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मुक्तक

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"मुक्तक"गया समय अब युद्ध का, लड़ा रहे सब छद्म।नहीं किसी के पास अब, सत्य बोलती नज्म।सूखे सब कंकाल हैं, दौड़ रहे हैं तेज-दौलत के संसार में, कहाँ पुरानी बज्म।।-1नाम समर का ले रहे, कायर अरु कमजोर।चुपके से चलते डगर, मानो कोई चोर।घात लगा कर वार कर, छुप जाते हैं खोह-पीछे से हमला करें, और मचाएं शोर।।-2महातम म

"चौपाई मुक्तक"वन-वन घूमे थे रघुराई, जब रावण ने सिया चुराई।रावण वधकर कोशल राई, जहँ मंदिर तहँ मस्जिद पाई।आज न्याय माँगत रघुवीरा, सुनो लखन वन वृक्ष अधिरा-कैकेई ममता विसराई, अवध नगर हति कागा जाई।।-1अग्नि परीक्षा सिया हजारों, मड़ई वन श्रीराम सहारो।सुनो सपूतों राम सहारो, जस

"मुक्तक"मंदिर रहा सारथी, अर्थ लगाते लोग।क्या लिख्खा है बात में, होगा कोई ढोंग।कौन पढ़े किताब को, सबके अपने रूप-कोई कहता सार है, कोई कहता रोग।।-1मंदिर परम राम का, सब करते सम्मान।पढ़ना लिखना बाँचना, रखना सुंदर ज्ञान।मत पढ़ना मेरे सनम, पहरा स्वारथ गीत-चहरों पर आती नहीं, बे-मौसम मुस्कान।।-2महातम मिश्र, गौत

"मुक्तक" नहीं सहन होता अब दिग को दूषित प्यारे वानी। हनुमान को किस आधार पर बाँट रहा रे प्रानी।जना अंजनी से पूछो ममता कोई जाति नहीं-नहीं किसी के बस होता जन्म मरण तीरे पानी।।-1मानव कहते हो अपने को करते दिग नादानी।भक्त और भगवान विधाता हरि नाता वरदानी।गज ऐरावत कामधेनु जहँ पीपल पूजे जाते-लिए जन्म भारत मे

"मुक्तक" हार-जीत के द्वंद में, लड़ते मनुज अनेक।किसे मिली जयमाल यह, सबने खोया नेक।बर्छी भाला फेंक दो, विषधर हुई उड़ान-पीड़ा सतत सता रहीं, छोड़ो युद्ध विवेक।।-1हार-जीत किसको फली, ऊसर हुई जमीन।युग बीता विश्वास का, साथी हुआ मशीन।बटन सटन दुख दर्द को, लगा न देना हाथ-यंत्र- यंत्र में तार है, जुड़ते जान नगीन।।-2

"मुक्तक"युग बीता बीता पहर, लेकर अपना मान।हाथी घोड़ा पालकी, थे सुंदर पहचान।अश्व नश्ल विश्वास की, नाल चाक-चौबंद-राणा सा मालिक कहाँ, कहाँ चेतकी शान।।-1घोड़ा सरपट भागता, हाथी झूमे द्वार।राजमहल के शान थे, धनुष बाण तलवार।चाँवर काँवर पागड़ी, राज चाक- चौबंद-स्मृतियों में अब शेष हैं, प्रिय सुंदर उपहार।।-2महातम

बाल-दिवस पर प्रस्तुति"मुक्तक"काश आज मन बच्चा होता खूब मनाता बाल दिवस।पटरी लेकर पढ़ने जाता और नहाता ताल दिवस।राह खेत के फूले सरसों चना मटर विच खो जाता-बूढ़ी दादी के आँचल में सुध-बुध देता डाल दिवस।।-1गैया के पीछे लग जाता बन बछवा की चाल दिवस।तितली के पर को रंग देता हो जाता खुशहाल दिवस।बिना भार के गुरु शर

रूप चौदस/छोटी दीपावली की सभी को हार्दिक बधाई एवं मंगल शुभकामना"मुक्तक"जलाते दीप हैं मिलकर भगाने के लिए तामस।बनाते बातियाँ हम सब जलाने के लिए तामस।सजाते दीप मालिका दिखाने के लिए ताकत-मगर अंधेर छुप जाती जिलाने के लिए तामस।।-1विजय आसान कब होती खुली तलवार चलती है।फिजाओं की तपिश लेकर गली तकरार पलती है।सु

"मुक्तक"दीपक दीपक से कहे, कैसे हो तुम दीप।माटी तो सबकी सगी, तुम क्यों जुदा प्रदीप।रोज रोज मैं भी जलूँ, आज जले तुम साथ-क्या जानू क्या राज है, क्यों तुम हुए समीप।।-1धूमधाम बाजार में, चमक रहे घरबारचाक लिए कुम्हार है, माटी महक अपारतरह-तरह के दीप हैं, भिन्न-भिन्न लौ रंगबिकता कोई बिन कहे, कहाँ चटक त्यौहार

आप का दिन मंगलमय हो,"मुक्तक"चढ़ा लिए तुम बाण धनुर्धर, अभी धरा हरियाली है।इंच इंच पर उगे धुरंधर, किसने की रखवाली है।मुंड लिए माँ काली दौड़ी, शिव की महिमा न्यारी है-नित्य प्रचंड विक्षिप्त समंदर, गुफा गुफा विकराली है।।महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

"मुक्तक"सत्य समर्पित है सदा, लेकर मानक मान।जगह कहाँ कोई बची, जहाँ नहीं गुणगान।झूठा भी चलता रहा, पाकर अपनी राह-झूठ-मूठ का सत्य कब, पाता है बहुमान।।-1सही अर्थ में देख लें, लाल रंग का खैर।झूठ सगा होता नहीं, और सगा नहीं गैर।सत्य कभी होती नहीं, आपस की तकरार-झूठ कान को भर गया, खूँट बढ़ा गया बैर।।-2महातम मि

छंद- कीर्ति (वर्णिक) छंद विधान - स स स ग मापनी- 112 112 112 2"आप सभी महानुभावों को पावन विजयादशमी की हार्दिक बधाई""मुक्तक"मुरली बजती मधुमाषा हरि को भजती अभिलाषा रचती कविता अनुराधाछलकें गगरी परिहाषा।।-1घर में छलिया घुस आयायशुदा ममता भरमायागलियाँ खुश हैं गिरधारीबजती मुरली सुख छाया।।-2मथुरा जनमे वनवा

"मुक्तक" कितना मुश्किल कितना निश्छल, होता बचपन गैर बिना।जीवन होता पावन मंदिर, मूरत सगपन बैर बिना।किसकी धरती किसका बादल, बरसाते नभ उत्पात लिए-बच्चों की हर अदा निराली, लड़ते- भिड़ते खैर बिना।।-1प्रत्येक दीवारें परिचित हैं, इनकी पहचान निराली।जग की अंजानी गलियारी, है सूरत भोली-भाली।हँसती रहती महफ़िल इनकी,

छंद- वाचिक सोमराजी (मापनीयुक्त मात्रिक) मापनी- लगागा लगागा, 122 122 "सोमराजी छंद" मुक्तकसिया राम माया। मृगा हेम भाया। छलावा दिखावा- सदा कष्ट पाया॥-1तजो काम धामा। भजो राम नामा। सदा कृष्ण माधो- पुकारें सुदामा॥-2मिले द्वारिका में। सुखी पादुका में। चुराते चना को-- सुदामा सखा में॥-3लुटाता नहीं मैं। स

“मुक्तक”कतरा-कतरा माँ तेरा है। पुतरा पुतरा माँ तेरा है।शीश निछावर करते वीरा- सुंदर अँचरा माँ तेरा है।।गर्वित होते लाल हजारों। सीमा प्रहरी नायक यारो। दुश्मन के छक्के छुट जाते- नमन शहीद धन्य दिग चारो।।महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

हिन्दी दिवस के सुअवसर पर आप सभी को दिल से बधाई सह शुभकामना, प्रस्तुत है मुक्तक....... ॐ जय माँ शारदा......!“मुक्तक”हिंदी सिर बिंदी सजी, सजा सितंबर माह। अपनी भाषा को मिला, संवैधानिक छाँह।चौदह तारिख खिल गया, दे दर्जा सम्मान- धूम-धाम से मन रहा, प्रिय त्यौहारी चाह॥-1बहुत बधाई आप को, देशज मीठी बोल। सगरी

शीर्षक ---भाषा/बोली/वाणी/इत्यादि समानार्थक“मुक्तक”तुझे छोड़ न जाऊँ रीसैयां न कर लफड़ा डोली में। क्या रखा है इसझोली में जो नहीं तेरी ठिठोली में। आज के दिन तूँ रोकले आँसू नैन छुपा ले नैनों से-दिल ही दिल की भाषाजाने क्या रखा है बोली में॥-1 हंस भी मोती खाएगा, फिर एक दिन ऐसा आयेगा। कागा अपने रंग मेंआकर,

छंद - हरिगीतिका(मात्रिक) मुक्तक, मापनी- 2212 2212 2212 2212“मुक्तक” (छंद -हरिगीतिका)फैले हुए आकाश मेंछाई हुई है बादरी। कुछ भी नजर आतानहीं गाती अनारी साँवरी। क्यों छुप गई है ओटलेकर आज तू अपने महल- अब क्या हुआ का-जलबिना किसकी चली है नाव री॥-1क्यों उठ रही हैरूप लेकर आज मन में भाँवरी। क्यों डूबने कोहरघड़

“मुक्तक” फिंगरटच ने कर दिया, दिन जीवन आसान। मोबाइल के स्क्रीनपर, दिखता सकल जहान। बिना रुकावट मान लो, खुल जाते हैं द्वार- चाहा अनचाहा सुलभ, लिखो नाम अंजान॥-1 बिकता है सब कुछयहाँ, पर न मिले ईमान। हीरा पन्ना अरु कनक, खूब बिके इंसान। बिन बाधा बाजार में, बे-शर्ती उपहार- हरि प्रणाम मुस्कानसुख, सबसे बिन पह

“मुक्तक”मापनी- २१२२ २१२२ २२१२ २१२जिंदगी को बिन बताए कैसे मचल जाऊँगा। बंद हैं कमरे खुले बिन कैसे निकल जाऊँगा। द्वार के बाहर तेरे कोई हाथ भी दिखता नहीं- खोल दे आकर किवाड़ी कैसे फिसल जाऊँगा॥-१ मापनी- २२१२ २२१२ २२१२ २२१२जाना कहाँ रहना कहाँ कोई किता चलता नहीं। यह बाढ़ कैसी आ गई

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