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मुंशी प्रेम चन्द की रचना

5 फरवरी 2024

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*मुंशी प्रेमचंद जी की एक "सुंदर कविता", जिसके एक-एक शब्द को, बार-बार "पढ़ने" को "मन करता" है-_*

ख्वाहिश नहीं, मुझे
मशहूर होने की,"

        _आप मुझे "पहचानते" हो,_
        _बस इतना ही "काफी" है।_😇

_अच्छे ने अच्छा और_
_बुरे ने बुरा "जाना" मुझे,_

        _जिसकी जितनी "जरूरत" थी_
        _उसने उतना ही "पहचाना "मुझे!_

_जिन्दगी का "फलसफा" भी_
_कितना अजीब है,_

        _"शामें "कटती नहीं और_
  -"साल" गुजरते चले जा रहे हैं!_

_एक अजीब सी_
_'दौड़' है ये जिन्दगी,_

   -"जीत" जाओ तो कई_
 -अपने "पीछे छूट" जाते हैं और_

_हार जाओ तो,_
_अपने ही "पीछे छोड़ "जाते हैं!_😥

_बैठ जाता हूँ_
_मिट्टी पे अक्सर,_

        _मुझे अपनी_
        _"औकात" अच्छी लगती है।_

_मैंने समंदर से_
_"सीखा "है जीने का तरीका,_

        _चुपचाप से "बहना "और_
        _अपनी "मौज" में रहना।_

_ऐसा नहीं कि मुझमें_
_कोई "ऐब "नहीं है,_

        _पर सच कहता हूँ_
        _मुझमें कोई "फरेब" नहीं है।_

_जल जाते हैं मेरे "अंदाज" से_,
_मेरे "दुश्मन",_

   -एक मुद्दत से मैंने_
       _न तो "मोहब्बत बदली"_ 
      _और न ही "दोस्त बदले "हैं।_

_एक "घड़ी" खरीदकर_,
_हाथ में क्या बाँध ली,_

        _"वक्त" पीछे ही_
        _पड़ गया मेरे!_😓

_सोचा था घर बनाकर_
_बैठूँगा "सुकून" से,_

  -पर घर की जरूरतों ने_
        _"मुसाफिर" बना डाला मुझे!_

_"सुकून" की बात मत कर-
-बचपन वाला, "इतवार" अब नहीं आता!_😓😥

_जीवन की "भागदौड़" में_
_क्यूँ वक्त के साथ, "रंगत "खो जाती है ?_

  -हँसती-खेलती जिन्दगी भी_
        _आम हो जाती है!_😢

_एक सबेरा था_
_जब "हँसकर "उठते थे हम,_😊

  -और आज कई बार, बिना मुस्कुराए_
        _ही "शाम" हो जाती है!_😓

_कितने "दूर" निकल गए_
_रिश्तों को निभाते-निभाते,_😘

        _खुद को "खो" दिया हमने_
        _अपनों को "पाते-पाते"।_😥

_लोग कहते हैं_
_हम "मुस्कुराते "बहुत हैं,_😊

        _और हम थक गए_,
        _"दर्द छुपाते-छुपाते"!😥😥

_खुश हूँ और सबको_
_"खुश "रखता हूँ,_

        _ *"लापरवाह" हूँ ख़ुद के लिए_*
 *-मगर सबकी "परवाह" करता हूँ।_😇🙏*

*_मालूम है_*
*कोई मोल नहीं है "मेरा" yफिर भी_*

   *कुछ "अनमोल" लोगों से_*
   *-"रिश्ते" रखता हूँ।
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सस्ती है वो चींज

30 जुलाई 2022
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जो चीज सबसे सस्ती है , वही सबसे अनमोल जीवनदायिनी है ।। जो वस्तु मंहगी है , वही जीवन अनुपयोगी  है।। सस्ते अनमोल ,उपहार,जो कुदरत ने दिये , पंच तत्वों में अग्नि, जल,पृथ्वी वायु और आकाश है ।

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अंधेरे तुम अपनी काली चादर ,

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अंधेरे तुम अपनी काली चादर , कितनी भी फैला दो । हम इंसान है , हर सितम से वाकिफ़ है । आज नही तो कल , मंझिल ढूढ ही लेगे । अंधेरे तब तेरा क्या होगा । रोशनी तो हमे रास्ता दिखला ही देगी , अंधेरे तुझे

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मत डर रे राही ,

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ओओं हम सब मिल कर एक नया भारत बनाये

24 अगस्त 2022
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ओओं हम सब मिल कर एक नया भारत बनाये जिसमे मजहपों के नाम नफरत न हो । जातीपात ऊच नीच की दीवार न हो । मंदिर मे हो शंख नांद, मस्जिद मे आजान हो, गुरुद्वारे की गुरुवाणी , चर्चो में घन्टो की आवाज हो ।

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देखते देखते जिन्दगी क्या हो गई

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 देखते देखते जिन्दगी क्या हो गई  मुंह पुपला गया । दाँत क्षड गये  कमर क्षुक गई ।। चलना भी अब दुःश्वार हो गया देखते देखते जिन्दगी क्या हो गई । कभी कलशों से नहाया , लोटों की तरह । अब जिन्दगी बोक्

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हम जिन्दगी के उस मुक़ाम पर खडे है

24 अगस्त 2022
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 हम जिन्दगी के उस मुक़ाम पर खडे है  जहाँ कब जिन्दगी की शाम हो जाये । कोई भरोसा नही , कोई भरोसा नही । अब आगे चल नही सकता  पीछे मुड नही सकता । जीवनसंगिनी चली जीवन पथ पर अंत समय तक साथ निभाने दुःख

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बेखौप जिन्दगी चलती रही ।

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बेखौप जिन्दगी चलती रही । कभी खुशी,कभी गम की राहो में ।। कभी ठन्ड ने कपाया,कभी गर्मी ने झुलसाया । कितने सावन भादों ,आये चले गये इन राहों मे ।। बेखौप जिन्दगी चलती रही । कभी खुशी,कभी गम की राहों में

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सुनों सुनों ऐ इंसानों ,ब्याने कब्रिस्तान के ,

24 अक्टूबर 2022
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सुनों सुनों ऐ इंसानों ,ब्याने कब्रिस्तान के , मेरे सन्नाटे, इस बीराने में,एक ख़ामोश आवाज है । कब्र की लिखीं इबारतें, तुम पढ लोगे इंसानों , पर क्या तुम मेरी ख़ामोश आवाज़ को सुन सकते हो कब्र मे दफ़न हर

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गुन गुन करती आई चिरईयॉ,

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  गुन गुन करती आई चिरईयॉ, कें बें कों शरमा रई । भीडतंत्र कों जमानों है, भईयाँ बहुमत को हे राज । लूट घसोंट (खरीद फरोक्‍त) कर सरकारें बन रई , जनता ठगी लूटी जा रई , अ, ब, स, को ज्ञान नईयॉ, सरकार,

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दद्दा बऊ की सुने ने भाईया साकें (शौक) को मरे जा रये ।

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दद्दा बऊ की सुने ने भाईया साकें (शौक) को मरे जा रये । अँगुरियों (अंगुलियों) मे सिगरट दबाये , और मों (मुँह) में गुटका खाँ रये । निपकत सो पेंट पेर रये , सबरई निकरत जा रये । दद्दा बऊ की सुने ने भाई

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अब तों फि़जओं में, वो मस्तीयॉ कहॉ

14 अप्रैल 2023
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अब तों फि़जओं में, वो मस्तीयॉ कहॉ । जहॉ देखों बिरानी ही बिरानी छॉई है ॥ बुर्जुगों से भी अब कायदा नही । ज़ाम से ज़ाम टकराने,  की तहजीब सी आई है ॥ किसे कहते हों, तुम इसान यहॉ ? यहॉ तो कपडों की तरह

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ऐ जि़न्दगी ले चल मुझें वहाँ

2 दिसम्बर 2022
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ऐ जि़न्दगी ले चल मुझें वहाँ  जहाँ नफरतों की दिवारें न हो , इंसान का इंसान से, इंसानियत का नाता हो, हर सुबह मस्जिद मे आज़ान हो मंदिर मे घंटो की आवाज़ हो चर्चो में प्रभु इशु की प्रार्थनाएं गुरुद्वार

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मुंशी प्रेम चन्द की रचना

5 फरवरी 2024
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*मुंशी प्रेमचंद जी की एक "सुंदर कविता", जिसके एक-एक शब्द को, बार-बार "पढ़ने" को "मन करता" है-_*ख्वाहिश नहीं, मुझेमशहूर होने की," _आप मुझे "पहचानते" हो,_ &

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