shabd-logo

भाग 16 : चलो लेडीज क्लब चलते हैं

16 जून 2022

41 बार देखा गया 41
लक्ष्मी जी को छमिया भाभी के बारे में होने वाली बातों में बड़ा रस आता था । दरअसल छमिया भाभी पर पूरे मौहल्ले के मर्द जान छिड़कते थे । बस यही बात लक्ष्मी जी को हजम नहीं होती थी । इसलिए वो गाहे बगाहे छमिया भाभी की बुराइयां करती रहती थीं । यहां पर छमिया भाभी उपस्थित थी नहीं इसलिए आज जी भरकर अपनी भड़ास निकाली जा सकती थी । मगर लाजो जी ने बात घुमा दी और वे इसे बच्चों पर ले गईं । इन बातों में लक्ष्मी जी जैसी औरतों को मजा नहीं आता था । उन्हें तो निंदा रस में ही मजा आता था ।
लक्ष्मी जी बात को घुमाकर छमिया भाभी पर ही लाना चाहती थीं इसलिए बोलीं 
"ऐ जिज्जी, एक बात बताओ ? छमिया भाभी को गये तो कई दिन हो गये हैं तो उनके श्रीमान जी "भुक्खड़ सिंह" जी का खाना कौन बनाता होगा" ? 

ललिता जी अब तक खामोश ही बैठी थीं । उन्हें छमिया भाभी से बहुत नफरत थी । नफरत ऐसे ही नहीं थी उसका कारण भी था । उनके पति दिलफेंक जी नाम के अनुरूप दिलफेंक ही थे । सुन्दरता में छमिया भाभी का कोई जवाब नहीं था । इसलिए दिलफेंक जी छमिया भाभी के सौंदर्य के जलवों में उलझ कर रह गये । छमिया भाभी के अप्रतिम सौंदर्य के दर्शन करने के लिए अपने घर आने जाने का रास्ता बदल लिया उन्होंने । अब वे पुराना रास्ता छोड़कर छमिया भाभी के घर के सामने से होकर आने जाने लगे । क्या पता कब दर्शन हो जायें छमिया भाभी के ? बस इतनी सी ही तो ख्वाहिश थी उनकी कि दिन में बस एक बार "देवी" के दर्शन हो जाए तो तबीयत चकाचक हो जाये । 

वैसे छमिया भाभी भी बहुत दिलदार औरत हैं । जैसे भगवान अपने भक्तों की तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें दर्शन देते हैं और उन्हें वरदान भी देते हैं । जैसे लेखक अपने पाठकों की समीक्षाएं पर आभार प्रकट करते हैं । जैसे कवि अपनी कविताओं पर श्रोताओं द्वारा ताली बजाने पर उनका हाथ जोड़कर अभिवादन करते हैं । उसी तरह सुंदरियां भी उनके आगे पीछे घूमने वाले उनके "कद्रदानों" का ध्यान रखती हैं । बीच बीच में उन्हें "झरोखा दर्शन" देती रहती हैं । भगवान को कौन पुजवाता है , पुजारी ही ना ? तो हुस्न की खुशबू चारों ओर कौन फैलाता है , ये दिलफेंक जैसे लोग ही ना ? तो क्जयों नहीं इनको तवज्जो मिले ? इसलिए इन कद्रदानों का भी ध्यान रखना पड़ता है । जब कभी कुछ "कद्रदानों" की तपस्या कुछ कुछ कठिन होने लगे तो एक बार मुस्कुरा कर उनकी तबीयत "हरी" करनी पड़ती है  । और कभी कभी तो बड़ी मीठी मीठी बातें भी करनी पड़ती है तब जाकर कद्रदानों की भीड़ इकठ्ठी होती है । बस, इतनी सी ही तो चाहत है बेचारे कद्रदानों की । इसमें भी कंजूसी करती हैं बहुत सी औरतें । उन कंजूस औरतों का कोई कद्रदान नहीं होता है । जितनी मुस्कान बिखेरोगे,  उतने ही कद्रदान पाओगे । 

औरतों का संसार एकदम अलग है । उन्हें सजना संवरना पसंद है । सजना संवरना तो जैसे उनके खून में शामिल है । उनसे जब पूछो कि वे किसके लिए सजती संवरती हो ? तो तपाक से उत्तर मिलेगा "अपने श्रीमान जी के लिए " । मगर जब श्रीमान जी के लिए ही सजना संवरना है तो फिर घर में ही सज लिया करो । श्रीमान जी तो घर में ही रहते हैं । मगर नहीं । श्रीमान जी तो कभी कभी कहते भी हैं "ये क्या हाल बना रखा है ? कभी कभी नहा भी लिया करो । बहुत दुर्गंध आती है तुम्हारे बदन से । और कभी कभी "डेन्टिंग पेन्टिंग" भी कर लिया करो । "साफ सुथरी गाड़ी और सजी संवरी लाड़ी" ही मन को भाती है" । लेकिन नहीं जी, श्रीमान जी की बात और श्रीमती जी मान जाये ? असंभव है आज के जमाने में । 

पर नहीं , इनको घर में नहीं सजना है । घर से बाहर जाएंगी तो ही सजेंगी । चाहे पास ही सब्जी के ठेले पर सब्जी लेने  जा रही हों , पर हल्की "लीपा पोती" तो करेंगी ही । और अगर किसी फंक्शन में जाना हो और उसमें यदि श्रीमान जी किसी कारणवश नहीं जा पाए रहे हों तो भी पूरा श्रंगार करके जाएंगी । क्यों भाई ? अब तो पतिदेव भी नहीं हैं साथ में , फिर भी ? इसका मतलब है कि किसी न किसी और को दिखाने के लिए ही तो सजती हैं ये । अब ये बताओ कि औरतों को दिखाने के लिए भी कोई औरत सजती है क्या ? सजना तो पुरुषों के लिए ही पड़ता है न ? पर इसे स्वीकार नहीं करती हैं ये औरतें और ना ही कभी करेंगी । इससे उनकी "पोल" खुलने का डर रहता है ना । और ये चाहती क्या हैं ? बस इतना ही तो कि "कोई" उन्हें देखकर इतना सा कह दे "वाह , क्या बात है" ? और वो भी लबों द्वारा नहीं , आंखों द्वारा या मुस्कुराहट द्वारा , बस । बोलो , कितनी सी हसरत है इनकी ? 

लेकिन पुरुष तो पैदायशी दिलदार हैं । वे तो मुक्त कंठ से प्रशंसा करते हैं । और कुछ तो इतने "महान" हैं कि प्रशस्ति गान ही करना शुरु कर देते हैं । पुरुष वैसे चाहे और कहीं कंजूसी कर सकते हैं मगर "नारी सौंदर्य" के गुणगान में कोई कमी नहीं छोड़ते हैं । बस, वे कंजूसी अपनी पत्नी की सुंदरता बखान करने में ही करते हैं, और कहीं नहीं । और पड़ोसन की सुंदरता का तो ऐसे वर्णन करते हैं जैसे वो आसमान से उतरी कोई परी हो । 

वैसे भी पुरुषों का दिल बहुत बड़ा होता है । उस दिल में न जाने कितनी भाभियां,  सालियां, पी ए, सैक्रेटरी,  पत्नी की सहेलियां, पड़ोसनें और तो और कामवाली बाइयां तक समा जाती हैं । मगर औरतों का दिल इतना छोटा होता है कि उसमें और कोई घुस ही नहीं सकता है । कितना अंतर है दोनों की प्रकृति में ! 

तो लक्ष्मी जी ने जैसे ही छमिया भाभी का विषय छेड़ा , ललिता जी के कान खड़े हो गए । ललिता जी को भी छमिया भाभी फूटी आंख नहीं सुहाती हैं । कारण तो अभी बताया था ना । बेचारे दिलफेंक जी को छमिया भाभी के घर के सामने से भी निकलने पर पाबंदी लगा रखी है ललिता जी ने । उन्हें अगर कभी दिलफेंक जी छमिया भाभी से बात करते हुए मिल जाएं तो दिलफेंक जी की तो आफत ही हो जाती है उस दिन । पर दिलफेंक जी भी कम उस्ताद नहीं हैं । घर से तो वे अपने पुराने वाले रास्ते से निकलते हैं जिससे ललिता जी को विश्वास हो जाए , मगर वे आगे जाकर अपना रास्ता बदल कर छमिया भाभी के घर की ओर चल देते हैं । 

छमिया भाभी भी बड़ी कमाल की हैं । वे अपने "भक्तों" को कभी कभी दर्शन देती हैं और कभी कभी उनके सामने प्रकट होकर अपने मुखारविन्द से दो चार मीठी बातें भी कर लेती हैं । इससे सामने वाला आदमी "लट्टू" हो जाता है । और जब कभी वे दिलफेंक जी से बातें करती हैं और उसी दौरान अगर ललिता जी उधर आ जाएं तो वे और भी नजदीक आकर जोर जोर से मीठी मीठी बातें करने लग जाती हैं जिससे ललिता जी को वे बातें सुनाई दे जायें । तब दिलफेंक जी की हालत बड़ी पतली हो जाती है । बेचारे दिलफेंक जी , उस दिन उनकी "शानदार वाली चम्पी" हो जाती है । 

ललिता जी थोड़ा गुस्से से बोलीं "लक्ष्मी जी, अगर आपको इतनी ही चिंता है भुक्खड़ सिंह जी की तो आप ही बना दिया करो उनका खाना । वे निहाल हो जाएंगे" । 

लक्ष्मी जी का मन बड़ा कोमल है । उनसे भुक्खड़ सिंह जी की ये हालत देखी नहीं जाती है । मगर क्या करें ? भुक्खड़ सिंह जी खाते ही इतना है कि सुबह खिलाना शुरु करो तो शाम हो जाए और शाम को खिलाना शुरू करो तो रात हो जाए । बस, इसी चक्कर में नहीं खिला पाती हैं लक्ष्मी जी, वर्ना खिलाने की इच्छा तो बहुत है उनकी । वैसे उन्हें भुक्खड़ सिंह जी की "सिक्स पैक्स" वाली बॉडी बहुत पसंद है । भुक्खड़ सिंह जी हैं ही इतने शरीफ कि किसी औरत की ओर आंख उठाकर भी नहीं देखते हैं । यही अदा तो लक्ष्मी जी को भा गई उनकी । मगर इतना खाना कौन बनाए ? समस्या का केंद्र बिंदु तो यही है ।

शोभना जी बोलीं "आजकल तो शादियां भी खूब हो रही हैं । उनमें चले जाते होंगे" ? 
इस बात पर प्रेमा जी खिलखिला पड़ीं "लो, और सुन लो । कल ही मेरी बात मेरी एक सहेली नीलम से हो रही थी । वे मुझे अपने एक फंक्शन में बुला रही थी । मैंने बातों बातों में छमिया भाभी का जिक्र कर दिया और पूछा कि क्या भुक्खड़ सिंह जी को भी बुलाया है ? तो वे हंसते हंसते दोहरी हो गई  । कहने लगीं 'आज के मंहगाई के जमाने में दस दस आदमियों को कौन बुलाता है' ? मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ । छमिया भाभी के तो कोई बच्चा भी नहीं है , फिर दस दस आदमी" कैसे' ? 

वो कहने लगीं कि भुक्खड़ सिंह जी अकेले दस आदमियों के बराबर हैं । इन दिनों में वे अकेले भी रह रहे हैं इसलिए वे लिफाफा भी लायेंगे तो एक आदमी के हिसाब से ही ना ? और खाना खाएंगे दस आदमियों का । अब आप ही बताओ, लिफाफा एक का और भोजन दस के बराबर । बड़ी नाइंसाफी है ये तो । इसलिए उन्हें अब कोई निमंत्रण देता ही नही है । 

मामला बड़ा संगीन हो गया था । लक्ष्मी जी के चेहरे पर उदासी छा गई थी । इतने में वसुधा जी बोलीं "आजकल तो ये शादियां भी जी का जंजाल बन गई हैं । इतने बड़े बड़े "सावे" हैं कि एक एक दिन के दस दस कार्ड आ जाते हैं " । 

सभी की आंखें चकाचौंध गई  । इनके इतने सारे कार्ड आते हैं और हमारे तो बहुत से बहुत एक दो ही आते हैं । अब प्रश्न यह है कि वे इतनी शादियां अटेंड कैसे करते होंगे" ? 

वसुधा जी ने ही रहस्य पर से पर्दा उठाया और कहा "हम लोग एक दिन में अधिक से अधिक चार शादी अटेंड कर सकते हैं , इससे ज्यादा नहीं । इसका निर्णय हम लोग कार्ड देखकर करते हैं जिसका कार्ड बढिया सा होता सै, हम लोग अक्सर उसमें ही जाते हैं । किसी के यहां "स्नैक्स,  किसी के यहां स्वीट्स,  किसी के यहां मैन कोर्स ले लेते हैं । सब जगह लिफाफे तो देने ही पडते हैं न । इसलिए  खूब जेब कटती है इन शादियों में । 

क्रमशः 

हरिशंकर गोयल "हरि" 
16.6.22 

18
रचनाएँ
बहू पेट से है
5.0
एक परिवार और आसपास के मौहल्ले में रोजमर्रा की जिंदगी में होने वाली घटनाओं , बातों और कथाओं से हास्य पनपता है । हास्य कभी भी अकेला नहीं होता है उसके साथ व्यंग्य उसी तरह चिपका होता है जैसे किसी लड़की पर किसी आशिक की दो आंखें चिपकी होती हैं । बात में से बात निकालने की कला में महिलाओं ने महारथ हासिल कर रखी है और,उसी कला का भरपूर प्रयोग कर पाठकों को गुदगुदाने के लिए लेकर आया हूं यह धारावाहिक । उम्मीद है कि आपको पसंद आयेगा । कृपया समीक्षा अवश्य करें । धन्यवाद।
1

भाग 1 : लेडीज क्लब

17 मई 2022
5
2
0

शीला चौधरी का अहाता दोपहर को आबाद होता था । जब लोग लंच के बाद आराम कर रहे होते हैं तब मौहल्ले की "बातूनी" औरतें शीला चौधरी के घर पर इकठ्ठे होकर गपशप करती हैं । दरअसल शीला चौधरी का मकान ठीक टी पॉइंट पर

2

भाग 1 : लेडीज क्लब

18 मई 2022
2
0
0

शीला चौधरी का अहाता दोपहर को आबाद होता था । जब लोग लंच के बाद आराम कर रहे होते हैं तब मौहल्ले की "बातूनी" औरतें शीला चौधरी के घर पर इकठ्ठे होकर गपशप करती हैं । दरअसल शीला चौधरी का मकान ठीक टी पॉइंट पर

3

भाग 2 : कामवाली बाई

18 मई 2022
1
0
0

आज लाजो जी बड़ी परेशान थीं । शीला चौधरी के मकान के सामने ही कोने का मकान है उनका । चौधराइन और लाजो जी में बहुत शानदार पटती थी । यहां तक कि कामवाली बाई भी दोनों की एक ही थी । कामवाली बाई दीपिका पहले चौ

4

भाग 3 : महाभारत

19 मई 2022
1
0
0

लाजो जी की हालत खस्ता कचौरी जैसी हो गई । सारा काम उन्हें ही करना पड़ेगा , यह सोच सोचकर ही उनका दिल बैठा जा रहा था । काम करने की आदत रही नहीं । बस, अब तो सोशल मीडिया पर ही समय गुजरता है लाजो जी क

5

भाग 4 : सिलेंडर

20 मई 2022
1
0
1

अमोलक जी जैसे ही झाड़ू उठाकर बाहर जाने लगे तो लाजो जी ने उन्हें पीछे से पकड़कर खींचा "भगवान ने थोड़ी बहुत भी अक्ल नहीं दी है क्या ? पता नहीं किस मूर्खानंद ने आपको अफसर बना दिया ? गुण तो घास खोदन

6

भाग : 5 : गंभीर समस्या

28 मई 2022
0
0
0

आज शीला चौधरी के अहाते में "लेडीज क्लब" का मेला लग रहा था । कई दिनों के बाद आज लेडीज क्लब सरसब्ज हुआ था । इसलिए सब महिलाओं के चेहरे चमक रहे थे । कुछ तो गपशप करने के कारण और,कुछ मेकअप करने के कारण । कु

7

भाग : 6 : आज नाश्ते में क्या बनाऊं मम्मी

29 मई 2022
0
0
0

"आज नाश्ते में क्या बनाऊं,मम्मी" लाजो जी जैसे नींद से जाग पड़ी । इतनी मीठी आवाज ! उसे विश्वास ही नहीं हुआ कि यह आवाज उसकी बहू रितिका की है । उसने कन्फर्म करने के लिये अपना चेहरा आवाज की ओर घुमाया । सा

8

भाग -7 : ब्रेड पिज्जा और घाट की राबड़ी

30 मई 2022
0
0
0

रितिका ने ब्रेड पिज्जा सर्व किया । प्रथम ने तो बिना चखे ही ब्रेड पिज्जा का बखान करना शुरू कर दिया । यह देखकर लाजो जी से जब रहा नहीं गया तो वे तपाक से बोली "हां, ब्रेड पिज्जा तो आज पहली बार ही बना है न

9

भाग 9 : रानी का महाराजा या हुक्म का गुलाम

5 जून 2022
0
0
0

अमोलक जी कब से इंतजार कर रहे थे कि लाजो फोन पर बात करना बंद करे तो वे "घाट की राबड़ी" का सेवन करें । जब से चौधराइन जी ने घाट की राबड़ी भेजी है तब से उनका मन उसी में अटका हुआ है । इस चक्कर में तो उन्हो

10

भाग 10 : सेमीनार

7 जून 2022
0
0
0

अमोलक जी घाट की राबड़ी का आनंद लेने लगे । उनकी इच्छाओं का भी ध्यान रखने वाला कोई तो इस दुनिया में है यह जानकर उन्हें बहुत खुशी हुई । उनके मन में शीला चौधरी के लिए कितना सम्मान है, कोई उनके हृदय में उत

11

भाग 11 : ईर्ष्या की आग

8 जून 2022
0
0
0

जब से लाजो जी ने सुना था कि चौधराइन की बहू मेघांशी "पेट से है" उनके दिमाग में लावा सा दौड़ने लगा । एक कहावत है न कि "पाड़ौसन खावे दही तो मो पै कब जावा सही" । जब पड़ौसन की बहू जो कि अभी दो साल पहले ही

12

भाग 12 : मैं अकेला तो बच्चे पैदा नहीं कर सकता हूं न

9 जून 2022
1
0
0

अमोलक जी को लगा कि लाजो जी ताना मार रही हैं कि प्रथम को पांच साल हो गए हैं शादी किए मगर अभी तक कोई बच्चा नहीं लगा रितिका को । लाजो जी को समझाते हुए वे कहने लगे "आजकल बच्चे बहुत समझदार हो गए हैं । वे अ

13

भाग 13 : अपने पति के साथ घूमने में क्या आनंद है

10 जून 2022
1
0
0

लाजो जी का मन कहीं लग नहीं रहा था । मन लगता भी कैसे ? जबसे चौधराइन ने "खुशखबरी" सुनाई है तब से लाजो जी की नींद हराम हो गई है । पड़ौस में तो किलकारियां गूजेंगी मगर यहां "ताने" मारे जायेंगे । आजकल जमाना

14

भाग 14 : गृहस्थ आश्रम सबसे कठिन तप है

13 जून 2022
0
0
0

लक्ष्मी जी को अपनी कही हुई बात पर जवाब देते हुए नहीं बना तो यह कहते हुए बचने की कोशिश करने लगीं कि "एक बात बताओ जिज्जी कि पति के साथ घूमने में भी कोई आनंद आता है क्या ? अरे, एक ही सूरत देखते देखते बोर

15

भाग 16 : चलो लेडीज क्लब चलते हैं

16 जून 2022
0
0
0

लक्ष्मी जी को छमिया भाभी के बारे में होने वाली बातों में बड़ा रस आता था । दरअसल छमिया भाभी पर पूरे मौहल्ले के मर्द जान छिड़कते थे । बस यही बात लक्ष्मी जी को हजम नहीं होती थी । इसलिए वो गाहे बगाहे छमिय

16

भाग 16 : लिफाफा संस्कृति

18 जून 2022
1
1
0

"हरि अनंत हरि कथा अनंता" की तरह "लेडीज क्लब" की बातें भी अनंत होती हैं । कभी भी समाप्त नहीं होने वाले आसमान की तरह । इन बातों से पेट कभी भरता नहीं और भूख कभी मिटती नहीं । मगर समय की घड़ी तो टिक टिक चल

17

भाग 17 : प्रहसन

20 जून 2022
0
0
0

आज लाजो जी ने ठान लिया था कि वह प्रथम और रितिका से बच्चे के बारे में बात अवश्य करेगी । अमोलक जी भी घर पर आ गये थे इसलिए उनके कंधे पर बंदूक रखकर दागी जा सकती थी । उन्होंने प्रथम और रितिका को शाम की चाय

18

भाग 18 : ड्रामा

23 जून 2022
0
0
0

लाजो जी को रितिका का यूं उठकर जाना अच्छा नहीं लगा था । प्रथम की शादी को पांच साल हो गये थे मगर अभी तो "मैडम" जी का मन "मस्ती" करने में ही रमा हुआ है । घर गृहस्थी की जिम्मेदारी क्या बुढापे में संभालेगी

---

किताब पढ़िए

लेख पढ़िए