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*होली का त्यौहार हमारे देश का प्रमुख त्यौहार है | विविधता में एकता का दिव्य संदेश होली के त्यौहार में छुपा हुआ है | जिस प्रकार कई रंग मिलकर एक नया रंग बनाते हैं उसी प्रकार लोग आपसी भेदभाव भुलाकर आपस में मिल जाते हैं | होली का त्यौहार मात्र हमारे देश भारत में ही नहीं आती संपूर्ण विश्व में पूर्ण हर्ष

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*हमारा देश भारत पर्व एवं त्योहारों का देश है , यहां वर्षपर्यंत पर्व एवं त्योहार मनाए जाते रहते हैं | सबसे विशेष बात यह हैं कि सनातन धर्म के प्रत्येक त्यौहार एवं पर्वों में मानवता के लिए एक दिव्य संदेश छुपा होता है | इन्हीं त्योहारों में प्रमुख है रंगों का त्योहार होली | होली के दिन अनेक प्रकार के रं

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*किसी भी समाज और राष्ट्र का निर्माण मनुष्य के समूह से मिलकर होता है और मनुष्य का निर्माण परिवार में होता है | परिवार समाज की प्रथम इकाई है | जिस प्रकार परिवार का परिवेश होता है मनुष्य उसी प्रकार बन जाता है इसीलिए परिवार निर्माण की दिशा में एक विकासशील व्यक्तित्व का ध्यान विशेष रूप से आकर्षित होना चा

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*सृष्टि के आदिकाल में ब्रह्मा जी ने मैथुनी सृष्टि करते हुए नर नारी का जोड़ा उत्पन्न किया , जिनके समागम से सन्तानोत्पत्ति हुई और सृष्टि गतिशील हुई | मानव जीवन में सन्तान उत्पन्न करके पितृऋण से उऋण हेने की परम्परा रही है | सन्तान उत्पन्न करने के लिए पुरुष एवं नारी वैवाहिक सम्बन्ध में बंधकर पति - पत्नी

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*किसी भी देश का भविष्य युवाओं को कहा जाता है | युवा शक्ति राष्ट्र शक्ति के रूप में जानी जाती है | भारत के संपूर्ण जनसंख्या का एक चौथाई हिस्सा आज युवा वर्ग है | छात्रों को राष्ट्र का भविष्य एवं भाग्यविधाता कहा जाता है छात्र समाज में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं | विद्यालय में रहकर सामाजिकता , नैति

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*सनातन धर्म मैं कार्तिक मास का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है | अनेक त्योहारों एवं पर्वों को स्वयं में समेटे हुए कार्तिक मास अद्वितीय है | सनातन धर्म में अनेक देवी-देवताओं का पूजन उनके विशेष दिन पर होता है परंतु आज कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को भगवान शिव और भगवान विष्णु का पूजन एक साथ करने का व

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*प्राचीन काल में हमारे महापुरुषों ने अनेक सिद्धियां प्राप्त करके लोक कल्याण का कार्य किया है | यम - नियम का पालन करते हुए कठिन तपश्चर्या करके उन्होंने यह सिद्धियां प्राप्त की थीं | किसी भी सिद्धि के विषय में आम जनमानस में रहस्य सा बना रहता है कि आखिर सिद्धि क्या है ? और कैसे प्राप्त की जा सकती है ?

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*इस सृष्टि का सर्वोच्च प्राणी मनुष्य जन्म लेने के बाद निरंतर प्रगतिशील रहा है | मनुष्य ने सफलता के कई मानदंडों को स्थापित किया , परंतु जब जब मनुष्य ने अपने बल , कौशल या ज्ञान को माध्यम बनाकर के कुछ सफलता अर्जित की है तो उसमें एक दुर्गुण चुपके से उत्पन्न हो जाता है जिसे वह स्वयं नहीं जान पाता उस दुर्

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*आदिकाल से धरा धाम पर नर और नारी सृष्टि के विकास में कदम से कदम मिलाकर एक साथ चलें | स्त्री एवं पुरुष को समान रूप से अधिकार प्राप्त था | यदि इतिहास का अवलोकन किया जाय तो नारी के ऊपर कभी भी अनावश्यक दबाव या कोई प्रतिबंध लगता हुआ नहीं प्रतीत होता है | प्राचीन समय में नारी का जितना सम्मान हमारे देश भार

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*इस असार संसार का वर्णन महापुरुषों , लेखकों एवं कवियों ने अपनी दिव्य लेखनी से दिव्यात्मक भाव देकर किया है | इन महान आत्माओं की रचनाओं में भिन्नता एवं विरोधाभास भी देखने को मिलता है | यदि सूक्ष्म दृष्टि से देखा जाय तो अनेक विरोधों के बाद भी इस असार संसार का सार लगभग सबने एक ही बताया है वह है :- प्रे

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*इस धराधाम पर मनुष्य का प्रादुरुभाव मैथुनीसृष्टि के द्वारा हुआ | यहाँ आकर मनुष्य विवाह बन्धन में बंधकर सन्तानोत्पत्ति करके अपने पितृऋण से उऋण होता है | सन्तान पुत्र हो चाहे पुत्री दोनों को समान सम्मान मिलता है | यदि हमारे धर्मशास्त्रों में पुत्र की महत्ता को दर्शाते हुए "अपुत्रस्तो गतिर्नास्ति" लिखा

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*आदिकाल से ही सामाजिक व्यवस्था के दो स्तंभ थे - वर्ण और आश्रम | मनुष्य की प्रकृति-गुण, कर्म और स्वभाव-के आधार पर मानवमात्र का वर्गीकरण चार वर्णो में हुआ था | व्यक्तिगत संस्कार के लिए उसके जीवन का विभाजन चार आश्रमों में किया गया था | ये चार आश्रम थे- (१) ब्रह्मचर्य, (२) गृहस्थाश्रम, (३) वानप्रस्थ और

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*इस धरा धाम पर अनेक प्राणियों के मध्य में मनुष्य सबसे ज्यादा सामर्थ्यवान एवं शक्ति संपन्न माना जाता है | अनेक प्राणी इस सृष्टि में ऐसे भी हैं जो कि मनुष्य अधिक बलवान है परंतु यह भी सत्य है कि मनुष्य शारीरिक शक्ति में भले ही हाथी , शेर , बैल , घोड़े आदि से कम हो परंतु बौद्धिक बल , सामाजिक बल एवं आत्

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*आदिकाल से इस धराधाम पर ऋषियों - महर्षियों एवं राजा - महाराजाओं द्वारा लोक कल्याण के लिए यज्ञ / महायज्ञ का अनुष्ठान किया जाता रहा है | जहाँ सद्प्रवृत्तियों द्वारा लोक कल्याण की भावना से ये सारे धर्मकार्य किये जाते रहे हैं वहीं नकारात्मक शक्तियों के द्वारा इन धर्मानुष्ठानों का विरोध करते हुए विध्वंस

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*मानव जीवन में गुरु शब्द का बहुत महत्व है | जो आपको अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाय वही गुरु है | अंधकार क्या है ? इस पर हमारे मनीषियों ने बताया है कि अज्ञानता ही अंधकार है | जो अज्ञानता से निकालकर ज्ञान का प्रकाश प्रकाशित कर दे वही गुरु है | गुरु शब्द की इतनी महत्ता है कि इसे सृष्टि में सबसे ऊँचे स्थ

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*सनातन धर्म के नियम व सिद्धांत समस्त मानवजाति के लिए प्रेरणास्रोत होने के साथ ही जीवन को दिव्य बनाने वाले रहे हैं | एक मनुष्य का जीवन पापरहित रहते हुए कैसे दिव्य बन सकता है इन रहस्यों के दर्शन यदि कहीं प्राप्त हो सकता है तो वह है सनातन धर्म | सनातन धर्म ने मनुष्यों को अपने ज्ञान , विद्या व धन का अहं

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*मनुष्य जब इस धरा धाम पर जन्म लेता है तो उसके जन्म से लेकर की मृत्यु पर्यंत पूरे जीवन काल में सुख एवं दुख समय समय पर आते जाते रहते हैं | प्रायः विद्वानों ने अपनी टीकाओं में यह लिखा है कि जब मनुष्य के विपरीत कोई कार्य होता है तब वह दुखी हो जाता है , और जब अपने अनुकूल सारे कार्य होते रहते हैं तब वह सु

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*इस संसार में मनुष्य जहाँ समय समय पर दिव्य ज्ञान के सद्गुणों को प्राप्त करता रहता है वहीं उसको काम , क्रोध , मोह , लोभ आदि भी अपने शिकंजे में कसने को प्रतिक्षण तत्पर रहते हैं | मनुष्य का तनिक भी डगमगाना उन्हें इस पथ का पथिक बना देता है | मनुष्य को लोभ ले डूबता है | लोभ क्या है, लोभ लालच को कहते हैं।

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*आदिकाल से मनुष्यों का सम्मान या उनका अपमान उनके कर्मों के आधार पर ही होता रहा है | मनुष्य की वाणी , उसका व्यवहार एवं उसका आचरण ही उसके जीवन को दिव्य या पतित बनाता रहा है | मनुष्य बहुत बड़ा विद्वान बन जाय परंतु उसकी वाणी में कोमलता न हो , उसकी भाषा मर्यादित न हो एवं उसके कर्म समाज के विपरीत हों तो उ

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*इस धराधाम पर जन्म लेने के बाद प्रत्येक मनुष्य एक सुंदर एवं व्यवस्थित जीवन जीने की कामना करता है | इसके साथ ही प्रत्येक मनुष्य अपनी मृत्यु के बाद स्वर्ग जाने की इच्छा भी रखता है | मृत्यु होने के बाद जीव कहां जाता है ? उसकी क्या गति होती है ? इसका वर्णन हम धर्मग्रंथों में ही पढ़ सकते हैं | इन धर्म ग्

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