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कांवर संग देवघर का सफ़र

21 मई 2023

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पिछले बरस सावन में 

कांवर ले नंगे पांव 

मैं देवस्थान, 

देवघर गई थी | 

एक बिल्कुल नया-सा 

पहलू मुझे समझ आया | 

कांवर लेकर 

देवघर तक  जाने 

का सफ़र मैंने 

बिलकुल जीवन-सा पाया |

दोनों ही सफ़र में 

ईश्वर तक पहुँचने से पहले 

थकने की इजाज़त नहीं | 

कभी तो चिलचिलाती 

धूप होती है ऐसी कि 

धरती पर पांव रखते ही 

जलने लगते हैं | 

कभी पेड़ की 

ठंडी छाँव होती है | 

तो कभी बारिश की 

फ़ुहार होती है | 

कभी सफर मुश्किल-सा 

मालूम पड़ता है | 

तो कभी सफ़र बहुत ही 

आसान लगता है | 

इस सफ़र में हम 

ठहर तो सकते हैं | 

पर रुक जाने की 

इजाज़त नहीं | 

बहुत से चेहरे 

कभी तो हमारे साथ 

चलते हैं | 

और कभी 

पीछे छूट जाते हैं | 

और कुछ चेहरे सफ़र 

के आख़िरी पड़ाव तक 

हमारे साथ जाते हैं | 

पर ईश्वर तक 

हमारे मन को हमारे 

पांव ही पहुंचाते हैं | 

जब सफ़र में 

पांव थकने लगते हैं | 

तब ईश्वर के नाम 

मात्र से ही 

ऊर्जा का संचार होता है | 

बोल-बम के नारे से 

पांव को बल मिलता है | 

और ईश्वर तक पहुँचने को 

मन प्रबल होता है | 

जीवन के सफ़र में 

जब कभी हम 

हताश होते हैं | 

तात्कालिक परेशानियों से 

निराश होते हैं | 

ईश्वर के नाम मात्र से ही 

मन सबल होता है | 

फिर हर-एक 

समस्या का 

हल होता है | 

दोनों ही सफर में 

हम ठहर सकते हैं | 

फिर से हम 

सम्हल सकते हैं | 

पर ईश्वर तक 

पहुंचने से पहले 

थक जाने की 

और रुक जाने की 

इजाज़त नहीं |

- तीषु सिंह ‘तृष्णा’
 

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रचनाएँ
चंद कविताएं जीवन से जुड़ी
5.0
कविताओं का संग्रह है - चंद कविताएं जीवन से जुड़ी |
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उफ़ ये चिन्तन

5 फरवरी 2022
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आज शाम मिली फुरसत मुझको अकेले में  पर पड़ गई फिर उसी चिन्तन  के झमेले में  उस दिन ये जो हुआ तो क्यों हुआ  काश वो होता तो कितना अच्छा होता  उस सोच की सोच में घंटों लगा दिये  शुकून से जो पल बिता

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5 फरवरी 2022
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5 फरवरी 2022
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5 फरवरी 2022
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नाराज हूँ  मैं वक्त से वक्त वो देता नहीं क्यों  ढेरों वजह ढूंढ़कर मशरूफ रहता यूँ ऐ वक्त कभी तो मेरे छज्जे पे आ रे   किसी शाम की चाय मेरे संग पी के जा रे मन में जन्मे  शब्दों को

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मेरी आजकल खुशी से बनती नहीं

5 फरवरी 2022
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5 फरवरी 2022
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एक औरत जो लड़की थी, कुछ ना सोचा करती थी,  ना कुछ समझा करती थी,  हवाओं सी बहती थी, बेफिक्री में रहती थी, ना सुबह शाम का होश था, ना मन में कोई रोष था, चेहरे पे मुस्कान लिए दिन-भर फिरा करती थी,

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ज़िन्दगी के नए पड़ाव पे पहुंची आज, अनजानी खुशी का हुआ आगाज़, बहुत ही मीठा-मीठा सा अहसास, वो मेरे ही अन्दर ले रहा है साँस, इन्द्रियों से कर रही मैं आभास, सपने बुनने की हुई है शुरु

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हम कहते हैं हम जाग रहे हैं

5 फरवरी 2022
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हम कहते हैं हम जाग रहे हैं, अनदेखे ख्वाबों के पीछे क्यों भाग रहे हैं, सफलता जो हमने बस में अपने कर ली, पाकर हमें है क्यों नहीं तसल्ली, सपनों की तस्वीर पाने की कोशिश में, जीवित नजारे नजरंदाज करत

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3 अप्रैल 2022
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मैं कवि तो नहींबस शब्द जोड़ती हूँ,कभी अपनी कल्पना उभारती हूँ,तो कभी अनुभव निखारती हूँ,कभी खुद के प्रेम में डूबती हूँतो कभी अहसासों में खोती हूँ,कभी खुद में जोश जगाती हूँ,तो कभी कहीं प्रेरणाऐं ढूँढती हू

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कोई पहचानी उलझन हो रही मन में,पुराना डर छुप के बैठा मेरे अंतर्मन में,फैला हर तरफ अजीब सा सन्नाटा,मानो फुटने को है कोई भयानक ज्वारभाटा,पहले भी बीता था मौसम आँधियों वाला,जिसमे जर

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अगर सुकून की शक्ल होती,अकेलेपन में खूब रोती ,हर तरफ आवाज़ है और शोर है,कहीं पहुँचने की सबको होड़ है,मुझको भुला दिया है सब ने,मेरा अस्तित्व ही मिटा दिया है सब ने,बच्चों से छूट गया माँ का आंचल,

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खिड़की पे बैठी हूँ ले चाय की प्याली,जी रही हूँ कुदरत की तस्वीर निराली, यूँ निकली है आज भींगी हुई भोर,गूंज रहा है पानी का सुरीला शोर,कभी गूँजती हैं झ

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वो गर्मी की दोपहर,बिलकुल शांत और गंभीर,अंदर ऊबासी लेते कमरे,पसीने से लथ-पथ खिड़कियां,वो गर्मी की दोपहर,बिलकुल शांत और गंभीर,बाहर गर्म हवाओं का शोर,धूम में झुलसी हुई पत्तियाँ,साल भर में मिलत

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ज़िन्दगी भी बहुत ही अजीब है,कभी तो ये हंसाती है,तो कभी ये रुलाती है,और कभी-कभी शांत रहकर बहत कुछ सिखाती है। ज़िन्दगी भी बहुत ही अजीब है,कभी तो बहुत कुछ छीन ले जाती है,तो कभी एकाएक बहुत कुछ दे

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पढ़ रही थी English literature,सोचा था बनूँगी मैं Lecturer,पर नौकरी की थी मुझे जल्दी,तो मैंने MBA ही कर ली,HR बन कर रही पुरे साल,फिर बसा लिया अपना घर-संसार,पति हैं मेरे IT professional,हम दो

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मेरे शहर की गली में रहता था बचपनऔर अगली मोड़ में रहती थी खुशी,वो हर सुबह - शाम मिलते थे अक्सरउन दोनों में थी काफी गहरी दोस्ती,बचपन का था थोड़ा रूखा स्वभावछोटी सी बात में गरम होता उसका भाव,खुशी थी होशिया

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इस बरस दिवाली हमें भी मनानी है

18 अक्टूबर 2022
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ओ राम मेरे ! मंदिर तेरे  प्रार्थना लेकर आई हूँ मैं श्याम रंग की श्यामा  कुम्हार टोली के  दिए वाले बिरजू की बेटी हूँ  मंदिर की सफाई वाली राधा मेरी माता है  मेरी माँ को  मूर्तियों के छोटे-छोटे,

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इस दीवाली

23 अक्टूबर 2022
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बैठती हूँ छत के मुँडेर पर देर तक,चंदा और तारों से गप्पें होती अक्सर,कभी तारे बताते अपनी कही-सुनी,तो कभी चंदा सुनाता अपनी कहानी,आज रात बदला सा है नज़ारा,एक कोने चुपचाप खड़ा चाँद,और झुण्ड बना कर चमक रहा स

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राज कुंवर और महारानी माँ

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एक छोटी-सी, प्यारी-सी यह कहानी है,राज कुंवर और उनकी माँ महारानी है,इन माँ-बेटे की दोस्ती इतनी गहरी है,कि हर एक बात एक दूजे को बतानी है, हर रोज सुबह-सवेरे महारानी मां,लाडले राज कुंवर के कमरे में आ

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माँ

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माँ माँ महज़ शब्द ही नहीं एक संस्कार है | नारी मन में छुपा एक सूंदर विचार है | नारी के आँगन जब बच्चे का जन्म होता है | उसी रोज़ नारी का भी पुनर्जन्म होता है | जीवन क्यों मिला ?

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कांवर संग देवघर का सफ़र

21 मई 2023
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पिछले बरस सावन में  कांवर ले नंगे पांव  मैं देवस्थान,  देवघर गई थी |  एक बिल्कुल नया-सा  पहलू मुझे समझ आया |  कांवर लेकर  देवघर तक  जाने  का सफ़र मैंने  बिलकुल जीवन-सा पाया | दोनों ही सफ़र में

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