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बसन्त के नाम पर

16 फरवरी 2022

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 १. 

प्रात जगाता शिशु-वसन्त को नव गुलाब दे-दे ताली। 

तितली बनी देव की कविता वन-वन उड़ती मतवाली। 

  

सुन्दरता को जगी देखकर, 

जी करता मैं भी कुछ गाऊॅं; 

मैं भी आज प्रकृति-पूजन में, 

निज कविता के दीप जलाऊॅं। 

  

ठोकर मार भाग्य को फोडूँ 

जड़ जीवन तज कर उड़ जाऊॅं; 

उतरी कभी न भू पर जो छवि, 

जग को उसका रूप दिखाऊॅं। 

  

स्वप्न-बीच जो कुछ सुन्दर हो उसे सत्य में व्याप्त करूँ। 

और सत्य तनु के कुत्सित मल का अस्तित्व समाप्त करूँ। 

  

२. 

कलम उठी कविता लिखने को, 

अन्तस्तल में ज्वार उठा रे! 

सहसा नाम पकड़ कायर का 

पश्चिम पवन पुकार उठा रे! 

  

देखा, शून्य कुँवर का गढ़ है, 

झॉंसी की वह शान नहीं है; 

दुर्गादास - प्रताप बली का, 

प्यारा राजस्थान नहीं है। 

  

जलती नहीं चिता जौहर की, 

मुटठी में बलिदान नहीं है; 

टेढ़ी मूँछ लिये रण - वन, 

फिरना अब तो आसान नहीं है। 

  

समय माँगता मूल्य मुक्ति का, 

देगा कौन मांस की बोटी? 

पर्वत पर आदर्श मिलेगा, 

खायें, चलो घास की रोटी। 

  

चढ़े अश्व पर सेंक रहे रोटी नीचे कर भालों को, 

खोज रहा मेवाड़ आज फिर उन अल्हड़ मतवालों को। 

  

३. 

बात-बात पर बजीं किरीचें, 

जूझ मरे क्षत्रिय खेतों में, 

जौहर की जलती चिनगारी 

अब भी चमक रही रेतों में। 

  

जाग-जाग ओ थार, बता दे 

कण-कण चमक रहा क्यों तेरा? 

बता रंच भर ठौर कहाँ वह, 

जिस पर शोणित बहा न मेरा? 

  

पी-पी खून आग बढ़ती थी, 

सदियों जली होम की ज्वाला; 

हॅंस-हॅंस चढ़े सीस, आहुति में 

बलिदानों का हुआ उजाला। 

  

सुन्दरियों को सौंप अग्नि पर निकले समय-पुकारों पर, 

बाल, वृद्ध औ तरुण विहॅंसते खेल गए तलवारों पर। 

  

४. 

हाँ, वसन्त की सरस घड़ी है, 

जी करता मैं भी कुछ गाऊॅं; 

कवि हूँ, आज प्रकृति-पूजन में 

निज कविता के दीप जलाऊॅं। 

  

क्या गाऊॅं? सतलज रोती है, 

हाय! खिलीं बेलियाँ किनारे। 

भूल गए ऋतुपति, बहते हैं, 

यहाँ रुधिर के दिव्य पनारे। 

  

बहनें चीख रहीं रावी-तट, 

बिलख रहे बच्चे मतवारे; 

फूल-फूल से पूछ रहे हैं, 

कब लौटेंगे पिता हमारे? 

  

उफ? वसन्त या मदन-बाण है? 

वन-वन रूप-ज्वार आया है। 

सिहर रही वसुधा रह-रह कर, 

यौवन में उभार आया है। 

  

कसक रही सुन्दरी-आज मधु-ऋतु में मेरे कन्त कहाँ? 

दूर द्वीप में प्रतिध्वनि उठती-प्यारी, और वसन्त कहाँ? 

  

(1935)  

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रचनाएँ
हुंकार
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रामधारी सिंह दिनकर स्वभाव से सौम्य और मृदुभाषी थे, लेकिन जब बात देश के हित-अहित की आती थी तो वह बेबाक टिप्पणी करने से कतराते नहीं थे। रामधारी सिंह दिनकर ने ये तीन पंक्तियां पंडित जवाहरलाल नेहरू के खिलाफ संसद में सुनाई थी, जिससे देश में भूचाल मच गया था। दिलचस्प बात यह है कि राज्यसभा सदस्य के तौर पर दिनकर का चुनाव पंडित नेहरु ने ही किया था, इसके बावजूद नेहरू की नीतियों की मुखालफत करने से वे नहीं चूके।
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हुंकार

16 फरवरी 2022
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सलिल कण हूँ, या पारावार हूँ मैं  स्वयं छाया, स्वयं आधार हूँ मैं  बँधा हूँ, स्वपन हूँ, लघु वृत हूँ मैं  नहीं तो व्योम का विस्तार हूँ मैं     समाना चाहता है, जो बीन उर में  विकल उस शुन्य की झनंकार

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हाहाकार

16 फरवरी 2022
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दिव की ज्वलित शिखा सी उड़ तुम जब से लिपट गयी जीवन में,  तृषावंत मैं घूम रहा कविते ! तब से व्याकुल त्रिभुवन में !    उर में दाह, कंठ में ज्वाला, सम्मुख यह प्रभु का मरुथल है,  जहाँ पथिक जल की झांकी म

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वर्त्तमान का निमन्त्रण

16 फरवरी 2022
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 समय-ढूह की ओर सिसकते मेरे गीत विकल धाये,  आज खोजते उन्हें बुलाने वर्त्तमान के पल आये !     "शैल-श्रृंग चढ़ समय-सिन्धु के आर-पार तुम हेर रहे,  किन्तु, ज्ञात क्या तुम्हें भूमि का कौन दनुज पथ घेर रहे

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दिगम्बरी

16 फरवरी 2022
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 उदय-गिरी पर पिनाकी का कहीं टंकार बोला,  दिगम्बरी ! बोल, अम्बर में किरण का तार बोला।     (१) तिमिर के भाल पर चढ़ कर विभा के बाणवाले,  खड़े हैं मुन्तजिर कब से नए अभियानवाले !     प्रतीक्षा है, सु

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विपथगा

16 फरवरी 2022
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 झन-झन-झन-झन-झन झनन-झनन,  झन-झन-झन-झन-झन झनन-झनन,     मेरी पायल झनकार रही तलवारों की झनकारों में  अपनी आगमनी बजा रही मैं आप क्रुद्ध हुंकारों में !  मैं अहंकार सी कड़क ठठा हन्ति विद्युत् की धारों

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अनल-किरीट

16 फरवरी 2022
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 लेना अनल-किरीट भाल पर ओ आशिक होनेवाले !  कालकूट पहले पी लेना, सुधा बीज बोनेवाले !     १  धरकर चरण विजित श्रृंगों पर झंडा वही उड़ाते हैं,  अपनी ही उँगली पर जो खंजर की जंग छुडाते हैं।     पड़ी स

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कविता का हठ

16 फरवरी 2022
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 "बिखरी लट, आँसू छलके, यह सस्मित मुख क्यों दीन हुआ ?  कविते ! कह, क्यों सुषमाओं का विश्व आज श्री-हीन हुआ ?  संध्या उतर पड़ी उपवन में ? दिन-आलोक मलीन हुआ ?  किस छाया में छिपी विभा ? श्रृंगार किधर उड्

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फूलों के पूर्व जन्म

16 फरवरी 2022
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प्रिय की पृथुल जांघ पर लेटी करती थीं जो रंगरलियाँ,  उनकी कब्रों पर खिलती हैं नन्हीं जूही की कलियाँ।     पी न सका कोई जिनके नव अधरों की मधुमय प्याली,  वे भौरों से रूठ झूमतीं बन कर चम्पा की डाली। 

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दिल्ली

16 फरवरी 2022
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यह कैसे चांदनी अमा के मलिन तमिस्त्र गगन में !  कूक रही क्यों नियति व्यंग्य से इस गोधुली-लगन में ?  मरघट में तू साज रही दिल्ली ! कैसे श्रृंगार ?  यह बहार का स्वांग अरि, इस उजड़े हुए चमन में !     इ

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शहीद-स्तवन (कलम, आज उनकी जय बोल)

16 फरवरी 2022
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 (उनके लिए जो जा चुके हैं)  कलम, आज उनकी जय बोल     जला अस्थियाँ बारी-बारी  छिटकाई जिनने चिंगारी,  जो चढ़ गये पुण्यवेदी पर लिए बिना गर्दन का मोल ।  कलम, आज उनकी जय बोल ।     जो अगणित लघु दीप

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आलोकधन्वा

16 फरवरी 2022
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ज्योतिर्धर कवि मैं ज्वलित सौर-मण्डल का,  मेरा शिखण्ड अरुणाभ, किरीट अनल का ।  रथ में प्रकाश के अश्व जुते हैं मेरे,  किरणों में उज्जल गीत गूँथे हैं मेरे ।     मैं उदय-प्रान्त का सिह प्रदीप्त विभा स

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सिपाही

16 फरवरी 2022
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वनिता की ममता न हुई, सुत का न मुझे कुछ छोह हुआ,  ख्याति, सुयश, सम्मान, विभव का, त्योंही, कभी न मोह हुआ ।  जीवन की क्या चहल-पहल है, इसे न मैंने पहचाना,  सेनापति के एक इशारे पर मिटना केवल जाना ।    

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शब्द-वेध

16 फरवरी 2022
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खेल रहे हिलमिल घाटी में, कौन शिखर का ध्यान करे ?  ऐसा बीर कहाँ कि शैलरुह फूलों का मधुपान करे ?     लक्ष्यवेध है कठिन, अमा का सूचि-भेद्य तमतोम यहाँ?  ध्वनि पर छोडे तीर, कौन यह शब्द-वेध संधान करे ? 

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मेघ-रन्ध्र में बजी रागिनी

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 सावधान हों निखिल दिशाएँ, सजग व्योमवासी सुरगन !  बहने चले आज खुल-खुल कर लंका के उनचास पवन ।     हे अशेषफण शेष ! सजग हो, थामो धरा, धरो भूधर,  मेघ-रन्ध्र में बजी रागिनी, टूट न पड़े कहीं अम्बर ।    

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तकदीर का बँटवारा

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 है बँधी तकदीर जलती डार से,  आशियाँ को छोड़ उड़ जाऊँ कहाँ ?  वेदना मन की सही जाती नहीं,  यह जहर लेकिन उगल आऊँ कहाँ ?     पापिनी कह जीभ काटी जायगी  आँख देखी बात जो मुँह से कहूँ,  हड्डियाँ जल जायें

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बसन्त के नाम पर

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 १.  प्रात जगाता शिशु-वसन्त को नव गुलाब दे-दे ताली।  तितली बनी देव की कविता वन-वन उड़ती मतवाली।     सुन्दरता को जगी देखकर,  जी करता मैं भी कुछ गाऊॅं;  मैं भी आज प्रकृति-पूजन में,  निज कविता के

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हिमालय

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 मेरे नगपति! मेरे विशाल!     साकार, दिव्य, गौरव विराट्,  पौरूष के पुन्जीभूत ज्वाल!  मेरी जननी के हिम-किरीट!  मेरे भारत के दिव्य भाल!  मेरे नगपति! मेरे विशाल!     युग-युग अजेय, निर्बन्ध, मुक्त,

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असमय आह्वान

16 फरवरी 2022
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 (1)  समय-असमय का तनिक न ध्यान,  मोहिनी, यह कैसा आह्वान ?     पहन मुक्ता के युग अवतंस,  रत्न-गुंफित खोले कच-जाल  बजाती मघुर चरण-मंजीर,  आ गयी नभ में रजनी-बाल ।     झींगुरों में सुन शिंजन-नाद 

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