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मुक्तक

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“मुक्तक”माटी मह मह महक रही है माटी की दीवाल रे। चूल्हा माटी बर्तन माटी माटी में शैवाल रे। ऐ माटी तू कहाँ गई रे आती नहिं दीदार में- माटी माटी ढूढ़ें माटी माटी में कंकाल रे॥-१ कौन उगा है बिन माटी के अंकुर है बेहाल रे। खोद रहे सब अपनी माटी माटी सम्यक माल रे। माटी बिना प

“मुक्तक”लो आ गया अपने वतन तो दिल दीवाना हो रहा है। जब मिल गई धरती हमें तो नैन लगाना हो रहा है। जाकर मिला घर छोड़ अपना होकर पराया रह गया था- जमें आसुओं की धारा से बाग खिलाना हो रहा है॥-१ मजबूर माँ के आँसुओं की तस्वीर दिखा सकता नहीं चाह विदेशी हरगिज न थी रुपया उगा सकता

“मुक्तक”याद आती पाठशाला पटरी को पढ़ते कर गई। चाक जब होते मधुर थे डगरी को हँसते कर गई। आज जाने क्या हुआ है खुन्नस बहुत है पीठ पर- पाठ कोई और पढ़ता नगरी को चिढ़ते कर गई॥-१ रे मदरसा चल बता कैसी पढ़ाई हो रही। नाम है तेरा बहुत पर धन उगाई हो रही। ढ़ूढ़ता मग मगहरी सु दोहा कहाँ

“मुक्तक”नूतन किसलय फूल खिले हैं अरमानों के बाग में। चितवन चितवन धूल भरी है इन्सानों के भाग में। जिसके मन में जो आता है तूल झुला के रख दिया-वीणा में अनगिनत तार हैं पहचानों के राग में॥-१ नव जीवन मिलता हैं किसको बार बार जब रोग लगे। सुख दुख है सबके जीवन में आर पार हठ जोग

“मुक्तक” रे मयूर केहि भांति मयूरी रंग बिना कस लाग खजूरी। अपलक चितवत तोहिं अधूरी नर्तकप्रिय पति करे मजूरी।रात दिवस सह आस लगाए नहिं मतवाली नैन चुराए- तूँ अति सुंदर जतन जरूरी मिलन बिना की सुखी सबूरी॥ मधु शाला है मधुर मयूरी रंग बिना कस लाग खजूरी। अपलक चितवत तोहिं अधूरी नर्

“मुक्तक”कवायत भी होगी सियासत भी होगी। पर बिन इजाजत क्या हिमायत भी होगी। बोली और भाषा क्यों बहरी हुई है- किसको रियायत जब रवायत भी होगी॥-१ मंजूरी मजूरी की बातें भी होंगी। मजबूरी गरीबी कमी कैसे होगी। बाढ़ कहाँ आती है दौलत तो देखो- है ताता थइया क्या होरी भी होगी॥-२ रवायत- स

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उछलती मौज़ा बहारें ला दरिया दिली दर्द लहराती। मचलती नौका किनारे ला सरिता मिली सर्द विखराती। जहाँ नित तूफान आते है भिगाते मन मोंह जाते हैं- पकड़ती बहियाँ किनारे ला खुशियाँ खिली जर्द मचलाती॥ रुख हवावों में मोड़ मिलना निराशा फिरी फर्द महकाती। खुद के गरुर में सिमट जाना हताशा हँस

“मुक्तक”अंग रंग प्रत्यंग कलेवर, शरद ऋतु भरे ढंग फुलेवर। सुनर वदन प्रिय पाँव महेवर, इत चितवत उत चली छरेहर। अजब गज़ब नर नारि नगारी, शोभा वरनि न जाय सुखारी- धानी चुनर पहिन प्रिय सेवर, तापर कनक कलश भरि जेवर॥-१ अवयव खिले महल रनिवासा, गाए झूमर पहिने आशा। जिह्वा परखे स्वाद बतासा

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गरम थे रुख़ बहुत अबतक महीना सर्द है साहबज़मी है धूल चेहरे पर या शीशा गर्द है साहब ...करूँ अल्फ़ाज़ में कैसेे बयाँ चाहत का नज़रानाभले मुस्कान है लब पर बहुत पर दर्द है साहब ........💔.....

“मुक्तक”चलत निक लागे चंद्रमा, नचत निक लागे मोर। गुंजन निक लागे भ्रमर अली, सु-सहज नयन चितचोर। निक लागे फुलत कलियाँ, महकत झुरझुर बयार-हिलत डुलत कटि काछनी, मलत बछवा कर लोर॥-१अति प्रिय लाग बौर आम का, मदन महुआ रस बोर। सूर्य प्रभात जिय लालिमा, मासे

“मुक्तक”पक्के इरादे हो तो घर मजबूत होता है। अटूट रिश्ता अपनों में वशीभूत होता है। अजेय हो जाती हैं यादें पृष्ट खुलने पर- अजी गैरों से कब बैर फलीभूत होता है॥-१अखंडित दीप जलता है दिन रात। अपार स्नेह पनप जाय हो यदि बात। गुमसुम से बैठे हो बरखुदार क्यों- इंतजार आँख को तकते प्

“मुक्तक” होता कब यूँ ही कभी, शैशव शख्स उत्थान जगत अभ्युदय जब हुआ, मचला था तूफानरिद्धी सिद्धि अरु वृद्धि तो, चलती अपने माप राह प्रगति गति बावरी, विचलित करती मान॥ तकते हैं जब हम कभी, कैसे हुआ विकास खो जाते हैं विरह में, उन्नति पर्व सुहास धीरज गृह आभा सुखी. सुखी नियति सह साख

“मुक्तक”चपला चमक रही निज नभ में, मन चित छवि लग री प्यारी। बिजली तड़क गगन लहराती, आभा अनुपम री न्यारी। जिय डरि जाए ललक बढ़ाए, प्रति क्षणप्रभा पिय नियराए- रंग बदलती सौदामिनी, बिजुरी छमके री क्यारी॥-१ चंचला अपने मन हरषे, मानों नभ को बुला रही। दामिनी चमके नभ गरजे, धरती पलना झुल

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क़तरा क़तरा इश्क़ मुझसे रूठता रहाहर ख़्वाब निंगाहों में मेरा टूटता रहा ...!कश्ती लहर के संग मेरी डूबती रहीमेरे हाथ से दामन जो तेरा छूटता रहा ...!!

“मुक्तक”नमन करूँ माँ पद कमल, अर्चन बारंबार। नव दिन की नवरात शुभ, श्रद्धा सुमन अपार। धूप दीप नैवेद्य ले, ‘गौतम’ करता जाप- भक्ति भावना चाहना, माता के दरबार॥महातम मिश्र गौतम गोरखपुरी

(शीर्षक--- अचल, अटल, अडिग, अविचल, स्थिर, दृढ़ आदि समानार्थक शब्द, मापनी- 1222, 1222, 1222, 1222 ..... ॐ जय माँ शारदे.........! "मुक्तक" अटल मेरा विश्वास हुआ तुम्हें निरखकर रे साथी अविचल अडिग कभी न हुआ तुम्हें लिपटकर रे साथी यही है जीत अफसाना लिए चलते नयन तके नजारों को स्थिर अचल चाल यह मेरी तुम्हें सम

शीर्षक---आँख, लोचन, नयन, नेत्र, चक्षु, दृग, विलोचन, दृष्टि, अक्षि, (मापनी--- १२२ १२२ १२२ १२२)यहाँ से वहाँ तक नयन घूमते हैं तुझे तो खुशी के पवन चूमते हैंदिलाशा दिली तनिक मुड़ मुस्कुरा देमना लूँ दिवाली गगन झूमते हैं॥-१ कहाँ जा रही हो किधर हैं विलोचनडगर तो तको तुम इधर हैं नशेमनबिना पंख के उड़ रही हैं हवा

मापनी, 212 212 212 212 बागवाँ बाग से चाहता वानगी हो गहन ताप या हो विपिन ताजगीदूर तक चाँदनी छा चले राह मेंहो चलन कारवाँ या चलन ख़ानगी॥-१जंगलों की विटप डालियाँ झूमतीफूल कलियाँ खिलें कोयली कूंकतीपर भरोषा कहाँ बीहड़ों ने दियाआग जलती रही वन विपिन फूँकती॥-२महातम मिश्र ‘गौतम’ गोरखपुरी

शीर्षक ---- हर्ष / प्रसन्न / खुशी / आनन्द, मापनी ----- मुक्तक, मापनी- 1222 1222 1222 1222....... “मुक्तक” खुशी मिलती कहाँ कोई बता तो दे ठिकाने को सजा लू ढूंढकर उसको पता तो दे बिराने को उसी की ताक में रहते उसी से दिल लगा बैठे कहाँ रहती प्रसन्ना वह मुकामे खिल खिलाने

शीर्षक- पोखर/सरोवर/तालाब/ताल/तलैया/जल स्रोत आदि मापनी- 1222 1222 1222 1222 “मुक्तक” यहीं पर था सरोवर एक पानी पी गए कौए नए जोड़े मिले थे दो किनारे हो गए हौए बड़े पोखर मिला करते लिए अपनी तलैया को अभी की हाल देखो तो सुराही पी गए पौए॥ बहुत पैमाल है पानी पियासे होठ तट मिनके कहाँ पर नाव चलव

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