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क्या यही प्यार है?(भाग:-12)

4 जून 2023

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गतांक से आगे:-

सूरजसेन के द्वारा नाम पूछने पर वो लड़की जो अभी तक भेड़िए के डर से उससे ऐसे लिपटी थी जैसे पेड़ पर लता लिपटी हो लेकिन जब उसने नाम पूछा तो वह सुकचाने लगी और बहुत ही धीमे स्वर में कहा
"चंचला"
सूरजसेन तो जैसे उसकी आंखों मे ही खो गया था । बड़ी बड़ी हिरनी सी आंखें थी उसकी ।रंग ऐसा जैसे दूधिया पानी मे केसर का रंग।और जो पहनावा उसने पहन रखा था उसमे वह किसी अप्सरा से कम नही लग रही थी।
सूरजसेन ने पूछा,"तुम अकेली यहां क्या कर रही थी जंगल मे । लड़की जात होकर तुम्हें डर नही लगता अकेले जंगल मे।"
जब उस लड़की ने सूरजसेन की बात सुनी तो तनिक रोष से बोली,"लड़की हुई तो क्या हम जंगल मे अकेले नहीं घुम सकते ।अब इतना भी मत अकड़ो वो तो मेरी कटार पेड़ से फल तोड़ कर जब नीचे उतरी तो गिर गयी थी वरना उस भेड़िए का शिकार तो मै भी कर सकती थी तुमने कोई बड़ा तीर नहीं मारा बाबू। हम बंजारन है ।किसी से नही डरते।"
यह कह कर वो थोड़ा दूर हट कर खड़ी हो गयी।
सूरजसेन उसके मुंह की तरफ देखता ही रह गया उसे ये कहां भान था कि वै क्या बोल रही है बस उसपर तो जैसे उस लड़की चंचला ने जादू सा कर दिया था।
जैसे ही चंचला जाने लगी सूरजसेन को होश आया ओर वह उसके पास दौड़ कर गया और बोला,"तुम्हें अब भी डर नही लगता अगर और भेड़िए ने आक्रमण कर दिया तो।"  
चंचला एक बार तो घबराई फिर बोली,"कोई चिंता नहीं है।" उसने थोड़ी दूरी पर नीचे पड़ी अपनी कटार उठाई और अपने वस्त्रों में छिपा लिया।
इतनी देर मे सूरजसेन को ढूंढते हुए उनके सैनिक आ पहुंचे। सूरजसेन उन्हें देखकर बोला,"मै तुम्हे ऐसे अकेले जंगल मे नही जाने दे सकता ।मेरे सैनिक आ गये है हमे बताओं कहां रहती हो हम तुम्हें छोड़ आते है।"
चंचला एक बार तो सुकचाई पर अगले ही पल बोली,"मेरे लिए तो अच्छी बात है ये ,चलों मुझे क्या।मेरा खेमा यहां से दो कोस की दूरी पर पूरब दिशा में लगा है।"
दोनों एक साथ एक घोड़े पर बैठे ।और सैनिक पीछे पीछे चलने लगे। चंचला को इस प्रकार सूरजसेन के बिल्कुल करीब बैठना मन को भा गया था ।उसका भी ये पहला अवसर था जब वह किसी पुरुष के इतने नजदीक बैठी हो । माना बस्ती मे कालू सारा दिन उसके साथ मस्ती करता था लेकिन उसकी भी इतनी हिम्मत नही थी कि वो उसके पास बैठ पाये। सरदार की बेटी होने का अलग ही रौब था उसका।
रास्ते मे चलते हुए चंचला ने भी पूछ लिया ,"आप कहां के रहने वाले हो बाबू?"
सूरजसेन हंसते हुए बोला ,"मै… मै तो इस रियासत का राजकुमार हूं सूरजसेन।"
चंचला एकदम से हैरान रह गयी वह घबराते हुए बोली,"सरकार हम से गलती है गयी जो हमने आप से ऐसे बात की ।बापू कह रहे थे रियासत के राजा बहुत ही नेक और दयालु है आप उनके पुत्र हो तो आप मे भी उनके गुण..…"चंचला इससे आगे बोल नहीं पाई और उसकी जुबान हलक से ही चिपक गयी।
सूरजसेन हंसते हुए बोला," अब बस करो पहले रौब दिखाती हो और अब मक्खन लगा रही हो।*
इतने मे चंचला का खेमा आ गया ।वह घोड़े से उतर कर खेमे मे चली गयी।
इधर सूरजसेन ने भी अपने घोड़े मोड़ लिए राजमहल की ओर पर…..इस मन का क्या करे जो उस मृगनयनी के साथ ही चला गया था। राजकुमार सूरजसेन को ऐसी बेचैनी कभी नही हुई वह महल की ओर चला जा रहा था पर मन बेचैन होकर बाहर आने को हो रहा था 
बड़ी अजीब स्थिति मे था सूरज दिल मे एक टीस  सी उठ रही थी ऐसा पहली बार हो रहा था उसके साथ ।
महल पहुच कर राजा पदमसेन ने सारी घटना का बयौरा सैनिकों से लिया कि इतनी देरी क्यों हो गयी।
बेटे को कुशल क्षेम देखकर उन्होंने सुख की सांस ली ।सब का लडला था सूरजसेन।
पर राजकुमार सूरज पूरा लोटा ही कहां था महल ।वो तो आधा चंचला के पास ही रह गया था ।बस देह ही राजमहल मे थी।महल आकर वह अपने कक्ष  मे चला गया ना कुछ खाया ना पीया।
मां रूपावती ने भी सोचा हो सकता है थक गया होगा इसलिए अपने कक्ष मे चला गया।
पर राजकुमार की हालत दिन पर दिन खराब होने लगी ।ना वो किसी से बात करता ,ना कुछ खाता पीता बस अपने कमरे मे पड़ा रहता।
एक दिन रानी रूपावती पुत्र की ऐसी हालत देख कर उसके पास गयी ओर पूछा,"पुत्र क्या बात है ? मै देख रही हूं कुछ दिन से तुम ठीक से खा पी नही रहे हो  बस उदास से अपने कमरे मे ही पड़े रहते हो । क्या स्वास्थ ठीक नहीं है ।कहो तो राजवैद्य को बुला लूं।"
राजकुमार सूरज आंखों मे पानी लाकर बोला ,"माता आप को पता है उस दिन मै जब आखेट पर गया था तो मेरी मुलाकात एक बंजारों की कन्या से हुई थी । मां मै उसे पसंद करता हूं और विवाह करना चाहता हूं । मुझे पता है पिता जी कभी राजी नही होगे इस बात के लिए कि राजकुल मे एक बंजारन लड़की बहू बनकर आये।पर मै क्या करूं मां ।"
सूरजसेन एक ही सांस मे सारी बात अपनी मां को बोल गया।वो हमेशा अपने दिल की बात अपनी मां से करता था कोई भी बात वो कभी भी नही छुपाता था।
रूपावती ने जब बेटे के मुंह से ये बात सुनी तो सन्न रह गयी और बोली,"पुत्र ये तुम क्या कह रहे हो तुम्हें पता है तुम्हारे पिताजी उसूलों के कितने पक्के है ।वो कभी ऐसा ना होने देंगे जिससे हमारे खानदान की शान पर बट्टा लगे।"
सूरजसेन बिलख उठा,"पर मै इस दिल का क्या करूं जो मान ही नही रहा । मुझे सब पता है तभी मै सब कुछ अंदर ही अंदर पी रहा हूं।"
मां रूपावती बेटे को ढांढस बंधाकर कुछ उपाय सोचने को बोल कर चली गयी।
इधर चंचला का भी बुरा हाल था ।जब से सूरजसेन जैसे बांके सजीले नौजवान को देखा था बावरी सी हो गयी थी ।वह भगवान गौरी शंकर की अराधना करती थी तो ऐसा ही वर अपनू लिए मांगती थी ।
कबीले की परम्परा के अनुसार उसका विवाह कबीले के सबसे ताकतवर आदमी से होना था जो कालू था क्योंकि वो ही आगे जाकर सरदार बनता ।पर चंचला तो जैसे दीवानी सी हो उठी थी राजकुमार सूरजसेन को देखकर।बस भगवान से मन ही मन कहती उन्हें ही मेरे वर रूप मे भेजना । राजकुमार ने तो मां से कहकर अपना बैझ हल्का कर लिया पर चंचला किसे कहती बेचारी की मां बचपन मे ही मर गयी थी और पिता के आगे एक बेटी ऐसी बात कैसे कहे ।बस मन ही मन भगवान को धयाती रहती कि कोई तो मिलन का रास्ता निकलेगा। 
एक दिन चंचला कबीले मे अपने खेमे मे सोई थी कि अचानक से उसके मुंह पर किसी ने हाथ थख दिया।

(क्रमशः)

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रचनाएँ
क्या यही प्यार है?
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क्या आज की युवा पीढ़ी प्यार का मतलब जानती है ....नहीं।बस आज कल के युवा लैला मजनूं,शीरी फरहाद,इन की कहानी पढ़कर उन राहों पर निकल पड़ते हैं। प्यार पाना ही नहीं होता। प्यार के लिए मर मिटना भी प्यार है। सदियों तक किसी का इंतजार भी प्यार है। आइए हम और आप जाने चंचला के प्यार को अपने अपने नजरिए से।
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