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अध्याय 18: जमनालाल बजाज

16 अगस्त 2023

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सेठ जमनालाल बजाज को छीनकर काल ने हमारे बीच से एक शक्तिशाली व्यक्ति को छीन लिया है। जब-जब मैने धनवानो के लिए यह लिखा कि वे लोककल्याण की दृष्टि से अपने धन के ट्रस्टी बन जाय तब-तब मेरे सामने सदा ही इस वणिक् शिरोमणि • का उदाहरण मुख्य रहा। अगर वह अपनी सपत्ति के आदर्श ट्रस्टी नही बन पाये तो इसमे दोष उनका नही था । मैने जानबूझकर उनको रोका | मै नही चाहता था कि वे उत्साह में आकर ऐसा कोई काम कर ले, जिसके लिए बाद मे शात मन से सोचने पर उन्हें पछताना पडे । उनकी सादगी तो उनकी अपनी ही चीज थी। अपने लिए उन्होने जितने भी घर बनाये, वे उनके घर नही रहे, धर्म- शाला बन गये । सत्याग्रही के नाते उनका दान सर्वोत्तम रहा । राजनैतिक प्रश्नो की चर्चा में वह अपनी राय दृढतापूर्वक व्यक्त करते थे। उनके निर्णय पक्के हुआ करते थे । त्याग की दृष्टि से उनका अतिम कार्य सर्वश्रेष्ठ रहा । वह किसी ऐसे रचनात्मक काम मे लग जाना चाहते थे, जिसमे वह अपनी पूरी योग्यता के साथ अपने जीवन का शेष भाग तन्मय होकर बिता सके। देश के पशु- धन की रक्षा का काम उन्होने अपने लिए चुना था और गाय को उसका प्रतीक माना था । इस काम में वह इतनी एकाग्रता और लगन के साथ जुट गये थे कि जिसकी कोई मिसाल नही । उनकी उदारता मे जाति, धर्म या वर्ण की सकुचितता को कोई स्थान न था। वह एक ऐसी साधना मे लगे हुए थे, जो कामकाजी आदमी के लिए विरल है । 

विचार-सयम उनकी एक बडी साधना थी । वह सदा ही अपनेको तस्कर विचारो से बचाने की कोशिश मे रहते थे । उनके अवसान से वसुधरा का एक रत्न कम हो गया है । उन- को खोकर देश ने अपना एक वीर-से-वीर सेवक खोया है । जिस कार्य के लिए उन्होने अपना शेष जीवन समर्पित कर दिया था, उसे अब उनकी विधवा जानकीदेवी ने स्वय करने का निश्चय किया है। उन्होने अपनी समस्त निजी सपत्ति को, जो करीब ढाई लाख के आस-पास है, कृष्णार्पण कर दिया है। ईश्वर उन्हे अपने इस अगीकृत कार्य मे सफल होने की शक्ति दे । १

मेरे साथ जमनालालजी का सबध करीब-करीब तभी से - शुरू हुआ जब से मैने हिदुस्तान के सार्वजनिक जीवन मे प्रवेश किया। उन्होने मेरे सभी कामो को पूरी तरह अपना लिया था, यहा तक कि मुझे कुछ करना ही नही पडता था । ज्योही में किसी नये काम को शुरू करत वह उसका बोझ खुद उठा लेते थे । इस तरह मुझे निश्चित कर देना मानो उनका जीवन-कार्य ही बन गया था। ..

११ फरवरी को जब मै जमनालालजी के द्वार पर पहुचा तो उनका देहात हो चुका था। मेरे पास वर्धा से सदेश तो सिर्फ यही आया था कि खून का दौरा कम करने की दवा भेजे। मै दवा भेज- कर अपने दिल की तसल्ली कर सकता था । लेकिन उस दिन मैंने महसूस किया कि नही, मुझे खुद ही जाना चाहिए । जब वहा पहुचा तो मामला कुछ और ही पाया।

जमनालालजी तो बडभागी थे । उनकी तरह हम भी अपने hot asभागी साबित कर सकते है, बशर्ते कि जो चीज उनके रहते हमे साफ नही दिखाई दी वह उनके बाद हमे साफ दिखाई देने लगे, जो जाग्रति हममे उनके जीवित रहते नही आई वह अब सब में आ जाय ।

उनका सबसे बडा काम गोसेवा का था। वैसे तो यह काम पहले भी चलता था, लेकिन धीमी चाल से । इसमे उन्हें सतोष न था । उन्होने इसे तीव्र गति से चलाना चाहा और इतनी तीव्रता से चलाया कि खुद ही चल बसे ।

खादी के काम में उनकी दिलचस्पी मुझसे कम न थी । खादी के लिए जितना समय मैने दिया उतना ही उन्होने भी दिया । उन्होने इस काम के पीछे मुझसे कम बुद्धि खर्च नही की थी। इस- लिए कार्यकर्ता भी वह ही ढूंढ-ढूंढकर मेरे पास लाया करते थे । •थोड़े मे यह कह लीजिय कि अगर मैने खादी का मत्र दिया तो जमनालालजी ने उसको मूर्त रूप दिया । खादी का काम कुछ होने के बाद मै तो जेल में जा बैठा, मगर वह जानते थे कि मेरे नजदीक खादी ही मे स्वराज्य है । अगर उन्होने तुरत ही उसमे रत होकर उसे संगठित रूप न दिया होता तो मेरी गैरहाजिरी मे सारा काम तीन-तेरह हो जाता ।

tara ग्रामोद्योग की थी। उन्होने इसके लिए मगनवाड़ी ही थी, साथ ही उसके सामने की कुछ जमीन भी वह मगनवाड़ी के लिए खरीदने का सकल्प कर चुके थे। अब चि० कमलनयन' ने वह जमीन भी मगनवाडी को दे दी है । ग्रामोद्योग का काम इतना व्यापक है कि इसमे अटूट रुपया खर्च किया जा सकता है। ...

...

एक बात और जमनालालजी कई बार कहा करते थे कि लोग और सब जगह तो खादी पहनकर चले जाते है, लेकिन बैक नही जाते । अगर बैक में वह अपनी मारवाड़ी पगडी पहनकर न जाय तो उनके खयाल में इसमें उनकी प्रतिष्ठा की हानि होती है । मगर खुद जमनालालजी ने कभी इसकी कोई चर्चा नही की ।  फिर उसका नतीजा कुछ भी क्यों न हुआ हो । अत मै यह चाहता हू कि हममे इतनी स्वतंत्रता और इतना आत्म गौरव पैदा हो जाना चाहिए कि हम अपनी खादी की पोशाक में हर जगह बिना झिझक के जा सके ।

अबतक इस देश की आजादी को खोने में व्यापारी - समाज की खास जिम्मेदारी रही है । जमनालालजी को यह चीज बराबर खटका करती थी ।

जमनालालजी का स्मृति - स्तभ खडा करके हम उनकी याद को चिरस्थायी नही बना सकते । स्तभ पर खुदे हुए शिला - लेख को तो लोग पढकर थोडे ही समय मे भुल जायगे, परतु जिस आदमी ने दुनिया के लिए इतना कुछ किया है उसके काम को चिर- स्थायी रखने का सकल्प कोई कर ले तो वह उनका सच्चा स्मारक हो रहेगा । कितु इसके लिए मै जबरदस्ती नही करना चाहता । जिसे जो कुछ भी करना हो आत्मोन्नति के लिए करे । अगर स, इसी खयाल से महिला आश्रम की स्थापना हुई । आज इस आश्रम के लिए एक त्यागी और सुशिक्षित महिला की आवश्यकता है । आप इस आवश्यकता की पूर्ति में सहायक हो सकते है । बुनियादी तालीम और हरिजन सेवक संघ के काम का

यही हाल है । आप इनमें शरीक हो सकते है । हिदू-मुस्लिम- एकता के लिए उनके दिल मे खास लगन थी । उनके अदर सांप्र- दायिक द्वेष की बू तक न थी। आप उनके जीवन से इस गुण को ग्रहण कर सकते है |

जमनालालजी का स्मृति - स्तभ खडा करके हम उनकी याद को चिरस्थायी नही बना सकते । स्तभ पर खुदे हुए शिला - लेख को तो लोग पढकर थोडे ही समय मे भुल जायगे, परतु जिस आदमी ने दुनिया के लिए इतना कुछ किया है उसके काम को चिर- स्थायी रखने का सकल्प कोई कर ले तो वह उनका सच्चा स्मारक हो रहेगा । कितु इसके लिए मै जबरदस्ती नही करना चाहता । जिसे जो कुछ भी करना हो आत्मोन्नति के लिए करे । अगर  दिखावे के लिए कुछ भी होगा तो उससे मुझे और जमनालालजी की आत्मा को उल्टा कष्ट ही होगा । 

जमनालाल का शरीर मर गया, पर असल जमनालाल तो जिदा ही है और आगे के लिए उसे जिदा रखना हमारा काम है । "

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रचनाएँ
देश सेवकों के संस्मरण
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देश सेवकों के संस्कार कई भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों के जीवन और कार्य के बारे में निबंधों का एक संग्रह है। निबंध स्वतंत्रता सेनानियों के साथ प्रभाकर की व्यक्तिगत बातचीत और उनके जीवन और कार्य पर उनके शोध पर आधारित हैं। देश सेवकों के संस्कार में निबंधों को कालानुक्रमिक रूप से व्यवस्थित किया गया है, जो भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के शुरुआती दिनों से शुरू होकर महात्मा गांधी की हत्या तक समाप्त होता है। निबंधों में असहयोग आंदोलन, भारत छोड़ो आंदोलन और नमक सत्याग्रह सहित कई विषयों को शामिल किया गया है। देश सेवकों के संस्कार में प्रत्येक निबंध भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन पर एक अद्वितीय और व्यक्तिगत दृष्टिकोण प्रदान करता है। प्रभाकर के निबंध केवल ऐतिहासिक वृत्तांत नहीं हैं, बल्कि साहित्य की कृतियाँ भी हैं जो उस समय की भावना और स्वतंत्रता सेनानियों द्वारा किए गए बलिदानों को दर्शाती हैं। देश सेवकों के संस्कार भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन पर साहित्य में एक महत्वपूर्ण और मूल्यवान रचना है।
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अध्याय 1: हकीम अजमल खां

15 अगस्त 2023
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एक जमाना था, शायद सन् ' १५ की साल में, जब मै दिल्ली आया था, हकीम अजमल खां साहब से मिला और डाक्टर अंसारी से | मुझसे कहा गया कि हमारे दिल्ली के बादशाह अंग्रेज नही है, बल्कि ये हकीम साहब है । डाक्टर असार

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अध्याय 2: डा० मुख्तार अहमद अंसारी

15 अगस्त 2023
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डा० असारी जितने अच्छे मुसलमान है, उतने ही अच्छे भारतीय भी है । उनमे धर्मोन्माद की तो किसीने शंका ही नही की है। वर्षों तक वह एक साथ महासभा के सहमंत्री रहे है। एकता के लिए किये गये उनके प्रयत्नो को तो

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अध्याय 3: बी अम्मा

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यह मानना मश्किल है कि बी अम्मा का देहात हो गया है। अम्मा की उस राजसी मूर्ति को या सार्वजनिक सभाओं में उन- की बुलंद आवाज को कौन नही जानता । बुढापा होते हुए भी उन- में एक नवयुवक की शक्ति थी । खिलाफत और

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अध्याय 4: धर्मानंद कौसंबी

15 अगस्त 2023
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शायद आपने उनका नाम नही सुना होगा । इसलिए शायद आप दुख मानना नही चाहेगे । वैसे किसी मृत्यु पर हमे दुख मानना चाहिए भी नही, लेकिन इसान का स्वभाव है कि वह अपने स्नेही या पूज्य के मरने पर दुख मानता ही है।

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अध्याय 5: कस्तूरबा गांधी

15 अगस्त 2023
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तेरह वर्ष की उम्र मे मेरा विवाह हो गया। दो मासूम बच्चे अनजाने ससार-सागर में कूद पडे। हम दोनो एक-दूसरे से डरते थे, ऐसा खयाल आता है। एक-दूसरे से शरमाते तो थे ही । धीरे-धीरे हम एक-दूसरे को पहचानने लगे।

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अध्याय 6: मगनलाल खुशालचंद गांधी

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मेरे चाचा के पोते मगनलाल खुशालचंद गांधी मेरे कामों मे मेरे साथ सन् १९०४ से ही थे । मगनलाल के पिता ने अपने सभी पुत्रो को देश के काम में दे दिया है। वह इस महीने के शुरू में सेठ जमनालालजी तथा दूसरे मित

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अध्याय 7: गोपालकृष्ण गोखले

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गुरु के विषय मे शिष्य क्या लिखे । उसका लिखना एक प्रकार की धृष्टता मात्र है। सच्चा शिष्य वही है जो गुरु मे अपने- को लीन कर दे, अर्थात् वह टीकाकार हो ही नही सकता । जो भक्ति दोष देखती हो वह सच्ची भक्ति

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अध्याय 8: घोषालबाबू

15 अगस्त 2023
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ग्रेस के अधिवेशन को एक-दो दिन की देर थी । मैने निश्चय किया था कि काग्रेस के दफ्तर में यदि मेरी सेवा स्वीकार हो तो कुछ सेवा करके अनुभव प्राप्त करू । जिस दिन हम आये उसी दिन नहा-धोकर मै काग्रेस के दफ्तर

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अध्याय 9: अमृतलाल वि० ठक्कर

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ठक्करबापा आगामी २७ नवबर को ७० वर्ष के हो जायगे । बापा हरिजनो के पिता है और आदिवासियो और उन सबके भी, जो लगभग हरिजनो की ही कोटि के है और जिनकी गणना अर्द्ध- सभ्य जातियों में की जाती है। दिल्ली के हरिजन

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लार्ड हार्डिज ने डाक्टर रवीद्रनाथ ठाकुर को एशिया के महाकवि की पदवी दी थी, पर अब रवीद्रबाबू न सिर्फ एशिया के बल्कि ससार भर के महाकवि गिने जा रहे है । उनके हाथ से भारतवर्ष की सबसे बडी सेवा यह हुई है कि

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अध्याय 11: लोकमान्य तिलक

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लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक अब ससार मे नही है । यह विश्वास करना कठिन मालूम होता है कि वह ससार से उठ गये । हम लोगो के समय मे ऐसा दूसरा कोई नही, जिसका जनता पर लोकमान्य के जैसा प्रभाव हो । हजारो देशवासियो क

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अध्याय 12: अब्बास तैयबजी

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सबसे पहले सन् १९१५ मे मै अब्बास तैयबजी से मिला था । जहा की मै गया, तैयबजी - परिवार का कोई-न-कोई स्त्री-पुरुष मुझसे आकर जरूर मिला । ऐसा मालूम पडता है, मानो इस महान् और चारो तरफ फैले हुए परिवार ने यह

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अध्याय 13: देशबंधु चित्तरंजन दास

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देशबंधु दास एक महान् पुरुष थे। मैं गत छ वर्षो से उन्हें जानता हू । कुछ ही दिन पहले जब में दार्जिलिंग से उनसे विदा हुआ था तब मैने एक मित्र से कहा था कि जितनी ही घनिष्ठता उनसे बढती है उतना ही उनके प्र

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अध्याय 14: महादेव देसाई

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महादेव की अकस्मात् मृत्यु हो गई । पहले जरा भी पता नही चला। रात अच्छी तरह सोये । नाश्ता किया। मेरे साथ टहले । सुशीला ' और जेल के डाक्टरो ने, जो कुछ कर सकते थे, किया लेकिन ईश्वर की मर्जी कुछ और थी ।

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अध्याय 15: सरोजिनी नायडू

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सरोजिनी देवी आगामी वर्ष के लिए महासभा की सभा - नेत्री निर्वाचित हो गई । यह सम्मान उनको पिछले वर्ष ही दिया जानेवाला था । बडी योग्यता द्वारा उन्होने यह सम्मान प्राप्त किया है । उनकी असीम शक्ति के लिए और

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अध्याय 16: मोतीलाल नेहरू

16 अगस्त 2023
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महासभा का सभापतित्व अब फूलो का कोमल ताज नही रह गया है। फूल के दल तो दिनो-दिन गिरते जाते है और काटे उघड जाते है । अब इस काटो के ताज को कौन धारण करेगा ? बाप या बेटा ? सैकडो लडाइयो के लडाका पडित मोतीलाल

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अध्याय 17: वल्लभभाई पटेल

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सरदार वल्लभभाई पटेल के साथ रहना मेरा बडा सौभाग्य 'था । उनकी अनुपम वीरता से मैं अच्छी तरह परिचित था, परतु पिछले १६ महीने मे जिस प्रकार रहा, वैसा सौभाग्य मुझे कभी नही मिला था । जिस प्रकार उन्होने मुझे स

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अध्याय 18: जमनालाल बजाज

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सेठ जमनालाल बजाज को छीनकर काल ने हमारे बीच से एक शक्तिशाली व्यक्ति को छीन लिया है। जब-जब मैने धनवानो के लिए यह लिखा कि वे लोककल्याण की दृष्टि से अपने धन के ट्रस्टी बन जाय तब-तब मेरे सामने सदा ही इस वण

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अध्याय 19: सुभाषचंद्र बोस

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नेताजी के जीवन से जो सबसे बड़ी शिक्षा ली जा सकती है वह है उनकी अपने अनुयायियो मे ऐक्यभावना की प्रेरणाविधि, जिससे कि वे सब साप्रदायिक तथा प्रातीय बधनो से मुक्त रह सके और एक समान उद्देश्य के लिए अपना रक

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अध्याय 20: मदनमोहन मालवीय

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जब से १९१५ मे हिदुस्तान आया तब से मेरा मालवीयजी के साथ बहुत समागम है और में उन्हें अच्छी तरह जानता हू । मेरा उनके साथ गहरा परिचय रहता है । उन्हें मैं हिंदू-संसार के श्रेष्ठ व्यक्तियो मे मानता हूं । क

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अध्याय 21: श्रीमद् राजचंद्रभाई

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में जिनके पवित्र सस्मरण लिखना आरंभ करता हूं, उन स्वर्गीय राजचद्र की आज जन्मतिथि है । कार्तिक पूर्णिमा संवत् १९७९ को उनका जन्म हुआ था । मेरे जीवन पर श्रीमद्राजचद्र भाई का ऐसा स्थायी प्रभाव पडा है कि

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अध्याय 22: आचार्य सुशील रुद्र

16 अगस्त 2023
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आचार्य सुशील रुद्र का देहात ३० जून, १९२५ को होगया । वह मेरे एक आदरणीय मित्र और खामोश समाज सेवी थे। उनकी मृत्यु से मुझे जो दुख हुआ है उसमे पाठक मेरा साथ दे | भारत की मुख्य बीमारी है राजनैतिक गुलामी |

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अध्याय 23: लाला लाजपतराय

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लाला लाजपतराय को गिरफ्तार क्या किया, सरकार ने हमारे एक बड़े-से-बडे मुखिया को पकड़ लिया है। उसका नाम भारत के बच्चे-बच्चे की जबान पर है । अपने स्वार्थ-त्याग के कारण वह अपने देश भाइयो के हृदय में उच्च स्

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अध्याय 24: वासंती देवी

16 अगस्त 2023
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कुछ वर्ष पूर्व मैने स्वर्गीय रमाबाई रानडे के दर्शन का वर्णन किया था । मैने आदर्श विधवा के रूप मे उनका परिचय दिया था । इस समय मेरे भाग्य मे एक महान् वीर की विधवा के वैधव्य के आरभ का चित्र उपस्थित करना

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अध्याय 25: स्वामी श्रद्धानंद

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जिसकी उम्मीद थी वह ही गुजरा। कोई छ महीने हुए स्वामी श्रद्धानदजी सत्याग्रहाश्रम में आकर दो-एक दिन ठहरे थे । बातचीत में उन्होने मुझसे कहा था कि उनके पास जब-तब ऐसे पत्र आया करते थे जिनमे उन्हें मार डालन

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अध्याय 26: श्रीनिवास शास्त्री

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दक्षिण अफ्रीका - निवासी भारतीयो को यह सुनकर बडी तसल्ली होगी कि माननीय शास्त्री ने पहला भारतीय राजदूत बनकर अफ्रीका में रहना स्वीकार कर लिया है, बशर्ते कि सरकार वह स्थान ग्रहण करने के प्रस्ताव को आखिरी

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अध्याय 27: नारायण हेमचंद्र

16 अगस्त 2023
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स्वर्गीय नारायण हेमचन्द्र विलायत आये थे । मै सुन चुका था कि वह एक अच्छे लेखक है। नेशनल इडियन एसो - सिएशनवाली मिस मैंनिग के यहा उनसे मिला | मिस गजानती थी कि सबसे हिल-मिल जाना मैं नही जानता । जब कभी मै

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