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बदलें दृष्टिकोण :- आचार्य अर्जुन तिवारी

25 जनवरी 2022

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*हमारा देश भारत आदिकाल से आध्यात्मिक ज्ञान ज्ञान का केंद्र रहा है |  आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने से पहले मनुष्य को आत्मज्ञान प्राप्त करना होता है | जीवन के दीपक के बुझने के पहले स्वयं को पहचान लेना ही आत्मज्ञान है |  मनुष्य प्रत्येक विषय में आनंद का अनुभव करना चाहता है ,  हमारे पूर्वजों ने भौतिक आनंद के साथ साथ वास्तविक आनंद का भी अनुभव किया जिसे आत्मानंद या चिदानंद अक्षय आनंद आदि कहा जा सकता है | यह लौकिक जीवन में उपलब्ध ना होकर पारलौकिक जीवन में उपलब्ध हो पाता है | इसके लिए आत्मा - परमात्मा के विषय में पूर्ण ज्ञान हो जाने के बाद परमात्मा की शरण में जाना पड़ता है तभी दिव्यानंद का अनुभव हो पाना संभव है | इस स्थिति में पहुंचने के लिए हमारे पूर्वजों ने अधिक कुछ ना करके मात्र अपने दृष्टिकोण को परिवर्तित किया क्योंकि बिना दृष्टिकोण को बदलें गहराई में नहीं उतरा जा सकता | दृष्टिकोण बदलता है तो सारी चीजें बदल जाती है और जिस दिन मनुष्य का दृष्टिकोण बदल जाएगा तो सर्वत्र आनंद ही आनंद बिखरा दिखाई देगा | दृष्टिकोण बदलने का तात्पर्य यह है कि हम भौतिकता में स्वयं को व्यस्त ना रखकर आत्मज्ञान की खोज में अधिक से अधिक समय व्यतीत करें | पुराणों की कथाओं में हमें प्रायः पढ़ने को मिलता है कि हमारे पूर्वजों ने बहुत कठिन से कठिन तपस्या की थी यह दृष्टिकोण परिवर्तन का ही परिणाम था क्योंकि उन्होंने जान लिया था कि यह जीवन क्षणभंगुर है और इस जीवन का लक्ष्य परमात्मा की प्राप्ति करना है ! इसी लक्ष्य को ध्यान में रखकर उन्होंने भौतिक आनंद के साथ साथ वास्तविक आनंद प्राप्त करने का प्रयास किया | भगवान को सच्चिदानंद कहा जाता है ! वे आनंद के सागर है ! यदि आनंद प्राप्त करने की इच्छा है तो बूंद बूंद आनंद की प्राप्ति का प्रयास ना करके आनंद के सागर में स्नान करने का या उसमें समाहित हो जाने का प्रयास प्रत्येक मनुष्य को करना चाहिए ,  इससे उसका लोक और परलोक दोनों ही सुधर जाएगा |*


*आज मनुष्य इंद्रिय सुख को ही अपना आनंद मानने लगा है | आज प्रत्येक विषय में आनंद प्राप्त करना प्रत्येक मनुष्य का मुख्य लक्ष्य रह गया है | मनुष्य दिन-रात उसी की प्राप्ति में लगा रहता है , जो जिस स्थिति में है उसी स्थिति में आनंद की अनुभूति कर रहा है | गांव में रहने वाला एक ग्रामीण इसलिए आनंदित है कि उसे स्वस्थ वायु , प्रकृति और अनेक प्राकृतिक साधनों का भोग भोगने को मिल रहा है | शहर में रहने वाले उनसे अधिक आनंदित हैं क्योंकि उन्हें उच्च साधन उपलब्ध हैं | परंतु मेरा "आचार्य अर्जुन तिवारी" का कहना है कि अनेक प्रकार के भोगों में लिप्त मनुष्य यह नहीं जान पाता है कि "भोग से ही रोग उत्पन्न होते हैं" जिसे मनुष्य आनंद मानकर प्रसन्न होता है क्या वह वास्तविक आनंद है ?  जिनसे इंद्रियों के विषय तृप्त होते हैं उन्हें वास्तविक आनंद की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता |  स्वाभाविक आनंद से ही यदि आत्मा तृप्त हो जाती तो संभवत यह प्रश्न इतना महत्वपूर्ण होता  जितना लोगों के सामने हैं ! आनंद क्या है ? पूर्णानंद तो वही है जहां किसी प्रकार की विकृति ना हो , किसी प्रकार की आशंका - अभाव या परेशानी ना उठानी पड़ती हो !  स्वाभाविक जीवन में जो आनंद मिल रहा है उसमें हमारा अभ्यास बन गया है इसलिए अनुचित होने पर भी वह ठीक ही लगता है | शुद्धतम आनंद प्राप्ति के लिए दृष्टिकोण को परिमार्जित करने की आवश्यकता है | अलौकिक आनंद कभी भी सिद्धिदाता नहीं हो सकता |  जो मनुष्य अलौकिक आनंद को ही पूर्ण आनंद मानकर इंद्रिय जन्य भोगों को तृप्त करने में आनंद की अनुभूति कर रहे हैं वह अपने साथ ही छलावा कर रहे हैं |  इस विषय पर दृष्टिकोण बदलने की आवश्यकता है | जिस दिन मनुष्य का दृष्टिकोण परिवर्तित हो जाएगा उसी दिन उसे वास्तविक आनंद प्राप्त होने लगेगा |*


*जिस दिन दृष्टि बदल जाती है उसी दिन सृष्टि भी बदली - बदली सी लगती है |  दृष्टिकोण के बदलने से ही मनुष्य महत्वपूर्ण भौतिक वस्तुओं को छोड़कर वास्तविक सुखों के चिंतन में लग जाते हैं और यही जीवन का अंतिम लक्ष्य होना चाहिए |*

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Pragya pandey

Pragya pandey

🙏🙏🙏🙏

25 जनवरी 2022

आचार्य अर्जुन तिवारी

आचार्य अर्जुन तिवारी

25 जनवरी 2022

आभार पाण्डेय जी

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रचनाएँ
हमारी संस्कृति एवं हम
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हमारी संस्कृति विश्व की प्राचीन एवं ओजस्वी संस्कृति कही जाती है ! हमें विश्वगुरु कहा जाता था तो उसका आधार हमारी संस्कृति एवं संस्कार ही थे ! हमारे महापुरुषों ने समाज के लिए कुछ आदर्श स्थापित किये थे ! उन आदर्शों के बलबूते पर ही हम विश्वगुरू थे ! चिन्तनीय यह है कि हमारे पूर्वजों ने संस्कृति एवं संस्कार को दिव्य ज्ञान हमको दिया था हम उनका संरक्षण नहीं कर पा रहे हैं ! आज विचार करने की आवश्यकता है कि हमारे पूर्वज क्या थे और हम क्या होते जा रहे हैं !
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चित्र और चरित्र :- आचार्य अर्जुन तिवारी

18 जनवरी 2022
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*भारतीय सनातन धर्म में सदैव से चरित्र-निर्माण पर ही बल दिया गया है | और चरित्र का निर्माण वैसे ही हो पाता है जैसा चित्र हमारे मनोमस्तिष्क में स्थापित होता है | सनातन धर्म में मूर्तिपूजा को विशेष महत्व

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मानव धर्म :- आचार्य अर्जुन तिवारी

18 जनवरी 2022
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*इस संसार में आदिकाल में जब पृथ्वी पर एकमात्र "सनातन धर्म" ही था तब हमारे महापुरुषों ने सम्पूर्ण धरती को अपना घर एवं सभी प्राणियों को अपना परिवार मानते हुए "वसुधैव - कुटुम्बकम्" का संदेश प्रसारित

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जीवन में मार्गदर्शन की आवश्यकता :- आचार्य अर्जुन तिवारी

22 जनवरी 2022
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*इस संसार में जन्म लेने के बाद प्रत्येक मनुष्य सफल , समृद्ध , सार्थक , सुखी एवं शांतिपूर्ण जीवन जीना चाहता है ,  परंतु यह इतना सहज नहीं है , क्योंकि वर्तमान युग में जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में भा

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बदलें दृष्टिकोण :- आचार्य अर्जुन तिवारी

25 जनवरी 2022
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*हमारा देश भारत आदिकाल से आध्यात्मिक ज्ञान ज्ञान का केंद्र रहा है |  आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने से पहले मनुष्य को आत्मज्ञान प्राप्त करना होता है | जीवन के दीपक के बुझने के पहले स्वयं को पहचान लेना

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गुण एवं दोष

26 मई 2022
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*ब्रह्मा जी द्वारा बनाई गई सृष्टि बड़ी ही अलौकिक है ! सृष्टि की रचना करते समय ब्रह्मा जी ने संतुलन को बनाए रखने के लिए जहां अनेकों गुण बनाए वहीं अनेक प्रकार के दोष भी बनाये हैं ! "जड़ चेतन गुण दोषमय ,

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तुलसी जयन्ती :- आचार्य अर्जुन तिवारी

4 अगस्त 2022
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*सनातन हिंदू धर्म में इस संसार का सृष्टिकर्ता , पालनकर्ता एवं संहारकर्ता विविध रूपों में भगवान को माना गया ! भगवान की पहचान हमेंशा भक्तों से हुई है ! यदि भक्त ना होते तो शायद भगवान का भी कोई अस्

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मित्रता अनमोल रत्न है :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

6 अगस्त 2022
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*संसार में आने के बाद मनुष्य अनेकों प्रकार के संबंधों में बंध जाता है ! पारिवारिक संबंध , सामाजिक संबंध , बन्धु - बांधव एवं अनेक प्रकार के रिश्ते नाते उसे जीवन भर बांधे रखते हैं ! यह सभी संबंध म

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सच्ची मित्रता :- आचार्य अर्जुन तिवारी

7 अगस्त 2022
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*जीवन में जिस प्रकार मनुष्य को आदर्श माता-पिता एवं आदर्श गुरु तथा एक आदर्श समाज उच्चता के शिखर पर ले जाता है उसी प्रकार एक सच्चा एवं आदर्श मित्र मनुष्य को सफलता की ऊंचाइयों तक पहुंचा देता है ! इस संसा

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हर घर तिरंगा :- आचार्य अर्जुन तिवारी

14 अगस्त 2022
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*इस संसार में जन्म लेने के बाद स्वतंत्र रहने का अधिकार प्रत्येक जीव मात्र को है ! परिस्थिति वश मनुष्य पराधीन हो जाता है ! पराधीनता का दुख वही समझ सकता है जिसने यह कष्ट झेला है ! बाबा जी ने मानस में लि

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गणेश लक्ष्मी का पूजन

27 अक्टूबर 2022
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*सनातन धर्म में पूजा पद्धति को मान्यता दी गई है ! अनेकों प्रकार के अनुष्ठान , यज्ञ एवं दैनिक पूजन सनातन धर्मप्रेमी आदिकाल से करते चले आए हैं ! कोई भी अनुष्ठान हो , कोई भी पूजन हो प्रथम पूजन गणेश गौरी

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वेदों में समाहित श्री राम नाम :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

5 नवम्बर 2022
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*सनातन धर्म में समय-समय पर नारायण ने अवतार लेकर के इस धरती का भार उतारा है ! इन सभी अवतारों की चर्चा हमें ग्रंथों में मिलती है परंतु यदि जन् - जन में किसी की चर्चा है तो वह है मर्यादा पुरुषोत्तम श्री

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वेदों में समाहित श्री राम नाम :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

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*सनातन धर्म में समय-समय पर नारायण ने अवतार लेकर के इस धरती का भार उतारा है ! इन सभी अवतारों की चर्चा हमें ग्रंथों में मिलती है परंतु यदि जन् - जन में किसी की चर्चा है तो वह है मर्यादा पुरुषोत्तम श्री

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प्रतिकार करना आवश्यक है

7 नवम्बर 2022
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*इस संसार में भगवान ने दो तरह की व्यवस्थाओं को समान रूप से स्थान दिया है ! प्रथम ध्वंस एवं दूसरे का नाम है सृजन ! सृष्टि में संतुलन बनाए रखने के लिए दोनों ही आवश्यक है , यदि कोई भवन गलत विधि से निर्मा

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श्रेय एवं प्रेय :- आचार्य अर्जुन तिवारी

9 मई 2023
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*इस संसार में प्रायः दो दो शब्दों की जोड़ी देखने को मिलती है जैसे दिन एवं रात , सुख एवं दुख , पाप एवं पुण्य आद

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मानव जीवन श्रेष्ठ है :- आचार्य अर्जुन तिवारी

10 जुलाई 2023
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धर्म का महत्त्व: - आचार्य अर्जुन तिवारी

26 अगस्त 2023
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रक्षाबन्धन एवं भद्राकाल :- आचार्य अर्जुन तिवारी

30 अगस्त 2023
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*हमारा देश भारत त्योहारों का देश है , जहां समय-समय पर अनेक प्रकार के त्यौहार मनाये जाते हैं जो कि हमारे देश को अनेकता में एकता के सूत्र में बांधते हैं ! सनातन धर्म में पर्व एवं त्योहारों का बहुत बड़ा

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मोक्ष के चार द्वारपाल :- आचार्य अर्जुन तिवारी

8 जनवरी 2024
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*सनातन धर्म में प्रत्येक मनुष्य के लिए चार पुरुषार्थ बताए गए हैं धर्म अर्थ काम और मोक्ष ! मोक्ष प्राप्त करना हमारे पूर्वजों का परम उद्देश्य रहता था ! बाकी के तीनों पुरुषार्थों का पालन करते हुए अंतिम प

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