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राजा, मंदिर और पुजारी- नेहरू/ प्रेमचंद

10 नवम्बर 2021

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हमने पिछले खत में लिखा था कि आदमियों के पाँच दरजे बन गए। सबसे बड़ी जमात मजदूर और किसानों की थी। किसान जमीन जोतते थे और खाने की चीजें पैदा करते थे। अगर किसान या और लोग जमीन न जोतते और खेती न होती तो अनाज पैदा ही न होता, या होता तो बहुत कम। इसलिए किसानों का दरजा बहुत जरूरी था। वे न होते तो सब लोग भूखों मर जाते। मजदूर भी खेतों या शहरों में बहुत फायदे के काम करते थे। लेकिन इन अभागों को इतना जरूरी काम करने और हर एक आदमी के काम आने पर भी मुश्किल से गुजारे भर को मिलता था। उनकी कमाई का बड़ा हिस्सा दूसरों के हाथ पड़ जाता था खासकर राजा और उसके दरजे के दूसरे आदमियों और अमीरों के हाथ। उसकी टोली के दूसरे लोग जिनमें दरबारी भी शामिल थे उन्हें बिल्कुल चूस लेते थे।

हम पहले लिख चुके हैं कि राजा और उसके दरबारियों का बहुत दबाव था। शुरू में जब जातियाँ बनीं, तो जमीन किसी एक आदमी की न होती थी, जाति भर की होती थी। लेकिन जब राजा और उसकी टोली के आदमियों की ताकत बढ़ गई तो वे कहने लगे कि जमीन हमारी है। वे जमींदार हो गए और बेचारे किसान जो छाती फाड़ कर खेती-बारी करते थे, एक तरह से महज उनके नौकर हो गए। फल यह हुआ कि किसान खेती करके जो कुछ पैदा करते थे वह बँट जाता था और बड़ा हिस्सा जमींदार के हाथ लगता था।

बाज मंदिरों के कब्जे में भी जमीन थी, इसलिए पुजारी भी जमींदार हो गए। मगर ये मंदिर और उनके पुजारी थे कौन। मैं एक खत में लिख चुका हूँ कि शुरू में जंगली आदमियों को ईश्‍वर और मजहब का खयाल इस वजह से पैदा हुआ कि दुनिया की बहुत-सी बातें उनकी समझ में न आती थीं और जिस बात को वे समझ न सकते थे, उससे डरते थे। उन्होंने हर एक चीज को देवता या देवी बना लिया, जैसे नदी, पहाड़, सूरज, पेड़, जानवर और बाज ऐसी चीजें जिन्हें वे देख तो न सकते थे पर कल्पना करते थे, जैसे भूत-प्रेत। वे इन देवताओं से डरते थे, इसलिए उन्हें हमेशा यह खयाल होता था कि वे उन्हें सजा देना चाहते हैं। वे अपने देवताओं को भी अपनी ही तरह क्रोधी और निर्दयी समझते थे और उनका गुस्सा ठंडा करने या उन्हें खुश करने के लिए क़ुरबानियाँ दिया करते थे।

इन्हीं देवताओं के लिए मंदिर बनने लगे। मन्दिर के भीतर एक मंडप होता था जिसमें देवता की मूर्ति होती थी। वे किसी ऐसी चीज की पूजा कैसे करते जिसे वे देख ही न सकें। यह जरा मुश्किल है। तुम्हें मालूम है कि छोटा बच्चा उन्हीं चीजों का खयाल कर सकता है जिन्हें वह देखता है। शुरू जमाने के लोगों की हालत कुछ बच्चों की सी थी। चूँकि वे मूर्ति के बिना पूजा ही न कर सकते थे, वे अपने मंदिरों में मूर्तियाँ रखते थे। यह कुछ अजीब बात है कि ये मूर्तियाँ बराबर डरावने, कुरूप जानवरों की होती थीं, या कभी-कभी आदमी और जानवर की मिली हुई। मिस्र में एक जमाने में बिल्ली की पूजा होती थी, और मुझे याद आता है कि एक दूसरे जमाने में बंदर की। समझ में नहीं आता कि लोग ऐसी भयानक मूर्तियों की पूजा क्यों करते थे। अगर मूर्ति ही पूजना चाहते थे तो उसे खूबसूरत क्यों न बनाते थे? लेकिन शायद उनका खयाल था कि देवता डरावने होते हैं, इसीलिए वे उनकी ऐसी भयानक मूर्तियाँ बनाते थे।

उस जमाने में शायद लोगों का यह खयाल न था कि ईश्‍वर एक है, या वह कोई बड़ी ताकत है जैसा लोग आज समझते हैं। वे सोचते होंगे कि बहुत-से देवता और देवियाँ हैं, जिनमें शायद कभी-कभी लड़ाइयाँ भी होती हों। अलग-अलग शहरों और मुल्कों के देवता भी अलग-अलग होते थे।

मंदिरों में बहुत-से पुजारी और पुजारिनें होती थीं। पुजारी लोग आम तौर पर लिखना-पढ़ना जानते थे और दूसरे आदमियों से ज्यादा पढ़े-लिखे होते थे। इसलिए राजा लोग उनसे सलाह लिया करते थे। उस जमाने में किताबों को लिखना या नकल करना पुजारियों का ही काम था। उन्हें कुछ विद्याएँ आती थीं इसलिए वे पुराने जमाने के ऋषि समझे जाते थे। वे हकीम भी होते थे और अक्सर महज यह दिखाने के लिए कि वे लोग कितने पहुँचे हुए हैं, वे लोगों के सामने जादू के करतब किया करते थे। लोग सीधे और मूर्ख तो थे ही, वे पुजारियों को जादूगर समझते थे और उनसे थर-थर काँपते थे।

पुजारी लोग हर तरह से आदमियों की जिंदगी के कामों में मिले-जुले रहते थे। वही उस जमाने के अक्लमंद आदमियों में थे और हर एक आदमी मुसीबत या बीमारी में उनके पास जाता था। वे आदमियों के लिए बड़े-बड़े त्योहारों का इंतजाम करते थे। उस जमाने में पत्र न थे, खास कर गरीब आदमियों के लिए। वे त्योहारों ही से दिनों का हिसाब लगाते थे।

पुजारी लोग प्रजा को ठगते और धोखा देते थे। लेकिन इनके साथ कई बातों में उनकी मदद भी करते और उन्हें आगे भी बढ़ाते थे।

मुमकिन है कि जब लोग पहले-पहल शहरों में बसने लगे हों तो उन पर राज्य करनेवाले राजा न रहे हों, पुजारी ही रहे हों। बाद को राजा आए होंगे और चूँकि वे लोग लड़ने में ज्यादा होशियार थे, उन्होंने पुजारियों को निकाल दिया होगा। बाज जगहों में एक ही आदमी राजा और पुजारी दोनों ही होता था, जैसे मिस्र के फिरऊन। फिरऊन लोग अपनी जिंदगी ही में आधे देवता समझे जाने लगे थे, और मरने के बाद तो वे पूरे देवताओं की तरह पुजने लगे।

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रचनाएँ
पिता के पत्र पुत्री के नाम- जवाहरलाल नेहरू
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आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इसमें अपनी एकलौती बेटी इंदिरा नेहरू का जिक्र किया था। जिसका सारांश इस प्रकार है- एक खत एकाएक खत्म हो जाता है। गर्मी का मौसम खत्म होता है और इंदिरा पहाड़ से उतर आई। फिर ऐसे खत लिखने का मौका मुझे नहीं मिला। उसके बाद के साल वह पहाड़ नहीं गई और दो साल बाद 1630 में मुझे नैनी की जो पहाड़ नहीं है, यात्रा करनी पड़ी। नैनी जेल में कुछ और पत्र मैंने इंदिरा को लिखे लेकिन वे भी अधूरे रह गए और भौर छोड़ दिया गया। ये नए खत इस किताब में शामिल नहीं है।
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पिता के पत्र पुत्री के नाम

2 अक्टूबर 2021
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<p><br></p> <figure><img src="https://shabd.s3.us-east-2.amazonaws.com/articles/61580f00a9e73b20b620

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संसार पुस्तक है- नेहरू/ प्रेमचंद

26 अक्टूबर 2021
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<p>जब तुम मेरे साथ रहती हो तो अकसर मुझसे बहुत-सी बातें पूछा करती हो और मैं उनका जवाब देने की कोशिश क

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शुरू का इतिहास कैसे लिखा गया - जवाहरलाल नेहरू

26 अक्टूबर 2021
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<p>अपने पहले पन्‍ने में मैंने तुम्हें बताया था कि हमें संसार की किताब से ही दुनिया के शुरू का हाल मा

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जमीन कैसे बनी - जवाहरलाल नेहरू

27 अक्टूबर 2021
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<p>तुम जानती हो कि जमीन सूरज के चारों तरफ घूमती है और चाँद जमीन के चारों तरफ घूमता है। शायद तुम्हें

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जानवर कब पैदा हुए - जवाहरलाल नेहरू

27 अक्टूबर 2021
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<p>हम बतला चुके हैं कि शुरू में छोटे-छोटे समुद्री जानवर और पानी में होनेवाले पौधे दुनिया की जानदार च

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आदमी कब पैदा हुआ- नेहरू/ प्रेमचंद

28 अक्टूबर 2021
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<p>मैंने तुम्हें पिछले खत में बतलाया था कि पहले दुनिया में बहुत नीचे दरजे के जानवर पैदा हुए और धीरे-

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शुरू के आदमी- नेहरू/ प्रेमचंद

28 अक्टूबर 2021
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<p>मैंने अपने पिछले खत में लिखा था कि आदमी और जानवर में सिर्फ अक्ल का फर्क है। अक्ल ने आदमी को उन बड

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तरह- तरह की कौमें क्योंकर बनीं- नेहरू/ प्रेमचंद

29 अक्टूबर 2021
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<p>अपने पिछले खत में मैंने नए पत्थर-युग के आदमियों का जिक्र किया था जो खासकर झीलों के बीच में मकानों

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आदमियों की कौमें और जबानें- नेहरू/ प्रेमचंद

29 अक्टूबर 2021
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<p>हम यह नहीं कह सकते कि दुनिया के किस हिस्से में पहले-पहल आदमी पैदा हुए। न हमें यही मालूम है कि शुर

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जबानों का आपस में रिश्ता- नेहरू/ प्रेमचंद

29 अक्टूबर 2021
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<p>हम बतला चुके हैं कि आर्य बहुत-से मुल्कों में फैल गए और जो कुछ भी उनकी जबान थी उसे अपने साथ लेते ग

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सभ्यता क्या है?- नेहरू/ प्रेमचंद

30 अक्टूबर 2021
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<p>मैं आज तुम्हें पुराने जमाने की सभ्यता का कुछ हाल बताता हूँ। लेकिन इसके पहले हमें यह समझ लेना चाहि

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जातियों का बनना- नेहरू/ प्रेमचंद

30 अक्टूबर 2021
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<p>मैंने पिछले खतों में तुम्हें बतलाया है कि शुरू में जब आदमी पैदा हुआ तो वह बहुत कुछ जानवरों से मिल

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मजहब की शुरुआत और काम का बंटवारा- नेहरू/ प्रेमचंद

30 अक्टूबर 2021
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<p>पिछले खत में मैंने तुम्हें बतलाया था कि पुराने जमाने में आदमी हर एक चीज से डरता था और खयाल करता थ

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खेती से पैदा हुई तब्दीलियां- नेहरू/ प्रेमचंद

1 नवम्बर 2021
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<p>अपने पिछले खत में मैंने कामों के अलग-अलग किए जाने का कुछ हाल बतलाया था। बिल्कुल शुरू में जब आदमी

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खानदान का सरगना कैसे बना- नेहरू/ प्रेमचंद

1 नवम्बर 2021
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<p>मुझे भय है कि मेरे खत कुछ पेचीदा होते जा रहे हैं। लेकिन अब जिंदगी भी तो पेचीदा हो गई है। पुराने ज

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सरगना का इख्तियार कैसे बढ़ा- नेहरू/ प्रेमचंद

1 नवम्बर 2021
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<p>मुझे उम्मीद है कि पुरानी जातियों और उनके बुजुर्गों का हाल तुम्हें रूखा न मालूम होता होगा।</p> <p>

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सरगना राजा हो गया- नेहरू/ प्रेमचंद

3 नवम्बर 2021
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<p>बूढ़े सरगना ने हमारा बहुत-सा वक्त ले लिया। लेकिन हम उससे जल्द ही फुर्सत पा जाएंगे या यों कहो उसका

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शुरू का रहन-सहन- नेहरू/ प्रेमचंद

3 नवम्बर 2021
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<p>सरगनों और राजाओं की चर्चा हम काफी कर चुके। अब हम उस जमाने के रहन-सहन और आदमियों का कुछ हाल लिखेंग

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पुरानी दुनिया के बडे़-बड़े शहर- नेहरू/ प्रेमचंद

3 नवम्बर 2021
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<p>मैं लिख चुका हूँ कि आदमियों ने पहले-पहल बड़ी-बड़ी नदियों के पास और उपजाऊ घाटियों में बस्तियाँ बना

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मिस्र और क्रीट- नेहरू/ प्रेमचंद

3 नवम्बर 2021
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<p>पुराने जमाने में शहरों और गाँवों में किस तरह के लोग रहते थे? उनका कुछ हाल उनके बनाए हुए बड़े-बड़े

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चीन और हिंदुस्तान- नेहरू/ प्रेमचंद

6 नवम्बर 2021
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<p>हम लिख चुके हैं कि शुरू में मेसोपोटैमिया, मिस्र और भूमध्‍य सागर के छोटे-से टापू क्रीट में सभ्यता

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समुद्री सफर और व्यापार- नेहरू/ प्रेमचंद

6 नवम्बर 2021
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<p>फिनीशियन भी पुराने जमाने की एक सभ्य जाति थी। उसकी नस्ल भी वही थी जो यहूदियों और अरबों की है। वे ख

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भाषा, लिखावट और गिनती- नेहरू/ प्रेमचंद

6 नवम्बर 2021
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<p>हम तरह-तरह की भाषाओं का पहले ही जिक्र कर चुके हैं और दिखा चुके हैं कि उनका आपस में क्या नाता है।

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आदमियों के अलग-अलग दरजे- नेहरू/ प्रेमचंद

10 नवम्बर 2021
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<p>लड़के, लड़कियों और सयानों को भी इतिहास अकसर एक अजीब ढंग से पढ़ाया जाता है। उन्हें राजाओं और दूसरे

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राजा, मंदिर और पुजारी- नेहरू/ प्रेमचंद

10 नवम्बर 2021
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<p>हमने पिछले खत में लिखा था कि आदमियों के पाँच दरजे बन गए। सबसे बड़ी जमात मजदूर और किसानों की थी। क

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पीछे की तरफ एक नजर- नेहरू/ प्रेमचंद

10 नवम्बर 2021
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<p>तुम मेरी चिट्ठियों से ऊब गई होगी! जरा दम लेना चाहती होगी। खैर, कुछ अरसे</p> <p>तक मैं तुम्हें नई

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फॉसिल और पुराने खंडहर- नेहरू/ प्रेमचंद

10 नवम्बर 2021
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<p>मैंने अरसे से तुम्हें कोई खत नहीं लिखा। पिछले दो खतों में हमने उस पुराने जमाने पर एक नजर डाली थी

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