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अध्याय 5: कस्तूरबा गांधी

15 अगस्त 2023

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तेरह वर्ष की उम्र मे मेरा विवाह हो गया। दो मासूम बच्चे अनजाने ससार-सागर में कूद पडे। हम दोनो एक-दूसरे से डरते थे, ऐसा खयाल आता है। एक-दूसरे से शरमाते तो थे ही । धीरे-धीरे हम एक-दूसरे को पहचानने लगे। बोलने लगे। हम दोनों हम उम्र थे, पर मैने पति का अधिकार जताना शुरू कर दिया ।...

कस्तूरबाई निरक्षर थी । स्वभाव उनका सरल और स्वतंत्र था। वह परिश्रमी भी थी; पर मेरे साथ कम बोला करती । अपने अज्ञान पर उन्हे असतोष न था । अपने बचपन में मैने कभी उनकी ऐसी इच्छा नही देखी कि 'वह पढते है तो मैं भी पढ़ ।' उन्हे पढाने की मुझे बडी चाह थी ।

पढाने की जितनी कोशिशे कीं वे सब प्राय बेकार गई । शिक्षक रखकर पढाने के मेरे यत्न भी विफल हुए। इसके फलस्वरूप कस्तूरबाई मामूली चिट्ठी-पत्री व गुजराती लिखने-पढने से अधिक साक्षर न हो पाईं।

...

दक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रह की लडाई के काम से मुक्त होने के बाद मैने सोचा कि अब मेरा काम दक्षिण अफ्रीका में नहीं, बल्कि देश मे है । दक्षिण अफ्रीका में बैठे-बैठे मै कुछ-न-कुछ सेवा तो जरूर कर पाता था, परतु मैने देखा कि यहा कही मेरा मुख्य काम धन कमाना ही न हो जाय ।

देश से मित्र लोग भी देश लौट आने को आकर्षित कर रहे थे । मुझे भी जचा कि देश जाने से मेरा अधिक उपयोग हो सकेगा ।

मैने साथियो से छुट्टी देने का अनुरोध किया । बडी मुश्किल से उन्होने एक शर्त पर छुट्टी स्वीकार की। वह यह कि एक साल के अदर लोगो को मेरी जरूरत मालूम हो तो मै फिर दक्षिण अफ्रीका आ जाऊगा । मुझे यह शर्त कठिन मालूम हुई, परतु मै तो प्रेम-पाश में बधा हुआ था। मित्रो की बात को टाल नही सकता था। मैने वचन दिया । इजाजत मिली |

इस समय मेरा निकट - सबध प्राय नेटाल के ही साथ था । नेटाल के हिदुस्तानियों ने मुझे प्रेमामृत से नहला डाला । स्थान- स्थान पर अभिनंदन पत्र दिये गये और हरेक जगह से कीमती ची नजर की गई ।

१८९६ मे जब मै देश आया था तब भी भेटे मिली थी; पर इस बार की भेटो और सभाओ के दृश्यों से में घबराया । भेट में सोने-चांदी की चीजे तो थी ही; पर हीरे की चीजे भी थी ।

इनसब चीजो को स्वीकार करने का मुझे क्या अधिकार हो सकता है ? यदि मैं इन्हे मजूर कर लू तो फिर अपने मन को यह कहकर कैसे मना सकती हू कि मै पैसा लेकर लोगो की सेवा नहीं करता था ? मेरे मवक्किलो की कुछ रकमो को छोड़कर  वालो सब चीजे मेरी लोक-सेवा के ही उपलक्ष मे दी गई थी । पर मेरे मन मे तो मवक्किल और दूसरे साथियों में कुछ भेद न था । मुख्य- मुख्य मवक्किल सब सार्वजनिक काम मे भी सहायता देते थे ।

फिर उन भेटो मे एक पचास गिनी का हार कस्तूरबाई के लिए था। मगर उसे जो चीज मिली वह भी थी तो मेरी ही सेवा के उपलक्ष मे । अतएव उसे पृथक नही मान सकते थे ।

जिस शाम को इनमे से मुख्य-मुख्य भेटे मिली, वह रात मैंने एक पागल की तरह जागकर काटी । कमरे मे यहा से वहा टहलता रहा, परतु गुत्थी किसी तरह सुलझती न थी । सैकडो रुपयो की भेटे न लेना भारी पड रहा था, पर ले लेना उससे भी भारी मालूम होता था ।

मै चाहे इन भेटो को पचा भी सकता, पर मेरे बालक और पत्नी ? उन्हें तालीम तो सेवा की मिल रही थी । सेवा का दाम नही लिया जा सकता था, यह हमेशा समझाया जाता था। घर मे कीमती जेवर आदि में नही रखता था । सादगी बढती जाती थी । ऐसी अवस्था में सोने की घडिया कौन रखेगा ? सोने की कठी और हीरे की अंगूठिया कौन पहनेगा ? गहनो का मोह छोडने के लिए मैं उस समय भी औरो से कहता रहता था । अब इन गहनो और जवाहरात को लेकर मैं क्या करूंगा ?

इस निर्णय पर पहुचा कि वे चीजे मै हरगिज नही रख सकता । पारसी रुस्तमजी इत्यादि को इन गहनो का ट्रस्टी बना- कर उनके नाम एक चिट्ठी तैयार की और सुबह स्त्री-पुत्रादि से सलाह करके अपना बोझ हलका करने का निश्चय किया।

जाता था कि धर्मपत्नी को समझाना मुश्किल पडेगा । मुझे विश्वास था कि बालको को समझाने मे जरा भी दिक्कत पेश आवेगी । अत उन्हें वकील बनाने का विचार किया ।

बच्चे तो तुरत समझ गये । वे बोले, "हमे इन गहनो से कुछ मतलब नही । ये सब चीजे हमे लौटा देनी चाहिए और यदि जरूरत होगी तो क्या हम खुद नही बना सकेगे ?"

में प्रसन्न हुआ । “तो तुम बा को समझाओगे न ?” मैने पूछा । “जरूर जरूर । वह कहा इन गहनो को पहनने चली है । वह रखना चाहेगी भी तो हमारे ही लिए न ? पर जब हमे ही इनकी जरूरत नही है तब फिर वह क्यो जिद करने लगी?"

परंतु काम अदाज से ज्यादा मुश्किल साबित हुआ । "तुम्हे चाहे जरूरत न हो और लडको को भी न हो। बच्चो का क्या ? जैसा समझा दे, समझ जाते है । मुझे न पहनने दो, पर मेरी बहुओ को तो जरूरत होगी। और कौन कह सकता है कि कल क्या होगा ? जो चीजे लोगो ने इतने प्रेम से दी है उन्हें वापस लौटाना ठीक नही ।" इस प्रकार वाग्धारा शुरू हुई और उसके साथ अश्रु- धारा आ मिली । लडके दृढ रहे और मै भला क्यो डिगने लगा

मैने धीरे से कहा, "पहले लडको की शादी तो हो लेने दो । हम बचपन मे तो इनके विवाह करना चाहते ही नही है । बड़े होने पर जो इनका जी चाहे सो करे । फिर हमे क्या गहनो - कपडो की शौकीन बहुए खोजनी है ? फिर भी अगर कुछ बनवाना ही होगा तो मैं कहा चला गया हू

"हा, जानती हू तुमको । वही न हो, जिन्होने मेरे भी गहने उतरवा लिये है । जब मुझे ही नही पहनने देते हो तो मेरी बहुओ को जरूर ला दोगे । लड़को को तो अभी से वैरागी बना रहे हो । इन गहनो को मैं वापस नही देने दूंगी और फिर मेरे हार पर तुम्हारा क्या हक है ?"

“पर यह हार तुम्हारी सेवा की खातिर मिला है या मेरी ?" मैने पूछा ।

" जैसा भी हो, तुम्हारी सेवा मे क्या मेरी सेवा नही है ? मुझ- से जो रात - दिन मजूरी कराते हो, क्या वह सेवा नही है ? मुझे रुला - रुलाकर जो ऐरै-गैरो को घर मे रखा और मुझसे सेवा - टहल कराई, वह कुछ भी नही ?"

ये सब बाण तीखे थे। कितने ही तो मुझे चुभ रहे थे । पर गहने वापस लौटाने का मै निश्चय कर चुका था । अंत मे बहुतेरी बातों मे मै जैसे-तैसे सम्मति प्राप्त कर सका ।...

जिस समय डरबन में मैं वकालत करता था, उस समय बहुत बार मेरे कारकुन मेरे साथ ही रहते थे । वे हिंदू और ईसाई होते थे, अथवा प्रातो के हिसाब से कहे तो गुजराती और मद्रासी । मुझे याद नही आता कि कभी उनके विषय मे मेरे मन मे भेद-भाव पैदा हुआ हो। मै उन्हे बिल्कुल घर के ही जैसा समझता और उसमे मेरी धर्मपत्नी की ओर से यदि कोई विघ्न उपस्थित होता तो मैं उससे लड़ता था । मेरा एक कारकुन ईसाई था । उसके मा-बाप पचम जाति के थे । हमारे घर की बनावट पश्चिमी ढग की थी। इस कारण कमरे मे मोरी नही होती थी और न होनी चाहिए थी, ऐसा मेरा मत है । इस कारण कमरो मे मोरियो की जगह पेशाब के लिए एक अलग बर्तन होता था । उसे उठाकर रखने का काम हम दोनो- दपती का था, नौकरो का नही। हा, जो कारकुन लोग अपने को हमारा बी-सा मानने लगते थे वे तो खुद ही उसे साफ कर डालते थे, लेकिन पचम जाति में जन्मा यह कारकुन नया था । उसका बर्तन हमे ही उठाकर साफ करना चाहिए था। दूसरे बर्तन तो कस्तूरबाई उठाकर साफ कर देती, लेकिन इन भाई का बर्तन उठाना उसे असह्य मालूम हुआ । इससे हम दोनो मे झगडा मचा । यदि मे उठाता हू तो उसे अच्छा नही मालूम होता था और खुद उसके लिए उठाना कठिन था । फिर भी आखो से मोती की बदे टपक रही है, एक हाथ मे बर्तन लिये अपनी लाल-लाल आंखो से उलहना देती हुई कस्तूरबाई सीढियो से उतर रही है, वह चित्र मै आज भी ज्यो-का-त्यों खीच सकता हूं।

परंतु मै जैसा सहृदय और प्रेमी पति था वैसा ही निष्ठुर और कठोर भी था। मै अपनेको उसका शिक्षक मानता था । इस- से अपने अंधप्रेम के अधीन हो मै उसे खूब सताता था । इस कारण महज उसके बर्तन उठा ले जाने-भर से मुझे सतोष न हुआ। मैने यह भी चाहा कि वह हँसते और हरखते हुए उसे ले जाय । इसलिए मैने उसे डांटा-डपटा भी। मैने उत्तेजित होकर कहा--"देखो, यह बखेडा मेरे घर मे नही चल सकेगा ।"

मेरा यह बोल कस्तूरबाई को तीर की तरह लगा । उसने धधकते दिल से कहा, "तो लो, रखो यह अपना घर ! मै चली ।"

उस समय मैं ईश्वर को भूल गया था । दया का लेशमात्र मेरे हृदय मे न रह गया था। मैने उसका हाथ पकड़ा। सीढी के सामने ही बाहर जाने का दरवाजा था। मैं उस दीन अबला का हाथ पकड़ कर दरवाजे तक खीचकर ले गया । दरवाजा आधा खोला होगा कि आखो मे गंगा-जमुना बहाती हुईं कस्तूरबाई बोली, "तुम्हें तो • कुछ शरम है नही, पर मुझे है । जरा तो लजाओ। मै बाहर निकल- कर आखिर जाऊ कहा ? मा-बाप भी यहा नही कि उनके पास चली जाऊ । मै ठहरी स्त्री जाति ! इसलिए मुझे तुम्हारी धौस सहनी ही पडेगी । अब जरा शरम करो और दरवाजा बंद कर लो । कोई देख लेगा तो दोनो की फजीहत होगी ।"

मैने अपना चेहरा तो सुर्ख बनाये रखा, पर मन मे शरमा जरूर गया । दरवाजा बंद कर दिया। जबकि पत्नी मुझे छोड़ नही सकती थी तब मै भी उसे छोड़कर कहा जा सकता था ? इस तरह हमारे आपस में लड़ाई-झगड़े कई बार हुए है, परंतु उनका परि- णाम सदा अच्छा ही निकला है । उनमें पत्नी ने अपनी अद्भुत सहनशीलता के द्वारा मुझपर विजय प्राप्त की ।

यह घटना १८९८ की है । उस समय मुझे ब्रह्मचर्य पालन के विषय में कुछ ज्ञान न था । वह समय ऐसा था जबकि मुझे इस बात का स्पष्ट ज्ञान न था कि पत्नी तो केवल सहधर्मिणी, सहचारिणी और सुख-दुख की साथिन है। मै यह समझकर बर्ताव करता था कि पत्नी विषय-भोग की भाजन है, उसका जन्म पति की हर तरह आज्ञाओ का पालन करने के लिए हुआ है ।

किंतु १९०० ई० से मेरे इन विचारो में गहरा परिवर्तन हुआ । १९०६ मे उसका परिणाम प्रकट हुआ, परतु इसका वर्णन आगे प्रसग आने पर होगा। यहा तो सिर्फ इतना बताना काफी है। कि ज्यो- ज्यो मै निर्विकार होता गया त्यो त्यो मेरा घर - ससार शात, निर्मल और सुखी होता गया । "

बा का जबरदस्त गुण महज अपनी इच्छा से मुझमे समा जाने का था। यह कुछ मेरे आग्रह से नही हुआ था। लेकिन समय पाकर Th अदर ही इस गुण का विकास हो गया था। मैं नही जानता था for a यह गुण छिपा हुआ था। मेरे शुरू-शुरू के अनुभव के अनु- सार बा बहुत हठीली थी । मेरे दबाव डालने पर भी वह अपना चाहा ही करती । इसके कारण हमारे बी व थोडे समय की या लबी. कडवाहट भी रहती, लेकिन जैसे-जैसे मेरा सार्वजनिक जीवन उज्ज्वल बनता गया, वैसे-वैसे बा खिलती गई और पुख्ता विचारो के साथ मुझमे यानी मेरे काम मे समाती गई । जैसे दिन बीतते गये, मुझमे और मेरे काम मे - सेवा मे -- भेद न रह गया । बा धीमे-धीमे उसमे तदाकार होने लगी । शायद हिदुस्तान की भूमि को यह गुण अधिक-से-अधिक प्रिय है । कुछ भी हो, मुझे तो Tata भावना का यह मुख्य कारण मालूम होता है ।

बा मे यह गुण पराकाष्ठा को पहुचा, इसका कारण हमारा ब्रह्मचर्य था । मेरी अपेक्षा बा के लिए वह बहुत ज्यादा स्वाभाविक सिद्ध हुआ। शुरू मे बा को इसका कोई ज्ञान भी न था । मैंने विचार किया और बा ने उसको उठाकर अपना बना लिया । परिणाम- स्वरूप हमारा सबंध सच्चे मित्र का बना । मेरे साथ रहने मे बा के लिए सन् १९०६ से, असल मे सन् १९०१ से, मेरे काम मे शरीक हो जाने के सिवा या उससे भिन्न और कुछ रह ही नही गया था । वह अलग रह नही सकती थीं । अलग रहने में उन्हें कोई दिक्कत न होती, लेकिन उन्होने मित्र बनने पर भी स्त्री के नाते और पत्नी के नाते मेरे काम मे समा जाने में ही अपना धर्म माना। इसमे बा ने निजी सेवाको अनिवार्य स्थान दिया । इसलिए मरते दम तक उन्होने मेरी सुविधा की देखरेख का काम छोडा ही नही ।

अगर में अपनी पत्नी के बारे मे अपने प्रेम और अपनी भावना का वर्णन कर सकू तो हिदूधर्म के बारे मे अपने प्रेम और अपनी भावनाओ को मै प्रकट कर सकता हू । दुनिया की दूसरी किसी भी स्त्री के मुकाबिले मे मेरी पत्नी मुझपर ज्यादा असर डालती है ।"

यद्यपि अपनी मृत्यु के कारण वह सतत वेदना से छूट गई है, इसलिए उनकी दृष्टि से मैने उनकी मौत का स्वागत किया है, तो भी इस क्षति से मुझको जितना दु ख होने की कल्पना मैने की थी उससे अधिक दु ख हुआ है । हम असाधारण दपती थे । १९०६ मे एक दूसरे की स्वीकृति से और अनजानी आजमाइश के बाद हमने आत्म-सयम के नियम को निश्चित रूप से स्वीकार किया था। इसके परिणामस्वरूप हमारी गाठ पहले से कही ज्यादा मजबूत बनी और मुझे उससे बहुत आनद हुआ। हम दो भिन्न व्यक्ति नही रह गये । मेरी वैसी कोई अच्छा नही थी, तो भी उन्होने मुझमे लीन होना पसंद किया । फलत वह सचमुच ही मेरी अर्धागिनी बनी । वह हमेशा से बहुत दृढ इच्छा शक्तिवाली स्त्री थी, जिनको अपनी नवविवाहित दशा मे मै भूल से हठीली माना करता था, लेकिन अपनी दृढ इच्छा शक्ति के कारण वह अनजाने ही अहिसक अस- योग की कला के आचरण मे मेरी गुरु बन गई । आचरण का आरभ मेरे अपने परिवार से ही किया । १९०६ मे जब मैने उसे राजनीति के क्षेत्र में दाखिल किया तब उसका अधिक विशाल और विशेष रूप से योजित 'सत्याग्रह' नाम पडा । दक्षिण अफ्रीका में जब हिदु- स्तानियो की जेल यात्रा शुरू हुई तब बा भी सत्याग्रहियो मे एक थी । मेरे मुकाबिले शारीरिक पीडा उनको ज्यादा हुई। वह कई बार जेल जा चुकी थी, फिर भी इस बार के इस कैद- खाने मे, जिसमे सभी तरह की सहूलियते मौजूद थी, उनको अच्छा नही लगा । दूसरे बहुतो के साथ मेरी और फिर तुरत ही उनकी जो गिरफ्तारी हुई, उससे उन्हें जोर का आघात पहुचा और उनका मन खट्टा हो गया। वह मेरी गिरफ्तारी के लिए बिल्कुल तैयार नही थी। मैने उन्हे विश्वास दिलाया था कि सरकार को मेरी अहिसा पर भरोसा है और जबतक मै खुद गिरफ्तार होना न चाहूं वह मुझे पकडेगी नही । सचमुच उनके ज्ञानततुओ को इतने जोर का धक्का बैठा कि उनकी गिरफ्तारी के बाद उन्हे दस्त की सख्त शिकायत हो गई । अगर उस समय डा० सुशीला नैयर ने, जो उनके साथ ही पकड़ी गईं थी, उनका इलाज न किया होता तो मुझसे इस जेल मे आकर मिलने से पहले ही उनकी देह छूट चुकी होती । मेरी हाजिरी से उन्हे आश्वासन मिला और बिना किसी खास इलाज के दस्त की शिकायत दूर हो गई । लेकिन मन जो खट्टा हुआ था, सो खट्टा ही बना रहा। इसकी वजह से उनके स्वभाव. मे चिड़चिड़ापन आ गया और इसीका नतीजा था कि आखिर कष्ट सहते-सहत क्रम-क्रम से उनका देहपात हुआ ।"

उनमे एक गुण बहुत बड़ा था । हर एक हिदू-पत्नी मे वह कमोबेश होता ही है । इच्छा से या अनिच्छा से अथवा जाने-अन- जाने भी वह मेरे पदचिह्नों पर चलने मे धन्यता अनुभव करती थी ।

.....

अगरचे में चाहता था कि उस तीव्र वेदना से उन्हे छुटकारा मिले और जल्दी ही उनकी देह का अत हो जाय तो भी आज उनकी कमी को जितना मैने माना था, उससे कही अधिक मै महसूस कर रहा हूं । हम असाधारण दंपती थे - अनोखे । हमारा जीवन सतोषी, सुखी और सदा ऊर्ध्वगामी था । "

प्रभा मिश्रा 'नूतन'

प्रभा मिश्रा 'नूतन'

बहुत सारगर्भित लेख लिखा है आपने 👍🙏🙏

16 अगस्त 2023

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रचनाएँ
देश सेवकों के संस्मरण
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देश सेवकों के संस्कार कई भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों के जीवन और कार्य के बारे में निबंधों का एक संग्रह है। निबंध स्वतंत्रता सेनानियों के साथ प्रभाकर की व्यक्तिगत बातचीत और उनके जीवन और कार्य पर उनके शोध पर आधारित हैं। देश सेवकों के संस्कार में निबंधों को कालानुक्रमिक रूप से व्यवस्थित किया गया है, जो भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के शुरुआती दिनों से शुरू होकर महात्मा गांधी की हत्या तक समाप्त होता है। निबंधों में असहयोग आंदोलन, भारत छोड़ो आंदोलन और नमक सत्याग्रह सहित कई विषयों को शामिल किया गया है। देश सेवकों के संस्कार में प्रत्येक निबंध भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन पर एक अद्वितीय और व्यक्तिगत दृष्टिकोण प्रदान करता है। प्रभाकर के निबंध केवल ऐतिहासिक वृत्तांत नहीं हैं, बल्कि साहित्य की कृतियाँ भी हैं जो उस समय की भावना और स्वतंत्रता सेनानियों द्वारा किए गए बलिदानों को दर्शाती हैं। देश सेवकों के संस्कार भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन पर साहित्य में एक महत्वपूर्ण और मूल्यवान रचना है।
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अध्याय 1: हकीम अजमल खां

15 अगस्त 2023
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एक जमाना था, शायद सन् ' १५ की साल में, जब मै दिल्ली आया था, हकीम अजमल खां साहब से मिला और डाक्टर अंसारी से | मुझसे कहा गया कि हमारे दिल्ली के बादशाह अंग्रेज नही है, बल्कि ये हकीम साहब है । डाक्टर असार

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अध्याय 2: डा० मुख्तार अहमद अंसारी

15 अगस्त 2023
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डा० असारी जितने अच्छे मुसलमान है, उतने ही अच्छे भारतीय भी है । उनमे धर्मोन्माद की तो किसीने शंका ही नही की है। वर्षों तक वह एक साथ महासभा के सहमंत्री रहे है। एकता के लिए किये गये उनके प्रयत्नो को तो

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अध्याय 3: बी अम्मा

15 अगस्त 2023
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यह मानना मश्किल है कि बी अम्मा का देहात हो गया है। अम्मा की उस राजसी मूर्ति को या सार्वजनिक सभाओं में उन- की बुलंद आवाज को कौन नही जानता । बुढापा होते हुए भी उन- में एक नवयुवक की शक्ति थी । खिलाफत और

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अध्याय 4: धर्मानंद कौसंबी

15 अगस्त 2023
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शायद आपने उनका नाम नही सुना होगा । इसलिए शायद आप दुख मानना नही चाहेगे । वैसे किसी मृत्यु पर हमे दुख मानना चाहिए भी नही, लेकिन इसान का स्वभाव है कि वह अपने स्नेही या पूज्य के मरने पर दुख मानता ही है।

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अध्याय 5: कस्तूरबा गांधी

15 अगस्त 2023
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तेरह वर्ष की उम्र मे मेरा विवाह हो गया। दो मासूम बच्चे अनजाने ससार-सागर में कूद पडे। हम दोनो एक-दूसरे से डरते थे, ऐसा खयाल आता है। एक-दूसरे से शरमाते तो थे ही । धीरे-धीरे हम एक-दूसरे को पहचानने लगे।

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अध्याय 6: मगनलाल खुशालचंद गांधी

15 अगस्त 2023
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मेरे चाचा के पोते मगनलाल खुशालचंद गांधी मेरे कामों मे मेरे साथ सन् १९०४ से ही थे । मगनलाल के पिता ने अपने सभी पुत्रो को देश के काम में दे दिया है। वह इस महीने के शुरू में सेठ जमनालालजी तथा दूसरे मित

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अध्याय 7: गोपालकृष्ण गोखले

15 अगस्त 2023
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गुरु के विषय मे शिष्य क्या लिखे । उसका लिखना एक प्रकार की धृष्टता मात्र है। सच्चा शिष्य वही है जो गुरु मे अपने- को लीन कर दे, अर्थात् वह टीकाकार हो ही नही सकता । जो भक्ति दोष देखती हो वह सच्ची भक्ति

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अध्याय 8: घोषालबाबू

15 अगस्त 2023
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ग्रेस के अधिवेशन को एक-दो दिन की देर थी । मैने निश्चय किया था कि काग्रेस के दफ्तर में यदि मेरी सेवा स्वीकार हो तो कुछ सेवा करके अनुभव प्राप्त करू । जिस दिन हम आये उसी दिन नहा-धोकर मै काग्रेस के दफ्तर

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अध्याय 9: अमृतलाल वि० ठक्कर

15 अगस्त 2023
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ठक्करबापा आगामी २७ नवबर को ७० वर्ष के हो जायगे । बापा हरिजनो के पिता है और आदिवासियो और उन सबके भी, जो लगभग हरिजनो की ही कोटि के है और जिनकी गणना अर्द्ध- सभ्य जातियों में की जाती है। दिल्ली के हरिजन

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अध्याय 10: द्रनाथ ठाकुर

15 अगस्त 2023
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लार्ड हार्डिज ने डाक्टर रवीद्रनाथ ठाकुर को एशिया के महाकवि की पदवी दी थी, पर अब रवीद्रबाबू न सिर्फ एशिया के बल्कि ससार भर के महाकवि गिने जा रहे है । उनके हाथ से भारतवर्ष की सबसे बडी सेवा यह हुई है कि

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अध्याय 11: लोकमान्य तिलक

16 अगस्त 2023
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लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक अब ससार मे नही है । यह विश्वास करना कठिन मालूम होता है कि वह ससार से उठ गये । हम लोगो के समय मे ऐसा दूसरा कोई नही, जिसका जनता पर लोकमान्य के जैसा प्रभाव हो । हजारो देशवासियो क

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अध्याय 12: अब्बास तैयबजी

16 अगस्त 2023
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सबसे पहले सन् १९१५ मे मै अब्बास तैयबजी से मिला था । जहा की मै गया, तैयबजी - परिवार का कोई-न-कोई स्त्री-पुरुष मुझसे आकर जरूर मिला । ऐसा मालूम पडता है, मानो इस महान् और चारो तरफ फैले हुए परिवार ने यह

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अध्याय 13: देशबंधु चित्तरंजन दास

16 अगस्त 2023
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देशबंधु दास एक महान् पुरुष थे। मैं गत छ वर्षो से उन्हें जानता हू । कुछ ही दिन पहले जब में दार्जिलिंग से उनसे विदा हुआ था तब मैने एक मित्र से कहा था कि जितनी ही घनिष्ठता उनसे बढती है उतना ही उनके प्र

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अध्याय 14: महादेव देसाई

16 अगस्त 2023
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महादेव की अकस्मात् मृत्यु हो गई । पहले जरा भी पता नही चला। रात अच्छी तरह सोये । नाश्ता किया। मेरे साथ टहले । सुशीला ' और जेल के डाक्टरो ने, जो कुछ कर सकते थे, किया लेकिन ईश्वर की मर्जी कुछ और थी ।

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अध्याय 15: सरोजिनी नायडू

16 अगस्त 2023
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सरोजिनी देवी आगामी वर्ष के लिए महासभा की सभा - नेत्री निर्वाचित हो गई । यह सम्मान उनको पिछले वर्ष ही दिया जानेवाला था । बडी योग्यता द्वारा उन्होने यह सम्मान प्राप्त किया है । उनकी असीम शक्ति के लिए और

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अध्याय 16: मोतीलाल नेहरू

16 अगस्त 2023
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महासभा का सभापतित्व अब फूलो का कोमल ताज नही रह गया है। फूल के दल तो दिनो-दिन गिरते जाते है और काटे उघड जाते है । अब इस काटो के ताज को कौन धारण करेगा ? बाप या बेटा ? सैकडो लडाइयो के लडाका पडित मोतीलाल

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अध्याय 17: वल्लभभाई पटेल

16 अगस्त 2023
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सरदार वल्लभभाई पटेल के साथ रहना मेरा बडा सौभाग्य 'था । उनकी अनुपम वीरता से मैं अच्छी तरह परिचित था, परतु पिछले १६ महीने मे जिस प्रकार रहा, वैसा सौभाग्य मुझे कभी नही मिला था । जिस प्रकार उन्होने मुझे स

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अध्याय 18: जमनालाल बजाज

16 अगस्त 2023
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सेठ जमनालाल बजाज को छीनकर काल ने हमारे बीच से एक शक्तिशाली व्यक्ति को छीन लिया है। जब-जब मैने धनवानो के लिए यह लिखा कि वे लोककल्याण की दृष्टि से अपने धन के ट्रस्टी बन जाय तब-तब मेरे सामने सदा ही इस वण

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अध्याय 19: सुभाषचंद्र बोस

16 अगस्त 2023
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नेताजी के जीवन से जो सबसे बड़ी शिक्षा ली जा सकती है वह है उनकी अपने अनुयायियो मे ऐक्यभावना की प्रेरणाविधि, जिससे कि वे सब साप्रदायिक तथा प्रातीय बधनो से मुक्त रह सके और एक समान उद्देश्य के लिए अपना रक

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अध्याय 20: मदनमोहन मालवीय

16 अगस्त 2023
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जब से १९१५ मे हिदुस्तान आया तब से मेरा मालवीयजी के साथ बहुत समागम है और में उन्हें अच्छी तरह जानता हू । मेरा उनके साथ गहरा परिचय रहता है । उन्हें मैं हिंदू-संसार के श्रेष्ठ व्यक्तियो मे मानता हूं । क

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अध्याय 21: श्रीमद् राजचंद्रभाई

16 अगस्त 2023
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में जिनके पवित्र सस्मरण लिखना आरंभ करता हूं, उन स्वर्गीय राजचद्र की आज जन्मतिथि है । कार्तिक पूर्णिमा संवत् १९७९ को उनका जन्म हुआ था । मेरे जीवन पर श्रीमद्राजचद्र भाई का ऐसा स्थायी प्रभाव पडा है कि

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अध्याय 22: आचार्य सुशील रुद्र

16 अगस्त 2023
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आचार्य सुशील रुद्र का देहात ३० जून, १९२५ को होगया । वह मेरे एक आदरणीय मित्र और खामोश समाज सेवी थे। उनकी मृत्यु से मुझे जो दुख हुआ है उसमे पाठक मेरा साथ दे | भारत की मुख्य बीमारी है राजनैतिक गुलामी |

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अध्याय 23: लाला लाजपतराय

16 अगस्त 2023
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लाला लाजपतराय को गिरफ्तार क्या किया, सरकार ने हमारे एक बड़े-से-बडे मुखिया को पकड़ लिया है। उसका नाम भारत के बच्चे-बच्चे की जबान पर है । अपने स्वार्थ-त्याग के कारण वह अपने देश भाइयो के हृदय में उच्च स्

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अध्याय 24: वासंती देवी

16 अगस्त 2023
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कुछ वर्ष पूर्व मैने स्वर्गीय रमाबाई रानडे के दर्शन का वर्णन किया था । मैने आदर्श विधवा के रूप मे उनका परिचय दिया था । इस समय मेरे भाग्य मे एक महान् वीर की विधवा के वैधव्य के आरभ का चित्र उपस्थित करना

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अध्याय 25: स्वामी श्रद्धानंद

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जिसकी उम्मीद थी वह ही गुजरा। कोई छ महीने हुए स्वामी श्रद्धानदजी सत्याग्रहाश्रम में आकर दो-एक दिन ठहरे थे । बातचीत में उन्होने मुझसे कहा था कि उनके पास जब-तब ऐसे पत्र आया करते थे जिनमे उन्हें मार डालन

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अध्याय 26: श्रीनिवास शास्त्री

16 अगस्त 2023
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दक्षिण अफ्रीका - निवासी भारतीयो को यह सुनकर बडी तसल्ली होगी कि माननीय शास्त्री ने पहला भारतीय राजदूत बनकर अफ्रीका में रहना स्वीकार कर लिया है, बशर्ते कि सरकार वह स्थान ग्रहण करने के प्रस्ताव को आखिरी

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अध्याय 27: नारायण हेमचंद्र

16 अगस्त 2023
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स्वर्गीय नारायण हेमचन्द्र विलायत आये थे । मै सुन चुका था कि वह एक अच्छे लेखक है। नेशनल इडियन एसो - सिएशनवाली मिस मैंनिग के यहा उनसे मिला | मिस गजानती थी कि सबसे हिल-मिल जाना मैं नही जानता । जब कभी मै

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