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अध्याय 13: देशबंधु चित्तरंजन दास

16 अगस्त 2023

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देशबंधु दास एक महान् पुरुष थे। मैं गत छ वर्षो से उन्हें जानता हू । कुछ ही दिन पहले जब में दार्जिलिंग से उनसे विदा हुआ था तब मैने एक मित्र से कहा था कि जितनी ही घनिष्ठता उनसे बढती है उतना ही उनके प्रति मेरा प्रेम बढता जाता है । मैने दार्जिलिंग मे देखा कि उनके मन मे भारत की भलाई के सिवा और कोई विचार न था । वह भारत की स्वाधीनता का ही सपना देखते थे, उसीका विचार करते थे और उसीकी बातचीत करते * थे, और कुछ नही । दार्जिलिंग से विदा होते समय भी उन्होने मुझसे कहा था कि आप बिछुड़े हुए दलो को एक करने के लिए बगाल मे अधिक समय तक ठहरिये, ताकि सब लोगो की शक्ति एक कार्य के लिए युक्त हो जाय । मेरी बगाल-यात्रा मे उनसे मत - भेद रखनेवालो ने भी बिना हिचकिचाहट के इस बात को स्वीकार किया है कि बगाल मे ऐसा कोई मनुष्य नही है, जो उनका स्थान ले सके। वह निर्भीक थे, वीर थे । बगाल मे नवयुवको के प्रति उन- का निस्सीम स्नेह था। किसी नवयुवक ने मुझसे ऐसा नही कहा कि देशबधु से सहायता मागने पर कभी किसीकी प्रार्थना खाली गई । उन्होने लाखो रुपया पैदा किया और लाखो रुपया बगाल के नव- युवको मे बाट दिया। उनका त्याग अनुपम था, और उनकी महान् बुद्धिमत्ता और राजनीतिज्ञता की बात मै क्या कह सकता | दार्जिलिंग मे उन्होने मुझसे अनेक बार कहा कि भारत की स्वाधीनता अहिसा और सत्य पर निर्भर है ।

देश ने पटना और दार्जिलिंग में चरखा कातने की कोशिश की थी। मैने उनको चरखा का पाठ पढाया था और उन्होने मुझ- से वादा किया था कि मै कातना सीखने की कोशिश करूंगा और जबतक शरीर रहेगा तबतक कातूगा । उन्होने अपने दार्जिलिंग के निवास स्थान को 'चरखा क्लब' बना दिया था। उनकी नेक पत्नी ने वादा किया कि बीमारी की हालत छोडकर मै रोज आध घटे तक स्वयं चरखा चलाऊगी और उनकी लडकी, बहन और बहन की लड़की तो बराबर ही चरखा कातती थी ।

देशबंधु मुझसे अक्सर कहा करते – “मैं समझता  हू कि सभा मे जाना जरूरी है मगर चरखा कातना भी उतना ही जरूरी है। न सिर्फ जरूरी है, बल्कि बिना चरखे के धारा सभा के काम को कारगर बनाना असंभव है।" उन्होने जबसे खादी की पोशाक पहनना शुरू किया तब से मरने के दिन तक पहनते आये ।

मेरे लिए यह कहने की बात नही है कि उन्होने हिदू-मुसल - मानो मे मेल करने के लिए कितना बडा काम किया था । अछूतो- से वह कितना प्रेम रखते थे, इसके विषय मे सिर्फ वही एक बात कहूगा जो मैने बारीसाल मे कल रात को एक नाम -शूद्र नेता से सुनी थी। उस नेता ने कहा -- "मुझे पहली आर्थिक सहायता देशबधु ने दी और पीछे डाक्टर राय ने ।” देशबधु देश - सेवको मे एक रत्न थे । उनकी सेवा और त्याग बेजोड था । ईश्वर करे, उनकी याद हमे सदा बनी रहे और उनका आदर्श हमारे सदुद्योग मे सार्थक हो । हमारा मार्ग लबा और दुर्गम है । हमको उसमे आत्म- निर्भरता के सिवा और कोई सहारा नही देगा । स्वावलंबन ही देगबधु का मुख्य सूत्र था। वह हमे सदा अनुप्राणित करता रहेगा ।"

...

मनुष्यो मे से एक दिग्गज पुरुष उठ गया । १९१९ मे, पजाब महासभा जाच-समिति के सिलसिले मे उनसे पहले-पहल मेरा प्रत्यक्ष परिचय हुआ । मैं उनके प्रति सशय और भय के भाव लेकर उनसे मिलने गया था । दूर से ही मैने उनकी धुआधार वकालत और उससे भी अधिक धुआधार वक्तृत्व का हाल सुना था। वह अपनी मोटरकार लेकर सपत्नीक, सपरिवार आये थे और एक राजा की शान-बान के साथ रहते थे । मेरा पहला अनुभव तो कुछ अच्छा न रहा । हम हटर - कमिटी की तहकीकात मे गवा- हिया दिलाने के प्रश्न पर विचार करने के लिए बैठे थे । मैने उनके अदर तमाम कानूनी बारीकियो को तथा गवाह को जिरह मे तोड- कर फौजी कानून के राज्य की, बहुतेरी शरारतो की कलई खोलने की, वकीलोचित तीव्र इच्छा देखी। मेरा प्रयोजन कुछ भिन्न था। मैने अपना कथन उन्हें सुनाया। दूसरी मुलाकात मे मेरे दिल को तसल्ली हुई और मेरा तमाम डर दूर हो गया । उनसे मैने जो कुछ कहा उसको उन्होने उत्सुकता के साथ सुना । भारतवर्ष मे पहली ही बार बहुतेरे देशसेवको के घनिष्ठ समागम में आने का अवसर मुझे मिला था । तबतक मैने महासभा के किसी काम मे वैसे कोई हिस्सा न लिया था । वह मुझे जानते थे - एक दक्षिण अफ्रीका का योद्धा है । पर मेरे तमाम साथियो ने मुझे अपने घर IT IT बना लिया, और देश के इस विख्यात सेवक का नबर इसमे सबसे आगे था । मैं उस समिति का अध्यक्ष माना जाता था । "जिन बातो मे हमारा मतभेद होगा उनमे मै अपना कथन आपके सामने उपस्थित कर दूंगा । फिर जो फैसला आप करेंगे उसे मै मान लूगा । इसका यकीन मै आपको दिलाता हूँ ।" उनके इस स्वयंस्फूर्त आश्वासन के पहले ही हममे इतनी घनिष्ठता हो गई थी कि मुझे अपने मन का सराय उनपर प्रकट करने का साहस हो गया। फिर जब उनकी ओर से यह आश्वासन मिल गया तब मुझे ऐसे मित्र- निष्ठ साथी पर अभिमान तो हुआ, कितु साथ ही कुछ सोच भी मालूम हुआ, क्योकि मै जानता था कि मै तो भारत की राज- नीति मे एक नौसिखिया था और शायद ही ऐसे पूर्ण विश्वास का अधिकारी था। परतु तत्र निष्ठा छोटे-बड़े के भेद को नही जानती । वह राजा जो कि तंत्र - निष्ठा के मूल्य को जानता है अपने सेवक की भी बात, उस मामले में मानता है, जिसका पूरा भार उसपर छो देता है । इस जगह मेरा स्थान एक सेवक के जैसा था । और मे इस बात का उल्लेख कृतज्ञता और अभिमान के साथ करता हू कि मुझे जितने मित्र-निष्ठ साथी वहा मिले थे, उनमें कोई इतना मित्र-निष्ठ न था जितना चित्तरजन दास थे ।

अमृतसर-धारा-सभा मे तत्र-निष्ठ का अधिकार मुझे नही मिल सकता था । वहा हम परस्पर योद्धा थे, हर शख्स को अपनी- अपनी योग्यता के अनुसार राष्ट्र-हित-सबधी अपने ट्रस्ट की रक्षा करनी थी, जहा तर्क अथवा अपने पक्ष की आवश्यकता के अलावा किसीकी बात मान लेने का सवाल न था । महासभा के मच पर पहली लडाई लडना मेरे लिए एक पूरे आनद और तृप्ति का विषय था। बडे सभ्य, उसी तरह न झुकनेवाले महान् मालवीयजी बला- बलको सामने रखने की कोशिश कर रहे थे। कभी एक के पास जाते थे, कभी दूसरे के पास । महासभा के अध्यक्ष पडित मोतीलाल- जी ने सोचा कि खेल खतम हो गया । मेरी तो लोकमान्य और देशबंधु से खासी जम रही थी । सुधार- सबधी प्रस्ताव का एक ही सूत्र उन दोनो ने बना रखा था । हम एक-दूसरे को समझा देना चाहते थे, पर कोई किसीका कायल न होता था । बहुतो ने तो सोचा था कि अब कोई चारा नही था और इसका अत बुरा रहेगा । अलीभाई, जिन्हे मैं जानता था और चाहता था, पर आज की तरह जिनसे मेरा परिचय न था, देशबंधु के प्रस्ताव के पक्ष मे मुझे समझाने लगे । मुहम्मद अली ने अपनी लुभावनी नम्रता से कहा, " जाच- समिति में आपने जो महान् कार्य किया है, उसे नष्ट न कीजिये ।" पर वह मुझे न पटा सके। तब जयरामदास वह ठंडे दिमागवाला सिंधी आया, और उसने एक चिट मे समझौते की सूचना और उसकी हिमायत लिखकर मेरे पास पहुचाई । मै शायद ही उन्हे जानता था । पर उनकी आंखो और चेहरे मे कोई ऐसी बात थी जिसने मुझे लुभा लिया । मैने उस सूचना को पढा । वह अच्छी थी। मैने उसे देशबंधु को दिया। उन्होने जवाब दिया, "ठीक है, बशर्तेकि हमारे पक्ष के लोग उसे मान ले।" यहां ध्यान दीजिये उनकी घनिष्ठता पर । अपने पक्ष के लोगो का समाधान किये बिना वह नही रहना चाहते थे । यही एक रहस्य है लोगों के हृदय पर उनके आश्चर्यजनक अधिकार का । वह सब लोगो को पसंद हुई । 

लोकमान्य अपनी गरुड के सदृश तीखी आखो से वहा जो कुछ हो रहा था सब देख रहे थे । व्याख्यान - मच से पडित मालवीयजी की गंगा के सदृश वाग्धारा बह रही थी। उनकी एक आख सभामच की ओर देख रही थी जहाकि हम साधारण लोग बैठकर राष्ट्र के भाग्य का निर्णय कर रहे थे। लोकमान्य ने कहा- "मेरे देखने की जरूरत नही । यदि दास ने उसे पसद कर लिया है तो मेरे लिए वह काफी है ।" मालवीयजी ने उसे वहा से सुना, कागज मेरे हाथ से छीन लिया और घोर करतल ध्वनि से घोषित कर दिया कि समझौता हो गया । मैने इस घटना का सविस्तर वर्णन इसलिए किया है कि उसमे देशबधु की महत्ता और नि- विवाद नेतृत्व, कार्य-विषयक दृढता, निर्णय- सबधी समझदारी और पक्ष - निष्ठा के कारणो का सग्रह आ जाता ह ।

अब और आगे बढिये । हम जुहू, अहमदाबाद, दिल्ली और दार्जिलिंग पहुचते है । जुहू मे वे और पडित मोतीलालजी मुझे अपने पक्ष मे मिलाने के लिए आये । वह दोनो जोडवा भाई हो गये थे। हमारे दृष्टि-बिदु अलग-अलग थे, पर उन्हे यह गवारा न होता था कि मेरे साथ मतभेद रहे । यदि उनके बस का होता तो वे ५० मील चले जाते जहा मै सिर्फ २५ मील चाहता, परंतु वे अपने एक अत्यत प्रिय मित्र के सामने भी एक इच न झुकना चाहते थे, जहां कि देशहित सकट मे था । हमने एक प्रकार का समझौता कर लिया । हमारा मन तो न भरा, पर हम निराश न हुए। हम एक-दूसरे पर विजय प्राप्त करने के लिए तुले हुए थे । फिर हम अहमदाबाद मे मिले । देशबंधु अपने पूरे रंग में थे और एक चतुर खिलाडी की तरह सब रग-ढंग देखते थे । उन्होने मुझे एक शान की शिकस्त दी। उनके जैसे मित्र के हाथो ऐसी कितनी शिकस्त मैं न खाऊगा । पर अफसोस । वह शरीर अब दुनिया में नही रहा

वह अक्सर आध्यात्मिकता की बाते करते थे और कहते थे कि धर्म के विषय मे आपका मेरा कोई मतभेद नही है । पर उन्होने कहा नही तथापि हो सकता है कि उनका भाव यह रहा हो कि मैं इतना काव्यहीन हू कि मुझे हमारे विश्वासो

कात्मता नही दिखाई देती । मैं मानता हूँ कि उनका खयाल ठीक था । उन बहुमूल्य पाच दिनो मे मैने उनका हर कार्य धर्म- मय देखा और न केवल वह महान् थे, बल्कि नेक भी थे, उनकी नेकी ढती जा रही थी ।

जबकि क्रूर दैव ने लोकमान्य को हमसे छीन लिया तब मै केला असहाय रह गया । अभी तक मेरी वह चोट गई नही है, क्योकि अबतक मुझे उनके प्रिय शिष्यो की आराधना करनी पडती है । पर देशबंधु के वियोग ने तो मुझे और भी बुरी हालत में छोड़ दिया है । "

उनका त्याग महान् था। उनकी उदारता की सीमा न थी । उनकी मुट्ठी सदा सबके लिए खुली रहती थी । दान देने कभी आगा-पीछा न सोचते थे। उस दिन मैने बड़े मीठे भाव से कहा, "अच्छा होता, आप दान देने में अधिक विचार से काम लेते ।” उन्होने तुरत उत्तर दिया, “पर मै नही समझता कि अपने अविचार के कारण मेरी कुछ हानि हुई है ।" अमीर और गरीब सबके लिए उनका रसोई-घर खुला था । उनका हृदय हरेक की मुसीबत के समय उसके पास दौड़ जाता था । सारे बगल मे ऐसा कौन नवयुवक है, जो किसी-न-किसी रूप में देशबंधु का कृतज्ञ नही है ? उनकी बेजोड कानूनी प्रतिभा भी सदा गरीबों की सेवा के लिए हाजिर रहती थी। मुझे मालूम हुआ है कि उन्होने यदि सबकी नही तो, बहुतेरे राजनैतिक कैदियों की पैरवी बिना एक कौडी लिये की है । पजाब की जाच के समय जब वह पंजाब गये तो अपना सारा खर्च अपनी जेब से किया था । उन दिनो अपने  साथ वह एक राजा की तरह लवाजमा ले गये थे । उन्होने मुझसे कहा था कि पंजाब की उस यात्रा मे उनके पचास हजार रुपये खर्च हुए थे। जो उनके द्वार पर आता था उसीके लिए उनकी उदारता का हाथ आगे बढ जाता था । उनके इसी गुण ने उन्हे हजारो नवयुवको के दिल का राजा बना दिया था ।

जैसे ही वह उदार थे वैसे ही निर्भीक भी थे अमृतसर में उनकी घुआधार वक्तृताओ ने मेरा दम खुश्क कर दिया था । वह अपने देश की मुक्ति तुरत चाहते थे । वह एक विशेषण को हटाने या बदलने के लिए तैयार न थे इसलिए नही कि वह जिद्दी थे, बल्कि इसलिए कि वह अपने देश को बहुत चाहते थे । उन्होने विशाल . शक्तियो को अपने कब्जे मे रखा । अपने अदम्य उत्साह और अध्यवसाय के द्वारा उन्होने अपने दल को प्रबल बनाया । परतु यह भीषण शक्ति प्रवाह उनकी जान ले बैठा । उनका यह बलि- दान स्वेच्छापूर्वक था । वह उच्च था, उदात्त था ।" 

कलकत्ता १८ ता० को पागल हो गया था । अक-शास्त्री कहते है कि २ लाख से कम आदमी इकट्ठे न हुए थे। रास्तो पर खड़े, तार के खभो पर चढे, ट्राम की छत पर खडे, झरोखो मे राह देखते बैठे स्त्री-पुरुष इससे जुदा है । साथ भजन-कीर्तन तो था ही। पुष्पो की वृष्टि हो रही थी । शव खुला हुआ था, परतु उसपर फूलो के हार का पहाड बिछ गया था ।

अर्थी के जुलूस के आगे स्वयसेवक फुलवाडी लेकर चल रहे थे । उसमे फूलो से सुसज्जित चरखा था। जुलूस स्टेशन से ७-३० पर चलकर श्मशान मे ३ बजे पहुचा । ३-३० बजे अग्नि-सस्कार शुरू हुआ ।

श्मशान घाट पर भीड उमडी थी । पीछे से जो भीड उमडती थी उसे रोकना अति कठिन था और मैं समझता हू कि यदि मुझे हट्टे-कट्टे लोगो ने अपने कधे पर बिठाकर इस उमडती हुइ भीड़ के सामने न उठा रखा होता तो भयकर दुर्घटना हो जाती । दो सशक्त आदमियो ने मुझे अपने कधे पर बिठा रखा और उस हालत मे मै लोगों को रोक रहा था और उनसे बैठ जाने की प्रार्थना कर रहा था । लोग जबतक मुझे देखते थे तबतक तो मानते थे, पर मैं जहा अशाति की आशंका होती उस ओर गया कि मेरी पीठ फिरते ही लोग तुरत उठ खड़े हो जाते थे । सब लोग दीवाने हो गये थे । हजारो आखे रथी की ओर लगी हुई थी । जब दाहकर्म शुरू हुआ तब लोग धीरज खो बैठे। सब बरबस खडे हो गये और चिता की ओर खिच पडे । यदि एक भी क्षण का विलंब होता तो सबके चिता पर गिर पडने का अंदेशा था । अब क्या . करे ? मैने लोगो से कहा, “अब काम पूरा हुआ। सब अपने-अपने घर जावे ।" और मुझे उठानेवाले भाइयो से कहा, "अब मुझे इस भीड़ से हटा ले चलो।" लोगो को मै पुकार पुकारकर और इशारे से कहता चला कि मेरे पीछे आओ। इसका असर बहुत अच्छा हुआ, वह हजारो की भीड वापस लौटी और दुर्घटना होते-होते बची । चिता चदन की लकडी की बनाई गई थी ।

लोग ऐसे मालूम होते थे मानो वन भोज को आये हो । गभीरता तो सबके चेहरे पर थी, पर ऐसा नही मालूम होता था कि वे शोक-भार से दब गये है । कुटुम्बियो का और मेरा शोक स्वार्थ पूर्ण मालूम होता था । हमारे तत्व ज्ञान का अत आ गया, लोगों का कायम रहा, क्योकि वे तटस्थ थे । उनके अंदर सम्मान का भाव तो पूरा-पूरा था। उनकी पूजा नि स्वार्थं थी । वे तो भारत- पुत्र को, अपने बधु को, प्रमाणपत्र देने के लिए आये थे । वे अपनी आंखों से और चेष्टा से ऐसा कहते हुए दिखाई देते थे, "तुमने बडा काम किया, तुम्हारे जैसे हजारो हो । "

देशबधु जैसे भव्य थे वैसे ही भले थे । दार्जिलिंग में इसका बड़ा अनुभव मुझे हुआ । उन्होने धर्म-संबधी बाते की । जिनकी छाप उनके दिल पर गहरी बैठी, उनकी बाते की । वह धर्म का अनु- भव-ज्ञान प्राप्त करने के लिए उत्सुक थे । “दूसरे देश मे जो कुछ हो, पर इस देश का उद्धार तो शातिमार्ग से ही हो सकता है । मै यहा के नवयुवको को दिखला दूंगा कि हम शांति के रास्ते स्वराज्य प्राप्त कर सकते है ।" ' यदि हम भले हो जायगे तो अग्रेजो को भला बना लेगे ।" "इस अधकार और दभ मे मुझे सत्य के सिवा दूसरा कोई रास्ता नही दिखाई देता । दूसरे की हमे आवश्यकता भी नही ।" मै तमाम दलो मे मेल कराना चाहता हू । बाधा सिर्फ इतनी ही है कि हमारे लोग भीरु है । उनको एकत्र करने के प्रयत्न होता क्या है कि हमे भीरु बनना पडता है । तुम जरूर सबको मिलाने की कोशिश करना और मिलना, पत्र - सपादकों को . समझाना कि मेरी और स्वराज्य- दल की ख्वामख्वा निदा करने से क्या लाभ? मैने यदि भूल की हो तो मुझे बतावे । मैं यदि उन्हे सतुष्ट न करू तो फिर शौक से पेट भर के मेरी निदा करे ।" " तुम्हारे चरखे का रहस्य में दिन-दिन अधिक समझता जाता हू । मेरा कधा यदि दर्द न करता हो और इसमे मेरी गति कुठित न तो मै तुरत सीख लू । एक बार सीखने पर नियमपूर्वक का मेरा जी न ऊबेगा। पर सीखते हुए जी उकता उठता है । देखो न, तार टूटते ही जाते है ।” “पर आप ऐसा किस तरह कह सकते है ? स्वराज्य के लिए आप क्या नही कर सकते ।" "हा- हा, यह तो ठीक ही है । मै कहा सीखने से नाही करता हू ? मैं तो अपनी कठि- नाई बताता हू। पूछो तो वासतीदेवी से कि ऐसे काम में मैं कितना मदबुद्धि हू ?" वासतीदेवी ने उनकी मदद की, "ये सच कहते है । अपना कलमदान खोलना हो तो ताला लगाने मुझे आना पडता है ।" मैने कहा, "यह तो आपकी चालाकी है । इस तरह आपने देशबंधु को अपग बना रखा है, जिससे उन्हें सदा आपकी खुशामद करनी पड़े और आप पर सहारा रखना पडे ।" हॅसी से कमरा गूज उठा । देशबधु मध्यस्थ हुए। “एक महीने बाद मेरी परीक्षा लेना । उस समय में रस्सिया निकालता न मिलूंगा ।" मैने कहा, “ठीक है । आपके लिए सतीशबाबू शिक्षक भी भेजे देगे ।

 आप जब पास हो जायगे तो समझियेगा कि स्वराज्य नजदीक आ गया ।" ऐसे सब विनोदो का वर्णन करने लगू तो खात्मा नही हो सकता ।कितने ही सस्मरण तो ऐसे है, जिनका वर्णन में कर ही नही सकता ।

मैं जिस प्रेम का अनुभव वहा कर रहा था उसकी कुछ झलक यदि यह न दिखाऊ तो मैं कृतघ्न माना जाऊगा । वह छोटी-छोटी- सी बात की सभाल रखते थे । मेवे खुद कलकत्ते से मगवाते । दार्जिलिंग में बकरी या बकरी का दूध मिलना मुश्किल पड़ता है । इसलिए ठेठ तलहटी से पाच बकरिया मगवा कर रखी । मेरी जरूरत की एक-एक चीज का इतजाम किये बगैर न रहते थे । हमारे कमरे के दरम्यान सिर्फ एक दीवार थी । सुबह होते ही, काम-काज से निबटकर, मेरी राह देखते बैठते । चारपाई पर बैठते थे, चारपाई अभी नही छूटी थी । पल्थी मारकर बैठने की मेरी आदत से परिचित थे । सो कुरसी पर नही बैठने देते थे । खटिया पर ही अपने सामने मुझे बैठाते । गद्दे पर भी कुछ खास तौर पर बिछवाते और तकिया भी लगवाते । मुझसे दिल्लगी किये बिना न रहा गया, "यह दृश्य तो मुझे चालीस बरस पहले की याद दिलाता है । जब मेरी शादी हुई थी तब हम दुलहे- दुलहिन इस तरह बैठे थे । अब यहा पाणिग्रहण की ही कसर है ।" मेरे कहने की देर थी कि देशबंधु के कहकहे से सारा घर गूंज उठा। देशबधु जब हंसते तो उनकी आवाज दूर तक पहुचे बिना न रहती ।

देश का हृदय दिन-पर-दिन कोमल होता जाता था । रूढि के अनुसार मांस-मछली खाने में उन्हें कोई विधि - निषेध न था । फिर भी जब असहयोग शुरू हुआ तब मासाहार, मद्यपान और चुरट तीनो चीजे उन्होने छोड दी थी । पीछे जाकर फिर उन्होने अपना जोर जमाया था, परतु उनका झुकाव इनको छोडने की ओर ही रहता था। अभी कुछ दिनो से राधास्वामी सप्रदाय के एक साधु उनका समागम हुआ । तब से निरामिष भोजन की उत्सुकता बढ गई थी। सो जबसे वह दार्जिलिंग गये, निरामिष भोजन शुरू किया था । और मेरे रहने तक घर मे मास-मछली न आने दिया । मुझसे अनेक बार कहा, "यदि मुझसे हो सका तो अब से मै मांस- मछली को छुऊगा तक नही । मुझे वह पसद थी नही और मैं समझता हू कि इससे हमारी आध्यात्मिक उन्नति मे बाधा पहुचती है। मेरे गुरु ने मुझे खास तौर पर कहा कि साधना के खातिर तुम्हे मासाहार अवश्य छोड देना चाहिए ।" "

यदि हमे देशबंधु की आत्मा को शांति दिलाना हो तो हमारे पास एक ही इलाज है । उनके तमाम सद्गुणो को हम अपने अदर पैदा करे। कितने ही सद्गुण तो अवश्य पैदा कर सकते है । उनके सदृश अग्रेजी चाहे हमे न आसके, उनकी तरह वकील हम सब न हो सके, धारासभा मे जाने की शक्ति उनके सदृश हमारे पास न हो, पर हमारे अंदर उनके जैसा देशप्रेम तो हो सकता है। उनके बराबर उदारता हम सीख सकते है । उनके बराबर धन हम चाहे न दे सके, परंतु जो यथाशक्ति देते है, उन्होने बहुत कुछ दे दिया है । विधवा के एक ताबे के छल्ले की कीमत महाराज के करोडो मे से दिये हजार की कीमत से ज्यादा है। देशबधु ने खादी पहनने के बाद फिर घर मे या बाहर उसका त्याग नही किया । क्या हम खादी पहनेगे ? देशबंधु ने महीन खादी कभी न चाही उन्होन तो मोटी खादी को ही पसंद किया था । देशबधु ने कातने का प्रयत्न किया । जिन्होने शुरू नही किया, क्या वे अब करेंगे ? "

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रचनाएँ
देश सेवकों के संस्मरण
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देश सेवकों के संस्कार कई भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों के जीवन और कार्य के बारे में निबंधों का एक संग्रह है। निबंध स्वतंत्रता सेनानियों के साथ प्रभाकर की व्यक्तिगत बातचीत और उनके जीवन और कार्य पर उनके शोध पर आधारित हैं। देश सेवकों के संस्कार में निबंधों को कालानुक्रमिक रूप से व्यवस्थित किया गया है, जो भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के शुरुआती दिनों से शुरू होकर महात्मा गांधी की हत्या तक समाप्त होता है। निबंधों में असहयोग आंदोलन, भारत छोड़ो आंदोलन और नमक सत्याग्रह सहित कई विषयों को शामिल किया गया है। देश सेवकों के संस्कार में प्रत्येक निबंध भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन पर एक अद्वितीय और व्यक्तिगत दृष्टिकोण प्रदान करता है। प्रभाकर के निबंध केवल ऐतिहासिक वृत्तांत नहीं हैं, बल्कि साहित्य की कृतियाँ भी हैं जो उस समय की भावना और स्वतंत्रता सेनानियों द्वारा किए गए बलिदानों को दर्शाती हैं। देश सेवकों के संस्कार भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन पर साहित्य में एक महत्वपूर्ण और मूल्यवान रचना है।
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देशबंधु दास एक महान् पुरुष थे। मैं गत छ वर्षो से उन्हें जानता हू । कुछ ही दिन पहले जब में दार्जिलिंग से उनसे विदा हुआ था तब मैने एक मित्र से कहा था कि जितनी ही घनिष्ठता उनसे बढती है उतना ही उनके प्र

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अध्याय 14: महादेव देसाई

16 अगस्त 2023
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महादेव की अकस्मात् मृत्यु हो गई । पहले जरा भी पता नही चला। रात अच्छी तरह सोये । नाश्ता किया। मेरे साथ टहले । सुशीला ' और जेल के डाक्टरो ने, जो कुछ कर सकते थे, किया लेकिन ईश्वर की मर्जी कुछ और थी ।

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अध्याय 15: सरोजिनी नायडू

16 अगस्त 2023
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सरोजिनी देवी आगामी वर्ष के लिए महासभा की सभा - नेत्री निर्वाचित हो गई । यह सम्मान उनको पिछले वर्ष ही दिया जानेवाला था । बडी योग्यता द्वारा उन्होने यह सम्मान प्राप्त किया है । उनकी असीम शक्ति के लिए और

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अध्याय 16: मोतीलाल नेहरू

16 अगस्त 2023
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महासभा का सभापतित्व अब फूलो का कोमल ताज नही रह गया है। फूल के दल तो दिनो-दिन गिरते जाते है और काटे उघड जाते है । अब इस काटो के ताज को कौन धारण करेगा ? बाप या बेटा ? सैकडो लडाइयो के लडाका पडित मोतीलाल

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अध्याय 17: वल्लभभाई पटेल

16 अगस्त 2023
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सरदार वल्लभभाई पटेल के साथ रहना मेरा बडा सौभाग्य 'था । उनकी अनुपम वीरता से मैं अच्छी तरह परिचित था, परतु पिछले १६ महीने मे जिस प्रकार रहा, वैसा सौभाग्य मुझे कभी नही मिला था । जिस प्रकार उन्होने मुझे स

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अध्याय 18: जमनालाल बजाज

16 अगस्त 2023
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सेठ जमनालाल बजाज को छीनकर काल ने हमारे बीच से एक शक्तिशाली व्यक्ति को छीन लिया है। जब-जब मैने धनवानो के लिए यह लिखा कि वे लोककल्याण की दृष्टि से अपने धन के ट्रस्टी बन जाय तब-तब मेरे सामने सदा ही इस वण

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अध्याय 19: सुभाषचंद्र बोस

16 अगस्त 2023
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नेताजी के जीवन से जो सबसे बड़ी शिक्षा ली जा सकती है वह है उनकी अपने अनुयायियो मे ऐक्यभावना की प्रेरणाविधि, जिससे कि वे सब साप्रदायिक तथा प्रातीय बधनो से मुक्त रह सके और एक समान उद्देश्य के लिए अपना रक

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अध्याय 20: मदनमोहन मालवीय

16 अगस्त 2023
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जब से १९१५ मे हिदुस्तान आया तब से मेरा मालवीयजी के साथ बहुत समागम है और में उन्हें अच्छी तरह जानता हू । मेरा उनके साथ गहरा परिचय रहता है । उन्हें मैं हिंदू-संसार के श्रेष्ठ व्यक्तियो मे मानता हूं । क

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अध्याय 21: श्रीमद् राजचंद्रभाई

16 अगस्त 2023
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में जिनके पवित्र सस्मरण लिखना आरंभ करता हूं, उन स्वर्गीय राजचद्र की आज जन्मतिथि है । कार्तिक पूर्णिमा संवत् १९७९ को उनका जन्म हुआ था । मेरे जीवन पर श्रीमद्राजचद्र भाई का ऐसा स्थायी प्रभाव पडा है कि

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अध्याय 22: आचार्य सुशील रुद्र

16 अगस्त 2023
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आचार्य सुशील रुद्र का देहात ३० जून, १९२५ को होगया । वह मेरे एक आदरणीय मित्र और खामोश समाज सेवी थे। उनकी मृत्यु से मुझे जो दुख हुआ है उसमे पाठक मेरा साथ दे | भारत की मुख्य बीमारी है राजनैतिक गुलामी |

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अध्याय 23: लाला लाजपतराय

16 अगस्त 2023
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लाला लाजपतराय को गिरफ्तार क्या किया, सरकार ने हमारे एक बड़े-से-बडे मुखिया को पकड़ लिया है। उसका नाम भारत के बच्चे-बच्चे की जबान पर है । अपने स्वार्थ-त्याग के कारण वह अपने देश भाइयो के हृदय में उच्च स्

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अध्याय 24: वासंती देवी

16 अगस्त 2023
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कुछ वर्ष पूर्व मैने स्वर्गीय रमाबाई रानडे के दर्शन का वर्णन किया था । मैने आदर्श विधवा के रूप मे उनका परिचय दिया था । इस समय मेरे भाग्य मे एक महान् वीर की विधवा के वैधव्य के आरभ का चित्र उपस्थित करना

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अध्याय 25: स्वामी श्रद्धानंद

16 अगस्त 2023
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जिसकी उम्मीद थी वह ही गुजरा। कोई छ महीने हुए स्वामी श्रद्धानदजी सत्याग्रहाश्रम में आकर दो-एक दिन ठहरे थे । बातचीत में उन्होने मुझसे कहा था कि उनके पास जब-तब ऐसे पत्र आया करते थे जिनमे उन्हें मार डालन

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अध्याय 26: श्रीनिवास शास्त्री

16 अगस्त 2023
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दक्षिण अफ्रीका - निवासी भारतीयो को यह सुनकर बडी तसल्ली होगी कि माननीय शास्त्री ने पहला भारतीय राजदूत बनकर अफ्रीका में रहना स्वीकार कर लिया है, बशर्ते कि सरकार वह स्थान ग्रहण करने के प्रस्ताव को आखिरी

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अध्याय 27: नारायण हेमचंद्र

16 अगस्त 2023
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स्वर्गीय नारायण हेमचन्द्र विलायत आये थे । मै सुन चुका था कि वह एक अच्छे लेखक है। नेशनल इडियन एसो - सिएशनवाली मिस मैंनिग के यहा उनसे मिला | मिस गजानती थी कि सबसे हिल-मिल जाना मैं नही जानता । जब कभी मै

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