटे की-" हीरा" बनने की कहानी

25 अक्टूबर 2018
0
3
2

चलिये ,सोना की कहानी को आगे बढ़ाते है और जानते है कि -कैसे उनका बेटा हीरा बन चमका और अपने माँ के जीवन में शीतलता भरी रौशनी बिखेर दी। सोना की बाते सुन माँ ने उन्हें पहले चुप कराया और फिर सारी बात बताने को कहा। सोना ने बताया कि- मेरी बहन ने मेरे बेटे को अब आगे पढ़ाने से म

15

हमारे त्यौहार और हमारी मानसिकता

29 अक्टूबर 2018
0
3
1

रहम करे अपनी प्रकृति और अपने बच्चो पर , आप से बिनम्र निवेदन है ना मनाया ऐसी दिवाली गैस चैंबर बन चुकी दिल्ली को क्या कोई सरकार ,कानून या धर्म बताएगा कि " हमे पटाखे जलाने चाहिए या नहीं?" क्या हमारी बुद्धि और विवेक बिलकु

16

"ज़िंदगी का सबक सिखाता " - दिसम्बर और जनवरी का महीना

24 दिसम्बर 2018
0
2
2

एक और साल अपने नियत अवधि को समाप्त कर जाने को है और एक नया साल दस्तक दे रहा है। बस, एक रात और कैलेंडर पर तारीखे बदल जायेगी। दिसम्बर और जनवरी महीने की कुछ अलग ही खासियत होती है। कहने को तो ये भी दो महीने ही तो है पर साल के सारे महीनो को बंधे रखते है। दोस

17

जीवन का अनमोल "अवॉर्ड "

8 जनवरी 2019
0
0
0

" नववर्ष मंगलमय हो " " हमारा देश और समज नशामुक्त हो " नशा जो सुरसा बन हमारी युवा पीढ़ी को निगले जा रहा है ,

18

यादें

2 मार्च 2019
0
1
0

"बहुत खूबसूरत होती है ये यादों की दुनियाँ , हमारे बीते हुये कल के छोटे छोटे टुकड़े हमारी यादों में हमेशा महफूज रहते हैं,

19

दम तोड़ती भावनायें

20 मई 2019
0
4
4

"क्या ,आज भी तुम बाहर जा रहे हो ??तंग आ गई हूँ मैं तुम्हारे इस रोज रोज के टूर और मिटिंग से ,कभी हमारे लिए भी वक़्त निकल लिया करो। " जैसे ही उस आलिशान बँगले के दरवाज़े पर हम पहुंचे और नौकर ने दरवाज़ा खोला ,अंदर से एक तेज़ आवाज़ कानो में पड़ी ,हमारे कदम वही ठिठक गये। लेकिन तभी बड़ी शालीनता के साथ नौकर न

20

गाना : हँसते आँसु

27 जून 2019
0
2
2

हजारो तरह के ये होते हैं आँसुअगर दिल में गम हैं तो रोते हैं आँसुख़ुशी में भी आँखे भिगोते हैं आँसुइन्हे जान सकता नहीं ये जमानामैं खुश हूँ मेरे आँसुओं पे न जानामैं तो दीवाना ,दीवाना ,दीवाना "मिलन " फिल्म का ये गाना वाकई लाजबाब हैं। आनं

21

जाने चले जाते हैं कहाँ ......

23 सितम्बर 2019
0
2
2

जाने चले जाते हैं कहाँ ,दुनिया से जाने वाले, जाने चले जाते हैं कहाँ कैसे ढूढ़े कोई उनको ,नहीं क़दमों के निशां अक्सर मैं भी यही सोचती हूँ आखिर दुनिया

22

आस्था और विश्वास का पर्व -" छठ पूजा "

31 अक्टूबर 2019
0
1
0

" छठ पूजा " हिन्दूओं का एक मात्र ऐसा पौराणिक पर्व हैं जो ऊर्जा के देवता सूर्य और प्रकृति की देवी षष्ठी माता को समर्पित हैं। मान्यता है कि -षष्ठी माता ब्रह्माजी की मानस पुत्री हैं,प्रकृति का छठा अंश होने के कारण उन्हें षष्ठी माता कहा गया जो लोकभाषा में छठी माता के नाम

23

धरती की करुण पुकार

7 अगस्त 2021
0
1
1

हे! मानस के दीप कलशतुम आज धरा पर फिर आओ।नवयुग की रामायण रचकर मानवता के प्राण बचाओं ।आज कहाँ वो राम जगत में जिसने तप को गले लगाया ।राजसुख से वंचित रह जिसने मात - पिता का वचन निभाया । सुख कहाँ है वो राम राज्य का ?वह सपना तो अब टूट गया ।कहाँ

24

सच्ची प्रहरी तो तुम हो "माँ"

30 अगस्त 2021
0
8
0

<p>कहते हैं, सब मुझको "सैनिक"</p> <p>पर, सच्ची प्रहरी तो तुम हो "माँ" </p> <p>मैं सपूत इस

25

दे दो ऐसा वरदान...

31 अगस्त 2021
7
8
3

<p><br></p> <figure><img src="https://shabd.s3.us-east-2.amazonaws.com/articles/611d425242f7ed561c89

26

आईं झुम के बसंत....

10 फरवरी 2022
0
0
0

बसंत अर्थात "फुलों का गुच्छा", बसंत, अर्थात  "शिव के पांचवें मुख से निकला एक राग" बसंत जिसके "अधिष्ठाता देवता ही कामदेव" हो, ऐसे ऋतु के क्या कहने।"बसंत" इस शब्द के स्मरण मात्र से ही दिलों में  फुल

---

किताब पढ़िए

लेख पढ़िए